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व्याकरण और ग्रामर दोनों एक नहीं है जैसे धर्म और रिलिजन एक नहीं होते।

व्याकरण का अनुवाद ग्रामर नहीं हो सकता। 

 

ग्रामर लिखने का तरीका है यानि ग्रामर बताएगा कि आप अपने मन की बातों को वाक्यों में कैसे लिखिएगा।

 

शिव के डमरू नाद से व्याकरण आरंभ हो जाता है।

*14 माहेश्वर सूत्र और 42– 43 प्रत्याहार पाणिनि के व्याकरणिक सूत्रों का विधान करते हैं।*

 

अव्यक्त परम सत्ता को अव्याकृत कहते हैं और व्यक्त परम सत्ता को व्याकृत।

 

 

अम्भ = जल !

सामान्य जल नहीं, ज्योतिर्जल।

 

पृथ्वी के जल को मर कहते हैं।

अन्तरिक्ष के जल को मरीची।

मरीची से भी सूक्ष्म जल है अम्भ।

‘जल’ की चन्द्रस्थ पंचम अवस्था ‘श्रद्धा’।

 

अम्भ सूर्य मण्डल के ऊपर सोम मण्डल में परमाणु रूप में व्याप्त है। इससे सृष्टि आरंभ होती है। यह अमृत तुल्य है।

 

गंगा मैया ‘अम्भ’ से निकली हैं।

 

शिव की जटा से अर्थात सूर्य मण्डल की ज्वालाओं से।

 

शिव ताण्डव स्तोत्र याद कीजिए,

*”जटा कटाह संभ्रम ,भ्रमन् निलिम्प निर्झरी ,विलोल वीचि वल्लरी…*

 

शिव की जटा कैसी है? खौलते हुए कड़ाह के सदृश्य। उसमें गंगा की चंचल लहरें घूमती हुई भँवर बना रही हैं और उसमें से निर्झरी बन झर रही हैं। 

 

यह सूर्यमण्डल में घूमते अम्भ का वर्णन है।

गंगा की अमृतधारा अम्भ से उतरी है।

 

आख्यानिक भाषा में यह भी कहा जाता है कि गंगा विष्णु की चरणामृत हैं और ब्रह्मा के कमण्डल से निकली हैं।

 

पौराणिक आख्यानों को वेद विज्ञान से समझा जाता है।

 

जल के चार भेद हैं –

अम्भ, मरीची, मर और अप् ।

 

अप् भूगर्भीय जल है, मर नदी, तालाब का जल।

 

आप जानते हैं, पंचतत्त्वों में एक तत्त्व जल है।

 

शास्त्र में जल तत्त्व का गंभीर परिचय मिलता है।

गंगा जी की परिचय कथा, मिथ नहीं है, विज्ञान है।

 

*त्रिकाग्नि कालाय! कालाग्नि रुद्राय !!*

 

वेद प्रत्यक्ष जगत में महादेव का  स्वरूप दिखाता है, दर्शन शास्त्र, योगागमादि परोक्ष अनुभूति को अभिव्यक्त करते हैं, अनुभुति शून्य लोग कही-सुनी बातों पर विश्वास करते हैं।

 

वर्तमान शिक्षा के आधुनिक ज्ञान- विज्ञान के विषयों की समस्या यह है कि वह टुकड़ों में ज्ञानोद्घाटन करता है और स्वयं तकनीकीय अधिक है।

 

तीन काल सभी मानते हैं। परंतु काल में अग्नि है, ताप और प्रकाश है, यह तथ्य केवल वेद से ही ज्ञात होता है- त्रिकाग्नि काल है, कालाग्नि रुद्र है।

 

विशेष यह है कि कालाग्नि ही  यज्ञाग्नि है, इसीसे सृष्टि होती है।

 

आइंस्टीन काल को एक्शन से उत्पन्न और बोधगम्य मानता है।

 

