
किसी भी महान राजा की वीरता का सही सही अनुमान उसके राज्य का क्षेत्रफल देखकर ही लगाया जा सकता है ।
आज का पूरा भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान , तजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान, तुर्की, अफ्रीका, सऊदी अरब , इधर नेपाल, थाईलैंड, इंडोनेशिया, कंबोडिया, लंका, चीन का बड़ा भाग इन सब प्रदेशो पर विश्व के बड़े भूभाग पर महाराज विक्रमादित्य का शाशन था ।।
ओर इतना ही नही —
विक्रमादित्य ने रोम के राजाओं के हराकर विश्व विजय भी कर लिया ।।
“यो रूमदेशाधिपति शकेश्वरं जित्वा ” ।।
अर्थात उसने रोम के राजा और शक राजाओं को जीता ।।उसने सब मिलाकर 95 देश जीतें ।। आज भारत मे डेमोक्रेसी है, लेकिन भारत शांत नही है, लेकिन इस डेमोक्रेसी की नींव डालने की शुरुवात ही खुद महान क्षत्रिय परमार वंश के राजपूत राजा विक्रमादित्य ने की थी, विक्रमादित्य की सेना का सेनापति प्रजा चुनती थी ।। वह प्रजा द्वारा चुना हुआ धर्माध्यक्ष होता था । प्रजा द्वारा अभिषिक्त निर्णायक था । आज के समय मे अमरीका और रूस के राष्ट्रपति की जो शक्ति है, वही शक्ति महाराज विक्रमादित्य के सेनापति की होती थी ।।
लेकिन यह सब भी अपना परम् वीर विक्रम को ही मानते थे ।। विक्रम ने भी अपने आप को शासक नही, प्रजा का सेवक मात्र घोषित कर रखा था ।।
पहला शक राजा मॉस था ।उसने ईसा की सदी से पूर्व गांधार को जीत लिया था । इसके बाद सम्भवतः एजस नाम का राजा बैठा ।अब शक आगे बढ़े, इनका विस्तार पंजाब तक हो गया । इसके बाद दो शक राजा और हुए, यह लोग सीथियन लोगो को भेजकर गर्वनर प्रणाली से शासन चलाते थे ।। इनकी शक राजाओं से प्रेरित गर्वनर लोग ” क्षत्रप ” कहलाते थे ।।
इन सीथियन गर्वनरों ने तक्षशिला से लेकर मथुरा तक राज किया है । इन्होंने केवल यही तक संतोष नही किया, यह विंध्यांचल पार कर दक्षिण की ओर भी बढ़े ।। यही कारण है की मालवा ओर गुजरात प्रदेश के आसपास विक्रम को क्षत्रपों से लड़ना पड़ा था, ओर क्षत्रप वीर विक्रम के आगे मार खाकर भागे ।
इन क्षत्रपों की एक शाखा दक्षिण में गौतमीपुत्र सातकर्णी से लड़कर मार खाई, उस समय नेहपान दक्षिण पर आधिपत्य जमाये बैठा था, उसका राज्य कोंकण, महाराष्ट्र, मंदसौर, मालवा से राजस्थान के पुष्कर तक फैला हुआ था । ईसा की दूसरी सदी ने गौतमीपुत्र सातकर्णी में नेहपान पर आक्रमण कर उसके राज्य को सातकर्णी साम्राज्य में मिला लिया ।।
उज्जैन में उन दिनों चपटन नामक क्षत्रप राजा था, जिसने सातवाहन को जीतकर उसे अपने राज्य में मिला लिया था। उसके बाद उनके ही पुत्र गौतमीपुत्र सातकर्णी में चपटन ने बेटे नेहपान को परास्त कर उसके पूरे राज्य को अपने राज्य में मिला लिया ।।
विक्रमादित्य मालव जाति से थे, जो आज परमार कहलाते है ।। हरिवंश पुराण में इन्हें चन्द्रवँशी क्षत्रिय कहा गया है । यह लोग बड़े ही बलवान, पराक्रमी ओर वैभवशाली लोग कहे जाते थे । कौरव पांडव के बीच जब महाभारत का युद्ध हुआ था, तो इन्होंने कौरव पक्ष का साथ दिया था । यतार्थ में मालव लोग मलवंशीय क्षत्रिय है, अब भी मल्ल तथा शाही वंश के कुछ परिवार नेपाल की तराई में रहते है, इतनी शताब्दी से वहां गरीबी की मार है, फिर भी वहां के क्षत्रियो का रहन सहन अन्य लोगो को अपेक्षा कहीं अधिक श्रेष्ठ है, वे आज भी अपने आप को सबसे ऊंचा मानते है , वे लोग भी बड़े पराक्रमी ओर वीर है । मल्ल की व्याख्या से ही प्रतीत होता है कि कुश्ती लड़ने वाला शूरवीर । कृष्ण महाभारत, बलदेव कुश्ती से समझा जाये, तो इस वंश को समझने में ज़रा भी देर नही लगेगी ।।
नेपाल के मल्ल पंजाब से नेपाल गए थे, ओर पंजाब के मल्ल ही राजपुताना आये थे, अपनी जाति की याद को हमेशा जीवित रखने के लिए उन्होंने अपने राज्य का नाम मालवा कर लिया । उज्जैयनी में मालव जाति का पहला राजा गन्धर्वसेन हुये है, यह पहली मालव राजा है, जिन्होंने अपने राज्य को अपनी भुजाओं के बल पर बढ़ाया । गन्धर्वसेन के बाद उनके ज्येष्ठपुत्र भृतहरि गद्दी ओर बैठे । किंतु कुछ काल के बाद विरक्त होकर इन्होंने नाथपन्थ की दीक्षा ले ली ।।
यह वहीं भृतहरि है जिन्होंने बाद में ” वैराग्य शतक ” नीति शतक ” सृंगार शतक ” नामक प्रसिद्ध शतश्लोकों ओर काव्यों की रचना की है । भृतहरि के बाद ऐतिहासिक वीर विक्रम गद्दी पर विराजमान हुए थे । इन्होंने ईसा से पूर्व प्रथम शताब्दी में राज किया था ।
यह शूरवीर बड़ा दानी था
वीर था
यह वीर विक्रम जमीन पर सोता था
अल्पाहार लेता था
केवल योगबल पर अपने शरीर को व्रज सा मजबूत बनाकर रखता था ।
इन्ही ने महान राष्ट्र की स्थापना कर सनातन धर्म का डंका पुनः बजाया था ।
महाभारत के युद्ध के बाद वैदिक धर्म का दिया लगभग बुझ गया था, हल्का सा टिमटिमा मात्र रहा था । इस युद्ध के बाद भारत की वीरता, कला, साहित्य, संस्कृति सब कुछ मिट्टी में मिल गयी ।। उस युद्ध के 6000 साल बीत गए, लेकिन उस काल जैसा प्रबल योद्धा ओर राजा भारत को आज तक नही मिला है ।।
इस देश का ऐसा कोई व्यक्ति नही, जिसने वीर विक्रम की वीरता और उदारता की कहानियां न सुनी हो ।
सम्राट विक्रम कैसे थे, इसका वर्णन एक गुणाढ्य कवि की इन पंक्तियों में मिलता है –
स पिता पितृहनिनामवन्धुनामं स बान्धव
अनाथानामं च नाथं सः प्रजानाम् कः सः नामवत
महावीरोप्यभदराजा स भीरू परलोकतः
शुरोपिशाचरचण्डकरः कुभतापर्यङ्गनप्रियः ।
अर्थात वह पितृहीनो का पिता, भातृहीनो का भाई, ओर अनाथों का नाथ था । वह प्रजा का क्या नही था ?? ।। महावीर होने पर भी वह परलोक से डरता था , शुर होने पर भी वह प्रचंडकर नही था । यही सब कारण है, की 2000 साल बाद भी हम उनके गुणों की चर्चा करते नही अघाते ।।
शकों के काल मे भारत की स्थिति क्या थी, इसका वर्णन आप इस श्लोक से समझ सकते है –
ये त्वया देव निरता , असुरा येच विष्णुना
ते जाता मल्लेछरूपेण पुनःरथ महीतले ।
व्यापादयन्ति ते विप्रान धांति यज्ञादकाकीय ।
हरन्तिमुनिकन्यास पापां की की न कुर्वते ।
भूलोका देवलोकास्चय शश्वदाप्यायते प्रभो ।
……..
अर्थात है विष्णुदेव आपने जिन मल्लेचो पर असुरों का वध किया है, वे धरती पर मल्लेचरूप धरकर पुनः प्रकट हो गए है । वे ब्राह्मण और मुनि कन्याओं को भगाकर ले जाते है, वे पापी क्या क्या अत्याचार नही करते ?
