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परशुराम की प्रतीक्षा में

‘संस्कृति के चार अध्याय’ में रामधारीसिंह दिनकर ने एक जगह लिखा है कि “जब हिंसा और धर्मसाधना के बीच संघर्ष उत्पन्न होता है, तब भारतवासी परशुराम की ही याद करते हैं।” यदि यह कथन सत्य है, तो यह भी सत्य है कि यह दौर परशुराम को ही याद करने का है। इसके साथ हम भारतवासियों को यह विचार भी स्थापित कर देना चाहिए कि परशुराम केवल ब्राह्मणों के नहीं, वे सम्पूर्ण मानवजाति के हैं।

 

यूँ भी परशुराम विष्णु के अवतार हैं, और दशावतारों में कोई भी अवतार किसी एक वर्ण का प्रतिनिधि बनकर नहीं आया। दशावतारों में वामन और परशुराम ही ब्राह्मणकुल में जन्मे, शेष सभी अन्य कुल में। लेकिन सभी अवतार किसी एक मूल्य को लेकर भी मानवता के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं। इसलिये परशुराम पर किसी का एकाधिकार नहीं।

नैतिक व्यवस्था की मांग को लेकर सदियों से समाज में जो वैचारिक युद्ध चलता आया है, उसके जनक तो परशुराम ही माने जाते हैं। मानवसभ्यता के इतिहास में परशुराम पहले क्रान्तिकारी हैं, जिन्होंने सत्य की रक्षा के लिये युद्ध को अनिवार्य बताया था। परशुराम का विचार था कि अपने भीतर बैठी राजसी और भोग-विलास में लिप्त शक्तियों के दमन के बिना सत्वगुणों का आवाहन किया नहीं जा सकता। अन्याय को सहन करते चले जाना पाप है। संघर्ष  किये बिना इस पाप से मुक्त नहीं हुआ जा सकता। यह धरती उन राजसी शक्तियों के नीचे दबी पड़ी है, जिन्होंने मनुष्यता को कुचला है और सत्य को अपना मुँह खोलने नहीं दिया। यही विचार था, जिसने उन पौराणिक कथाओं को जन्म दे दिया, जो यह कहती हैं कि परशुराम ने इक्कीस बार क्षत्रियों का वध किया, और पिता के कहने पर अपनी ही माता का वध कर डाला। हमें इन बातों से कुछ लेना-देना नहीं कि परशुराम ने २१बार क्षत्रियों का संहार क्यों किया, माता का वध कैसे किया या वे क्रोधी के रूप में क्यों सामने लाये गये। इन प्रश्नों के उत्तर मिल जाने से किसी भी जाति या वर्ण का कोई भला होता नहीं दिखाई देता।

 

परशुराम स्पष्ट रूप से वर्णव्यवस्था को अनुचित मानते थे। उनके पिता जमदग्नि ने वर्णेतर स्त्री से विवाह किया। शस्त्र विद्या सिखाते समय परशुराम ने ब्राह्मणों के साथ समान रूप से क्षत्रियों और शूद्रों को भी सुपात्र समझा। इसके असंख्य उदाहरण मिलते हैं।।परशुराम जीवनभर मनुष्यता के लिये नीतिशास्त्र बनाने में लगे रहे। अत्रि की पत्नी अनसूया, अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा और अपने प्रिय शिष्य अकृतवर्ण के साथ मिलकर परशुराम नारी जागरण अभियान चलाने वाले सबसे पहले क्रान्तिकारी थे।

 

परशुराम वैदिकयुग और ब्राह्मणयुग के संधिपुरुष हैं। वे एकमात्र ऋषि हैं, जो अवतारों में गिने गये। इसमें कुछ भी संदेह नहीं कि परशुराम विष्णु के आवेशावतार हैं। परशुराम शास्त्र में जीते हैं, किंतु अन्याय का सामना करने के लिये शस्त्र को पूजा की वस्तु नहीं मानते। बुद्धिजीवी होकर हाथ पर हाथ धरे बैठने वालों को अक्षम्य ठहराते हैं, और अन्यायी के विरुद्ध आवाज उठाने को उचित ठहराते हैं।

 

