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सर्वप्रथम गणेशजी की पूजा क्यों होती है?

हिन्दू धर्म में किसी भी सुबह कार्य को करने से पहले गणेश जी की पूजा करना आवश्यक मन गया है क्योंकि उन्हें विघ्नहर्ता व् ऋद्धि -सीधी का स्वामी कहा जाता है। इनके स्मरण, ध्यान, जप, आराधना से कामनाओ की पूर्ति होती है व् विघ्नों का विनाश होता है।

 

गणेश जी अतिशीघ्र प्रसन्न होने वाले बुद्दि के अधिष्ठाता और साक्षात् प्रणवरूप है। गणेश का अर्थ है – गणों का ईश अर्थात गणों का स्वामी। किसी पूजा आराधना, अनुष्ठान व् कार्य में गणेश जी के गण कोई विघ्न – बाधा न पहुंचाए, इसलिए सर्वप्रथम गणेश पूजन कर उनकी कृपा प्राप्त होती है।

 

प्रत्येक शुभकार्य के पूर्व “श्री गणेशाय नमः ” का उच्चारण कर यह मंत्र बोल जाता है :

 

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ |

 निर्विघ्नं कुरु में देव सर्वकार्येषु सर्वदा ||

 

अर्थात👉 “विशाल आकार और टेढ़ी सूंढ़ वाले करोडो सूर्यो के सामान ते वाले हे देव (गणेश जी) , समस्त कार्यो को सदा विघ्नरहित पूर्ण (सम्पन्न) करे।

 

वेदो में भी गणेश जी की महत्ता व् उनके विघ्नहर्ता सवरूप की ब्रह्मरूप में स्तुति व् आवाहन करते हुए कहा गया है की –

 

गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कबिनामु पश्रवस्तमम |

 ज्येष्ठराजं ब्र्ह्मण्णा ब्रह्मणसप्त आ न: शृण्वन्नतिभि: सीद सादनम||

 

अर्थात तुम देवगणो के प्रभु होने से गणपति हो, ज्ञानियों में श्रेष्ठ हो, उत्कृष्ठ ऋतिवलो में श्रेष्ठ हो, तुम शिव के ज्येष्ठ पुत्र हो, अतः हम आदर से तुम्हारा आव्हान करते है। हे ब्रह्मणसप्त गणेश, तुम अपने समस्त शक्तियों के साथ इस आसान पर आओ।

 

दूसरे मंत्र में कहा गया है की –

 

नि शु सीद गणपते गणेशु त्वामाहु विर्प्रत्म: कबिनाम |

 न रीते त्वत्त क्रियते की चनारे महामक मघवाक मघवचित्रमर्च ||

 

अर्थात👉 ‘हे गणपते’ आप देव आदि समूह में विराजिये क्योंकि समस्त बुद्धिमानो में आप ही श्रेष्ठ है, आपके बिना समीप या दूर का कोई कार्य नहीं किया जा सकता. हे पूज्य आदरणीय गणपति, हमारे सत्कार्यों को निर्विघ्न पूरा करने की कृपा कीजिये।

 

गणेशजी विधा के देवता है, साध्ना में उच्स्तरीय दूरदर्शिता आ जाये, उचित – अनुचित, कर्तव्य -अकर्तव्य की पहचान हो जाये, इसलिए सभी शुभकार्यो में गणेश पूजन का विधान बताया गया है।

 

गणेश जी की पूजा सबसे पहले क्यों होती है इसके पीछे एक पद्मपुराण की कथा भी है जो इस प्रकार है …

 

सृष्टि के आरम्भ में जब यह प्रसन्न उठा कि प्रथमपूज्य किसे माना जाए तो समस्त देवतागण ब्रह्मा जी के पास पहुंचे. ब्रह्मा जी ने कहा कि जो कोई पृथ्वी कि परिकर्मा सबसे पहले कर लगा, उसे ही प्रथम पूजा जायेगा. इस पर सभी देवतागण अपने-अपने वाहनों पर सवार होकर परिक्रमा हेतु चल पडे।

 

चूंकि गणेशजी का वाहन चूहा है और उनका शरीर स्थूल, तो ऐसे में वे परिक्रमा कैसे कर पाते! इस समस्या को सुलझाया देवर्षि नारद ने। नारद ने उन्हें जो उपाय सुझाया, उनके अनुसार गणेशजी ने भूमि पर “राम” नाम लिखकर उसकी सात परिक्रमा की और ब्रह्माजी के पास सबसे पहले पहुंच गए। तब ब्रह्माजी ने उन्हें प्रथमपूज्य बताया, क्योंकि “राम” नाम साक्षात् श्रीराम का स्वरूप है और श्रीराम में ही संपूर्ण ब्रह्मांड निहित है.

