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क्या प्रेम सच्चा था, फिर भी रिश्ता अचानक खत्म हो गया।

क्या विवाह अपनी पसंद से हुआ, फिर वही रिश्ता कुछ समय बाद असहनीय लगने लगा। क्या गुण मिलाने के बाद भी घर में रोज कलह होती है? क्या जीवनसाथी के अलावा किसी तीसरे व्यक्ति की ओर मन खिंचने लगा क्या मुकदमा खत्म होने के बजाय बढ़ता जा रहा है क्या पैसा आता है लेकिन रुकता नहीं। क्या नौकरी ठीक चल रही थी और अचानक संकट खड़ा हो गया। क्या आपकी जिंदगी में एक परेशानी खत्म होने से पहले दूसरी परेशानी सामने आ जाती है। हर घटना को केवल खराब समय कह देना आसान है, लेकिन कई बार जन्मकुण्डली में वही ग्रह पहले से बैठे होते हैं जो समय आने पर जीवन के सबसे कमजोर हिस्से को पकड़ लेते हैं।।
1..क्या प्रेम बहुत गहरा होने के बाद भी विवाह से पहले टूट सकता है। यदि पंचमेश अर्थात प्रेम और भावनाओं का स्वामी षष्ठ भाव में बैठ जाए, पंचम भाव पर शनि की दृष्टि पड़े और पंचमेश जिस नक्षत्र में बैठा हो उसका स्वामी भी षष्ठ, अष्टम या द्वादश भाव से जुड़ा हो, तो प्रेम संबंध में बाधा केवल बाहर से नहीं आती, स्वयं ग्रहों की संरचना संबंध को कठिन बनाती है। यदि शुक्र भी राहु से पीड़ित हो और सप्तमेश का संबंध षष्ठेश से बन जाए तो प्रेम विवाह तक पहुँचते पहुँचते परिवार, दूरी, विरोध या गलतफहमी के कारण टूट सकता है। पंचमेश की दशा में षष्ठेश या राहु सक्रिय हो तो वर्षों पुराना संबंध भी अचानक निर्णायक मोड़ पर पहुँच सकता है।। 2..क्या जिस व्यक्ति के लिए सब कुछ छोड़ा, वही विवाह के बाद परेशानी का कारण बन सकता है। यदि पंचमेश और सप्तमेश आपस में जुड़े हों लेकिन दोनों पर षष्ठेश की दृष्टि हो, शुक्र पर शनि का प्रभाव हो और नवांश में सप्तमेश फिर से षष्ठ या अष्टम भाव से जुड़ जाए, तो प्रेम विवाह के बाद वही प्रेम लगातार विवाद में बदल सकता है। विवाह से पहले जो स्वभाव आकर्षक लगता था, विवाह के बाद वही असहनीय लग सकता है। यदि द्वितीयेश भी पीड़ित हो तो परिवार की वाणी, धन और घरवालों का हस्तक्षेप संबंध को और बिगाड़ सकता है। यहाँ केवल प्रेम विवाह का योग देखना पर्याप्त नहीं, विवाह के बाद सुख टिकेगा या नहीं यह सप्तम भाव, शुक्र और नवांश से देखना पड़ता है।। 3..क्या विवाह के बाहर किसी तीसरे व्यक्ति की ओर आकर्षण इतना बढ़ सकता है कि घर टूटने लगे। यदि शुक्र राहु के साथ बैठा हो, मंगल की दृष्टि शुक्र पर पड़ रही हो और शुक्र या राहु का नक्षत्र भी इसी संबंध को मजबूत कर रहा हो, तो विपरीत लिंग की ओर आकर्षण सामान्य नहीं रहता। यहाँ व्यक्ति को अपने चरित्र और संबंधों के मामले में बहुत सावधान रहना चाहिए। यदि सप्तमेश भी राहु या द्वादशेश से जुड़ जाए और पंचमेश इस योग में शामिल हो जाए तो गुप्त प्रेम संबंध बनने का खतरा बहुत बढ़ जाता है। नवांश में भी शुक्र या सप्तमेश इसी प्रभाव में हो और दशा में शुक्र, राहु या द्वादशेश सक्रिय हो जाए तो विवाह के बाहर बना संबंध वैवाहिक जीवन के लिए गंभीर संकट बन सकता है। 4..