उक्त बातें शक ओर हूण हमलों की याद ताजा करने के लिए है, यह लोग आज के isis से भी ज़्यादा बर्बर होते थे, भारत की कुछ जातियां खुद को इनका वंसज होने का कहने में शर्म भी महसूस नही करती ।।
जब भारत मे इस तरह की हाहाकार मची थी, तब विष्णुजी ने पुकार सुनी । गुणाढ्य कवि ने एक जगह लिखा है की भारत की यह दुर्दशा देखकर स्वयं शिवजी ने विक्रमादित्य विक्रम का अवतार धरकर पृथ्वी पर जन्म लिया ।। इनके पराक्रम का अंदाजा इस बात से लगा सकते है, की जावा सुमात्रा तक के सुदूर देशों तक इन्होंने अपने सेनापति नियुक्त कर रखे थे ।
मथुरा जितने के पश्चात उन्होंने शकों को भारत से निकालने की ठानी ।
कालिदास की इस पंक्ति से उनके सैन्यबल का पता चलता है ।
यस्यापाष्टदश योजनानि कटके पादातिकोटित्रियम ।
वाहानामयुतायुतंच नेवते ……
3 करोड़ पैदल सेना
90,000 हाथी
4 लाख नॉकाएँ थी
——-
उत्तरपश्चिमी शकों का मान मर्दन करने के लिए मुल्तान के पास जागरूर नाम की जगह पर विक्रम का शकों के भयानक युद्ध हुआ । विशेषकर राजपुताना के उत्तरपश्चिमी राज्य की ओर शकों में उत्पात मचा रखा था । मुल्तान में विक्रम की सेना से परास्त होकर शक जंगलो में भाग गए, उसके बाद इन्होंने फिर कभी आंख उठाने की हिम्मत नही की,
विक्रम साक्षात शिव थे, क्यो की उज्जैन के राजा महाकाल के ।।
विक्रमादित्य के काल के सिक्कों पर ” जय मालवांना लिखा है । विक्रमादित्य के मातृभूमि से प्रेम से इससे अच्छा उदाहरण क्या हो सकता है, सिक्को पर अपना नाम न देकर अपनी मातृभूमि का नाम दिया ।।
विक्रमादित्य का हम जहां भी वर्णन पाते है, पूरे राज्य के कार्य वहीं करते है, युद्ध मे वह सेना का संचालन करते थे, बाद में राजदरबार में न्यायमूर्ति बनकर बैठते थे । विक्रम के पिता एक साधारण मांडलिक के राजा थे, जबकि विक्रम ने जावा सुमात्रा को भी अपने गणतंत्र में मिलाया ।।
विक्रम की गाथा चल रही है, तो वेताल के कारण विक्रम की कहानियां काल्पनिक सी लगती है । पौराणिक काल मे प्रत्येक राजा तंत्र का ज्ञाता अवश्य होता था, ओर वह प्रकांड तांत्रिकों की संगत में हमेशा रहता, पटना का वैताल एक महातांत्रिक था, विक्रमादित्य के नवरत्नों में एक था, वह महातांत्रिक तो क्या, स्वम् में एक महाशक्ति था ।
मनीषा सिंह की कलम से सम्राट विक्रमादित्य:-
एक स्वर्ण युग जिसे ब्रिटिश इतिहासकारों द्वारा नजरअंदाज कर दिया गया एक साज़िश के तेहत और इस साज़िशो के अंधकार में खोये इतिहास से अवगत कराया इतिहासविदुर श्री कोटा वेंकटाचलम ने।
VIKRAMADITYA ERAS (विक्रमादित्य युग)
सर्वप्रथम वंश परिचय – सम्राट विक्रमादित्य से पूर्व चार राजवंश हुए अग्निवंशी कुल के जिन्होंने २९१ वर्ष तक शासन किया ३९२ ईस्वी पूर्व से १०१ ईस्वी पूर्व तक शासन किये थे महाभारत युद्ध (३१३८ ईस्वी पूर्व) के समय से लेकर गुप्ता चन्द्रवंशी राजवंश गुप्ता साम्राज्य के समय तक अग्निवंशी का शासन रहा सम्राट गंधर्वसेन के दो पुत्र हुए प्रथम शंख और द्वितीय पुत्र थे विक्रमादित्य। गंधर्वसेन परमार ने १८२ से १३२ ईस्वी पूर्व तक शासन कर अपने बड़े पुत्र शंख को साम्राज्य सौंपकर जंगल में तपस्या करने चले गये परन्तु दुर्भाग्यवश बड़े पुत्र शंख की अकाल मृत्यु होती हैं एवं गंधर्वसेन परमार तपस्या त्याग कर वापस राजपाठ संभालते हैं उसी समय भगवान शिव के पार्षद विक्रमादित्य परमार की जन्म हुआ था 101 ईस्वी पूर्व । गंधर्वसेन परमार ने अपने पुत्र विक्रमादित्य को ८२ (82 B.C) ईस्वी पूर्व में राजपाठ सौंपकर सन्यास ले लिए एवं तपस्या करने चले गये । (Even before Vikramaditya the four dynasties of Agni Vamsa covered over a period of 291 years from Kali 2710(or 392 BCE) to Kali 3001(or 101 BCE). The Chronology of ancient Indian History right from the time of Mahabharata War (3138 BCE) down to the beginning of Gupta dynasty (327 BCE) )
सम्राट विक्रमादित्य की जीवनी -:
सम्राट विक्रमादित्य जी का जन्म सन १०१ ईस्वी पूर्व में (101 B.C) हुआ था एवं पांच वर्ष की आयु में विक्रमादित्य तपस्या करने जंगल में चले गये १२ वर्ष तक तपस्या किया । तपोबल से दिव्या शक्तियों को प्राप्त करने के बाद अम्बावती (वर्त्तमान उज्जैन) लौटे और फिर २० साल की आयु में राज्याभिषेक हुआ एवं 32 सोने की पुतलियों का सिंहासन प्राप्त हुआ था । भारतवर्ष के सम्पूर्ण भूमंडल पर अपना आधिपत्य स्थापित किया ८२ (82 B.C) ईस्वी पूर्व उज्जैन की राजगद्दी पर आसीन हुए महाराज विक्रमादित्य सौ वर्ष तक पुरे पृथ्वी पर शासन किया १९ ईस्वी तक (19 A.D) । ऐसा अपराजिता योद्धा , चारो दिशाओं के सम्राट मनुष्य तो हो ही नही सकता अवतार ही होंगे । यह ध्यान देना चाहिए विक्रमादित्य किसी उपाधि का नाम नही हैं जैसा की पश्चिमी इतिहासकारों ने धरना बना लिया हैं की विक्रमादित्य एक उपाधि हैं जो राजालोग धारण करते थे उज्जैन के सम्राट गंधर्वसेन परमार ने अपने पुत्र का नाम सूर्य के समान पराक्रमी होने के कारण (जिनका पराक्रम आदित्यवत हो) विक्रमादित्य नाम रखा था इतिहासों में शकारी विक्रमादित्य के नाम से जाने जाते हैं (शकारी का अर्थ होता हैं शक को हरानेवाला) ।
(“जब वे 5 वर्ष के थे, तब विक्रम वन में चले गए और 12 वर्षों तक तपस्या की। तपस्या से अपनी महानता को और समृद्ध करके वे अंबावती या अवंती (उज्जैन) नगर पहुँचे और 32 स्वर्ण मूर्तियों से अलंकृत स्वर्ण सिंहासन पर राजा के रूप में अभिषिक्त किए गए।
(यह घटना कलियुग के 3020वें वर्ष, अर्थात् 82 ईसा पूर्व में हुई थी।) (भव. 3-1-7-17,18)
यह ध्यान देने योग्य है कि विक्रमादित्य कोई उपाधि नहीं थी, जैसा कि कुछ इतिहासकार मानते हैं, बल्कि यह उनके पिता द्वारा रखा गया उनका वास्तविक नाम था।”)
अवन्ती राज्य के राजा कैसे बने सम्पूर्ण भारतवर्ष के स्वामी एवं विश्व विजेता सम्राट -:
कलियुग के ३१८२ (3182) वर्ष पुरे हो चुके थे शको के अत्याचार से भारतवर्ष के कण कण में त्राहि त्राहि मच उठा था हिन्दू धर्म पर अतिभारी संकट आन पड़ी थी इस वक़्त किसी हिन्दू धर्म में किसी अवतार की ज़रूरत थी शक जैसे क्रूर मलेच्छों से हिन्दू धर्म की रक्षा करे मंदिरों पर मंदिर ध्वस्त कर मंदिर लूट रहे थे हिन्दू नारीओं के शील भंग हो रहे थे । महाराज विक्रमादित्य परमार ने ८२ ईस्वी पूर्व में राजा बनते ही शक मलेच्छ को भारत से पराजित कर भारतवर्ष से खदेड़ने के लिए युद्ध अभियान आरंभ किया ।
कालिदास ने लिखा हैं इस युद्ध के विषय में -:
अथ शाककर्तृत्वमाह – निहन्तीति — यो भूतलमण्डले शकान् मलेच्छान् निहन्ति कस्मिन् कलौ कलियुगे किंभूतान् सपञ्चेति । अब्जं शतकोटिसहस्रस्व दलमर्घं पञ्चाशत्कोटि अब्जदलं सह पञ्चकोट्यो वर्तते यत्तत्सपञ्चकोटि तच्चाब्ज दलान् तेन प्रमीयन्त इति प्रमा: स्यु: । अंकतोऽप्यत्र (५५,००,००,०००) । स राजपुत्र: शक कारको नृपाधिराजश्चक्रवर्ती भवेत् । हि युक्तार्थे । उत पुनः शकानां म्लेच्छाना नाशकाल: शाक: शाक कर्तृन् हन्तीति शाककर्तृहा सोऽपि शाककर्ता चक्रवर्ती भवेत् । यथा जैन मते वासुदेवं प्रति वासुदेवत् । ( ) – शकोंको मारकर विक्रमादित्यने शक सम्वत् प्रारंभ की – इन्होंने कलियुग में समस्त भूमण्डलके ५५ करोड़ शकों को युद्धमें मार डाला था । इन शकोंके दल में ५५ करोड़ की संख्या में सैनिक थे ,उन सबका समूल नाश किया था श्री विक्रम ने । वह महान् राजपूत राजा विक्रम शक् सम्वत् प्रारंभ कर चक्रवर्ती सम्राट हो गये ।
श्लोक 17 अध्याय -: 22