अग्नि और काल की अभिन्नता को वैदिक विज्ञान ही बताता है।

 

कामरेड प्रगतिशील बुद्धिजीवी बिना जाने- समझे अटैक मारता है।

 

34 वर्ष पूर्व की कविताओं को मैं फाइल में खोज रहा था। यह जानने के लिए कि

 

जिन उपास्य स्वरूपों को भक्ति भावना का आलंब मानकर मार्क्सवादी आलोचकों ने नकार दिया था, उन्हें जीवन का अभिन्न हिस्सा मानकर श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन के समय मैं विचार करता था।

 

वैदिक रुद्र प्रत्यक्ष हैं, इनका अभिषीक्त स्वरूप पावस ऋतु में व्यक्त होता है।

 

ग्रीष्म में झुलसी वनस्पतियाँ पावस में हरी भरी हो जाती है। यह प्रत्यक्ष है।

 

सावन माह में हम शिव का जलाभिषेक करते  हैं, क्योंकि प्राकृतिक यज्ञ में अर्थात संवत्सर  में ऐसा ही होता है। 

 

पौराणिक आख्यानों ने महादेव को साकार में निरूपित कर जीवन का उत्सव बना दिया है।

 

जिस प्रकृति के यज्ञ से जीवन उत्पन्न हुआ है, उसके दिक्काल में अग्नि सोमात्मक यज्ञ निरंतरमान है।

 

यह जगत प्रकृति- पुरुषात्मक है- शिवशक्ति का युग्म।

 

कर्पूर गौर महादेव को श्याम वर्णा उमा ने वरण किया है, इसलिए उन्हें गौरी कहते हैं। इसी सम्मिलन से सृष्टि हुई है।

 

लेकिन जब गोरी राधा श्रीकृष्ण से अभेद होती हैं तब महा भार बना हुआ तमस नष्ट हो जाता है, अर्थात महाभारत का युद्ध हो जाता है।

 

मार्क्सवादी जिस तथ्य को भावुकता बताता है, मैंने उसके यथार्थ पक्ष का मात्र स्पर्श किया और क्रिया व्यक्त हो गई ।

✍🏻आगे और बाकी है

 

 

शिव और शिवत्व।।

 

 रुद्र – वैदिक देवता या स्वयं महादेव?

 

रुद्र उग्र भी हैं और करुणामय भी। वे धनुर्धर भी हैं और भेषजपति भी। वे दण्ड भी देते हैं और संरक्षण भी करते हैं।  बड़ा प्रश्न सामने है-

यदि वेदों में “रुद्र” हैं, तो फिर “शिव” कहाँ से आए?

 यह भारतीय धर्म, दर्शन और इतिहास के सबसे रोचक प्रश्नों में से एक है। बहुत से लोग मानते हैं कि वेदों में “शिव” शब्द है ही नहीं।

यह पूर्णतः सही नहीं है। वेदों में “शिव” शब्द मिलता है, किन्तु अधिकांश स्थानों पर वह आज की तरह किसी विशिष्ट देवता का नाम नहीं, बल्कि एक विशेषण है।

जिसका अर्थ है- मंगलकारी। कल्याणकारी।

शुभ।

अर्थात् वैदिक ऋषि जब किसी देवता के कल्याणकारी स्वरूप की कामना करते हैं, तब “शिव” शब्द का प्रयोग करते हैं।

यही कारण है कि रुद्र के संदर्भ में भी उनके मंगलमय, सौम्य और अनुग्रहकारी रूप का स्मरण किया जाता है।

क्या “शिव” पहले एक गुण था और बाद में वही नाम बन गया?