 

शिवपुराण में भी एक ऐसी ही कथा बताई गई है इसके अनुसार एक बार समस्त देवता भगवान शंकर के पास यह समस्या लेकर पहुंचे कि किस देव को उनका मुखिया चुना जाए। भगवान शिव ने यह प्रस्ताव रखा कि जो भी पहले पृथ्वी की तीन बार परिक्रमा करके कैलाश लौटेगा, वहीं सर्वप्रथम पूजा के योग्य होगा और उसे ही देवताओं का स्वामी बनाया जाएगा। चूंकि गणेशजी का वाहन चूहा था जिसकी गति अत्यंत धीमी गति थी, इसलिए अपनी बुद्धि-चातुर्य के कारण उन्होंने

देवर्षि नारद कै उपदेश दिया स्मरण किया , सच्चितानंद  भगवान का नाम की महिमा समझा  जो स्वयं उमा महेश कर रहे है

पुरुष प्रकृति

उसी नाम का भजन  सुमिरन कर रहे हे ऐसा जाना

 

*जेहि जाने नाम प्रभाऊ*

*प्रथम पूजिए तेहि गणराउ*

 

गणेश जी ने उस ५२ अक्षर से परे नाम का सुमिरन किया,और अपने पिता शिव और माता पार्वती की ही तीन परिक्रमा पूर्ण की और हाथ जोडकर खडे हो गए।

 

 शिव ने प्रसन्न होकर कहा कि तुमसे बढकर संसार में अन्य कोई इतना चतुर नहीं है। माता-पिता की तीन परिक्रमा से तीनों लोकों की परिक्रमा का पुण्य तुम्हें मिल गया, जो पृथ्वी की परिक्रमा से भी बडा है. इसलिए जो मनुष्य किसी कार्य के शुभारंभ से पहले तुम्हारा पूजन करेगा, उसे कोई बाधा नहीं आएगी। बस, तभी से गणेशजी अग्रपूज्य हो गए।

 

वाराहपुराण के अनुसार जब देवगणों की प्रार्थना सुनकर महादेव ने उमा की ओर निर्निमेष नेत्रों से देखा, उसकी समय के मुखरूपी से एक परम सुंदर, तेजस्वी कुमार वहां प्रकट हो गया. उसमें ब्रह्मा के सब गुण विद्यमान थे और वह दूसरा रूद्र जैसा ही लगता था. उसके रूप को देखकर पार्वती को क्रोध आ गया और उन्होंने शाप दिया कि हे कुमार! तू हाथी के सिर वाला, लंबे पेट वाला और सांपों के जनेऊ वाला हो जाएगा।

 

इस पर शंकरजी ने क्रोधित होकर अपने शरीर को धुना, तो उनके रोमों से हाथी के सिर वाले, नीले अंजन जैसे रंग वाले, अनेक शस्त्रों को धारण किए हुए इतने विनायक उत्पन्न हुए कि पृथ्वी क्षुब्ध हो उठी, देवगण भी घबरा गए। तब ब्रह्मा ने महादेव से प्रार्थना की, “हे त्रिशूलधारी! आपके मुख से पैदा हुए ये विनायकगण आपके इस पुत्र के वश मे रहें. आप प्रसन्न होकर इन सबकों ऐसा ही वर दें. तब महादेव ने अपने पुत्र से कहा कि तुम्हारे भव, गजास्व, गणेश और विनायक नाम के होंगे।

 

यह सब कू्रर दृष्टि वाले प्रचण्ड विनायक तुम्हारे भृत्य होंगे यज्ञादि कार्यो में तुम्हारी सबसे पहले पूजा होगी, अन्यथा तुम कार्य के सिद्ध होने मे विघ्न उपस्थित कर दोगे” इसके अनन्तर देवगणों ने गणेशजी की स्तुति की और शंकर ने उनका अभिषेक किया।

 

एक बार देवताओं ने गोमती के तट पर यज्ञ प्रारंभ किया तो उसमें अनेक विघ्न पडने लगे, यज्ञ संपन्न नहीं हो सका। उदास होकर देवताओं ने ब्रह्मा और विष्णु से इसका कारण पूछा। दयामय चतुरानन ने पता लगाकर बताया कि इस यज्ञ मे श्रीगणेशजी विघ्न उपस्थित कर रहे है और यदि आप लोग विनायक को प्रसन्न कर ले, तब यज्ञ पूर्ण हो जाएगा। विधाता की सलाह से देवताओं ने स्नान कर श्रद्धा और भक्तिपूर्वक गणेशजी का पूजन किया. विघ्नराज गणेशजी की कृपा से यज्ञ निर्विघ्न संपन्न हुआ।

 

तो इस प्रकार हम गणेश जी की सर्वप्रथम पूजा करते है ताकि काम में कोई बाधा ना आये !

 

बुधवार को गणेश जी की पूजा के लाभ

 

 

देवता भी अपने कार्यों की बिना किसी विघ्न से पूरा करने के लिए गणेश जी की अर्चना सबसे पहले करते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि देवगणों ने स्वयं उनकी अग्रपूजा का विधान बनाया है।

 

शास्त्रों में एक बार जिक्र आता है कि भगवान शंकर त्रिपुरासुर का वध करने में जब असफल हुए, तब उन्होंने गंभीरतापूर्वक विचार किया कि आखिर उनके कार्य में विघ्न क्यों पड़ा?