शक राजा रुममा ने अपनी ५५ (55) करोड़ सेना के साथ अवन्ती पर आक्रमण किया एवं सम्राट विक्रमादित्य के १४ (14) करोड़ । महान विक्रमादित्य के अप्रतिरोध्य पराक्रम से पराजित होकर शक राजा रुममा उत्तर पश्चिमी राज्य को छोड़कर भाग गया एवं भारतवर्ष शक अश्शूरो के अत्याचारों से मुक्त होगया एवं दक्षिण में भी युद्ध अभियान कर सम्राट विक्रमादित्य ने शको को पराजित कर भारतवर्ष के बहार बैक्ट्रिया या बाख़्तर तक खदेड़ा एवं महाभारत युद्ध के बाद यह युद्ध दूसरा महाभारत के रूप में भी जाने जाते हैं क्योंकि इस युद्ध के बाद शक मलेच्छों के अस्तित्व केवल मुट्ठीभर रह गये थे। शको को पराजित कर भारतवर्ष के इन राज्य पर पुनर धर्मस्थापना किया हिमालया की चोटी से लेकर , सिंध नदी के पश्चिम दिशा से लेकर दक्षिण दिशा एवं हिमालय के उत्तरी सीमा के बद्रीनारायण नामक राज्य एवं कपिलावस्तु राज्य इन सभी राज्यों की शुद्धिकरण करवाया एवं वैदिक मंदिर मठ , चिकित्सालय , रास्ते , गुरुकुल का निर्माण करवाया । महान् सम्राट विक्रमादित्य ने शको का उन्मूलन कर वैदिक संस्कृति सभ्यता की पुनर्स्थापना किया एवं अनेको मंदिरों का निर्माण किया जिसमे अयोध्या राम मंसिर का जीर्णोद्धार किया ८४ स्फटिक के खम्बे लगवाएं थे मंदिर में शक अश्शूरोको पराजित करके अनेक मन्दिरों का निर्माण कराके वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना की ।
श्लोक नंबर 22-1-: सम्राट विक्रमादित्य के साम्राज्य में सम्मिलित प्रान्तों कम्भोज , गौड़ा , आंध्र , मालवा , अनर्ता , सौराष्ट्र , गुर्जरात्रा के प्रजाओं ने सम्राट विक्रमादित्य के लिए प्रशंसा गीत भी गाये थे क्योंकि सम्राट विक्रमादित्य वर्णाश्रम के महानतम रक्षक थे ।
सम्राट विक्रमादित्य के अधीन 18 भारतीय राज्य थे ,
1) इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली-हरियाण ), 2) पाञ्चाल (गंगा के उत्तर और दक्षिण के भाग फर्रुखाबाद और बरेली) , 3) कुरुक्षेत्र (पंजाब , हरियाणा उत्तरप्रदेश का पश्चिमी भूभाग( , 4) कपिलराष्ट्र ((बांग्लादेश से पूर्व में स्थित भूखण्ड , 5) अन्तर्वेदी, 6) व्रजराष्ट्र ( मथुरा, मण्डल, आगरा), 7) मद्र , मत्स्य आदि राज्य, 8 मरुधन्व (आधा अजमेर आधा मारवाड़ एवं सम्पूर्ण राजस्थान) 9), गुर्जरात्रा , सौराष्ट्रकाठियावाड़ , 10) महाराष्ट्र (विदर्भ -लाट आदि ) , 11) द्रविड़ ( कर्नाटक,तमिलनाडु, केरल, पांड्य,लङ्का आदि), 12) कलिंग (उत्कल , आंध्रप्रदेश आदि ), 13) अवन्तिउज्जैन) , मालवा , गोंडवाना आदि ), 14) उडुपम -उड़ीसा) , ताम्रलिप्तक्) 15) बांग्लादेश (वंग ) , 16) गौड़देश ढ़ाका) ,आसाम आदि), 17) मगध ( -गंगा जी के दक्षिण में स्थित गया, -पाटिलपुत्र आदि) 18) कौसल (अयोध्या , लखनऊ , नेपाल आदि) ,
सम्राट विक्रमादित्य के राज्य के महत्वपूर्ण भाग -:
1), कश्यपमेरु (कश्मीर) 2), Cape Comorin (कन्याकुमारी) 4), कम्पास (चीन) 5), और्व / अर्व (अरब हो गया) 6), इथियोपिया 7), रोम
महान सम्राट विक्रमादित्य के दरबार -:
आठवी एवं नौवी श्लोक अध्याय 22 कालिदास ने सम्राट विक्रमादित्य के दरबार में रहनेवाले कवी , पंडितों की सूचि भी दिए हैं जो सम्राट विक्रमादित्य के दरबार की शोभा बढ़ाते थे -:
१) मणि, २) अंगुदत्ता , ३) जीष्णु , ४) त्रिलोचना , ५) हरी (हरी स्वामी शुक्ल एवं यजुर्वेद के महान ज्ञाता थे ), ६) सत्याचार्य, ७) सरुतासेन ८) बद्रायण, ९) मनीत्था , १०) कुमार सिंह ( ज्योतिषाचार्य ) एवं इनके अलवा नौ रत्न और थे -:
विक्रमार्कस्य आस्था ने नवरत्नानि :-
धन्वन्तरिः क्षपणको मरसिंह शंकू वेताळभट्ट घट कर्पर कालिदासाः।
ख्यातो वराह मिहिरो नृपते स्सभायां रत्नानि वै वररुचि र्नव विक्रमस्य।।
उनके दरबार में “नवरत्न” कहलाने वाले नौ विद्वान थे। वे थे-1. धनवंतरी, 2. क्षपणक, 3. अमरसिंह, 4.शंकु भट्ट, 5. वेताल भट्ट, 6. घटकर्पर, 7. वाराहमिहिर, 8. वररुचि, 9. कालिदास (संस्कृत के प्रसिद्ध कवि)। रुद्रसागर में कुछ रत्न हैं, जो राजा विक्रमादित्य के सिंहासन के अवशेष कहे जाते हैं । उनके दरवारमें रहते थे , 16 वैदिक ज्योतिर्विद् ,16 महान् चिकित्सक ,16 भट्ट ब्राह्मण ,16 ढाढ़िन , 16 वेदपाठी ब्राह्मण विक्रमादित्य की सभा में शोभा बढ़ाते थे । 800 मूर्धाभिषिक्त राजा उनके दरवारमें रहते थे एवं तीन हज़ार दरबारी राजा थे , शस्त्र विद्या के महाग्यता ऐसे एक करोड़ सैनिक थे (“22-11 में कालिदास विक्रम के दरबार का आगे का विवरण देते हैं। वहाँ 800 सामंत राजा और 3000 दरबारी राजा थे, एक करोड़ श्रेष्ठ सैनिक थे, 16 महान विद्वान, 16 ज्योतिषी, 16 कुशल वैद्य, 16 भट्ट तथा 16 वैदिक ज्ञान के विद्वान उपस्थित थे। इन विद्वान दरबारियों से घिरे हुए सिंहासन पर विराजमान विक्रम का दरबार प्रकाशमान होता था।
संदर्भ: Chronology of Kashmir History Reconstructed — पंडित कोटा वेंकटाचेलम, पृष्ठ संख्या 180।”)
1 कोष में तीन किलोमीटर चार कोष में एक योजन होता हैं और 18 योजन में २१६ (216) किलोमीटर । विक्रमादित्य के राज्य का मात्र २१६ किलोमीटर अर्थात 18 योजन को 3 करोड़ सैनिक घेरकर रहते थे , दस करोड़ विभिन्न रथी सैन्य हुआ करते थे , गज सेना में 24,300 केवल में हाथी हार करते थे , 4 लाख जल जहाज़ थे । यह सिर्फ उनके राज्य अवन्ती (वर्त्तमान उज्जैन) के सैनिक थे । तो चिंतन कीजिये सम्पूर्ण भारतवर्ष में कितने सैन्यबल हुआ करते थे महाराजा विक्रमादित्य के । कालिदास से लेकर अब तक के निष्पक्ष सारे इतिहासकारों ने लिखे हैं सम्राट विक्रमादित्य के बाद भारत का कोई सम्राट इतना शक्तिशाली नही हुआ एवं महाभारत युद्ध के बाद कोई इतना पराक्रमी नही हुआ था औ इनके बाद भी कोई नही हुआ । (“ज्योतिरविदाभरण, कालिदास, श्लोक 22-12 में विक्रमादित्य की सेना के संबंध में निम्न विवरण दिया गया है—
उनकी सेना 18 योजन (लघु ज्योतिषीय योजन; 1 लघु ज्योतिषीय योजन = 4 11/12 अंग्रेज़ी मील) तक फैली हुई थी और उसमें निम्नलिखित शामिल थे:
यह वही सेना थी जो उनके अभियानों में उनके साथ रहती थी। इस संदर्भ में कालिदास कहते हैं कि उन दिनों विक्रम के समान कोई भी सम्राट नहीं था।”)
सम्राट विक्रमादित्य के साम्राज्य में १२ करोड़ ७० लाख ५० हज़ार सेना थे -: ६ (6) करोड़ पैदल सेना थे , ५ (5) करोड़ अश्वारोही सेना थे , १ (1) करोड़ रथी सैन्य हुआ करते थे , ५० (50) हज़ार गज सेना , ७० (70) लाख जल जहाज़ थे
सम्राट विक्रमादित्य के युग में सभी अपने अपने वर्णाश्रम को मान कर चले १४ से १६ करोड़ क्षत्रिय विक्रमादित्य के सैन्यदल में थे , ब्राह्मण पंडित वैद्य , चिकित्सक , गुरुकुल के आचार्य , ज्योतिष इत्यादि वर्ण के अनुसार कर्म किये वैश्य , शुद्र सभी ने , परन्तु तब किसीने यह लालच नही लगाया की हमे ब्राह्मण बनना हैं और हमे बन ने नही दिया जा रहा हैं अथवा यह की हम दबे कुचले श्रेणी से हैं हमे आरक्षण चाहिए सबने वर्ण के अनुसार कर्म किया एवं प्रजाओ ने सम्राट विक्रमादित्य को वर्णाश्रम रक्षक की उपाधि दिए एवं सभी राज्य के प्रजाओ ने प्रशंसा गीत गाने की प्रचालन का शुरुवात किये थे यह अंतर था तब के राजतन्त्र में एवं आज के लोकतंत्र में ।
कैसे हुआ विक्रम संवत की शुरुवात -:
सम्राट सम्पूर्ण प्रजा का कर मुक्त कर दे वही संवत का आरंभ करता हैं सम्राट विक्रमादित्य ने ५७ (57 B.C) ईस्वी पूर्व में सम्पूर्ण प्रजा का ऋण मुक्त कर के उन्होंने कलियुग में सतयुग की स्थापना की इसीलिए उन्होंने कीरितयुग नामक संवत का आरम्भ किया था उनके प्रजा ने उनकी याद में विक्रम संवत नाम प्रचलित कर दिया ।
यह तो केवल सम्राट विक्रमादित्य के भारत विजय की इतिहास हुआ, किसी अन्य पोस्ट में यूरोप एवं अरब विजय पर भी बात होगी ।
संदर्भ-:
““पूर्णे त्रिंशच्चते वर्षे कलौ प्राप्ते भयङ्करे,
शकानां च विनाशार्थम् आर्य धर्म विवृद्धये।
जातः शिवाज्ञया सोऽपि कैलासात् गुह्यकालयात्॥
(भविष्य महापुराण 3-1-7-14,15)
अर्थ: कलियुग के भयावह समय के 3000 वर्ष पूर्ण होने पर, शकों के विनाश और आर्य धर्म की वृद्धि के लिए, शिव की आज्ञा से वे कैलास के गुप्त स्थान से जन्मे।
“विक्रमादित्य नाम्नं पिता कृत्वा मुमोद ह।
स बालोऽपि महाप्राज्ञः पितृमातृ प्रियंकरः॥” (3-1-7-16)
अर्थ: उनके पिता ने उनका नाम विक्रमादित्य रखा और अत्यंत प्रसन्न हुए। वह बालक भी महान बुद्धिमान था और माता-पिता को प्रिय था।
“पञ्च वर्षे वयः प्राप्ते तपसोऽर्थे वनं गतः।
द्वादशाब्दं प्रयत्नेन विक्रमेण कृतं तपः॥” (भविष्य 3-1-7-17)
अर्थ: पाँच वर्ष की आयु में वे तपस्या के लिए वन में गए और विक्रम ने 12 वर्षों तक कठोर तप किया।
“पश्चादम्बावतीं दिव्यां पुरीं यातः श्रियान्वितः।
दिव्यं सिंहासनं रम्यं द्वात्रिंशन्मूर्ति संयुतम्॥” (भविष्य 3-1-7-18)