क्या अच्छे गुण मिल जाने के बाद भी पति पत्नी के बीच शांति नहीं रह सकती। यदि गुण मिलान अच्छा हो, लेकिन पहली कुण्डली का सप्तमेश षष्ठेश से पीड़ित हो, दूसरी कुण्डली में सप्तमेश पर शनि या राहु का प्रभाव हो, दोनों के शुक्र कमजोर हों और दोनों की नवांश कुण्डलियों में भी सप्तम भाव या सप्तमेश पीड़ित हो, तो गुणों की संख्या घर की शांति की गारंटी नहीं देती। विवाह के बाद स्वभाव, क्रोध, परिवार, धन और मानसिक दूरी सामने आ सकती है। इसलिए केवल गुण मिल गए, यह कहकर विवाह को सुरक्षित मान लेना बहुत अधूरा निर्णय है , बाकी दोनों की महादशा क्या चल रही है जरूर देखनी चाहिए, आगे के 20,25 साल कैसे रहेंगे,सब कुण्डली मै छुपा होता है ।। 5..क्या पति पत्नी का संबंध इतना बिगड़ सकता है कि तलाक की नौबत आ जाए। यदि सप्तमेश षष्ठ भाव में बैठा हो, षष्ठेश सप्तम भाव को देख रहा हो, शुक्र शनि या राहु से पीड़ित हो और अष्टमेश भी सप्तमेश से संबंध बना रहा हो, तो पति पत्नी के बीच विवाद केवल झगड़े तक सीमित नहीं रहता। बार बार वही समस्या लौट सकती है, समझौते के बाद फिर विवाद हो सकता है और अंत में साथ रहना ही भारी लग सकता है। यदि द्वादशेश भी इसमें जुड़ जाए और नवांश में यही स्थिति दोहर जाए तो अलगाव और तलाक की स्थिति गंभीर हो सकती है। ऐसी दशा में षष्ठेश, अष्टमेश, द्वादशेश या राहु की सक्रिय दशा बहुत निर्णायक हो सकती है। ये वोही समस्या है गुण मिलान किया और ग्रह महादशा नहीं देखी तब ये नौबत आती है ।। 6..क्या कोई पुरुष या स्त्री विवाह के बाद परगमन की ओर जा सकता है। यदि शुक्र राहु से युक्त हो, मंगल शुक्र को दृष्टि दे, सप्तमेश द्वादशेश से जुड़ा हो और राहु या शुक्र का नक्षत्र भी उसी संबंध को दोहरा रहा हो, तो विपरीत लिंग का आकर्षण मर्यादा की सीमा पार कर सकता है। यदि पंचमेश भी इसमें जुड़ जाए तो भावनात्मक संबंध और शारीरिक आकर्षण दोनों का पक्ष मजबूत हो सकता है। नवांश में शुक्र या सप्तमेश फिर राहु या मंगल से जुड़ जाए तो स्थिति को हल्का नहीं समझना चाहिए। ऐसे योग को केवल चरित्र का दोष कहकर छोड़ देना भी अधूरा है, क्योंकि ग्रहों का दबाव व्यक्ति की कमजोरी को किस समय सक्रिय करेगा, यह दशा से समझना पड़ता है।।
7..क्या आपकी प्रतिष्ठा वर्षों में बने और एक घटना में बिगड़ जाए। यदि सूर्य राहु के साथ बैठा हो, दशमेश अष्टमेश से जुड़ा हो, शनि दशम भाव को देख रहा हो और सूर्य या दशमेश का नक्षत्र स्वामी भी अष्टम या द्वादश से संबंध बना रहा हो, तो कलंक योग जैसी स्थिति बन सकती है। व्यक्ति के नाम, पद या प्रतिष्ठा पर आरोप, विवाद या बदनामी का ऐसा असर पड़ सकता है जिसे साफ करने में बहुत समय लगे। यदि दशमेश, सूर्य, राहु या अष्टमेश की दशा उसी समय सक्रिय हो जाए तो वर्षों की बनाई हुई प्रतिष्ठा पर एक घटना भारी पड़ सकती है।। 8..क्या कोर्ट केस खत्म होने के बजाय वर्षों तक चलता रह सकता है। यदि षष्ठेश अष्टमेश से युक्त हो, राहु षष्ठ भाव में बैठा हो, मंगल षष्ठेश को प्रभावित कर रहा हो और शनि भी इसी संरचना से जुड़ा हो, तो विवाद को समाप्त करना कठिन हो सकता है। एक तारीख दूसरी तारीख को जन्म दे सकती है, एक विवाद से दूसरा विवाद निकल सकता है और धन के साथ मानसिक शांति भी खर्च होती रह सकती है। यदि षष्ठेश का नक्षत्र स्वामी अष्टम या द्वादश से जुड़ा हो तो मामला और उलझ सकता है। षष्ठेश, अष्टमेश, शनि या राहु की दशा इस स्थिति को सक्रिय कर सकती है।। 