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तुझे किस किसने नहीं ध्याया मेरी माँ,भाग-8

चामुण्डा देवी ने जब युद्ध के अलावा कोई राह न छोड़ी तो फिर क्या हनुमान जी ने युद्ध किया राधारमण❓

नहीं,हनुमान जी बड़े चतुर व कुशाग्र बुद्धि वाले थे।इसलिये उन्होंने हाथ जोड़कर दुर्गा के पदतलों की रज वहाँ वहाँ से उठाकर, जहाँ जहाँ चामुण्डा विचरी थी,अपने मस्तक पर धारण करके,गदा जमीन पर रखकर, दोनों हाथ जोड़ करके माता भगवती को विनम्र निवेदन किया कि हे माँ❗आप एक बार मेरी समस्या तो सुनिए,तब आप निर्णय लीजिए।उसके बाद मैं चला जाऊंगा,मैं सत्य शपथ लेता हूँ।

मैं आपका प्रतिद्वंदी नहीं माता❗मैं न आपका शत्रु हूँ और न लंका का।मैं तो केवल प्रभु श्री राम जी का एक दूत हूँ।उनका पैगाम लेकर ही मुझे लंका के भीतर प्रवेश करना है और कोई मेरा मन्तव्य नहीं माँ❗

इस पर भी देवी शांत नहीं हुई अर्जुन और वे हनुमान से बोली।

रामभक्त हनुमान❗मैं जानती हूँ कि तुम कौन हो।मुझे तुम्हारे परिचय की जरूरत नहीं।लेकिन इतने पर भी मैं तुम्हें अंदर नहीं जाने दे सकती।

तुम्हारे राम वचन प्रेमी हैं। रघुकुल रीति सदा चली आई।प्राण जाए पर वचन न जाई।।

मैं भी वचन प्रेमी हूँ जो रावण को दे चुकी हूँ।अतः युद्ध में परास्त करके तो तुम भीतर जा सकते हो,अन्य कोई विकल्प है ही नहीं।उठाओ शस्त्र हनुमान❗

ठीक है माता।मैं आपको बाध्य भी कैसे करूँ मार्ग छोड़ने को और माँ पर शस्त्र भी कैसे उठाऊँ।लेकिन आप इतना तो बता दें कि क्या भगवती सीता माता लंका में हैं❓

बहुत चतुर बनते हो हनुमान❗लंका की प्रहरी से लंका की भीतरी बात पूछ रहे हो❓इतना कच्चा समझा है क्या मुझे।यहाँ तुम्हारी दाल न गलेगी हनुमान।आओ युद्ध करो मुझसे,नहीं तो लौट जाओ अपने स्वामी राम के पास।

अच्छा माँ, मैं कुछ प्रार्थना कर लूँ, तब तक आप अंदर तो नहीं चली जाएंगी क्योंकि आप चली गयी तो रही सही उम्मीद भी टूट जाएगी।जब तक मैं इष्टदेव को स्मरण करूँ,आप अंदर न जाना माँ👏

ठीक है हनुमान❗कर लो,जिस जिसको याद करना हो,मैं युद्ध से पीछे कदम न हटाऊंगी।या तो तुम वापस जाओगे,या मैं युद्ध में तुम्हें छकाऊँ।तीसरा कोई कार्य न होगा आज।करो याद अपने सम्बन्धियों को।

हनुमान ने प्रभु श्री राम जी को हृदय से नमन किया और कहा कि अगर मैं सच्ची निष्ठा से आपका दास हूँ तो मेरी सहायता करें।अब प्रार्थना करके फिर दुर्गा से विनय की,हे माता❗कृपया मेरी मदद करें,मुझे मार्ग दें।मैं आपसे जीत नहीं सकता क्योंकि आप जगजननी हैं।युद्ध की तो मैं सोच भी नहीं सकता माँ।

