
हाल ही में जब भी कोई शादी का निमंत्रण आता है, तो मैं सबसे पहले यह देखने के बजाय कि शादी कहाँ है और तारीख क्या है, कार्ड की आखिरी पंक्ति देखता हूँ।
“आपका आशीर्वाद ही हमारा उपहार।”
यह पंक्ति दिखाई देती है तो सबसे पहले अच्छा लगता है। चलो! लोग बदल रहे हैं। बेवजह नेग, उपहार, लिफाफे और इन सारी औपचारिकताओं से कोई तो बाहर निकल रहा है। लेकिन यह संतोष लगभग तीस सेकंड तक ही रहता है।
फिर घर से सवाल आता है,
“तो लिफाफा नहीं ले जाना है ना?”
“नहीं। साफ-साफ लिखा है।”
“हाँ… लेकिन एक साथ ले चलें क्या?”
यहीं से हमारे सिद्धांतों का पतन शुरू हो जाता है।
“क्यों?”
“देना थोड़े ही है। अपने पास रखा हुआ अच्छा रहता है।”
यह तर्क मुझे हमेशा पसंद आता है। वह लिफाफा बिल्कुल गाड़ी के स्पेयर टायर जैसा होता है। इस्तेमाल नहीं करना है, लेकिन परिस्थिति कब बिगड़ जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता।
फिर एक खाली लिफाफा लिया जाता है। उसमें पैसे रख दिए जाते हैं। ऊपर नाम नहीं लिखा जाता। क्योंकि अभी भी हम वैचारिक रूप से ‘आशीर्वाद ही हमारा उपहार है’ वाली विचारधारा के साथ खड़े होते हैं।
शादी में पहुँचने के बाद मेरे अंदर का समाजशास्त्री जाग जाता है। दूल्हा-दुल्हन को देखने से पहले मैं लोगों के हाथों को देखने लगता हूँ।
एक परिवार आया। खाली हाथ। बहुत बढ़िया!
दूसरे आए। हाथ में सिर्फ मोबाइल। शानदार!
तीसरे आए। महिला के हाथ में एक बड़ा-सा पर्स है। संदेहास्पद।
लेकिन ध्यान से देखने पर उसमें से सिर्फ रुमाल और मोबाइल निकलता है। जान में जान आती है।
धीरे-धीरे यकीन होने लगता है कि लोगों ने निमंत्रण पत्र में लिखी बात को गंभीरता से लिया है। हम भी जेब से लिफाफा नहीं निकालते।
बल्कि मन ही मन मेजबानों की तारीफ शुरू हो जाती है।
कितना अच्छा विचार है!
आखिर शादी का मतलब ही लोगों का एक साथ आना है। पैसों का लेन-देन क्यों?
मेरे अंदर का समाज सुधारक अभी-अभी जन्म ले ही रहा होता है कि तभी हॉल के दरवाजे से वह आती है।
हर शादी में वह होती है।
कभी बुआ। कभी मौसी। कभी माँ के मामा के बेटे की पत्नी।
रिश्ता चाहे कोई भी हो, उसकी चाल से एक बात बिल्कुल साफ होती है—आज के कार्यक्रम में कुछ फैसले लेने का अधिकार उसने अपने पास सुरक्षित रखा हुआ है।
और उसके हाथ में होता है एक बहुत बड़ा डिब्बा।
वह डिब्बा इतना बड़ा होता है कि उसमें आखिर क्या होगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल होता है।
डिनर सेट हो सकता है, मिक्सर हो सकता है, चाँदी की कोई चीज हो सकती है या गृहस्थी शुरू करने के लिए कोई ऐसा उपकरण, जो अगले पंद्रह साल तक अलमारी की सबसे ऊपर वाली शेल्फ पर पड़ा रहने वाला हो।
अब मेरा पूरा ध्यान उसी पर होता है।
वह सीधे स्टेज पर चढ़ती है।
दुल्हन उम्मीद के मुताबिक विरोध करती है।
“अरे, क्यों लेकर आईं? हमने कहा था ना कि कुछ भी मत लाना!”
इस पर बुआ जिस नजर से उसे देखती है, उससे दुल्हन को उसी क्षण अपनी शादी में अपने सीमित अधिकार का एहसास हो जाता है।
“तुम लोग लिखते रहो कुछ भी! मैं तुम्हारी बुआ हूँ!”
डिब्बा उसके हाथ में थमा दिया जाता है।
फोटोग्राफर ठीक उसी समय सक्रिय हो जाता है।
“मैडम, इधर देखिए… सर थोड़ा पास आइए… यस… स्माइल प्लीज!”
क्लिक!
बस्स।
उस एक क्लिक के साथ पूरे हॉल की मौद्रिक नीति अचानक बदल जाती है।
मेरा हाथ अनजाने में जेब की तरफ चला जाता है।
लिफाफा है।
अच्छा हुआ!
आसपास देखता हूँ।
मेरे जैसे तीन-चार लोग अचानक गंभीर दिखाई देने लगते हैं।
कोई अपनी पत्नी के कान में पूछता है,
“हमारा लिफाफा लाए हैं ना?”