 

तब महादेव को ज्ञात हुआ कि वे गणेशजी की अर्चना किए बगैर त्रिपुरासुर से युद्ध करने चले गए थे। इसके बाद शिवजी ने गणेशजी का पूजन करके उन्हें लड्डुओं का भोग लगाया और दोबारा त्रिपुरासुर पर प्रहार किया, तब उनका मनोरथ पूर्ण हुआ।

 

सनातन एवं हिन्दू शास्त्रों में भगवान गणेश जी को, विघ्नहर्ता अर्थात सभी तरह की परेशानियों को खत्म करने वाला बताया गया है। पुराणों में गणेशजी की भक्ति शनि सहित सारे ग्रहदोष दूर करने वाली भी बताई गई हैं। हर बुधवार के शुभ दिन गणेशजी की उपासना से व्यक्ति का सुख-सौभाग्य बढ़ता है और सभी तरह की रुकावटे दूर होती हैं।

 

गणेश भगवान की सामान्य पूजा विधि

 

प्रातः काल स्नान ध्यान आदि से सुद्ध होकर सर्व प्रथम ताम्र पत्र के श्री गणेश यन्त्र को साफ़ मिट्टी, नमक, निम्बू  से अच्छे से साफ़ किया जाए।  पूजा स्थल पर पूर्व या उत्तर दिशा की और मुख कर के आसान पर विराजमान हो कर सामने श्री गणेश यन्त्र की स्थापना करें।

 

शुद्ध आसन में बैठकर सभी पूजन सामग्री को एकत्रित कर पुष्प, धूप, दीप, कपूर, रोली, मौली लाल, चंदन, मोदक आदि गणेश भगवान को समर्पित कर, इनकी आरती की जाती है।

 

अंत में भगवान गणेश जी का स्मरण कर ॐ गं गणपतये नमः का 108 नाम मंत्र का जाप करना चाहिए।

 

बुधवार को यहां बताए जा रहे ये छोटे-छोटे उपाय करने से व्यक्ति को लाभ प्राप्त होता है।

 

👉 बिगड़े काम बनाने के लिए बुधवार को गणेश मंत्र का स्मरण करें-

 

त्रयीमयायाखिलबुद्धिदात्रे बुद्धिप्रदीपाय सुराधिपाय। नित्याय सत्याय च नित्यबुद्धि नित्यं निरीहाय नमोस्तु नित्यम्।

 

अर्थात भगवान गणेश आप सभी बुद्धियों को देने वाले, बुद्धि को जगाने वाले और देवताओं के भी ईश्वर हैं। आप ही सत्य और नित्य बोधस्वरूप हैं। आपको मैं सदा नमन करता हूं। कम से कम 21 बार इस मंत्र का जप जरुर होना चाहिए।

 

👉 ग्रह दोष और शत्रुओं से बचाव के लिए-

 

गणपूज्यो वक्रतुण्ड एकदंष्ट्री त्रियम्बक:।

नीलग्रीवो लम्बोदरो विकटो विघ्रराजक:।।

धूम्रवर्णों भालचन्द्रो दशमस्तु विनायक:।

गणपर्तिहस्तिमुखो द्वादशारे यजेद्गणम्।।

 

इसमें भगवान गणेश जी के बारह नामों का स्मरण किया गया है। इन नामों का जप अगर मंदिर में बैठकर किया जाए तो यह उत्तम बताया जाता है। जब पूरी पूजा विधि हो जाए तो कम से कम 11 बार इन नामों का जप करना शुभ होता है।

 

परिवार और व्यक्ति के दुःख दूर करने के सरल उपाय

 

👉 बुधवार के दिन घर में सफेद रंग के गणपति की स्थापना करने से समस्त प्रकार की तंत्र शक्ति का नाश होता है।

 

👉 धन प्राप्ति के लिए बुधवार के दिन श्री गणेश को घी और गुड़ का भोग लगाएं। थोड़ी देर बाद घी व गुड़ गाय को खिला दें। ये उपाय करने से धन संबंधी समस्या का निदान हो जाता है।

 

👉 परिवार में कलह कलेश हो तो बुधवार के दिन दूर्वा के गणेश जी की प्रतिकात्मक मूर्ति बनवाएं। इसे अपने घर के देवालय में स्थापित करें और प्रतिदिन इसकी विधि-विधान से पूजा करें।

 

👉३२ पदों में के घर के विशिष्ट १-२ पद पर मुख्य दरवाजे  होने पर गणेशजी की प्रतिमा लगाने का नियम हे, घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

कोई भी नकारात्मक शक्ति घर में प्रवेश नहीं कर पाती हैं।

यह नियम वास्तु के केवल २ पदों पर कार्य करते  है

सभी ३२ पदों पर नहीं।

गणपति की प्रथम वन्दना होती है। गणपति प्रतीक हैं *Privacy निजता की सुरक्षा के।*

चाहे प्राण जायें शीश कटे किन्तु निजता भङ्ग न हो।

यही कथा है न कि माँ उमा ने कहा कि देखो कोई आने न पाये.

नमो व्रातपतये, नमो गणपतये,

नमः प्रमथपतये,

नमस्ते अस्तु लम्बोदराय एकदन्ताय,

विघ्ननाशिने शिवसुताय,

वरदमूर्तये नमः ||

 

गणेश-सरस्वती

१९८१ में भौतिक विज्ञान में नोबेल पुरस्कार पाने के बाद प्रोफेसर अब्दुल सलाम भुवनेश्वर आये थे तो उनके साथ २ दिन रहा था। उस समय मैने गणित एमएससी की परीक्षा थी थी तथा मूलतः भौतिक विज्ञान का छात्र होने के कारण उनसे चर्चा करने योग्य केवल मैं ही था  उनसे (योगेश चन्द्र) पति-सलाम सिद्धान्त का दार्शनिक आधार पूछा तो उन्होंने कहा कि हमारा वेदान्त दर्शन क्षेत्र सिद्धान्त (Field Theory) है। वे अविभाजित भारत में जमालपुर (मुंगेर, बिहार) के रेलवे संस्था से मेकेनिकल इंजीनियर थे, अतः अपने को भारतीय मान कर कह रहे थे। क्षेत्र सिद्धान्त में गिनती नहीं की जा सकती है। मैंने कहा कि वेद में दोनों है। जिस ज्ञान की गणना हो सके वह गणेश है, जिसकी गणना नहीं हो, रस या भाव युक्त है, वह सरस्वती है। श्री सलाम ने उपनिषदों के कई उदाहरण दिए, जो राधाकृष्णन की पुस्तक पर आधारित थे। मैंने कहा कि उन्होंने मूल ग्रन्थ नहीं देखे, केवल पाश्चात्य नकल की है। मुझे एक ही सन्दर्भ याद आया जो रामचरितमानस के आरम्भ में है-

वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।

मङ्गलानां च कर्तारौ वन्दे वाणी विनायकौ॥

वर्ण, अक्षर, शब्दों का समूह गिना जा सकता है, वह गणेश है। उसका अर्थ या भाव (रस) नहीं गिन सकते हैं, वह रसवती या सरस्वती है। सम्भवतः तुलसीदास का भी यही आशय था, यद्यपि किसी टीका में ऐसा नहीं लिखा है।

आज सरस्वती के इस अर्थ का वैदिक उद्धरण पहली बार देखा।

सभी ज्ञान सरस्वती तथा गणेश का समन्वय है। क्षेत्र में फैला रूप देवी या स्त्री है, कण या पिण्ड रूप पुरुष या देव है। केश पुल्लिङ्ग है, पर उसका समूह दाढ़ी, मूंछ, चोटी-सभी स्त्रीलिङ्ग हैं। सरस्वती तथा गणेश की पूजा संवत्सर के विपरीत भागों में होती है (माघ शुक्ल पञ्चमी, भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी)।

सभी प्रत्यक्ष विश्व या देव गणेश हैं जिनको गिन सकते हैं, जैसा गणपत्यथर्वशीर्ष में कहा है-त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मा असि –।

गणेश-सरस्वती का मिलित रूप सुब्रह्मण्य है (गोपथ ब्राह्मण का आरम्भ)। अलग अलग पिण्ड प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं, स्वेद से वे मिले हुए लगते हैं, वह सुब्रह्म है। जैसे प्रिण्टर में अलग अलग विन्दुओं को हम रेखा या अक्षर समझ लेते हैं। या तारा समूह को हम आकृति मानते हैं।

संलग्न लेख में दो शब्दों के वैकल्पिक अर्थ हैं-

तायमान (पालन) से ताई, ताऊ, तात हुआ है।

सुकृत का अर्थ लोक भाषा में अच्छा कार्य है। पर ब्रह्म द्वारा सृष्टि होने पर कर्म, कर्ता, क्रिया, आधार, सामग्री आदि सब एक ही ब्रह्म है। सबका मिलन सुकृत है।

यद्वै तत् सुकृतं रसो वै सः (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/७/२)

ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।

ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्म कर्म समाधिना॥ (गीता, ४/२४)

 

गणेश जी के ४ रूप-(१) विद्या रूप-विद्या दो प्रकार की है, जो प्रत्यक्ष वस्तु दीखती है, उनकी गणना। जिसकी गणना की जा सके, वह गणेश है। अतः गणपति अथर्वशीर्ष में कहा है-त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्माऽसि….। जो भाव रूप है या नहीं गिना जा सके वह रसवती = सरस्वती है। इनके बीच में पिण्डों के निकट रहने से उनको मिला कर एक रूप होने का बोध होता है-जैसे दूर-दूर के तारों में आकृति की कल्पना, या डौट-मैट्रिक्स प्रिण्टर में अलग -अलग विन्दुओं के मिलने से अक्षर की आकृति। ये विन्दु स्वेद (स्याही फैलने से) मिल जाते हैं अतः स्वेद ब्रह्म या सु-ब्रह्म हैं। अलग अलग पिण्डों का समूह प्रत्यक्ष (दृश्य) ब्रह्म है। ॐ ब्रह्म ह वा इदमग्र आसीत्… तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य सन्तप्तस्य ललाटे स्नेहो यदार्द्र्यमजायत। महद् वै यक्षं सुवेदं अविदामह इति।.. एतं सुवेदं सन्तं स्वेद इति आचक्षते॥१॥ सर्वेभ्यो रोमगर्त्तेभ्यः स्वेदधाराः प्रस्यन्दन्त। … अहं इदं सर्वं धारयिष्यामि…. तस्मात् धारा अभवन्॥२॥ (गोपथ ब्राह्मण पूर्व १/१-२)

दृश्य जगत् के ४ व्यूह (क्षर, अक्षर, अव्यय और परात्पर, या पाञ्चरार के वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध) हैं और उनसे विश्व का भद्र बना है अतः गणेश पूजा भाद्र शुक्ल चतुर्थी को होती है। विश्व का मूल अव्यक्त रस है, अतः वेदाङ्ग ज्योतिष में प्रथम मास माघ था अतः माघ में होता है। विद्या का वर्गीकरण अपरा-विद्या (= अविद्या) रूप में ५ स्तर का है, अतः सरस्वती पूजा माघ शुक्ल पञ्चमी को है। पुर रूप में दृश्य तत्त्व पुरुष है, अतः गणेश पुरुष देवता हैं। रस रूप केवल क्षेत्र दीखता है, जो स्त्री या श्री है अतः रस-विद्या स्त्री रूप सरस्वती है। दोनों विपरीत रूप संवत्सर के विपरीत विन्दुओं पर ६ मास के बाद आते हैं।