लेकिन चामुण्डा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

अब हनुमान जी ने शिव जी को हृदय कमल पर विराजमान करके प्रार्थना की,हे भोलेबाबा❗बड़ी विकट समस्या है।कृपया आइए,मेरे लिये नहीं तो प्रभु श्री राम के लिये ही आइए,पर विलम्ब न कीजिये भोलेबाबा।ॐ नमः शिवाय,ॐ नमः शिवाय,ॐ नमः शिवाय……जपते जपते हनुमत शिव में लीन हो गए और कुछ समय पश्चात भोलेबाबा प्रकट हुए।

बोलो हनुमान क्या चाहते हो❓

हे भोलेबाबा❗माँ को मनाएँ, मुझे राम काज को लंका में प्रविष्ट होने दें।

मैं विवश हूँ हनुमान❗चामुण्डा खुद लंका में प्रसन्न नहीं।इन्हें सीता अपहरण की बात ज्ञात है।परन्तु फिर भी अधर्मी की प्रहरी बनी हुई हैं।ये बात चामुण्डा को पीड़ित करती है, लेकिन ये क्या करें और मैं क्या करूँ❓क्या मैं इनसे धर्म से डिगने के लिये कहूँ, जो मुझे भी उचित नहीं लगता।या फिर रावण से विश्वासघात करने को कहूँ, जो मुझे उचित नहीं लगता।

तुम ही बताओ हनुमान,मैं तुम्हारी मदद कैसे करूँ।

हम त्रिदेव वचन भंग नहीं कर सकते,विश्वासघात नहीं कर सकते,युद्ध करोगे तो मैं दुर्गा की तो सहायता कर सकता हूँ क्योंकि मेरी धर्मपत्नी पार्वती की प्रतिरूप हैं।अतः पति होने के नाते मैं चामुण्डा का साथ ही दूँगा,जो मेरा दायित्व है।लेकिन मैं नहीं चाहता कि मैं तुम्हारे खिलाफ इस समर में खड़ा हो जाऊं क्योंकि श्री राम मेरे भी इष्ट हैं।अतः उनके कारज में मैं विघ्न क्यों बनूँ,ये मेरी भक्ति को कलंक लगेगा।क्या तुम मेरी जगह होते तो ऐसा करते हनुमान❓

लेकिन मैं माँ से युद्ध करूँ तो दुर्गा के प्रति निष्ठा को कलंक लगेगा भोलेबाबा❗

चलो राम जी के लिये मैं युद्ध करके कलंक भी लगवा लूँ ।लेकिन मैं इनसे जीत नहीं सकता भोलेबाबा❗फिर युद्ध का फायदा भी क्या भोलेबाबा❗और यदि राम काज किये बिना लौटा तो मेरी भक्ति पे कलंक लगेगा भोलेबाबा❗मेरे लिये कोई तो उपाय होगा भोलेबाबा❗

प्रिय हनुमान ❗क्या उपाय बताऊँ❓तुम दोनों में एक की हार निश्चित्त है।तुमने मेरी बड़े प्रेम से अभ्यर्थना की,इसलिये मैं तुम्हें इतना वचन देता हूँ कि न मैं तुम्हारी ओर से लड़ूँगा और न चामुण्डा देवी की ओर से।अब मैं जाता हूँ हनुमान।

मुझे आशीर्वाद तो देते जाओ भोलेबाबा❗युद्ध के लिये नहीं मांग रहा,विजय के लिये नहीं मांग रहा क्योंकि धर्म संकट देवी के लिये तो आपके लिये भी क्यों खड़ा करूँ।

मुझे आशीर्वाद दो कि मैं इस समस्या का समाधान पा जाऊँ।

मेरा भरपूर आशीर्वाद है हनुमान।तुम जरूर ऐसा कुछ करो,जिससे सारी बात बन जाये।तुम्हारा कल्याण हो हनुमान❗बुद्धि लड़ाओ।जहाँ चाह, वहाँ राह।

