Sshree Astro Vastu

मानसिक तनाव योग: चन्द्र पीड़ा से मन की व्यथा।

बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 80, श्लोक 4

क्षीणेन्दौ पापसंयुक्ते पापक्षेत्रगतेऽपि वा। मनोव्यथा भवेत्तस्य चिन्तया व्याकुलो भवेत्॥ 

 

मानसिक_तनाव_योग चन्द्रमा मन का अधिपति है, पाप ग्रह से क्लेशित होने पर यह योग निर्मित होता है`। `शनि, राहु, केतु, मंगल की युति अथवा दृष्टि से चन्द्र कलुषित हो जाता है । निद्रा भंग हो, मिथ्या भ्रम हो, अकारण भय हो, एकांत में अश्रु बहें । 20 वर्ष के पश्चात चिंता का विस्तार होता है, 38 वर्ष तक विषाद रहता है तथा निर्णय सामर्थ्य नष्ट हो जाता है। शुभ दृष्टि का अभाव हो तो उन्माद की सीमा तक स्थिति पहुंचे एवं औषधि से भी लाभ प्राप्त न हो। 

चन्द्रमा जल तत्व और मन का सीधा कारक है। शरीर में 70% जल है जो चंद्र से संचालित होता है। क्षीण चन्द्र अमावस्या के पास होता है, तब समुद्र में भी ज्वार नहीं उठता। वैसे ही मन में उत्साह की लहर नहीं उठती। पाप ग्रह की किरणें चन्द्र के शीतल प्रकाश को दूषित कर देती हैं, जैसे दूध में नींबू डालने से फट जाता है।

 

फलदीपिका, अध्याय 9, श्लोक 3  

शनि राहु युतश्चन्द्रे लग्ने वाप्यथवा यदि। चित्तोद्वेगो भवेत्तस्य स्वप्ने भूतादिदर्शनम्॥ 

 

चन्द्र_शनि_राहु युति लग्न अथवा चतुर्थ भाव में हो तो मन निरंतर उद्वेलित रहे`। `दुःस्वप्न आएं तथा काल का भय सताता रहे`। `किसी पर प्रत्यय न हो एवं आशंका वृद्धि को प्राप्त हो । गृह में अशांति व्याप्त रहे तथा कलह से चित्त खंडित हो

। 

लग्न देह है, चतुर्थ हृदय है। शनि भय है, राहु भ्रम है। तीनों मन के घर में बैठ जाएं तो ‘भय + भ्रम + देह’ मिलकर पैनिक अटैक बनता है। आधुनिक मनोविज्ञान इसे ‘Anxiety Disorder’ कहता है। स्वप्न में प्रेत दिखना राहु का मायाजाल है, क्योंकि राहु छाया ग्रह है जो अवचेतन को दूषित करता है

 

सारावली, अध्याय 20, श्लोक 14 

पापमध्यगते चन्द्रे पापैरपि निरीक्षिते। शोकमोहभयग्रस्तो भ्रमते दुःखपीडितः॥ 

 

पापकर्तरी_चन्द्र चन्द्र के उभय पार्श्व में पाप ग्रह हों तो पापकर्तरी योग का निर्माण होता है`। `मन प्रतिपल कर्तित होता रहता है`। `शोक, मोह, भय तीनों आवेष्टित कर लें`। `निर्जन में बैठकर क्रंदन करता है। 

 

कर्तरी का अर्थ कैंची है। आगे-पीछे पाप ग्रह हों तो चन्द्र रूपी मन कैंची के बीच फंसे कागज सा कटता है। मेडिकल भाषा में इसे ‘Sandwich Attack’ कहते हैं। दो तरफ से दबाव पड़ने पर नसें दबती हैं, सेरोटोनिन घटता है, डिप्रेशन बढ़ता है

 

01.मनोव्यथा योग सूत्र

बृहत् जातक, अध्याय 20, श्लोक 2  

चन्द्रे पापसमायुक्ते केन्द्रे पापसमन्विते। शुभदृष्टिविहीने च मनोव्याधिर्विनिर्दिशेत्॥ 

 

चन्द्र_पीड़ित मात्र से मानसिक तनाव योग नहीं बनता एवं यह अपूर्ण कथन है । शास्त्र में 3 शर्त एक साथ पूर्ण होना आवश्यक है तथा तीनों का समागम अनिवार्य है । 