दो प्रकार के विद्या रूपों की स्तुति से तुलसीदास जी ने रामचरितमानस आरम्भ किया है-वर्णानां अर्थ संघानां रसानां छन्दसां अपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ, वन्दे वाणी विनायकौ॥ यहां वर्णों, का संघ प्रथम संख्येय अनन्त है, अर्थ असंख्येय अनन्त हैं और रस या भाव अप्रमेय अनन्त हैं-अनन्त के ये ३ शब्द विष्णु-सहस्रनाम में प्रयुक्त हैं।

(२) मनुष्य रूप-ब्रह्मा द्वारा लिपि निर्धारित करने के लिये जिनको अधिकृत किया गया उनको गणपति, अङ्गिरा, वृहस्पति आदि कहा गया है। ये अलग अलग युगों में भिन्न व्यक्ति थे।

गणानां त्वा गणपतिं हवामहे, कविं कवीनामुपमश्रवस्तम्।

ज्येष्ठराजं ब्रह्मणा ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नृतिभिः सीद सादनम्॥१॥

विश्वेभ्यो हित्वा भुवनेभ्यस्परि त्वष्टाजनत् साम्नः साम्नः कविः।

मूल लिपि ऋण चिह्न (रेखा—-) तथा चिद्-ऋण (रेखा का सूक्ष्म भाग विन्दु) के मिलन से बना था। देवों के लक्षण रूप वर्ण बने, ३३ देवों के लक्षण क से ह तक ३३ व्यञ्जन थे, १६ स्वर मिला कर ४९ मरुत् हैं, तथा ३ संयुक्ताक्षर क्ष, त्र, ज्ञ मिला कर क्षेत्रज्ञ (आत्मा) है। बाकी वर्ण अ से ह तक अहम् (स्वयम्) हैं। विन्दु-रेखा के ३ जोड़े २ घात ६ = ६४ प्रकार के चिह्न बना सकते हैं, प्राचीन चीन की इचिंग लिपि, टेलीग्राम का मोर्स कोड या कम्प्यूटर की आस्की लिपि। अतः ब्राह्मी लिपि में ६४ वर्ण हैं। आकाश में छन्द माप से सौर मण्डल का आकार ३३ धाम है-३ पृथ्वी के भीतर और ३० बाहर, इनके पाण ३३ देवता हैं। ब्रह्माण्ड (गैलेक्सी) का आकार ४९ है, प्रत्येक क्षेत्र १ मरुत् है, उसका आभा-मण्डल या गोलोक की माप ५२ है अतः इस प्रकार के देव रूप वर्णों का न्यास या नगर देवनागरी कहलाता है।

स ऋणया चिदृणया ब्रह्मणस्पतिर्द्रुहो हन्तमह ऋतस्य धर्तरि॥१७॥ (ऋक् २/२३/१, १७)

देवलक्ष्मं वै त्र्यालिखिता तामुत्तर लक्ष्माण देवा उपादधत…. (तैत्तिरीय संहिता ५/२/८/३)

(३) राज्य प्रमुख रूप-देश के लोगों का समूह गण है, उसका मुख्य गणेश या गणपति है। जैसे हाथी सूंढ़ से पानी खींचता है उसी प्रकार राजा भी प्रजा से टैक्स वसूलता है। मनुष्य हाथ से काम करता है अतः यह कर हुआ। हाथी का काम सूंढ़ से होता है, अतः वह भी कर हुआ। सूंढ़ क्रिया जैसा टैक्स वसूलते हैं, अतः टैक्स भी कर हुआ। कर वसूलने वाला या हाथी कराट है-

तत् कराटाय च विद्द्महे हस्तिमुखाय धीमहि , तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ।

(कृष्ण यजुर्वेदः – मैत्रायणी शाखा – अग्निचित् प्रकरणम् -११९ -१२०)

(४) विश्व रूपमें गणेश-प्रत्यक्ष पिण्डों का समूह गणेश है। पिण्ड रूप में स्वयम्भू मण्डल में १०० अरब ब्रह्माण्ड हैं, हमारे ब्रह्माण्ड में १०० अरब तारा हैं और इनकी प्रतिमा रूप मनुष्य के मस्तिष्क में १०० अरब कलिल (सेल) हैं, जो लोम का मूल होने से लोमगर्त्त कहे जाते हैं। जितने लोमगर्त्त शरीर में हैं उतने ही १ वर्ष मॆं हैं, ऐसा काल-मान भी लोमगर्त्त कहलाता है जो १ सेकण्ड का प्रायः ७५,००० भाग है। यह मुहूर्त्त को ७ बार १५ से विभाजित करने पर मिलता है। पुनः १५ से विभाजित करने पर स्वेदायन है, जो बड़े मेघ में जल विन्दुओं की संख्या है या उनके गिरने की दूरी (इतने समय में प्रकाश प्रायः २७० मीटर चलता है, उतनी दूरी तक हवा में वर्षा बून्दें अपना रूप बनाये रखतीं हैं–

पुरुषोऽयं लोक सम्मित इत्युवाच भगवान् पुनर्वसुः आत्रेयः, यावन्तो हि लोके मूर्तिमन्तो भावविशेषास्तावन्तः पुरुषे, यावन्तः पुरुषे तावन्तो लोके॥ (चरक संहिता, शारीरस्थानम् ५/२)