इतना कहकर शिवजी अंतर्ध्यान हो गए।

हनुमान जी ने फिर प्रार्थना की कि हे माता,माँ तो बच्चों के लिये अपना सब कुछ हार जाती है और बच्चे की जीत होते ही वह अपनी हार विजय में ही परिवर्तित देखती है।अगर रामकाज हो गया तो आपको गर्व होगा कि अभिमानी व पापी की नगरी में आपसे एक पुनीत काम हो गया,तब वह मेरी व रामजी की जीत नहीं होगी,आपकी ही विजय होगी माँ।कृपया मूझे मदद देकर मार्ग दें दें।

मुझे तुम जैसे साधु से यह उम्मीद नहीं थी हनुमान कि तुम वाणी के बल पर मुझे पिंघलाकर मुझसे रावण के साथ छल कपट करने को कहोगे❗

धर्म पर मिट जाना आसान नहीं हनुमान।आज मैं दगा करूँ तो मेरी ज्योति नष्ट हो जाएगी,जिसकी ज्योति घर घर जगती है।मेरी ज्योति में सत्य,त्याग,बलिदान,करुणा,कृपा,दया,तप,रक्षा व वरदान की शक्ति भरी हुई है हनुमान।तुम कैसे उस ज्योति के विरुद्ध मुझे सलाह दे रहे हो❓

छमा करो माँ❗ऐसी बात अब नहीं सोचूँगा।परन्तु मुझे आप ही कोई उपाय बता दें,जिससे आपका धर्म भी बना रहे और मेरा भी धर्म न डिगे,राम काज ही मेरा धर्म है।अब तक जो कुछ गलत वाणी बोली हो अथवा गलत कार्य किया हो तो मुझे गोदी का बालक जानकर छमा करें मेरी माता

ठीक है, क्षमा किया।अब बताओ वापस जा रहे हो या युद्ध करोगे मुझसे❓

हनुमान जी की आंखों से अश्रुधारा निकल आयी।माँ जो बिना युद्ध के ही आपसे हार गया हो,उस बालक से युद्ध की अपेक्षा क्यों माते❓

ठीक है हनुमान,तुम भी जाओ वापस,मैं भी लंका में अपनी गुफा में जाती हूँ।मेरे भी भोग आरती का समय होने को है।

ठहरो माँ❗मैंने युद्ध से हार मानी है, उपाय से नहीं।इसलिये आपको यहाँ से मुझे बिल्कुल ही हराकर जाना होगा।ये आमना सामना दो में से एक बात पर ही थमेगा अब।या तो आप मुझे रास्ता देंगी अथवा मैं ही कहूँगा कि अब मैं कभी लंका के द्वार पर नहीं आऊँगा।मैं आपकी बातों से हिम्मत नहीं हारा।

ठीक है हनुमान।मैं भी तब तक अब लंका में प्रवेश नहीं करूँगी,जब तक तुम्हें पूरी तरह विफल न कर दूँ।

अब क्या करोगे तुम हनुमान❗

कुछ सोच लूँ भगवती❗थोड़ा समय दें मुझे।

बिल्कुल हनुमान❗चाहे कितने दिन,महीने,वर्ष लगा लो क्योंकि ये सब बातें न लंका वासियों को पता और न रावण को क्योंकि मैंने सबकी दृष्टि में स्वयं को अदृश्य किया हुआ है।हर कोई मेरे दर्शन का अधिकारी नहीं।मेरी इस लीला में तुम भी किसी को दिखाई नहीं दोगे क्योंकि तुम जैसे भक्त को मैं लंका में गिरफ्त नहीं होने देना चाहती क्योंकि तुम नेक कारज के लिये ही मुझसे टकराये।आज तुम्हारा व मेरा धर्म ही टक्कर पर है।

हाँ, तो ढूँढू लो उपाय।

हनुमान जी विचार करते करते स्वयं में एकाग्र हो गए।बस यही बात समझ आयी कि जब भगवान भी काम न आएं तो गुरु की शरण अवश्य ग्रहण करनी चाहिये।शायद कुछ हल निकले।

क्रमशः●●●●●●●●●●

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