9..क्या अपने ही व्यक्ति से ऐसा धोखा मिल सकता है जिसकी कल्पना भी न हो। यदि सप्तमेश या एकादशेश राहु से जुड़ा हो, अष्टमेश भी उसी ग्रह को प्रभावित करे और बुध कमजोर हो, तो भरोसे, साझेदारी या निजी जानकारी का गलत इस्तेमाल हो सकता है। यदि राहु संबंधित ग्रह के नक्षत्र में बैठा हो तो सामने वाला व्यक्ति शुरू में बिल्कुल भरोसेमंद दिखाई दे सकता है। बाद में धन, संबंध या किसी छिपी हुई बात से ऐसा नुकसान हो सकता है जिसे संभालना आसान न हो। अष्टमेश की दशा में यह बात अचानक सामने आ सकती है।। अकसर मेरे अनुभव मै दो राशि इसी है जिसमें अपने लोगों से धोखा मिलता है , कर्क और घनु राशि।। 10..क्या नौकरी हाथ में होते हुए भी अचानक छूट सकती है। यदि दशमेश अर्थात नौकरी और कर्म का स्वामी षष्ठ, अष्टम या द्वादश भाव में बैठा हो, दशम भाव पर शनि या राहु की दृष्टि हो, सूर्य कमजोर हो और दशमेश का नक्षत्र स्वामी भी अष्टम या द्वादश से जुड़ा हो, तो नौकरी में स्थिरता पर गंभीर दबाव बन सकता है। व्यक्ति काम ठीक कर रहा हो, फिर भी अधिकारी से विवाद, पद में बदलाव, स्थान परिवर्तन या अचानक नौकरी जाने की स्थिति बन सकती है। यदि दशमेश की दशा में राहु या शनि सक्रिय हो जाए तो घटना बहुत तेजी से सामने आ सकती है।। 11..क्या मेहनत आपकी हो लेकिन पदोन्नति किसी और को मिलती रहे। यदि दशमेश मजबूत दिखाई दे लेकिन एकादशेश कमजोर हो, एकादश भाव पर शनि की दृष्टि हो, सूर्य निर्बल हो और दशमेश का नक्षत्र स्वामी अष्टम या षष्ठ से जुड़ा हो, तो व्यक्ति काम करने के बाद भी उसका पूरा लाभ नहीं उठा पाता। काम का श्रेय किसी और को जाना, पदोन्नति अंतिम समय पर रुकना, वरिष्ठ का विरोध या मेहनत के अनुपात में सम्मान न मिलना ऐसी स्थिति में बार बार सामने आ सकता है।। 12..क्या खूब कमाने के बाद भी पैसा घर में टिक नहीं सकता। यदि द्वितीयेश द्वादश भाव में बैठा हो, द्वादशेश द्वितीय भाव को देखता हो, एकादशेश भी द्वादश से जुड़ा हो और राहु द्वितीय या एकादश भाव को प्रभावित कर रहा हो, तो धन आने के साथ ही उसके निकलने के रास्ते भी खुले रहते हैं। व्यक्ति कमाता अच्छा है, लेकिन बचत नहीं बनती। परिवार, ऋण, अचानक खर्च, गलत निवेश या ऐसी जिम्मेदारी सामने आती रहती है जहाँ जमा धन निकल जाता है। यदि द्वितीयेश का नक्षत्र स्वामी भी द्वादश से जुड़ा हो तो धन रोकना और कठिन हो सकता है।। 13..क्या कारोबार चलता रहे लेकिन पैसा फँसता जाए। यदि दशमेश या व्यापार से जुड़े ग्रह का संबंध अष्टमेश से हो, द्वितीयेश कमजोर हो, राहु धन और कारोबार दोनों को प्रभावित करे और शनि भी उसी संरचना पर दृष्टि डाले, तो कारोबार चलता हुआ दिखाई दे सकता है लेकिन भुगतान अटक सकते हैं। ग्राहक पैसा रोक सकते हैं, साझेदार हिसाब में उलझा सकता है या एक गलत निर्णय बड़ी रकम फँसा सकता है। यदि एकादशेश भी कमजोर हो तो कमाई की उम्मीद और वास्तविक प्राप्ति के बीच बहुत बड़ा अंतर बन सकता है।। 