उसके चेहरे पर तुरंत वह सार्वभौमिक संतोष दिखाई देता है—
“मैंने कहा था।”
इन चार शब्दों में शादी से पहले के पैंतीस साल के वैवाहिक अनुभव की पूरी जीत समाई होती है।
फिर भी हम तुरंत लिफाफा नहीं निकालते।
क्योंकि अभी भी एक उम्मीद होती है।
वह करीबी बुआ है। उसका अलग है। बाकी कोई नहीं देगा।
लेकिन तभी एक अंकल उठते हैं।
स्टेज पर जाते हैं।
जेब से लिफाफा निकालते हैं।
दूल्हे के हाथ में देते हैं।
पहला किला गिर जाता है।
फिर दूसरा उठता है।
फिर तीसरा।
अब जेब में लिफाफा रखे हुए आदमी का धैर्य जवाब देने लगता है।
मैं भी उठता हूँ।
और दो मिनट पहले जिस चीज को हम पुरानी सामाजिक प्रथा समझ रहे थे, वही लिफाफा अब पूरी श्रद्धा के साथ दूल्हा-दुल्हन के हाथ में देकर वापस आ जाते हैं।
असल समस्या उन बेचारे लोगों की होती है जिन्होंने निमंत्रण पत्र पढ़ा और मेजबानों पर विश्वास कर लिया।
वे कुछ भी लेकर नहीं आए होते।
उनके चेहरे की शांति धीरे-धीरे गायब होने लगती है।
मेरे एक परिचित ने ऐसी ही एक शादी में धीरे से मुझसे पूछा था,
“तुम्हारे पास कोई खाली लिफाफा है?”
मैंने कहा,
“नहीं।”
उसने मेरी तरफ ऐसी नजर से देखा, जैसे दोस्ती के सबसे कठिन समय में मैंने उसे अकेला छोड़ दिया हो।
फिर उसने दूसरे से पूछा।
फिर तीसरे से।
पाँच मिनट के अंदर शादी के मंडप में एक छोटा-सा अंडरग्राउंड लिफाफा नेटवर्क तैयार हो गया।
किसी ने कहा,
“गाड़ी में कोई पुराना पड़ा होगा।”
एक उत्साही सज्जन तो बाहर स्टेशनरी की दुकान है या नहीं, इसकी जानकारी जुटाने लगे।
अब मजेदार बात यह है कि लिफाफा मिल जाने के बाद भी समस्या खत्म नहीं होती।
बल्कि असली सवाल तो उसके बाद शुरू होता है।
“कितने रखने हैं?”
“501?”
“कम लगेंगे।”
“तो 1001?”
“हमारे पास इतने हैं क्या?”
“उन्होंने हमारे बेटे की शादी में कितने दिए थे?”
और इसी क्षण घर का कोई बुजुर्ग अचानक RBI के आर्काइव डेटाबेस की तरह काम करने लगता है।
“उन्होंने 2011 में अर्चित के मुंडन में 501 दिए थे।”
मुझे इस याददाश्त पर हमेशा आश्चर्य होता है।
मुझे कल दोपहर मैंने क्या खाया था, यह याद नहीं रहता।
लेकिन हमारे घर के किसी कार्यक्रम में 2011 में किसने कितने रुपये का नेग दिया था, यह कुछ लोगों को आज भी बिल्कुल सटीक याद रहता है।
आखिरकार रकम तय होती है।
लिफाफा तैयार होता है।
वह दूल्हा-दुल्हन को दिया जाता है।
और इंसान वापस अपनी कुर्सी पर आकर चुपचाप बैठ जाता है।
उसके चेहरे पर उपहार देने की खुशी नहीं होती।
बल्कि ऐसा सुकून होता है जैसे इमिग्रेशन पार करने के बाद पासपोर्ट पर मुहर लग गई हो।
मुझे इस पूरे नाटक में वह दूर की बुआ बहुत महत्वपूर्ण लगती है।
क्योंकि वह सिर्फ एक डिब्बा लेकर नहीं आई होती।
उसने हम सबके मन में छिपा हुआ एक छोटा-सा सवाल सामने ला दिया होता है—
“लोग क्या कहेंगे?”
हमें नेग देना था या नहीं, यह सवाल गौण होता है।
बाकी सबने दिया और हमने नहीं दिया, तो हम कैसे दिखेंगे—असल सवाल यह होता है।
और मजेदार बात यह है कि यह सिर्फ शादी के लिफाफे तक सीमित नहीं है।
शादी कितनी बड़ी करनी है, कितने लोगों को बुलाना है, कितने गहने बनवाने हैं, जन्मदिन कहाँ मनाना है, बच्चों की शादी में क्या करना है—
हमें लगता है कि ये सारे फैसले हम अपनी क्षमता और अपनी इच्छा के अनुसार लेते हैं।
लेकिन वास्तव में हमारी जिंदगी के कई फैसलों के कोने में एक अदृश्य बुआ एक बड़ा-सा डिब्बा लेकर खड़ी होती है।
हम उसे अलग-अलग नाम देते हैं—
परंपरा।
प्रतिष्ठा।
रिवाज।
चार लोग क्या कहेंगे।
लेकिन उसका असली नाम शायद एक ही है—
“बाकी लोग क्या कर रहे हैं?”
इसलिए अगली बार अगर ऐसा निमंत्रण पत्र आए जिस पर लिखा हो—
“आपका आशीर्वाद ही हमारा उपहार है”
तो मैं मेजबानों की भावना का पूरा सम्मान करूँगा।
कुछ भी लेकर नहीं जाऊँगा।
दिल से आशीर्वाद दूँगा।
यह फैसला बिल्कुल पक्का है।
बस…
गाड़ी के डैशबोर्ड में दो-तीन खाली लिफाफे रखे हैं।
आखिर सामाजिक क्रांति करने में कोई बुराई नहीं है;
लेकिन उस शादी में बुआ कौन है, यह पहले से हमें कहाँ पता होता है!