परशुराम को जानना हो, तो हमें पुराणों के उस पार ही जाना होगा। वे पुराणों में आई हुई कथा के पात्र बना तो दिये गये हैं, किन्तु वे पुराणों के युग में हैं नहीं। वे वैदिक मंत्रों के रचयिता हैं और बहुत सारे मंत्र उन्होंने अपने पिता जमदग्नि के साथ साझा किये हैं। ऋग्वेद के दशम मंडल में इस जमदग्निपुत्र की जितनी ऋचाएँ मिलती हैं, उनमें पहली बार उस ब्रह्मतेज का आलोक दिखाई देता है जो बाद में क्षात्रतेज को धूमिल करता नजर आया, और कई बार दोनों तेज मिल कर धरती-आकाश एक करते दिखाई दिये।

 

इतिहास में सबसे पहले राम तो यही हुए। परशु धारण करने के कारण ही ये परशुराम कहलाए। परशु ही क्यों ? क्योंकि उसी दौर में लोहे की खोज हुई और लोहे के आयुध सामने आये थे, अन्यथा एक दौर तो वह रहा है, जब मानव-अस्थियों से वज्र बनाये जाने के उदाहरण मिलते हैं। वेदों में वर्णित जीवनचर्या केवल अध्यात्म और देवतावाद में नहीं, युद्ध की सम्भावनाओं में भी दिखाई देती है। जमदग्निपुत्र राम कभी दशरथपुत्र राम से मिले हों, यह सम्भव नहीं लगता।

 

परशुराम ने युगधर्म का निर्वाह करने के लिये क्रोध की आवश्यकता को नैतिक करार दिया। बाली और रावण के विनाश में यही नीतिशास्त्र श्रीराम के काम आया। परशुराम की ब्रह्मनिष्ठ वीरता का संदेश कृष्ण ने गीता में अर्जुन को दिया। परशुराम ने बताया कि योद्धा में ही भगवान् होने की योग्यता है। अन्याय को सहन करने वाला और दब कर पड़ा रह जाने वाला मनुष्य  मरा हुआ है। भले ही उसने उच्चकुल में जन्म ले लिया हो, वह सम्मान का अधिकारी नहीं है।

 

दशावतारों में परशुराम छठे अवतार हैं। मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह और वामन के बाद परशुराम ही सम्पूर्ण मनुष्यता के अवतार है। यह अवतारवाद वास्तव में तो  जैविक विकासक्रम की ओर संकेत करता है। अवतारों में भी अकेले परशुराम ही है, जो ऋषि हो कर अप्रतिम योद्धा भी हैं। विष्णु के अवतारों में गिने जाने के कारण ही शायद परशुराम को भगवान् मान लिया गया, किन्तु वे किसी एक वर्ण या जाति के भगवान् नहीं हो सकते। भगवान् सबके होते हैं । राम क्षत्रिय होकर, और कृष्ण यादव होकर भी सबके हैं, उसी तरह परशुराम ब्राह्मण होकर भी हम सभी के हैं।

 

परशुराम आगाह करते हैं, कि सहिष्णु रहो चाहे जिस सीमा तक, किन्तु लोहा कभी भी ठंडा मत होने देना। जीवन अंततः एक भीषण युद्ध है, और इसे जीते बिना मुक्ति सम्भव है ही नहीं। इसलिये वे बार-बार कहते हैं – “योद्धा बनो ।” वे स्वयं को क्रान्तिकारी घोषित करते हैं,  पराक्रमी घोषित करते हैं, किन्तु कभी भगवान् घोषित नहीं करते। उनके अनुसार योद्धा के भीतर ही भगवान् का निवास है।

 

कोई कहते हैं कि परशुराम चिरजीवी हैं। यह सत्य है, क्योंकि परशुराम का काम अभी पूरा नहीं हुआ। यह भी हमारे सामने है कि पृथ्वी पर हिंसा चल रही है और धर्म साधना भी। इसलिये दिनकर जी के अनुसार चलें तो परशुराम का तीव्रता के साथ याद आने का भी यही कारण है।

 

सम्पूर्ण मानव जाति को परशुराम की प्रतीक्षा है।

 

महर्षि परशुराम

 

।। प्रथम ऊर्जा वैज्ञानिक ।।

।। प्रथम कृषि वैज्ञानिक ।।

महर्षि परशुराम जी के परिचय में निम्न उक्ति कहि गयी है

 

!! अग्रस्तस्त  चतुरो वेदा, पृष्टतम शरीरम धनु !!