एभ्यो लोमगर्त्तेभ्य ऊर्ध्वानि ज्योतींष्यान्। तद्यानि ज्योतींषिः एतानि तानि नक्षत्राणि। यावन्त्येतानि नक्षत्राणि तावन्तो लोमगर्त्ताः। (शतपथ ब्राह्मण १०/४/४/२)

पुरुषो वै सम्वत्सरः॥१॥ दश वै सहस्राण्यष्टौ च शतानि सम्वत्सरस्य मुहूर्त्ताः। यावन्तो मुहूर्त्तास्तावन्ति पञ्चदशकृत्वः क्षिप्राणि। यावन्ति क्षिप्राणि, तावन्ति पञ्चदशकृत्वः एतर्हीणि। यावन्त्येतर्हीणि तावन्ति पञ्चदशकृत्व इदानीनि। यावन्तीदानीनि तावन्तः पञ्चदशकृत्वः प्राणाः। यावन्तः प्राणाः तावन्तो ऽनाः। यावन्तोऽनाः तावन्तो निमेषाः। यावन्तो निमेषाः तावन्तो लोमगर्त्ताः। यावन्तो लोमगर्त्ताः तावन्ति स्वेदायनानि। यावन्ति स्वेदायनानि, तावन्त एते स्तोकाः वर्षन्ति। (शतपथ ब्राह्मण, १२/३/२/५)

अतः गणेश को खर्व (१०० अरब) कहते हैं-खर्व-स्थूलतनुं गजेन्द्र वदनं …।

 

*यहां खर्व का अन्य अर्थ कम ऊंचाई का व्यक्ति भी है।*

पूरा विश्व ब्रह्म का १ ही पाद है-पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि (पुरुष सूक्त ३)। बाकी ३ पाद का प्रयोग नहीं हुआ अतः वह ज्यायान (भोजपुरी में जियान = बेकार) है। वह बचा रह गया अतः उसे उच्छिष्ट गणपति कहते हैं।

विश्व के सभी पिण्ड ब्रह्माण्ड, तारा, ग्रह, उपग्रह गोलाकार हैं, अतः गणेश का शरीर भी गोल बड़े पेट का है। भौतिक विज्ञान में जितने भी भिन्न दिशा के बलों का संयोग (त्रि-विक्रम) है, वह दाहिने हाथ की ३ अंगुलियों से निर्देशित होता है अतः इसे दाहिने हाथ के अंगूठे का नियम कहते हैं। स्क्रू या बोतल की ठेपी (ढक्कन) दाहिने हाथ से घुमाने पर ऊपर उठता है। गणेश की सूंढ भी इस दिशा में ( बायीं तरफ) मुड़ी है, उस दिशा में ठेपी घुमाने पर वह ऊपर उठेगा।

✍🏻आगे किसी दिन और,,,

विकिपीडिया में गणेश जी पर आलेख में मैंने पढ़ा कि गणेश जी की  “खोज”  कालिदास के बाद हुई क्योंकि  “कुमारसम्भव”  में गणेश जी का उल्लेख नहीं है ।

वहाँ मैंने जोड़ दिया कि  “कुमारसम्भव”  शब्द का संस्कृत में अर्थ है  “(गणेश जी के ज्येष्ठ भ्राता) कुमार का जन्म” । ज्येष्ठ भ्राता का जन्म होते ही कथा समाप्त है । छोटा भाई (गणेश जी) का जन्म ही नहीं हुआ था तो  “कुमारसम्भव”  में उनका उल्लेख कैसे होता ? मेरे वाक्य को हटा दिया गया और मुझे कहा गया कि विकिपीडिया में मैं अपने विचार नहीं जोड़ सकता, किसी  “प्रोफेसर”   समकक्ष व्यक्ति के विचार ही उद्धृत कर सकता हूँ । कालिदास के बाद गणेश जी की  “खोज”    सम्बन्धी बकवास उन लोगों ने किसी तथाकथित हिन्दू लेखक की पुस्तक से उद्धृत की थी । तब मैंने यजुर्वेद की मैत्रायणी शाखा से एक पूरा अध्याय ही उद्धृत कर दिया जिसमे महादेव जी के पूरे परिवार का सबके नामसहित वर्णन और उनकी पूजा के मन्त्र थे । यह तथ्य दो सौ सालों के झूठे प्रचार का खण्डन करता था जिसके अनुसार शङ्कर जी और गणेश जी अनार्यों के देवता थे क्योंकि वेदों में उनकी चर्चा नहीं है । झट से मेरे वाक्य को हटा दिया गया और मुझे उत्तर मिला कि मैत्रायणी संहिता का उपरोक्त अध्याय “प्रक्षिप्त”  है (अर्थात बाद में जोड़ा गया है)। मैंने जवाब दिया कि किसी भी वेद में कोई प्रक्षिप्त मन्त्र होने की बात संसार के किसी भी  “विद्वान”  ने कभी नहीं कही, अतः यह तुम्हारा व्यक्तिगत विचार है । यदि मैं अपने विचार विकिपीडिया में नहीं जोड़ सकता तो तुम भी नहीं जोड़ सकते । मैत्रायणी संहिता में प्रक्षिप्त अंश होने का उद्धरण किसी प्रोफेसर की किताब से लेकर आओ, वरना मैं विकिपीडिया की पञ्चायत बिठाऊँगा (arbitration committee) । तब जाकर उस आलेख में मेरे वाक्य जुड़ पाये । इस पूरे फालतू की बहस में मेरा एक महीना नष्ट हुआ (मैंने अनेक प्रमाण दिए जिन्हें उन लोगों ने प्रमाण मानने से इनकार कर दिया)। ऐसा मेरे सभी लेखों के साथ हुआ । 