भारतीय परम्परा में ऐसा पहली बार नहीं हुआ।

अनेक उपाधियाँ, विशेषण और गुण समय के साथ नाम बन गए। जो जगत का पालन करे-वह “गोपाल”। जो धर्म की स्थापना करे-वह “धर्मराज”। जो कल्याण का मूर्त स्वरूप हो-

वह “शिव”।

इस दृष्टि से देखें तो “शिव” किसी व्यक्ति का नाम बनने से पहले एक आध्यात्मिक गुण भी था।

यहीं से विद्वानों के दो प्रमुख मत सामने आते हैं। पहला मत कहता है-

वैदिक रुद्र और पुराणों के शिव मूलतः एक ही देवता हैं। समय के साथ उनके स्वरूप, उपासना और दर्शन का विस्तार हुआ, किन्तु तत्त्व वही रहा।

यह मत विशेषतः शैव, आगमिक और अनेक पारम्परिक आचार्यों में स्वीकार किया जाता है।

 

दूसरा मत मुख्यतः आधुनिक इतिहासकारों का है।

उनके अनुसार वैदिक रुद्र का विभिन्न स्थानीय शिव-परम्पराओं, योगी परम्पराओं और लोकदेवताओं के साथ क्रमशः समन्वय हुआ।

फलस्वरूप वह व्यापक स्वरूप विकसित हुआ जिसे आज हम “महादेव” के रूप में जानते हैं।

इन दोनों मतों में मतभेद अवश्य है, किन्तु एक रोचक समानता भी है।

दोनों इस बात को स्वीकार करते हैं कि भारतीय परम्परा में रुद्र का महत्त्व समय के साथ निरन्तर बढ़ता गया। यही कारण है कि उपनिषदों तक पहुँचते-पहुँचते रुद्र केवल एक देवता नहीं रह जाते वे परम तत्त्व की ओर संकेत करने लगते हैं और पुराणों में वही महादेव बनकर सम्पूर्ण भारतीय चेतना के केन्द्र में प्रतिष्ठित हो जाते हैं।

यही विकास भारतीय साहित्य में भी दिखाई देता है।

महर्षि वाल्मीकि जब युद्धभूमि में श्रीराम के धर्मयुक्त तेज का वर्णन करते हैं, तब उनकी तुलना रुद्र से करते हैं। यह तुलना केवल क्रोध की नहीं है। यह उस दिव्य शक्ति की है जो अधर्म के विनाश और धर्म की रक्षा के लिए जागृत होती है। अर्थात् ,

“रुद्र” केवल एक देवता का नाम नहीं रह गया था। वह एक आदर्श, एक शक्ति और एक दार्शनिक प्रतीक बन चुका था।

“रुद्र शिव कब बने?” प्रश्न यह नहीं है-

“मनुष्य ने रुद्र को शिव के रूप में कब पहचानना प्रारम्भ किया?”

यह प्रश्न सही है तो परिवर्तन देवता में नहीं दृष्टि में हुआ था।

ऋग्वेद ने रुद्र का परिचय दिया। अब यजुर्वेद उन्हें ऐसी ऊँचाई पर ले जाता है जहाँ वे केवल वनों, पर्वतों या तूफ़ानों के देव नहीं रहते।

वे राजा में भी हैं, चरवाहे में भी, शस्त्र में भी, शांति में भी, जीव में भी और जगत् के प्रत्येक कण में भी।

यही है- श्रीरुद्रम।

और यहीं से “रुद्र” का स्वरूप “महादेव” की विराटता को स्पर्श करने लगता है।

 एक स्तोत्र जिसने रुद्र को महादेव के रूप में प्रतिष्ठित किया

यदि ऋग्वेद ने रुद्र का परिचय कराया तो श्रीरुद्रम ने उनके स्वरूप को विराट बना दिया।

यदि ऋग्वेद में रुद्र एक महान देवता हैं तो श्रीरुद्रम में वे सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त चेतना बन जाते हैं। यही कारण है कि हजारों वर्षों से भारत में जब भी रुद्राभिषेक होता है, जब भी महाशिवरात्रि की रात्रि में वेदध्वनि गूँजती है, जब भी कोई वैदिक आचार्य भगवान रुद्र का आवाहन करता है तो सबसे पहले जिस वैदिक स्तोत्र का स्मरण होता है, वह श्रीरुद्रम ही है।श्रीरुद्रम, कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भाग है। इसे सामान्यतः दो भागों में विभाजित किया जाता है-