 

चन्द्र_निर्बल कृष्ण पक्ष, अमावस्या, नीच वृश्चिक, शत्रु राशि में हो । शुक्ल पक्ष, पूर्णिमा, उच्च वृष, स्वराशि कर्क में हो तो योग भंग । 

पूर्णिमा का चन्द्र 100% प्रकाश देता है, मन को बल मिलता है। अमावस्या का चन्द्र 0% प्रकाश देता है, मन अंधकार में चला जाता है। वृश्चिक में चन्द्र नीच होता है क्योंकि वृश्चिक ‘बिल’ है, चन्द्र ‘जल’ है। बिल में जल गिरते ही अदृश्य हो जाता है, वैसे ही मन की शक्ति लुप्त हो जाती है।

 

पाप_प्रभाव शनि, राहु, केतु, मंगल से युत, दृष्ट या पाप मध्य में हो। गुरु, शुक्र, बुध, शुक्ल चन्द्र से युत-दृष्ट हो तो रक्षा हो जाती है। 

 गुरु का प्रकाश सबसे शुभ है। गुरु की दृष्टि चन्द्र पर हो तो ‘गजकेसरी योग’ बनता है। गजकेसरी में हाथी = गुरु, सिंह = चन्द्र। सिंह अकेला डरे, पर हाथी साथ हो तो जंगल का राजा बन जाए। वैसे ही पाप पीड़ित चन्द्र अकेला रोए, पर गुरु साथ हो तो मन का राजा बन जाए।

 

भाव_दूषित लग्न, चतुर्थ, अष्टम, द्वादश भाव में चन्द्र पाप युत हो। केन्द्र-त्रिकोण में शुभ युत हो तो मनोबल वर्धन होता है। 

 लग्न सिर है, चतुर्थ हृदय है, अष्टम गुप्तांग है, द्वादश शय्या है। चारों ‘सुख स्थान’ हैं। इनमें चन्द्र पाप युत हो तो सुख के चारों स्तंभ गिर जाते हैं। जैसे मकान के चारों कोने कमजोर हों तो मकान गिर जाता है, वैसे ही मन गिर जाता है।

 

फल: तीनों शर्त पूर्ण हों तभी जातक विषाद से ग्रस्त हो, आत्महत्या तक विचार उत्पन्न हों । स्मृति लुप्त हो, निद्रा न आए, वैद्य परिश्रांत हो जाएं । अगर गुरु की दृष्टि हो तो जातक संत बनता है, रोगी नहीं होता । शुभ प्रभाव न हो तभी जीवन भार प्रतीत हो। 

 

लग्न_चन्द्र_पाप  लग्न में शनि-राहु चन्द्र हो तो बाल्यकाल से भीरु  अंधकार से त्रस्त रहे 

तर्क: लग्न प्रथम भाव है, बचपन है। बचपन में डर बैठ जाए तो ‘Childhood Trauma’ बनता है जो 38 वर्ष तक पीछा करता है।

 

चतुर्थ_चन्द्र_पीड़ा चतुर्थ में केतु-मंगल चन्द्र हो तो माता को क्लेश  गृह में चित्त न लगे तर्क: चतुर्थ माता है, चन्द्र भी माता है। दोनों पीड़ित हों तो ‘डबल मातृ दोष’। माता स्वयं दुखी हो तो बच्चा कैसे सुखी रहे? इसीलिए जातक घर से भागता है

 

अष्टम_चन्द्र_शोक अष्टम में शनि चन्द्र हो तो मृत्यु भय  प्रतिक्षण अनिष्ट की आशंका बनी रहे  

 

 अष्टम मृत्यु का घर है, शनि काल है। काल + मन + मृत्यु भाव = ‘Thanatophobia’ यानी मृत्यु का फोबिया। हर मिनट लगता है अब मरा तब मरा

द्वादश_चन्द्र_चिंता  द्वादश में राहु चन्द्र हो तो निद्रा न आए  औषधि से भी लाभ प्राप्त न हो 

 द्वादश शय्या सुख है, राहु धुआं है। शय्या में धुआं भर जाए तो नींद कैसे आए राहु-चन्द्र को ‘ग्रहण योग’ कहते हैं। ग्रहण में चन्द्र की रोशनी ढक जाती है, वैसे ही नींद ढक जाती है।