14..क्या कर्ज चुकाने के बाद फिर नया कर्ज खड़ा हो सकता है। यदि षष्ठेश मजबूत होकर द्वितीयेश को पीड़ित करे, राहु षष्ठ भाव में बैठा हो, शनि द्वितीय भाव को देख रहा हो और द्वितीयेश का नक्षत्र स्वामी भी षष्ठ या अष्टम से जुड़ा हो, तो ऋण का चक्र आसानी से समाप्त नहीं होता। एक कर्ज चुकाने के बाद दूसरा कारण सामने आ सकता है। कमाई का बड़ा हिस्सा पुराने दायित्वों में जा सकता है और व्यक्ति को लगेगा कि वह मेहनत कर रहा है लेकिन आर्थिक बोझ वहीं का वहीं है।। 15..क्या जमीन या मकान परिवार को जोड़ने के बजाय बाँट सकता है। यदि चतुर्थेश अर्थात घर और संपत्ति का स्वामी मंगल या राहु से पीड़ित हो, अष्टमेश भी चतुर्थ भाव या चतुर्थेश से जुड़ जाए और द्वितीयेश कमजोर हो, तो संपत्ति का विषय परिवार में बड़ा विवाद खड़ा कर सकता है। हिस्सेदारी, कागज, कब्जा या पैतृक अधिकार को लेकर अपने ही लोग आमने सामने आ सकते हैं। यदि शनि भी जुड़ जाए तो विवाद जल्दी समाप्त नहीं होता। चतुर्थेश या अष्टमेश की दशा में यह विषय अचानक सामने आ सकता है।। 16..क्या संतान सुख के बजाय सबसे बड़ी चिंता बन सकती है। यदि पंचमेश कमजोर हो, पंचम भाव पर शनि या राहु की दृष्टि हो, गुरु भी पीड़ित हो और पंचमेश का नक्षत्र स्वामी षष्ठ, अष्टम या द्वादश से जुड़ा हो, तो संतान से जुड़ा विषय लंबे समय तक चिंता दे सकता है। समस्या केवल संतान प्राप्ति तक सीमित नहीं रहती, संतान के स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वभाव या भविष्य को लेकर लगातार चिंता रह सकती है। यदि पंचमेश की दशा में अष्टमेश या राहु सक्रिय हो जाए तो यह चिंता और तीखी हो सकती है।। 17..क्या व्यक्ति अपनी ही बुद्धि से अपने लिए नुकसान का रास्ता खोल सकता है। यदि बुध राहु से युक्त हो, पंचमेश भी राहु से जुड़ा हो, चंद्रमा पर शनि की दृष्टि हो और पंचमेश का नक्षत्र स्वामी षष्ठ या अष्टम में बैठा हो, तो निर्णय लेने में भ्रम पैदा हो सकता है। व्यक्ति गलत व्यक्ति पर भरोसा कर सकता है, गलत समय पर नौकरी छोड़ सकता है, गलत साझेदारी कर सकता है या ऐसा निवेश कर सकता है जिसका नुकसान बाद में समझ आए। यहाँ समस्या केवल भाग्य की नहीं होती, निर्णय लेने वाले ग्रह ही गलत समय पर व्यक्ति को गलत दिशा में धकेल सकते हैं। 18..क्या बिना कारण मन में अनहोनी का डर बैठ सकता है। यदि चंद्रमा राहु से युक्त हो, शनि चंद्रमा को देख रहा हो और अष्टमेश भी चंद्रमा से जुड़ जाए, तो मन बार बार किसी अनहोनी की आशंका कर सकता है। छोटी बात बड़ी लग सकती है, अकेले रहने में घबराहट हो सकती है और भविष्य को लेकर मन लगातार आशंकित रह सकता है। यदि चंद्रमा का नक्षत्र स्वामी भी द्वादश या अष्टम से जुड़ा हो तो मानसिक दबाव और बढ़ सकता है। इसे किसी निश्चित दुर्घटना की भविष्यवाणी नहीं मानना चाहिए, लेकिन ऐसी ग्रह स्थिति में मन को संभालना और वास्तविक जीवन में सावधानी रखना बहुत जरूरी है।। 19..