 !! इदं ब्रम्हम इदं क्षात्रम, शापादपि शरादपि !!

अर्थ-

जिनके आगे आगे चारो वेद चलते है,जिनके शरीर के पृष्ठ भाग में धनुष होता है,ये ब्रम्ह (सृष्टि निर्माण की क्षमता रखने वाले)भी है और क्षत्र  (सृष्टि विनाश की क्षमता रखने वाले) भी है।ये श्राप भी दे सकते है और संहार भी कर सकते है।

यह परिचय है

 महर्षि परशुराम का।

 

और हमे क्या रटाया गया

इन्होंने अपने पिता के कहने पर माता का कत्ल किया,

इन्होंने 21 बार पूरी धरती पर से क्षत्रियों को मारकर समाप्त किया,

ये क्रोधी अभिमानी थे,

फरसा इनकी शक्ति है…आदि आदि बहुत सी मिथ्या धारणाएं बना दी गई है।

 

ये सब बातें उसी प्रोपोगेंडा का हिस्सा है जिसमे भारतीय मनीषियों ऋषियोँ के खोजों को आमजन से छुपाकर दूर रखकर अपना स्वार्थ पूरा कर सके।

 

आइये आज महर्षि परसुराम जी के जयंती पर इनके वैज्ञानिक खोजो पर चर्चा करते है।

 

 जयंत पोतदार जी की लिखित पुस्तक महर्षि परशुराम के आधार पर :-

महर्षि परसुराम में दो व्यक्तित्व के पूर्ण अनुभव होते है

एक- ये पूर्ण ऊर्जा वैज्ञानिक थे।

दो- ये पूर्ण कृषि वैज्ञानिक भी थे।

इन्होंने सृस्टि निर्माण करने वाली  सप्त ऊर्जा (शैलपुत्री…महागौरी) को प्रकट करने वाले सिद्धांत व कृति अग्निहोत्र प्रकट किया,इसीलिए हम इन्हें शक्ति के अवतार कहते है, न कि फरसा रखते है इसीलिए शस्त्र

तो हर हिन्दू देवता धारण करते है।

दूसरे

इनके जन्मदिन पर हम बीजो की पूजा करते है,क्योंकि इन्होंने ही कृषि  के लिए अनेकों तरह के बीजो का उत्पन्न किया ।

भारत मे धान, ज्वार,बाजरा,जौ,तिल, सरसो,अलसी,कोदो, कुटकी,मढ़िया,अरहर,मूंग,मटर,चना,धना,सब्जियो के अनेक तरह के बीज ऐसे ही ऋषियों ने दिए है,इन बीजो को प्रकृति ने नही उपजाए है,इन्ही ऋषियों के बनाये हुए है,प्रकृति की स्वतः प्रक्रिया से उपजे होते तो ये बीज अमेरिका यूरोप के जंगलों में भी मिलते।

 

भारत के बीज हमारे पूर्वजो के योगबल (जेनेटिक्स व प्लान्ट ब्रीडिंग)के कमाल है,ये बीज हमारे पूर्वजों की धरोहर है,इनका सम्मान करें,इनको सँजोये।

आज इन बीजो की पूजा करे।

।। इन बीजो को आज चंद्रमा की रोशनी दिखाएं।।

 

ऊर्जा क्या है कैसे प्रकट होता है….

प्रकृति में ऊर्जा रूप,रँग गन्ध,स्वर,स्पर्श  के रूप में बहती है।

ऊर्जा के ये पांचों स्वरूप क्रमशः नैनो (सूक्ष्मतम)में है.

ऊर्जा के ये पांचों स्वरूप

पंचतत्वो की शक्ति के आधार है।

ये ही पांचों ऊर्जाओं ने परमाणु से लेकर ब्रम्हांड तक को बनाया है।

 अपरा प्रकृति के निर्माण के यही आधार है।

हमारा भौतिक शरीर भी इनसे ही बना है। शरीर के निर्माण में भूमि तत्व 1% गगन तत्व 8%,वायु तत्व 21% अग्नि तत्व 32*C (यह प्रतिशत में नही है) और नीर तत्व 70% पाया है।)

 