 

पंचम_चन्द्र_भ्रम। पंचम में पाप दृष्ट चन्द्र हो तो संतान चिंता। बुद्धि भ्रमित रहे।

पंचम बुद्धि है, संतान है। चन्द्र मन है। मन भ्रमित हो तो निर्णय गलत, निर्णय गलत तो संतान भी कष्ट में। इसीलिए पंचम का पीड़ित चन्द्र ‘Wrong Decision Maker’ बनाता है।

 

केमद्रुम_योग चन्द्र से द्वितीय- द्वादश में ग्रह न हों और केन्द्र में ग्रह न हों तो केमद्रुम योग  दरिद्रता और मानसिक क्लेश दे  चन्द्र राजा है। राजा अकेला हो, आगे-पीछे कोई मंत्री-सैनिक न हो, तो शत्रु घेर लें। केमद्रुम में चन्द्र अकेला होता है, इसलिए मन को शत्रु रूपी चिंता घेर लेती है। केमद्रुम = ‘के’ + ‘मद्रुम’ = बिना समूह के वृक्ष। अकेला पेड़ आंधी में गिर जाता है।

 

विष योग

स्रोत: जातक पारिजात, अध्याय 6, श्लोक 28 

शनि चन्द्र युतिर्लग्ने विषयोग इति स्मृतः। मन्दाग्निर्दुःखभाक् नित्यं जायते नात्र संशयः॥ 

 

शनि_चन्द्र_युति लग्न या सप्तम में हो तो विष योग निर्मित होता है। विष के समान कष्ट प्रदान करता है। 30 वर्ष के पश्चात विषाद में वृद्धि हो । 

 

शनि विष है, चन्द्र दूध है। दूध में विष मिल जाए तो ‘धीमा जहर’ बनता है। 30 वर्ष बाद इसलिए असर करता है क्योंकि शनि का अंक 8 है, 30 = 3+0 = 3, 8×3=24, 24+6=30। 30 वर्ष में शनि अपना पूरा चक्र दिखाता है। विष योग वाले को दूध पीने से भी गैस बनती है, क्योंकि मन ही विषाक्त हो गया

 

व्यक्तित्व: मुख मलिन, नेत्र सजल, अल्प बात पर रुदन, नकारात्मक विचारधारा। श्वेत-पीत वस्त्र से विरक्ति, एकांत प्रियता। 

आर्थिक स्थिति: 22 से 28 वर्ष तक विद्या भंग, 29वें वर्ष वृत्ति में अरुचि। 40 वर्ष तक औषधि में धन क्षय, 50 वर्ष तक एकाकीपन। 

पारिवारिक: माता से वियोग अथवा माता रुग्ण। पत्नी से मतभेद रहे। संतान अवज्ञा करे। 

बाधा_पक्ष: राहु चतुर्थ में हो तो गृह बंधन सा लगे, श्वास अवरुद्ध हो। केतु द्वादश में हो तो निद्रा में भयभीत होकर उठे। 

अंतिम जीवन: वार्धक्य में स्मृति ह्रास हो। मरण काल में कोई समीप न हो। 

 

05 उपाय

  1. चन्द्र शांति हेतु शिव अभिषेक

विधि: सोमवार को कच्चे दुग्ध से शिवलिंग का अभिषेक करें`। `ॐ नमः शिवाय 108 बार जपें। श्वेत पुष्प अर्पित करें। 16 सोमवार तक करें। 

दान: सोमवार को तंदुल + शर्करा + दुग्ध दान करें। 

लाभ: चन्द्र दोष, मानसिक व्यथा 16 सोमवार में शांत । निद्रा आने लगे। 

 शिव के मस्तक पर चन्द्र है। चन्द्र पीड़ित हो तो उसके स्वामी शिव को दूध चढ़ाओ। दूध चन्द्र की वस्तु है। स्वामी को प्रसन्न करो तो नौकर = चन्द्र अपने आप ठीक हो जाए। 16 सोमवार = 16 कला चन्द्र की। 16 सोमवार से पूरा चन्द्र बलवान।

 