क्या एक परेशानी खत्म होते ही दूसरी सामने आ सकती है। यदि लग्नेश एक साथ षष्ठेश, अष्टमेश और द्वादशेश में से दो या तीन ग्रहों से जुड़ा हो, चंद्रमा भी पीड़ित हो और दशा क्रम में लगातार उन्हीं ग्रहों की सक्रियता आती रहे, तो व्यक्ति को सचमुच ऐसा लग सकता है कि परेशानी पीछा नहीं छोड़ रही। धन का संकट खत्म हुआ तो स्वास्थ्य सामने आ गया, स्वास्थ्य सुधरा तो संबंध बिगड़ गया, संबंध संभला तो नौकरी में संकट आ गया। यहाँ किसी एक ग्रह को दोष देना पर्याप्त नहीं, पूरी ग्रह श्रृंखला और दशा क्रम को देखना पड़ता है।। 20..क्या सफलता बिल्कुल सामने आकर भी हाथ से निकल सकती है। यदि नवमेश अर्थात भाग्य का स्वामी षष्ठ या अष्टम भाव में बैठा हो, पंचमेश भी कमजोर हो, गुरु निर्बल हो और पंचमेश तथा नवमेश के नक्षत्र स्वामी भी कठिन भावों से जुड़े हों, तो व्यक्ति कई बार सफलता के बिल्कुल पास जाकर रुक सकता है। नौकरी मिलने वाली होती है, निर्णय बदल जाता है। विवाह तय होता है, बात टूट जाती है। पैसा आने वाला होता है, भुगतान रुक जाता है। व्यक्ति मेहनत में कमी नहीं करता, लेकिन अंतिम परिणाम बार बार हाथ से निकलता है। यही वह स्थिति है जहाँ देखना पड़ता है कि भाग्य को रोक कौन रहा है।। 21..क्या जीवन में अचानक ऐसा मोड़ आ सकता है जहाँ सब कुछ बदल जाए। यदि लग्नेश अष्टमेश से जुड़ जाए, चतुर्थेश द्वादश से, दशमेश अष्टम से और राहु इन ग्रहों में से कई को एक साथ प्रभावित करे, तो परिवर्तन केवल एक क्षेत्र में नहीं आता। नौकरी बदल सकती है, रहने की जगह बदल सकती है, संबंध टूट सकता है, आर्थिक स्थिति बिगड़ सकती है और परिवार की पूरी व्यवस्था बदल सकती है। यदि दशा भी इन्हीं ग्रहों की चल रही हो तो वर्षों से स्थिर दिखाई दे रहा जीवन अचानक दूसरी दिशा में जा सकता है।। 22..आखिर कुण्डली में सबसे कठिन स्थिति किसे मानना चाहिए?? केवल शनि का बैठना, राहु का बैठना या मंगल की दृष्टि पड़ना अपने आप में अंतिम निर्णय नहीं है। असली कठिनाई तब बनती है जब एक ही समस्या को कुण्डली के कई ग्रह एक साथ पुष्ट करने लगें। विवाह का ग्रह कमजोर हो, उस पर राहु की दृष्टि हो, नक्षत्र स्वामी भी विवाह के लिए कठिन स्थिति में हो, नवांश में वही कमजोरी दोहर जाए और उसी समय उसी ग्रह की दशा चल रही हो, तब बात केवल एक सामान्य योग की नहीं रहती। तब ग्रह, नक्षत्र और समय तीनों एक ही विषय को सामने ला रहे होते हैं।। इसलिए यदि आपके जीवन में ऊपर लिखी कोई परिस्थिति केवल एक बार नहीं बल्कि बार बार उसी रूप में सामने आ रही है, तो किसी एक ग्रह को देखकर स्वयं निर्णय न लें। सम्पूर्ण कुण्डली में लग्न, भावेश, ग्रहों की दृष्टि, नक्षत्र स्वामी, नवांश, षड्बल, अष्टकवर्ग और महादशा अंतर्दशा को एक साथ देखकर ही पता चलता है कि आपकी परेशानी की असली जड़ कहाँ है। कुण्डली का सही विश्लेषण वह नहीं जो केवल यह बता दे कि कौन सा ग्रह कहाँ बैठा है, बल्कि वह है जो यह पकड़ सके कि आपके जीवन में बार बार वही समस्या क्यों लौट रही है और किस ग्रह के सक्रिय होते ही वह समस्या सबसे ज्यादा तीखी हो जाती है , एक अनुभवी ज्योतिषी सब बता सकता है , कुण्डली मै ही छुपा होता है सब राज ।।
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