✍🏻आगे पढ़े

 

मंगलाचरण का प्रारम्भ तुलसीदास जी ने दोहा/सोरठा रूप में ऐसे किया है ।

 

जो सुमिरत सिधि होइ गन नायक करिबर बदन।

करउ अनुग्रह सोइ बुद्धि रासि सुभ गुन सदन।।

 

इसमें तीन बाते आप समझिए । पहली दृष्टि से यह गणेश जी की वन्दना है ।

 

दूसरी दृष्टि से यदि आपको यह पहला छन्द समझ में आ गया तो कुटिल वामपन्थियों से बच जाएँगे । और तीसरी दृष्टि पोस्ट के अन्त में स्पष्ट हो जाएगी ।

 

पोस्ट प्रारम्भ :

 

“जो सुमिरत सिधि होइ” यहाँ पर तुलसीदास जी कहते हैं की जिसका स्मरण करने मात्र से सिद्धि मिल जाती है । अब प्रश्न उठेगा की किसके स्मरण मात्र से तो उत्तर दिया “ गन नायक “ अर्थात गणेश । केवल गणनायक कहकरके तुलसीदास जी नही रूके वो इस प्रश्न को और स्पष्टता से बताए वही गणनायक जो “करिबर बदन” है अर्थात जिसका सिर हाथी का और धड़ मनुष्य का है ।

 

अर्थात आँख से देखने में गणेश का रूप विलक्षण है पर इतने पर ही तुलसीदास जी नही रूके और बोले “बुद्धि रासि” वही गणेश जो बुद्धिमान भी हैं पर क्या केवल बुद्धिमान होना ही पर्याप्त है ? जी नहीं केवल किसी का बुद्धिमान होना समाज के लिए पर्याप्त नहीं होता जब तक वह “सुभ गुन सदन” अर्थात् वे गणेश जी जो बुद्धिमान भी हैं और सद्गुण उनमें निवास करता है ।

 

ऐसे आश्चर्यजनक दिखने वाले गणेश जी की मैं वन्दना करता हूँ , यह रहा पहला दृष्टिकोण ।

 

यहीं पर आप “ वामपन्थियों “ से अपना बचाव कर सकते हैं क्योकि बहुत से वामपन्थी ख़ूब पढे लिखे , डिग्री धारी, तर्क बुद्धि वाले बुद्धिमान हो सकते हैं पर यदि उनमें “ सद्गुण “ न हो अर्थात कपिल सिब्बल , मनु सिंघवी या रामचन्द्र गुहा जैसे व्यक्ति तर्क बुद्धि वाले बुद्धिमान तो है पर दुर्गुणों से भरे हुए है अत: समाज के लिए सङकट का ही यह कारण बन जाते हैं ।

 

अब तीसरा दृष्टिकोण देखिए , **जो सुमिरत  सिद्धि होइ*

*गन नायक करिबर बदन।*

*करउ अनुग्रह सोइ बुद्धि रासि सुभ गुन सदन।।**

 

अर्थात् जिनका, स्मरण करके जो गणेश जी न केवल गणनायक हो गए बल्कि बुद्धि और सद्गुणों के भी स्वामी और देवता हो गए उन “*नाम*“ को मैं प्रणाम करता हूँ ।

 

हम “ अनुग्रह “ भूल गए ।

 

अनुग्रह का सामान्य अर्थ कृपा या नम्रता विनम्र भाव के होने से होता है।

 

 परन्तु अनुग्रह का मूल अर्थ है वह क्रिया जिसमें गुरू, अपने पूरे का पूरा ज्ञान अपने शिष्य को दे दे अर्थात अनुग्रहित कर दे ।

 

यह थी भारतीय वैदिक शिक्षा व्यवस्था ।

गुरू को शाक्षात शिव माना गया है ।

 

आप एक सहस्त्र और IIT और IIM बना लीजिए , यदि अनुग्रह की भावना देस से समाप्त हो जाएगी तो आप टाई बाँधे नमूने ही पैदा कर सकते हैं ।

 

सनातन व्यवस्था में गणेश को अनुग्रह का देवता माना गया है । अब समझिये , वक्र का अर्थ होता है टेढ़ा मेढ़ा, और भ्रमण का मूल होता है भ्रम । अर्थात टेढ़े मेढ़े पथ से भ्रमित होने से बचने के लिए गुरू का अनुग्रह आवश्यक है ।

 

बिना गुरू के अनुग्रह के आप जीवन पर्यन्त इधर उधर भ्रमण करेंगे अर्थात भटकेंगे।

✍🏼आगे और हे

 

वामपंथी , कुरैशिवादी और कुछ निर्बुद्धि दुष्टों के दुष्प्रचार ने यह प्रचार करने में कोई भी कसर न छोड़ी भारत से बाहर वैदिक धर्म नही , जबकि सच यह है कि आज भी पूरी दुनिया मे हिन्दू पौराणिक देवी देवताओं की पूजा होती है । और खुद पूरी दुनिया के ज्यादातर बुद्धिस्ट मूर्तिपूजक और पौराणिक हिन्दू देवताओं के उपासक है यहां तक खुद बुद्ध का भी दलितवाद से कोई लेना देना नही है और न ही बुद्ध ने कभी भी दलितत्व को धारण किया , उन्होंने आर्यत्व को धारण किया ।