अर्थ: इसके बाद वे दिव्य नगरी अम्बावती (उज्जैन) पहुँचे और 32 मूर्तियों से युक्त दिव्य व सुंदर सिंहासन पर आसीन हुए।”
हमारे देश के काले अंग्रेज इतिहासकारों ने केवल सुल्तान एवं सिकंदर को महान बताया वास्तविक इतिहास को छुपा इसलिए दिया ताकि हम अपने पूर्वजो पर गर्व ना कर पाए । सिंहासन बत्तीसी , वेताल पचीसी ऐसे ऐसे अपमानजनक नाटक निकाल कर सम्राट विक्रमादित्य के इतिहास को सदेव छुपाने की निरंतर चेष्ठा चलायें हैं और अभी भी चला रहे हैं जब की वेताल को भूत नही वेताल भट्ट सम्राट विक्रमादित्य के नव रत्न में से एक थे ऐसे कई महान विद्वानों को वामपंथी कामरेडी ने भूत बना दिया , पर कोई बात नही जहा ऐसे गद्दार हैं वही डॉक्टर के.एम. राव , एस .बी. कुलकर्णी , पंडित कोटा वेंकटाचेलाम, कल्हण जैसे निष्पक्ष इतिहासविदुर भी जन्म लिए हैं जिन्होंने हमेसा मेरे मार्गदर्शन किये एवं आज सही एवं निष्पक्ष इतिहास पता चलता है ।।
दो विचित्र बातें इतने श्रेष्ठ ज्ञान संपन्न रह चुके देश में हो रही हैं पंचांग को लेकर।
पहली बात तो जिसे हिंदू नव वर्ष कहा जा रहा है वह उस अर्थ में किसी धर्म अथवा किसी पंथ का भी नववर्ष नहीं अपितु वह पूरी तरह खगोल विज्ञान की गणना के आधार पर मेष संक्रांति और बसंत संपात की शास्त्र शुद्ध और विज्ञान शुद्ध मान्यताओं के आधार पर चलने वाला पंचांग है।
वह एक स्वाभाविक कालगणना है। जिसे इन दिनों अभ्यास वश वैज्ञानिक कहा जा रहा है यद्यपि हमारे शास्त्रों में विज्ञान का एक अन्य अर्थ है परंतु मुख्य बात यह है कि वह एक आधुनिक अर्थों में वैज्ञानिक कालगणना है और सार्वभौमिक है, संपूर्ण पृथ्वी के लिए हैं और इसलिए उसे मानने वाला हिंदू नहीं है अपितु वैज्ञानिक है, वह खगोल शास्त्री हैं, वह खगोल में चल रही गतिविधियों के प्रति सजग और जानकारी से भरा हुआ व्यक्ति है और इस तरह वह एक वैश्विक नागरिक है ।
दूसरी ओर ईसाई नववर्ष को भारत में जो लोग मना रहे हैं वह बुद्धि से बहुत ही कमजोर और दयनीय लोग हैं और सत्ता के दास हैं और क्योंकि इस समय अनेक देशों में उन लोगों की सत्ता है
आज से पृथ्वी का उत्तर ध्रुव सूर्य की ओर बढ़ने लगता है, और इसी कारण भारत में इस दिन को नव वर्ष के रूप में मनाया जाता है। जब सूर्य की किरणें धरती पर नई ऊर्जा लेकर आती हैं, तब प्रकृति भी जैसे एक नया जीवन पाती है—पेड़-पौधे हरे-भरे हो जाते हैं, हवा में ताजगी घुल जाती है, और मन में एक नई आशा जन्म लेती है। यही वह समय होता है जब हम अपने जीवन में भी नए संकल्प लेते हैं, पुराने दुःखों को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं। हमारे पूर्वजों ने केवल त्योहार नहीं बनाए, बल्कि उन्होंने प्रकृति के हर परिवर्तन को समझकर उसे जीवन से जोड़ा। नव वर्ष का यह पर्व हमें याद दिलाता है कि जैसे पृथ्वी हर साल एक नया चक्र शुरू करती है, वैसे ही हमें भी हर वर्ष अपने जीवन को बेहतर बनाने का एक नया अवसर मिलता है।
यह चित्र हमें यह भी सिखाता है कि विज्ञान और संस्कृति एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। जहाँ विज्ञान हमें कारण समझाता है, वहीं परंपरा हमें उस कारण को महसूस करना सिखाती है।
आइए, इस नव वर्ष पर हम भी अपने भीतर एक नई रोशनी जलाएँ, इस ज्ञान को अपनाएँ, और जीवन के इस सुंदर सफर को और भी अर्थपूर्ण बनाएँ।
दो विचित्र बातें इतने श्रेष्ठ ज्ञान संपन्न रह चुके देश में हो रही हैं पंचांग को लेकर।
पहली बात तो जिसे हिंदू नव वर्ष कहा जा रहा है वह उस अर्थ में किसी धर्म अथवा किसी पंथ का भी नववर्ष नहीं अपितु वह पूरी तरह खगोल विज्ञान की गणना के आधार पर मेष संक्रांति और बसंत संपात की शास्त्र शुद्ध और विज्ञान शुद्ध मान्यताओं के आधार पर चलने वाला पंचांग है।
वह एक स्वाभाविक कालगणना है। जिसे इन दिनों अभ्यास वश वैज्ञानिक कहा जा रहा है यद्यपि हमारे शास्त्रों में विज्ञान का एक अन्य अर्थ है परंतु मुख्य बात यह है कि वह एक आधुनिक अर्थों में वैज्ञानिक कालगणना है और सार्वभौमिक है, संपूर्ण पृथ्वी के लिए हैं और इसलिए उसे मानने वाला हिंदू नहीं है अपितु वैज्ञानिक है, वह खगोल शास्त्री हैं, वह खगोल में चल रही गतिविधियों के प्रति सजग और जानकारी से भरा हुआ व्यक्ति है और इस तरह वह एक वैश्विक नागरिक है ।
दूसरी ओर ईसाई नववर्ष को भारत में जो लोग मना रहे हैं वह बुद्धि से बहुत ही कमजोर और दयनीय लोग हैं और सत्ता के दास हैं और क्योंकि इस समय अनेक देशों में उन लोगों की सत्ता है जो इसी कैलेंडर को जानते थे,, तो उनके अनुसरण में उन के बल पर भारत में भी लोग चाटुकार की तरह से अंतरराष्ट्रीय नव वर्ष या ईसाईयों का नव वर्ष कहकर इसे भारत में मना रहे हैं ।
ईसाइयों के पास अपना कभी कोई पंचांग था ही नहीं क्योंकि वे बौद्धिक रूप से बहुत ही कमजोर रहे और जब विश्व के संपर्क में आने के बाद वहां वैज्ञानिक विकास हुआ तो सभी वैज्ञानिकों ने ईसाइयत का विरोध किया है और ईसाइयों ने वैज्ञानिकों का विरोध किया है। आप किसको अपना नव वर्ष मानें यह आपकी बुद्धि है। मनुष्य के नाते हम सभी का सम्मान करते हैं ।
कोई व्यक्ति अज्ञानी है तो भी तो वह मनुष्य है ही और कोई व्यक्ति सेवक है तो ठीक है सेवा धर्म कर रहा है परंतु
इसे ईसाई कैलेंडर कहना और खगोलीय गणना को पांथिक अर्थ में हिन्दू कहना गलत है।
एक नैसर्गिक काल ज्ञान है।दूसरा कल्पित काल कथन।
✍🏻Agey….
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा ही वर्ष का प्रथम दिन है शास्त्रों के अनुसार, ज्योतिष नक्षत्र गणना के अनुसार चान्द्र वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही आरम्भ होता है क्योंकि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही चन्द्रमा पहले नक्षत्र अश्विनी या उसके बगल में व पहली राशि मेष में प्रवेश करता है।
फाल्गुन पूर्णिमा को चन्द्र पूर्वा या उत्तराफाल्गुनी में रहता है व चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को हस्त के आसपास जो 27 नक्षत्रों के एकदम मध्य में आता है इसलिए इस दिन किसी भी प्रकार वर्ष आरम्भ सिद्ध नहीं हो सकता है। न ही भारत में कोई भी संस्कृति तब से वर्षारम्भ मानती है। भारत में सभी जगह किसी न किसी रूप में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का ही महत्त्व है।
दूसरा कारण यह कि हर तीन साल में चन्द्र व सूर्य दोनों लगभग एकसाथ पहले नक्षत्र अश्वनी व पहली राशि मेष में प्रवेश करते हैं क्योंकि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा व मेष संक्रान्ति लगभग एक साथ आती है, चैत्र कृष्णपक्ष में ऐसा कभी भी सम्भव नहीं हो एकता क्योंकि चान्द्र वर्ष का मान सौर वर्ष से छोटा है इसलिए वह हमेशा मेष संक्रान्ति से पहले पड़ेगी।
हर तीन साल में चन्द्र सूर्य की यह एकरूपता हिन्दू कालगणना में चान्द्रवर्ष व सौरवर्ष के अद्भुत समन्वय को दर्शाती है है। चन्द्र और सूर्य ही पञ्चाङ्ग का निर्धारण करते हैं, तिथि नक्षत्र वार योग करण यह पांचों चंद्र व सूर्य पर ही आधारित हैं, अतः इनके वर्षों की एकरूपता भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के नववर्ष से ही सिद्ध होती है।
यदि चैत्र कृष्णपक्ष की प्रतिपदा को नववर्ष कहा जाएगा तो महाराष्ट्र व गुजरात में एक महीने बाद नववर्ष आएगा, क्योंकि वहाँ अमान्त मास के कारण चैत्र कृष्ण प्रतिपदा के दिन फाल्गुन कृष्ण प्रतिपदा रहेगी। जबकि सभी जानते हैं चैत्र शुक्ल प्रतिपदा सम्पूर्ण भारतवर्ष में एक ही होती है व उसी दिन अमान्त पूर्णिमांत दोनों ही प्रदेशों में साथ नववर्ष महोत्सव होता है।
हमारा पंचांग ज्योतिष पर आधारित है, नववर्ष भी ज्योतिष पर आधारित है, इतिहास पर नववर्ष आधारित नहीं है। जब इतिहास नहीं बना था तब भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा ही नववर्ष थी, इसी दिन से इतिहास चला है। हमारे नववर्ष का महत्त्व व व्यापकता जानकर इतिहास में महापुरुषों ने इस दिन का उपयोग भी महत्त्वपूर्ण कार्यों के लिए किया, न कि उनके कार्यों के आधार पर हमारा नववर्ष निश्चित हुआ। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना की थी, सतयुग का आरम्भ हुआ था, न कि सम्राट विक्रमादित्य ने शकों को हराया इसलिए हमने उस तिथि को अपना नववर्ष माना। सम्राट धर्म के पीछे चले हैं, किसी सम्राट ने हमारे धर्म को नहीं चलाया।