रूप ऊर्जा से आप अपने शरीर मे भूमि तत्व की पूर्ति कर सकते है,भूमि तत्व हमारे शरीर मे माता तत्व की भूमिका निभाती है,फास्फोरस, पोटास,कैल्सियम, तांबा,आयरन जैसे जरूरी खनिज तत्वों को पूर्ण कर सकते है।

 

रँग ऊर्जा से आप अपने शरीर मे गगन तत्व की पूर्ति कर सकते है,गगन तत्व पिता तत्व है,प्रजनन क्षमता को स्वस्थ कर सकते है।

 

गन्ध ऊर्जा से आप अपने शरीर मे वायु तत्व की पूर्ति कर सकते है। शरीर मे ऑक्सिजन की कमी को पूरी कर सकते है।

 

स्वर ऊर्जा से आप अपने शरीर मे अग्नि तत्व की पूर्ति कर सकते है अर्थात अपने शरीर के तापक्रम को 32 डिग्री टेम्प्रेचर में ला सकते है।

 

नीर ऊर्जा से आप अपने शरीर मे जल तत्व की पूर्ति कर सकते है अर्थात शरीर मे पानी की कमी को पूरा कर सकते है।

रूप,रँग गन्ध,स्वर,स्पर्श

इन पाँच ऊर्जाओं के कारण ये सब प्राप्त हो रहा है।

ये ऊर्जा प्रकट करने का सरल सहज विज्ञान

महर्षि परसुराम ने दिया है ।

इसे अग्निहोत्र विज्ञान कहा जाता है

ऊर्जा यानी शक्ति के इस सिद्धांत व विज्ञान के खोज के कारण ही महर्षि परसुराम को शक्ति का अवतार कहा गया है।

और

शायद इन पंचतत्वो(अपरा ऊर्जा) को अपने शरीर मे स्थिर कर लेने के कारण ही महर्षि परशुराम अमर है।

ये त्रेतायुग में श्रीराम से भी मिलने आये,द्वापर में श्रीकृष्ण,भीष्म कर्ण से भी मिले है और शायद कलियुग में भी  मिले ऐसी किदवंती है।

 

आईये

अब समझते है,महर्षि परसुराम पूर्ण कृषि वैज्ञानिक कैसे हुए।

 

अपरा ऊर्जा (भूमि,गगन, वायु,अग्नि,नीर) की निर्मिति की सूक्ष्म इकाई(रूप,रँग,गंध, स्वर,स्पर्श) को प्राप्त करने के बाद परा ऊर्जा(मन,बुद्धि,अहम$कार यानी कि बीज) प्राप्ति की प्रक्रिया (ध्यान,धारणा,समाधि) को समझने के बाद महर्षि परसुराम ने

नए सिरे से प्रकृति को बनाना शुरू किया

अपने योगबल विज्ञान के दम पर समुद्र को पीछे धकेलकर भूमि का   एक भाग (टुकड़ा,प्रदेश) निकाला।

जिसे आज हम केरल कहते है,वैज्ञानिक केरल का भूमि तल और समुद्र का तल समान है फिर भी समुद्र का पानी यहां नही आता है।

तल समान होने से तो आना ही चाहिए पर ऐसा नही होता।

 

इस केरल प्रदेश पर नए नए तरह के वनस्पति और जीव इन 8 ऊर्जाओं के समुच्चय से प्रकट किए

इन वनस्पतियों को हम

केला

नारियल

सुपाड़ी

हल्दी

धान(चावल)

बनाया और इन वनस्पतियों को अक्षय ऊर्जा से भर दिया।

मतलब

उक्त कोई भी वनस्पति सड़ती नही है,केमिकल खेती होने के कारण आज जरूर नारियल,सुपाड़ी सड़ने लगी है यदि ये खेती की मूल पद्धति के उगाए जाएं, जैविक खेती से उगाए जाएं तो कभी नही सड़ती।

 

इन फसलो के बीजों में अक्षय ऊर्जा भरने के कारण ही हम महर्षि परसुराम की जयंती को हम कृषि कार्य के शुरू करने के दिन के रूप में मनाते है,जिसे हम अक्षय तृतीया कहते है।

हम सबके पहले कृषि गुरू महर्षि परसुराम ही है

अपने पूर्वजो के विज्ञान को जानकर छाती चौड़ी करने का आनन्द पाएं।

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