“*नमकम् और चमकम्।*

“नमकम्” इसलिए क्योंकि इसमें बार-बार “नमः” शब्द आता है।

और “चमकम्” इसलिए क्योंकि उसके प्रत्येक खण्ड में “च मे… च मे…” अर्थात् “मुझे यह भी प्राप्त हो, वह भी प्राप्त हो” की प्रार्थना मिलती है।

किन्तु यदि कोई यह समझे कि यह केवल वरदान माँगने का स्तोत्र है तो वह श्रीरुद्रम का हृदय कभी नहीं समझ पाएगा।

भारतीय दर्शन में दो प्रकार की प्रार्थनाएँ मिलती हैं। पहली-

जहाँ मनुष्य ईश्वर से कुछ चाहता है।

दूसरी-

जहाँ मनुष्य ईश्वर को हर रूप में पहचानना सीखता है।

श्रीरुद्रम दूसरी श्रेणी का स्तोत्र है। यह केवल रुद्र की स्तुति नहीं करता यह हमारी दृष्टि को बदलता है।

ऋग्वेद में रुद्र का स्वरूप मुख्यतः कुछ विशिष्ट प्रसंगों में दिखाई देता है, किन्तु श्रीरुद्रम एक अद्भुत घोषणा करता है। वह कहता है-

रुद्र केवल पर्वतों में नहीं हैं वनों में भी हैं।

केवल तपस्वियों में नहीं गृहस्थों में भी हैं।

केवल राजाओं में नहीं साधारण श्रमिकों में भी हैं।

केवल यज्ञशाला में नहीं जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हैं।

यहाँ तक कि जिन लोगों को समाज सम्मान की दृष्टि से नहीं देखता श्रीरुद्रम उनके भीतर भी उसी परम सत्ता का दर्शन करता है।

यही इस स्तोत्र की सबसे बड़ी क्रान्ति है।

इसीलिए श्रीरुद्रम का आरम्भ भी अत्यन्त गम्भीर है-

*नमस्ते रुद्र मन्यव उतोत इषवे नमः।नमस्ते अस्तु धन्वने बाहुभ्यामुत ते नमः॥*

 

ऋषि सबसे पहले क्या करते हैं?

वे रुद्र से उनके अस्त्र छीनने की प्रार्थना नहीं करते। वे पहले उन्हें प्रणाम करते हैं। उनके तेज को प्रणाम। उनके धनुष को प्रणाम। उनके बाण को प्रणाम। उनकी भुजाओं को प्रणाम।

यह सामान्य बात नहीं है। यदि किसी शक्ति से भय हो तो मनुष्य उससे दूर भागता है।

किन्तु वैदिक ऋषि ऐसा नहीं करते। वे पहले उस शक्ति का सम्मान करते हैं।

क्योंकि भारतीय दर्शन का एक मौलिक सिद्धान्त है-

जिस शक्ति का स्रोत धर्म है, उसका विरोध नहीं किया जाता उसे समझा जाता है। यही श्रीरुद्रम की पहली शिक्षा है।

 प्रायः लोग कहते हैं,आध्यात्मिकता का अर्थ केवल कोमलता है।

किन्तु वेद कहते हैं-

करुणा, यदि शक्ति से रहित हो जाए, तो वह असहाय बन जाती है। और शक्ति यदि करुणा से रहित हो जाए तो वह अत्याचार बन जाती है। रुद्र इसलिए पूजनीय हैं क्योंकि उनमें शक्ति और करुणा का अद्भुत संतुलन है।

✍🏻 फ़िर मिलते है….

विक्रम संवत् बनाम ग्रेगोरियन कैलेंडर: विज्ञान, इतिहास और सत्य का संगम

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