✍🏻 Aage aur padhe
बधाइयाें का अवसर : नव विक्रमीय संवत्सर
विक्रमीय संवत्सर की बधाइयां देते-लेते कई बरस हो गए..। भारत कालगणनाओं की दृष्टि से बहुत आगे रहा है। यहां गणित को बहुत रुचि के साथ पढ़ा और पढ़ाया जाता था। यहां खास बात पर्व और उत्सवों के आयोजन की थी और उसके लिए अवसरों को तय करना बड़ा ही कठिन था। कई संस्कृतियां अपने-अपने ढंग को लेकर आई कई संस्कृतियां यहां रची-बसी, मगर सबको यहां की रवायतों के साथ तालमेल करना ही था। कुछ तो प्रयास और कुछ सहजता से यह कार्य हुआ।
गणितज्ञों ने बहुत परिश्रम किया… इस परिश्रम काे साश्चर्य स्वीकारा था अलबीरुनी ने जो भारत में 30 अप्रैल 1030 से लेकर 30 सितंबर 1030 तक रहा, रेनाद ने उसके कार्य का फ्रांसिसी अनुवाद ‘फ्रेगमां अरेबीज ए परसां’ के नाम से किया। इसे प्रथमतया यूं अनूदित किया गया –
सामान्यताया लोग श्रीहर्ष के, विक्रमादित्य के, शक के, वल्लभ के तथा गुप्तों के संवत का प्रयोग करते हैं। वल्लभ, जिसका नाम एक संवत के साथ भी संबद्ध है, अनहिलवाड के दक्षिण में लगभग 30 योजनों की दूरी पर स्थित वलभी नामक स्थान का शासक था, यह संवत शक संवत से 241 साल बाद का है, शक संवत की तिथि में से छह का घन अर्थात् 216 तथा पांच का वर्ग 25 घटाने पर वल्लभी संवत की प्राप्ति होती है.. गुप्तों का संवत उनकी सत्ता जाने के बाद आरंभ हुआ… जो कि शक के 241 वें साल से आरंभ होता है। ब्रह्मगुप्त की खंडखाद्यक (कन्दरवातक) की सारणियां इसी संवत में रखी जाती है, इस कृति को हम अरकंद के नाम से जानते हैं। इस प्रकार मज्दर्जिद के संवत के 400 वें साल में रखने पर हम स्वयं को श्री हर्ष संवत के 1488वें वर्ष में, विक्रमादित्य संवत के 1088वें वर्ष में, शक संवत के 953 वें वर्ष में, वल्लभी संवत तथा गुप्तों के संवत के 712वें वर्ष में पाते हैं…। मित्रों को यह जानकर हैरानी होगी कि नवंबर, 1887 ईस्वी में जॉन फैथफुल फ्लीट को यह अनुवाद नहीं रुचा और उसने प्रो. सचाऊ आदि के अनुवाद व मूलपाठ को जमा किया :
” व लि धालिक अरडू अन् हा व इला तवारीख श्रीह्रिश व बिगरमादित व शक व बिलब व कूबित व अम्मा तारीख बल्ब…।”
यह विषय बहुत जटिल था, है और रहेगा, इस पर फ्लीट ने अपने जमाने में करीब दो सौ पन्ने लिखे हैं जिनका प्रकाशन ‘काॅर्पस इंस्क्रीप्शनम इंडिकेरम’ के तीसरे भाग में हुआ हैं। उसकी गणित और गणनाओं को निर्धारित करने के लिए भारतीयों ने अपना पराक्रम दिखाया। उस जमाने के मशहूर भारतीय गणितज्ञ और पंचांगकारों ने कमरतोड़, कल्पनातीत प्रयास किया। इनमें भगवानलाल इंद्रजी, शंकर बालकृष्ण दीक्षित जैसे अपूर्व प्रतिभा के धनी विद्वान भी शामिल थे। भारत के सभी गौरवशाली ग्रंथों और अन्यान्य प्रमाणों, संदर्भों को भी सामने रखा गया था। जे. फरर्गुसन जैसों के निर्णयों को भी कसौटी पर कसा गया… बहुत अच्छा हुआ कि मंदसौर नगर से यशोधर्मन का लेख मिल गया जिसके लिए 533-34 ईस्वी की तिथि मिली।
समस्या यहीं पर खत्म नहीं हुई… लंबी गणनाएं हुईं। अनेकानेक शिलालेखों के आधार पर गणनाओं के लिए कई कागज रंगे गए, तब केल्कुलेटर कहां थे और यह स्वीकारा गया कि ईस्वी सन् 58 से प्रारंभ होने वाला विक्रम संवत है किंतु सामान्यतया 57 ईस्वी से प्रारंभ हुआ माना जाता है। यह पश्चिमी भारत की उत्पत्ति का संवत कहा गया जिसे उज्जैन के शासक विक्रम या विक्रमादित्य के शासनकाल के प्रारंभ से माना जाता है। फरगुसन का विचार था कि यह छठीं सदी में आविष्कृत हुआ लेकिन इसका ऐतिहासिक प्रारंभ बिंदु ईस्वी सन 544 था, तथा इसको पीछे की तिथि से संबद्ध किया गया किंतु मन्दसौर लेख से प्रमाणित होता है कि यह इस समय के पूर्व मालव नाम के अंतर्गत अस्तित्वमान था। मध्यभारत में यह 9वीं सदी ईस्वी तक ज्ञात था और 11वीं शताब्दी ईस्वी में विक्रम के नाम के साथ संबद्ध रूप में इस संवत का एक प्राचीन दृष्टांत खोजा गया।
है न जंजाली जटिलताओं के बीच एक रोचक खोज के निर्धारण का प्रयास जो डेढ़ सदी पहले हुआ… मगर आज हमारे पास कई नए प्रमाण मौजूद हैं, उज्जैन स्थित विक्रमादित्य शोधपीठ के खोजे गए प्रमाण भी कम नहीं। कई प्रकाशन हुए हैं, उसके निदेशक डॉ. भगवतीलालजी राजपुरोहित तो ‘विक्रमार्क’ शोधपत्रिका संपादन कर रहे हैं। और तो और, अश्विनी रिसर्च सेंटर, माहीदपुर के चेयरमेन डॉ. आर. सी. ठाकुर ने विक्रमादित्य के सिक्के और छापें भी खोज निकाली हैं। पिछले दिनों दोनों से मेरी मुलाकात भी हुईं। ये प्रमाण गणना मूलक एक संवत के प्रवर्तक के लिए तो है ही, संवत के अस्तित्व में आने के कारणों को भी पुष्ट करेंगे। काम एक दिमाग के सोच से ज्यादा है, कई लोग लगे हैं… मगर, हमारे लिए तो यह उचित होगा कि हम कालीमिर्च, नीम की कोपल, मिश्री का सेवन करें और परस्पर बधाइयों का आदान प्रदान करें। जय-जय।
विक्रम संवत् और हम
एक सज्जन कुछ वर्षों पहले मेरे पास आए और मुझे गर्व से बताते हुए उन्होंने एक कैलेण्डर दिखाया। उस पर बड़े अक्षरों में लिखा था : हिन्दू कैलेण्डर। वे विक्रम संवत का अनुवार्षिक प्रकाशन हिंदू नववर्ष की तरह करते थे। मैंने कहा कि बस यहीं पर मेरा मतभेद है। यह एक औपनिवेशक सत्ता द्वारा काफी चालाकी से खेले गए एक खेल का परिणाम है कि हम भी उन्हीं की पिच पर उन्हीं की शर्तों पर खेलने के लिए तत्पर रहते हैं। इसी औपनिवेशिक सत्ता ने ‘हिंदू’ शब्द का अर्थ-संकुचन किया था और इसी ने ही विक्रम संवत को भी एक सांप्रदायिक परिधि में बांध दिया। आज विक्रम-संवत एक धार्मिक पहचान वाला संवत् इस हद तक बन गया है कि आज से कुछ सालों पहले जब मध्यप्रदेश सरकार ने इस संवत् के पहले दिन अर्थात् वर्ष प्रतिपदा को अवकाश की घोषणा की तो कुछ हल्कों में उसे एक सांप्रदायिक पहल तब तक बताया जाता रहा जब तक कि उनके सामने यह तथ्य न लाया गया कि केरल में सरकार राज्य भर में चिंगम प्रथम पर आयोजन करती है। मलयालम कैलेंडर- ‘कोला वर्षम्’ तो फिर भी कोल्लम में शिव मंदिर निर्मित करने के उपलक्ष्य में 825 ई. में शुरू हुआ था। लेकिन विक्रम संवत् के प्रवर्तन में तो इतनी भी मजहबी या सांप्रदायिक संवेदना नहीं है।
जितनी कि उस तथाकथित ‘सिविल’ कैलेण्डर में है जिसे दुनिया के एक बड़े हिस्से में ‘क्रिश्चियन केलेण्डर’ के रूप में जाना जाता है। इसे पोप ग्रेगरी तेरहवें ने 1582 में प्रवर्तित किया था। पोप की धर्माज्ञा (Papal Bull) 24 फरवरी, 1582 को Inter Gravissimas के नाम से निकली थी। इसे प्रवर्तित करने की मुख्य प्रेरणा ईस्टर के पर्व की तिथि का समायोजन करना था। चर्च ऑफ रोम और चर्च ऑफ अलेक्ज़ेड्रिया में इस बारे में मतभेद चला आ रहा था। ऐसा कर ये मतभेद दूर किये गए। इसके बाद भी इसे शुरू में कैथलिक चर्च और पोपाधीन राज्य- यानी रोम, मार्शे, अंब्रया, रोमाग्ना के बाहर नहीं स्वीकार किया गया था। यह राज्य इटली प्रायद्वीप का एक हिस्सा मात्र था। प्रोटेस्टेंट और आर्थोडॉक्स सहित कुछ अन्य चर्चों ने भी इसे नहीं स्वीकारा था। जब पहली बार इस केलेण्डर को प्रकाशित किया गया था तो इसकी बॉटमलाइन में पोप की अधिकृति (ऑथोरॉइजेशन) का उल्लेख था। ब्रिटेन और ब्रिटिश साम्राज्य ने 1752 से पहले तक इस केलेण्डर को नहीं स्वीकारा था। यानी ब्रिटिश प्रतिरोध लगभग 170 वर्ष तक चला। स्वीडिश प्रतिरोध 171 वर्ष। फ्रांस ने इसे स्वीकार भी किया और 1793 में इसे त्यागकर फ्रेंच रिपब्लिकन कैलेण्डर प्रवर्तित किया। 1805 में उसने इसे वापस स्वीकारा।
यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि पोप ने अपनी धर्माज्ञा में ऐसे कैलेण्डर जारी करने को अपना पारंपरिक प्राधिकार बताया था। उसने तब कहा था : ‘’By this our decree, we therefore assert what is the customary right of the sovereign pontiff, and approve the calendar which has now by the immense grace of God towards his church been corrected and completed, and we have ordered that it be printed and published at Rome… We wish all patriarchs, primates, archbishops, bishops, abbots and others who preside over churches, to introduce the new calendar for reciting divine offices and celebrating feasts in all their churches, monasteries, convents, orders, militias and dioceses. ’’
इस प्रकार आज का तथाकथित “धर्मनिरपेक्ष” कैलेण्डर मूलतः एक धार्मिक/ सांप्रदायिक कैलेण्डर था। एक संप्रदाय विशेष के प्रमुख द्वारा जारी किया गया था। इसे प्रवर्तित करने की प्रेरणा और कारण भी धार्मिक था और इसका प्रयोजन व उपयोग भी प्रमुखतः धार्मिक था। दूसरी ओर आज ‘हिंदू’ कहा जाने वाला कैलेण्डर एक राष्ट्रीय उपलब्धि को अनुष्ठानित करने के लिए एक शासक/ प्रशासक के द्वारा स्थापित और प्रवर्तित कैलेण्डर था। यह राष्ट्रीय पराक्रम के सम्मान में चक्रवर्ती राजा विक्रमादित्य द्वारा तब आरंभ किया गया जब उसकी सेनाओं ने 95 शक राजाओं को पराजित कर भारत को विदेशी राजाओं की दासता से मुक्त किया था। भारत में संवत् ऐसे ही स्थापित/ प्रवर्तित नहीं हो जाते। शास्त्रीय मान्यता यह थी कि जिस नरेश को अपना संवत् चलाना हो, उसे संवत् चलाने के दिन से पूर्व अपने पूरे राज्य में जितने भी लोग किसी के ऋणी हों, उनका ऋण अपनी ओर से चुकाना होता था। महाराजा विक्रमादित्य ने अपने राज्य कोष से धन देकर दीन दुखियों को साहूकारों के कर्ज से मुक्त किया था। इसकी तुलना आजकल की कर्ज माफी योजना से भी नहीं की जा सकती क्योंकि तब सिर्फ राजकीय ऋण ही नहीं माफ किए गए थे बल्कि निजी मनीलेंडर्स सहित किसी से भी लिए हुए कर्ज से मुक्त किया गया था। विक्रम शब्द सिर्फ तत्कालीन शासक का निजी नाम ही नहीं था बल्कि राष्ट्र की शक्ति और पराक्रम का परिचायक था। सारे पश्चिमी भारत सौराष्ट्र (काठियाकाड़), गुजरात, अवंती तक शक छा गए थे। सिंध, तक्षशिला, मथुरा, महाराष्ट्र तक में उनके केन्द्र बन चुके थे। उन विदेशी आक्रान्तों को पराजित करने का पराक्रम राष्ट्र ने दिखाया था, उसकी स्मृति को चिरस्थाई बनाने के लिए यह संवत् प्रवर्तित किया गया था।
फ्लीट और फर्गुसन आदि बहुत से औपनिवेशक इतिहासविदों ने विक्रम संवत् के बारे में भ्रांतियाँ फैलाने के अधकचरे प्रयास किए हैं। फ्लीट उसे शकों द्वारा प्रवर्तित बताते हैं। ‘शकारि’ द्वारा नहीं। कोशिश यही रही है कि विक्रम संवत् राष्ट्र की विदेशियों पर विजय का स्मारक-संवत् न रहकर उसकी पराजय की स्मृति में बदल जाए। लेकिन ऐसे प्रयास अपने ही अंतर्विरोधों से ध्वस्त हो चुके हैं।
कल्पना कीजिए कि यदि भारत गुलाम नहीं हुआ होता तो क्या ग्रेगोरियन कैलेण्डर हम पर लादा जा सकता था? आज भी सरकार और राज्य ने भले ही इसे चला रखा है, लेकिन भारतीय समाज अपने पर्व-त्यौहार ग्रेगोरियन कैलेण्डर से नहीं मनाता। न अपने घर-परिवार की ब्याह-शादियों का निर्धारण उससे करता है। तो समाज राष्ट्रीय कैलेण्डर से चल रहा है और राज्य धार्मिक कैलेण्डर से। राज्य और समाज के बीच फांक के बारे में बहुत से उदाहरण हैं। लेकिन ‘स्टेट’ और ‘चर्च’ के पृथक्करण की यहाँ इस बिंदु पर एक हद तक उपेक्षा कर दी गई है। ‘चर्च’ की तारीखें स्वतंत्र भारतीय राज्य द्वारा अपना ली गई हैं। यह औपनिवेशिक बोझ है जिसका प्रसन्नतापूर्वक परिवहन हम सब कर रहे हैं।तो अब हम पर्यावरण दिवस 5 जून को मनाते हैं जब प्रकृति अपनी सबसे लुटी-पिटी हालत में होती है, हरियाली तीज या हरियाली अमावस्या पर नहीं जब प्रकृति की सुषमा अपने गौरव में खिलती है।
अब हम इस प्रशासकीय उपलब्धि पर बने कैलेण्डर का कोई प्रशासनिक विनियोग भी नहीं करते। गुलामी के पहले ऐसा विनियोग करते हुए हमें किंचित् भी शर्मिन्दगी महसूस नहीं होती थी। तब वसंत पंचमी के दिन स्लेट-पट्टी पर लिखना सिखाया जाता था और वह दिन शाला का प्रवेशोत्सव वाला दिन होता था। ‘ओनामासी धम/बाप पढ़े न हम’ जैसी कहावतों में वह आज भी छुपा हुआ है। ‘ओनामासी धम’ यानी ‘ओम नमः सिद्धम’। तब बलराम दिवस किसान दिवस हो सकता था, विश्वकर्मा दिवस अभियंताओं का दिन हो सकता था, धन्वन्तरि दिवस चिकित्सकों का दिन हो सकता था। तब दशहरे से लेकर देवउठनी एकादश तक वृक्ष-पूजा/ वृक्षारोपण/ वृक्ष-संरक्षण के 5 दिन हो सकते थे। जिस देश में राष्ट्र ही धर्म था, वहाँ धर्म के आधार पर राष्ट्र को पोस्टपोन कर दिया गया।
यह भी देखें कि 1582 ई. में ग्रेगोरियन कैलेण्डर आने के 18 साल बाद ईस्ट इंडिया कंपनी का इंग्लैंड में गठन होता है, 20 साल बाद डच ईस्ट इंडिया कंपनी का, 46 साल बाद पोर्तुगीज ई.इं.क.का और 1664 ई. में फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी का। इन सबके द्वारा दुनिया को गुलाम बनाने की मुहिम शुरू हुई। यानी भारतीय कैलेण्डर जहाँ दासता से मुक्त करता था, वहीं ग्रेगोरियन कैलेण्डर का विकास विश्वभर में गुलामी का प्रसार करने से हुआ। भारतीय कैलेण्डर जहाँ ऋणोन्मोचन से होता था, ग्रेगोरियन कैलेण्डर भारत से हुए पूंजी के उस ड्रेन की याद दिलाता है जिसकी चर्चा दादा भाई नौरोजी ने इतने विस्तार से की है।
कैलेण्डर शब्द संभवतः ‘कालान्तर’ शब्द का ही एक रूप है। वह सामाजिक जीवन से संगठन के लिए एक उपयोगी उपकरण ही नहीं है बल्कि वह यथार्थ के एक निश्चित पर्सेप्शन का माध्यम है। विक्रम संवत् जागतिक स्थिरता एवं लय को पकड़ने वाला ऐसा संवत् है जो प्रकृति से निरन्तर संवाद करता है। यह सिंतबर, अक्टूबर, नवंबर, दिसंबर की तरह वहाँ सात, आठ, नौ, दस की तरह की गिनती नहीं है। यहाँ जूलियस सीज़र या ऑगस्टस की तरह राजाओं के नाम पर जुलाई-अगस्त नहीं है। वे भी बाद में जोड़े जाए। पहले वे भी नहीं थे। गिनती की अशुद्धियाँ भी हैं क्योंकि 12 महीनों वाले कैलेण्डर का आखिरी महीना दस पर कैसे खत्म हो सकता है। इसका मतलब यह है कि जनवरी और फरवरी ग्यारहवें और बारहवें महीने हुए अर्थात् पहला महीना वही मार्च हुआ, जिसमें प्रायः चैत्र पड़ता है, जिससे विक्रम संवत् की शुरूआत होती है। फायनेंशियल इयर के रूप में कमोबेश वही विक्रम संवत् दुनिया भर में चलता है। एक तरह से वैश्वीकरण की प्रक्रिया में इसका अनदेखा योगदान है। जिस ग्लोबलाइजेशन के तर्क पर ग्रेगोरियन कैलेण्डर आवश्यक हो गया है, उसी तर्क को फायनेंशियल इयर के रूप में व्यवहारतः विक्रम संवत् ने, अप्रत्यक्ष रूप से, कोई दावा किए बिना पूरा किया है। सेचा स्टर्न (कैलेंडर्स इन इंटीक्विटी) प्राचीन समाजों के एक अध्ययन में कहते हैं कि तब एक दोहरी कैलेंडर परंपरा चली आई। एक सिविल कैलेण्डर की और एक धार्मिक कैलेण्डर की। बहुत प्राचीन लैटिन लेखक सेंसोरिनस (तृतीय शती ई.पू.) ने इसका उल्लेख सहज रूप से किया है, लेकिन इनकी contrastive pairing आधुनिक स्कॉलरशिप की देन है। प्राचीन मेसोपोटामिया में एक चंद्र संवत भी था और 30 दिन के महीनों वाला एक दूसरा संवत् भी था जो लेखादि प्रयोजनों में काम आता था। ऐसी दुहरी या विविध संवतों वाली व्यवस्था के दृष्टान्त इसराइल, मिस्र, ग्रीस, अरब में भी पाए जाते हैं।
भारत में समय का चक्र पूरा घूम गया है। अब जो ‘धार्मिक’ था, वह ‘सिविल’ हो गया है और जो ‘सिविल’ था, वह ‘धार्मिक’ हो गया है। यह परिवर्तन भारत की गुलामी के बिना संभव नहीं हुआ।
इसलिए अनुरोध है कि आज नए विक्रम संवत् का आरंभ सेलीब्रेट करते हुए इतिहास की इस त्रासदी और विडम्बना का परिप्रेक्ष्य जरूर ध्यान रखें।
विक्रम संवत् कब से ?
एक विचार : अत्रि विक्रमार्क जी की ओर से
५७ई.पू. में ‘विक्रम’ नामक संवत्सर ही था। एक कारण यह भी है इसे विक्रम संवत् कहने का ।
१३४ या १३५ वर्षों के अन्तर पर शक वर्ष प्रारम्भ किये जाने के पीछे भी ज्योतिषीय योजना ही है । {कार्तिकादि में १३४ का तथा चैत्रादि में १३५ का अन्तर रहता है।}
पाँच वर्षों के एक युग में सूर्य १३५ नक्षत्रों का भोग करता है और चन्द्रमा के अयन १३४ होते हैं।
धनिष्ठा में जब सूर्य, चन्द्र, बृहस्पति तथा उत्तरायणारम्भ था तब से युगारम्भ हुआ और युगारम्भ वर्ष में संवत्सर का नाम हुआ ‘प्रभव’ origin .