 

दोस्तो कुछ लोगों (पृथ्वी के सबसे निकृष्ट समूह ) के द्वारा एक प्रचार चलाया जाता है कि पौराणिक भगवान गणेश (बुद्धिमत्ता के प्रतीक) को पशु का मुँह लगा दिया गया कैसा भगवान है ये सब ब्राह्मणों का गुलाम बनाने का तरीका इत्यादि है  , देखो चीन , जापान बुद्ध देशो में जहां ये पाखण्ड नही है कितनी तरक्की की है उन्होंने , ऐसा ।

मित्रो आपको बताना चाहता हूँ , कि पूरी दुनिया मे सबसे ज्यादा आपके पुराणिक देव गणपति का ध्वजा फहरता है । जापान में भगवान गणेश को पूजा जाता है जिन्हें वहां Kangi-ten (歓喜天) कहा जाता है जापान में बुद्धिज़्म के Shingon Sect (सम्प्रदाय) में भगवान गणेश मुख्यरूप से पूजे जाते है । । इन गणपति को वहां bodhisattva Avalokiteshvara के नाम से भी जाना जाता है । जिनके अन्य नाम है –

Shō-ten (聖天) , Daishō-ten, Daishō Kangi-ten (大聖歓喜天),

Tenson (天尊) , Kangi Jizai-ten (歓喜自在天), Shōden-sama , Vinayaka-ten ,

Binayaka-ten (毘那夜迦天), Ganapatei (誐那缽底) and Zōbi-ten (象鼻天).

 

बर्मा में पुराणिक देव गणेशा को Maha Peinne (မဟာပိန္နဲ) के नाम से जाना जाता है । थाईलैंड में भगवान गणेश को Phra Phikhanet or Phra Phikhanesuan के नाम से जाना जाता है ।  श्री लंका में गणेश को Aiyanayaka Deviyo  के नाम से जाना जाता है । सिंघल द्वीप में गणेश को Gana deviyo के नाम से जाना जाता है ।

इसके अतिरिक्त चीन , कम्बोडिया , वियतनाम सहित सभी बौद्ध देशो में गणेश पूजे जाते है जापान में लगभग सभी शहरों में गणेश के मंदिर है । बुद्धिस्ट और पुराण पुस्तको में गणेश को विनायक के नाम से जाना जाता है । सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है मित्रो कि दुनिया के सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले देश इंडोनेशिया में भी पुराणिक देव गणपति का डंका बोलता है , यहां की 20000 की करेंसी पर गणेश की फ़ोटो है ।

 

 कुछ लोग अक्सर कहते है कि शिव आदि की पूजा जापान , चीन में नही होती देखो कितना तरक्की हुई है और यहा देखो ब्राह्मणों ने शिव भगवानो के नाम पर पाखण्ड फैला रखा है जिसका भारत के बाहर कोई वजूद नही है ।

मित्रो आपको बताना चाहता हूँ कि देवाधिदेव के नाम विख्यात शिव सुमात्रा देश में प्रमुख रूप से पूजे जाते है । इसके अतिरिक्त नेपाल , बाली,कम्बोडिया , श्री लंका में भी शिव की पूजा होती है । सिंधु घाटी के लोग भी शिव के पशुपति रूप को पूजते थे । जापान में शिव को ( Daijizai-ten or Daikokuten)  大自在天 के नाम से पूजा जाता है । बौद्ध गर्न्थो में शिव महाकाल के नाम से जाने जाते है । बौद्ध ग्रन्थ Saddharma Puṇḍarīka Sūtra एवम maya sutta शिव को ही समर्पित है । ऐसा कोई भी बुद्धिस्ट देश नही है जहाँ लिंग की पूजा नही होती हो , लिंग पूजा सभी बुद्धिस्ट देशो में होती है । तिब्बत , थाईलैंड जापान में बुद्ध के लिंग की विशेष रूप से पूजा होती है । बौद्ध देशो में penis (लिंग) फेस्टिवल भी मनाया जाता है , तिब्बत में बुद्ध मठो में और बुद्धिस्ट अपने घरों में बुद्ध के लिंग को घर के दरवाजे – द्वारों पर लगा के रखते है । यहां जानने योग्य यह है कि हिन्दू पुराणिकों में किसी भी ढंगे – बेढंगे पत्थर पर त्रिपुंड लगाकर शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है , जबकि तिब्बत , जापान , चीन में मानव लिंग की तरह (बुद्ध लिंग के नाम से) ही आकार का यह बड़े बड़े लिंग जुलूस निकाल कर फेस्टिवल मनाये जाते है । कहा जाता है कि लिंग की प्रतिमा बुरी आत्माओं को दूर रखती है और द्वेष भावना से बचाती है. धारणा ये भी है कि ऐसी पेंटिंग्स उर्वरता को बढ़ाती हैं.कई नि: संतान दंपति हर साल Chimi Lhakhang जो कि एक ‘उर्वरता मठ’ है, तीर्थ करने जाते हैं. यहां बौद्ध भिक्षु उन्हें आशीर्वाद में लकड़ी का लिंग देता है.।

✍🏼आगे कभी और

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