  1. चन्द्र मंत्र अनुष्ठान

विधि: शुक्ल पक्ष सोमवार से “ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः” की 11 माला 43 दिन। रजत पात्र में जल स्थापित रखें। 

दान: पूर्णिमा को पायस + श्वेत वस्त्र दान। 

लाभ: मन शांत हो`। `भय दूर हो`। `एकाग्रता वृद्धि हो। 

श्रां श्रीं श्रौं बीज मंत्र हैं। ‘श’ अक्षर चन्द्र का है। 11 माला x 43 दिन = 473 माला = 51084 जप। 51 हजार जप से एक ‘पुरश्चरण’ होता है। पुरश्चरण से देवता सिद्ध होता है। चन्द्र सिद्ध हो जाए तो मन का राजा बन जाए।

 

  1. दुर्गा कवच पाठ

विधि: 40 दिन तक रात्रि काल में दुर्गा कवच का 1 पाठ करें। कर्पूर आरती करें। 

दान: नवमी को 2 कन्या भोजन + रक्त वस्त्र। 

लाभ: नकारात्मक ऊर्जा, दुःस्वप्न 40 दिन में निवृत्त। मन में साहस आए। 

: राहु भ्रम है, केतु भय है। दोनों ‘असुर’ हैं। दुर्गा ‘असुर नाशिनी’ हैं। कवच = कवच। 40 दिन पाठ से मन के चारों ओर ऊर्जा का कवच बन जाता है, राहु-केतु की निगेटिव किरणें प्रवेश नहीं कर पातीं

 

  1. मोती धारण प्रयोग

विधि: शुक्ल पक्ष सोमवार को 4 रत्ती मोती रजत में कनिष्ठा अंगुली में धारण करें। चन्द्र होरा में धारण करें। 

दान: धारण के उपरांत श्वेत गौ को तंदुल खिलाएं। 

लाभ: चिन्ता निवारण हो`। `मन प्रफुल्लित रहे`। `संबंध मधुर हों। 

: मोती चन्द्र का रत्न है। चन्द्र जल में बनता है, मोती भी सीप में जल से बनता है। ‘सम-सम को खींचता है’। निर्बल चन्द्र को बलवान चन्द्र का रत्न खींचकर बल देता है। कनिष्ठा बुध की अंगुली है, बुध नसों का कारक। मोती की तरंगें नसों से मस्तिष्क तक जाकर सेरोटोनिन बढ़ाती हैं।

 

यह योग मन-बीज योग है एवं पूर्व जन्म के कर्म का प्रतिफल है। मन चपल है तो चन्द्र दूषित होगा। ग्रह विकार प्रदान करते हैं, मंत्र शांति प्रदान करते हैं, दान पुण्य प्रदान करता है, पर ध्यान तुम्हें करना है। 

 

सार सूत्र: मानसिक तनाव = चन्द्र + पाप + निर्बलता तथा मनोरोग का मार्ग है। योग विकृत हो तो उन्माद, वैराग्य, आत्मघात, कुल क्षय प्राप्त हो। योग संस्कृत हो तो संत, वैरागी, मनोवैज्ञानिक बनकर भी कीर्ति प्राप्त हो। 

 

अतः शिव को जल, दुर्गा को रक्त पुष्प, चन्द्र को दुग्ध, गौ को चारा दो एवं नवग्रहों का आश्रय लो चारों मिलकर मन को शांत कर दें एवं सुख प्रदान कर दें। 

 

अंतिम वाक्य: ध्यान कर, जप कर, सत्संग कर, चिंता मत कर, पर कुंडली में चन्द्र पीड़ा अवश्य देख एवं समय रहते उपाय कर ले। `क्योंकि ग्रह ही मन की दशा निर्धारित करते हैं एवं शांति प्रदान करते हैं।

चतुर्थ भाव  घर, भूमि, माता और गृह-सुख का रहस्य

केमद्रुम दरिद्र योग

एक गरीब ब्राह्मण रोज विष्णु *सहस्त्रनाम पढ़ता था और उसके घर चमत्कार* होने लगे

आप सभी लोगों से निवेदन है कि हमारी पोस्ट अधिक से अधिक शेयर करें जिससे अधिक से अधिक लोगों को पोस्ट पढ़कर फायदा मिले |
Share This Article
error: Content is protected !!
×