शक वर्ष का प्रारम्भ भी ‘प्रभव’ नामक संवत्सर से ही हुआ।
आप जानते ही हैं कि संवत्सर ६० हैं और इनकी आवृत्ति पुनः पुनः होती रहती है।
ये बृहस्पति की गति पर आधारित हैं , ८५ वर्षों में एक संवत्सर का क्षय हो जाता है, इसी तथ्य का ध्यान दिलाने के लिए ६०वें संवत्सर का नाम ‘क्षय’ रखा गया है।
विक्रम संवत् कब से और नामकरण का आधार —–
हम जानते हैं कि भारतवर्ष में पञ्चसंवत्सरात्मक युग एवं द्वादशाब्दात्मक बार्हस्पत्य युग के सम्मेलन के फलस्वरूप साठ वर्षीय युग प्राप्त होता है।
५×१२ = ६०
और इस प्रकार साठ संवत्सरों के साठ नाम या संज्ञायें भी हुईं।
उक्त ६० नामों की सूची हमें श्रीविष्णुधर्मोत्तरपुराण तथा वराहमिहिरकृत बृहत्संहिता में प्राप्त होती है।
वराहमिहिर के ग्रन्थों पर उत्पल भट की टीकायें प्राप्त होती हैं।
बृहत्संहिता में दसवें युग अर्थात् क्रम सं. ४६ से लेकर क्रमाङ्क ५० तक के बार्हस्पत्य संवत्सरों के नाम बृहस्पतिचाराध्यायान्तर्गत कथित हैं-
इन्द्राग्निदैवं दशमं युगं यत्तत्राद्यवर्षं ( यत्राद्यमब्दं) परिधाविसंज्ञम् ।
प्रमादिनं विक्रममपि अतोऽन्यत् ( प्रमाद्यथानन्दमतः परं यत्) । स्याद् राक्षसं चानलसंज्ञितम् च ॥४४॥
इन्द्राग्निदैवं दशमं युगं यत् तत्राद्यमब्दं परिधावि १ संज्ञम्। प्रमाद्य २थानन्द ३ मतः परं यत् स्याद्राक्षसं ४ चानल ५ संज्ञितं च।
यहाँ स्पष्ट है कि ४८वें क्रम के संवत् की सञ्ज्ञा #विक्रम है। और इस पर भटोत्पल के सशक्त हस्ताक्षर हैं।
यह तो आपको पता ही होगा कि षष्ट्यब्दों में प्रथम नाम “प्रभव” एवं अन्तिम साठवाँ “क्षय” है।
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा।।
प्रभव के पश्चात् प्रलय या क्षय ही होगा।
अब और स्पष्टता से कहें तो जान लीजिये कि शालिवाहन शकारम्भ से १३५ वर्ष पूर्व यही ४८वें क्रम का “विक्रम” संवत् था।
जो लोग नहीं जानते हैं उनको बता दें कि सन् २०२१( वैक्रमाब्द २०७८) में ‘विक्रम/आनन्द’ नाम का संवत्सर होगा।
अब यदि आप २०७८ को ६० से विभाजित करेंगे तो ३४ बार भाग जाकर , शेष रह जायेंगे ३८ ।
अर्थात् ६० से २२ न्यून रहे। इसका कारण है प्रति ८५ वर्ष में एक संवत् का क्षय होना, दूसरे शब्दों में ८५ सौर वर्षों में ८६ बार्हस्पत्य वर्ष पूर्ण हो जाते हैं।
२०७८ में ८६ का भाग दें तो लब्धि प्राप्त होगी २२ +१।
{ स्थूल गणित से केवल संकेत किया है}
यहाँ एक बात और कहना आवश्यक है कि युगादि वह स्थिति है जिसका उल्लेख लगधप्रोक्त ज्योतिष, विष्णुधर्मोत्तरपुराण एवं गर्गवचनों में है।
यह १५०५ विक्रमपूर्व या १६४० शकपूर्व है।
युक्तेश्वर गिरि ने ज्योतिष पर भी कार्य किया था, इन्होंने शून्य अयनांश वर्ष की कल्पना सम्भवतः कुलप भट की आर्य्यभटीय के अनुसार उसके काल को आधार बनाकर की थी।
मेरे विचार से शून्य अयनांश वर्ष विक्रम सम्वत्सर का आदि वर्ष ही है।
Ayanamsha Precession rate Start year
Lahiri: 50.2719 285 ce
Krishnamurti 50.2388475 291 CE
B.V. Raman 50.33 397 CE
Fagan-Bradley [western sidereal] 50.25 221 CE
YukteshwarA 53.9906 499 CE
किसी ने कहा है-
अप्रत्यक्षाणि शास्त्राणि विवादस्तत्र केवलम् । प्रत्यक्षं ज्यौतिषं शास्त्रं चन्द्रा
क्या किसी भी कैलेण्डर का प्रवर्तन कहीं भी हो सकता है? क्या कैलेण्डर सिर्फ टाइमकीपिंग का एक तरीका है, या आप लोग तो स्वयं डॉक्टर हैं तो मैं पूछ सकता हूँ कि कैलेण्डरों का न्यूरोएंडोक्राइन क्लॉक से कोई रिश्ता है? कि जितने भी vertebrates है, सभी की सीजनलिटीज़ की साइकल्स होती हैं, सभी का ऋतु-चक होता है. प्रत्येक के पास अपनी एक circaannual timing है। प्रत्येक का एक फोटोपीरियडिज्म है।
कि कैलेंडर सिर्फ कालांतर ही नहीं है, देशान्तर भी है। उसका एक पर्यावरणीय तर्क भी है। उसमें रहने वाले मनुष्यों की एक seasonal रिद्मिसिटी होती है। यही तो शास्त्रों में कहा गया कि संवसन्तेऽस्मिन् भूतानि – जिसमें समस्त भूत अच्छी प्रकार बसते हैं। सूर्य का एक नाम संवत्सर है। संवत्सर को त्रिनाभिचक्रम भी कहा गया : ग्रीष्म, वर्षा, हेमन्त।
तो कैलेण्डर का बदलना सिर्फ संस्कृति का बदलना ही नहीं है, वह प्रकृति का बदलना भी है। ऋतुचक्र से छेड़छाड़ ऋत से छेड़छाड़ है। विक्रम संवत् हमारे परिवेश और प्रकृति के अनुकूल है। और वह हमारी संस्कृति के सर्वश्रेष्ठ मूल्यों का भी संरक्षण करता है।
स्वातंत्र्योत्तर भारत में जब हमने पोप ग्रेगरी तेरहवें के कैलेंडर को मान्यता दी और विक्रम सम्वत् को नहीं, तभी हमारी मूल्यगत प्राथमिकताएँ पता चल गयीं।
विक्रमादित्य के संस्कारों से अपने को जोड़ना सिर्फ पराक्रम की परंपरा से ही अपने को जोड़ना न था, वह न्याय की परंपरा के प्रति भी अपनी निष्ठा प्रकट करना था। जिन विक्रमादित्य के सिंहासन पर बैठकर एक ग्राम्य बच्चे तक का न्याय-बोध इतना जागृत हो जाता था, उनके सामने पोप ग्रेगरी तेरहवें की हैसियत ही क्या थी? इस पोप ने तो कैथलिक मज़हब को न मानने वालों को ईशद्रोही कहकर इनक्वीजीशन में मरवाया और प्रोटेस्टेंटों के नरसंहारों का अनुमोदन किया और जिसके लालच व भ्रष्टाचार के किस्से मशहूर हैं, उसके द्वारा प्रवर्तित कैलेंडर को चुनना आपके लिए क्यों जरूरी हो गया था।
राज्य अपनी कोई भी वरीयता बताए, भारत के समाज ने इस ग्रेगोरियन कैलेण्डर को चुनना सरासर अस्वीकार कर दिया। तंत्र ने अपनी कोई भी विवशता स्वतंत्र होने के बाद भी बतलाई हो, समाज ने ‘स्व’ होने का मतलब समझाया।
पर इससे राज्य और समाज के बीच की दूरी बढ़ गयी। इसके बाद समाज राज्य पर विश्वास कर न सका।
विक्रम संवत् और हम
एक सज्जन कुछ वर्षों पहले मेरे पास आए और मुझे गर्व से बताते हुए उन्होंने एक कैलेण्डर दिखाया। उस पर बड़े अक्षरों में लिखा था : हिन्दू कैलेण्डर। वे विक्रम संवत का अनुवार्षिक प्रकाशन हिंदू नववर्ष की तरह करते थे। मैंने कहा कि बस यहीं पर मेरा मतभेद है। यह एक औपनिवेशक सत्ता द्वारा काफी चालाकी से खेले गए एक खेल का परिणाम है कि हम भी उन्हीं की पिच पर उन्हीं की शर्तों पर खेलने के लिए तत्पर रहते हैं। इसी औपनिवेशिक सत्ता ने ‘हिंदू’ शब्द का अर्थ-संकुचन किया था और इसी ने ही विक्रम संवत को भी एक सांप्रदायिक परिधि में बांध दिया। आज विक्रम-संवत एक धार्मिक पहचान वाला संवत् इस हद तक बन गया है कि आज से कुछ सालों पहले जब मध्यप्रदेश सरकार ने इस संवत् के पहले दिन अर्थात् वर्ष प्रतिपदा को अवकाश की घोषणा की तो कुछ हल्कों में उसे एक सांप्रदायिक पहल तब तक बताया जाता रहा जब तक कि उनके सामने यह तथ्य न लाया गया कि केरल में सरकार राज्य भर में चिंगम प्रथम पर आयोजन करती है। मलयालम कैलेंडर- ‘कोला वर्षम्’ तो फिर भी कोल्लम में शिव मंदिर निर्मित करने के उपलक्ष्य में 825 ई. में शुरू हुआ था। लेकिन विक्रम संवत् के प्रवर्तन में तो इतनी भी मजहबी या सांप्रदायिक संवेदना नहीं है।
जितनी कि उस तथाकथित ‘सिविल’ कैलेण्डर में है जिसे दुनिया के एक बड़े हिस्से में ‘क्रिश्चियन केलेण्डर’ के रूप में जाना जाता है। इसे पोप ग्रेगरी तेरहवें ने 1582 में प्रवर्तित किया था। पोप की धर्माज्ञा (Papal Bull) 24 फरवरी, 1582 को Inter Gravissimas के नाम से निकली थी। इसे प्रवर्तित करने की मुख्य प्रेरणा ईस्टर के पर्व की तिथि का समायोजन करना था। चर्च ऑफ रोम और चर्च ऑफ अलेक्ज़ेड्रिया में इस बारे में मतभेद चला आ रहा था। ऐसा कर ये मतभेद दूर किये गए। इसके बाद भी इसे शुरू में कैथलिक चर्च और पोपाधीन राज्य- यानी रोम, मार्शे, अंब्रया, रोमाग्ना के बाहर नहीं स्वीकार किया गया था। यह राज्य इटली प्रायद्वीप का एक हिस्सा मात्र था। प्रोटेस्टेंट और आर्थोडॉक्स सहित कुछ अन्य चर्चों ने भी इसे नहीं स्वीकारा था। जब पहली बार इस केलेण्डर को प्रकाशित किया गया था तो इसकी बॉटमलाइन में पोप की अधिकृति (ऑथोरॉइजेशन) का उल्लेख था। ब्रिटेन और ब्रिटिश साम्राज्य ने 1752 से पहले तक इस केलेण्डर को नहीं स्वीकारा था। यानी ब्रिटिश प्रतिरोध लगभग 170 वर्ष तक चला। स्वीडिश प्रतिरोध 171 वर्ष। फ्रांस ने इसे स्वीकार भी किया और 1793 में इसे त्यागकर फ्रेंच रिपब्लिकन कैलेण्डर प्रवर्तित किया। 1805 में उसने इसे वापस स्वीकारा।
यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि पोप ने अपनी धर्माज्ञा में ऐसे कैलेण्डर जारी करने को अपना पारंपरिक प्राधिकार बताया था। उसने तब कहा था : ‘’ “इस हमारे आदेश द्वारा हम यह घोषित करते हैं कि यह सर्वोच्च पोंटिफ़ (पोप) का परंपरागत अधिकार है। हम उस कैलेंडर को अनुमोदित करते हैं, जिसे अब परमेश्वर की अपनी कलीसिया पर असीम कृपा से संशोधित और पूर्ण किया गया है, और हमने आदेश दिया है कि इसे रोम में मुद्रित और प्रकाशित किया जाए।
हम यह भी चाहते हैं कि सभी पैट्रिआर्क, प्राइमेट, आर्कबिशप, बिशप, एबॉट तथा अन्य जो चर्चों का नेतृत्व करते हैं, वे इस नए कैलेंडर को अपने सभी चर्चों, मठों, कॉन्वेंट्स, धार्मिक आदेशों, संगठनों और डायोसीज़ में ईश्वरीय अनुष्ठानों के पाठ और पर्वों के उत्सव के लिए लागू करें।”
. ’’
इस प्रकार आज का तथाकथित “धर्मनिरपेक्ष” कैलेण्डर मूलतः एक धार्मिक/ सांप्रदायिक कैलेण्डर था। एक संप्रदाय विशेष के प्रमुख द्वारा जारी किया गया था। इसे प्रवर्तित करने की प्रेरणा और कारण भी धार्मिक था और इसका प्रयोजन व उपयोग भी प्रमुखतः धार्मिक था। दूसरी ओर आज ‘हिंदू’ कहा जाने वाला कैलेण्डर एक राष्ट्रीय उपलब्धि को अनुष्ठानित करने के लिए एक शासक/ प्रशासक के द्वारा स्थापित और प्रवर्तित कैलेण्डर था। यह राष्ट्रीय पराक्रम के सम्मान में चक्रवर्ती राजा विक्रमादित्य द्वारा तब आरंभ किया गया जब उसकी सेनाओं ने 95 शक राजाओं को पराजित कर भारत को विदेशी राजाओं की दासता से मुक्त किया था। भारत में संवत् ऐसे ही स्थापित/ प्रवर्तित नहीं हो जाते। शास्त्रीय मान्यता यह थी कि जिस नरेश को अपना संवत् चलाना हो, उसे संवत् चलाने के दिन से पूर्व अपने पूरे राज्य में जितने भी लोग किसी के ऋणी हों, उनका ऋण अपनी ओर से चुकाना होता था। महाराजा विक्रमादित्य ने अपने राज्य कोष से धन देकर दीन दुखियों को साहूकारों के कर्ज से मुक्त किया था। इसकी तुलना आजकल की कर्ज माफी योजना से भी नहीं की जा सकती क्योंकि तब सिर्फ राजकीय ऋण ही नहीं माफ किए गए थे बल्कि निजी मनीलेंडर्स सहित किसी से भी लिए हुए कर्ज से मुक्त किया गया था। विक्रम शब्द सिर्फ तत्कालीन शासक का निजी नाम ही नहीं था बल्कि राष्ट्र की शक्ति और पराक्रम का परिचायक था। सारे पश्चिमी भारत सौराष्ट्र (काठियाकाड़), गुजरात, अवंती तक शक छा गए थे। सिंध, तक्षशिला, मथुरा, महाराष्ट्र तक में उनके केन्द्र बन चुके थे। उन विदेशी आक्रान्तों को पराजित करने का पराक्रम राष्ट्र ने दिखाया था, उसकी स्मृति को चिरस्थाई बनाने के लिए यह संवत् प्रवर्तित किया गया था।
फ्लीट और फर्गुसन आदि बहुत से औपनिवेशक इतिहासविदों ने विक्रम संवत् के बारे में भ्रांतियाँ फैलाने के अधकचरे प्रयास किए हैं। फ्लीट उसे शकों द्वारा प्रवर्तित बताते हैं। ‘शकारि’ द्वारा नहीं। कोशिश यही रही है कि विक्रम संवत् राष्ट्र की विदेशियों पर विजय का स्मारक-संवत् न रहकर उसकी पराजय की स्मृति में बदल जाए। लेकिन ऐसे प्रयास अपने ही अंतर्विरोधों से ध्वस्त हो चुके हैं।
कल्पना कीजिए कि यदि भारत गुलाम नहीं हुआ होता तो क्या ग्रेगोरियन कैलेण्डर हम पर लादा जा सकता था? आज भी सरकार और राज्य ने भले ही इसे चला रखा है, लेकिन भारतीय समाज अपने पर्व-त्यौहार ग्रेगोरियन कैलेण्डर से नहीं मनाता। न अपने घर-परिवार की ब्याह-शादियों का निर्धारण उससे करता है। तो समाज राष्ट्रीय कैलेण्डर से चल रहा है और राज्य धार्मिक कैलेण्डर से। राज्य और समाज के बीच फांक के बारे में बहुत से उदाहरण हैं। लेकिन ‘स्टेट’ और ‘चर्च’ के पृथक्करण की यहाँ इस बिंदु पर एक हद तक उपेक्षा कर दी गई है। ‘चर्च’ की तारीखें स्वतंत्र भारतीय राज्य द्वारा अपना ली गई हैं। यह औपनिवेशिक बोझ है जिसका प्रसन्नतापूर्वक परिवहन हम सब कर रहे हैं।तो अब हम पर्यावरण दिवस 5 जून को मनाते हैं जब प्रकृति अपनी सबसे लुटी-पिटी हालत में होती है, हरियाली तीज या हरियाली अमावस्या पर नहीं जब प्रकृति की सुषमा अपने गौरव में खिलती है।
अब हम इस प्रशासकीय उपलब्धि पर बने कैलेण्डर का कोई प्रशासनिक विनियोग भी नहीं करते। गुलामी के पहले ऐसा विनियोग करते हुए हमें किंचित् भी शर्मिन्दगी महसूस नहीं होती थी। तब वसंत पंचमी के दिन स्लेट-पट्टी पर लिखना सिखाया जाता था और वह दिन शाला का प्रवेशोत्सव वाला दिन होता था। ‘ओनामासी धम/बाप पढ़े न हम’ जैसी कहावतों में वह आज भी छुपा हुआ है। ‘ओनामासी धम’ यानी ‘ओम नमः सिद्धम’। तब बलराम दिवस किसान दिवस हो सकता था, विश्वकर्मा दिवस अभियंताओं का दिन हो सकता था, धन्वन्तरि दिवस चिकित्सकों का दिन हो सकता था। तब दशहरे से लेकर देवउठनी एकादश तक वृक्ष-पूजा/ वृक्षारोपण/ वृक्ष-संरक्षण के 5 दिन हो सकते थे। जिस देश में राष्ट्र ही धर्म था, वहाँ धर्म के आधार पर राष्ट्र को पोस्टपोन कर दिया गया।
यह भी देखें कि 1582 ई. में ग्रेगोरियन कैलेण्डर आने के 18 साल बाद ईस्ट इंडिया कंपनी का इंग्लैंड में गठन होता है, 20 साल बाद डच ईस्ट इंडिया कंपनी का, 46 साल बाद पोर्तुगीज ई.इं.क.का और 1664 ई. में फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी का। इन सबके द्वारा दुनिया को गुलाम बनाने की मुहिम शुरू हुई। यानी भारतीय कैलेण्डर जहाँ दासता से मुक्त करता था, वहीं ग्रेगोरियन कैलेण्डर का विकास विश्वभर में गुलामी का प्रसार करने से हुआ। भारतीय कैलेण्डर जहाँ ऋणोन्मोचन से होता था, ग्रेगोरियन कैलेण्डर भारत से हुए पूंजी के उस ड्रेन की याद दिलाता है जिसकी चर्चा दादा भाई नौरोजी ने इतने विस्तार से की है।
कैलेण्डर शब्द संभवतः ‘कालान्तर’ शब्द का ही एक रूप है। वह सामाजिक जीवन से संगठन के लिए एक उपयोगी उपकरण ही नहीं है बल्कि वह यथार्थ के एक निश्चित पर्सेप्शन का माध्यम है। विक्रम संवत् जागतिक स्थिरता एवं लय को पकड़ने वाला ऐसा संवत् है जो प्रकृति से निरन्तर संवाद करता है। यह सिंतबर, अक्टूबर, नवंबर, दिसंबर की तरह वहाँ सात, आठ, नौ, दस की तरह की गिनती नहीं है। यहाँ जूलियस सीज़र या ऑगस्टस की तरह राजाओं के नाम पर जुलाई-अगस्त नहीं है। वे भी बाद में जोड़े जाए। पहले वे भी नहीं थे। गिनती की अशुद्धियाँ भी हैं क्योंकि 12 महीनों वाले कैलेण्डर का आखिरी महीना दस पर कैसे खत्म हो सकता है। इसका मतलब यह है कि जनवरी और फरवरी ग्यारहवें और बारहवें महीने हुए अर्थात् पहला महीना वही मार्च हुआ, जिसमें प्रायः चैत्र पड़ता है, जिससे विक्रम संवत् की शुरूआत होती है। फायनेंशियल इयर के रूप में कमोबेश वही विक्रम संवत् दुनिया भर में चलता है। एक तरह से वैश्वीकरण की प्रक्रिया में इसका अनदेखा योगदान है। जिस ग्लोबलाइजेशन के तर्क पर ग्रेगोरियन कैलेण्डर आवश्यक हो गया है, उसी तर्क को फायनेंशियल इयर के रूप में व्यवहारतः विक्रम संवत् ने, अप्रत्यक्ष रूप से, कोई दावा किए बिना पूरा किया है। सेचा स्टर्न (कैलेंडर्स इन इंटीक्विटी) प्राचीन समाजों के एक अध्ययन में कहते हैं कि तब एक दोहरी कैलेंडर परंपरा चली आई। एक सिविल कैलेण्डर की और एक धार्मिक कैलेण्डर की। बहुत प्राचीन लैटिन लेखक सेंसोरिनस (तृतीय शती ई.पू.) ने इसका उल्लेख सहज रूप से किया है, लेकिन इनकी contrastive pairing आधुनिक स्कॉलरशिप की देन है। प्राचीन मेसोपोटामिया में एक चंद्र संवत भी था और 30 दिन के महीनों वाला एक दूसरा संवत् भी था जो लेखादि प्रयोजनों में काम आता था। ऐसी दुहरी या विविध संवतों वाली व्यवस्था के दृष्टान्त इसराइल, मिस्र, ग्रीस, अरब में भी पाए जाते हैं।
भारत में समय का चक्र पूरा घूम गया है। अब जो ‘धार्मिक’ था, वह ‘सिविल’ हो गया है और जो ‘सिविल’ था, वह ‘धार्मिक’ हो गया है। यह परिवर्तन भारत की गुलामी के बिना संभव नहीं हुआ।
इसलिए अनुरोध है कि आज नए विक्रम संवत् का आरंभ सेलीब्रेट करते हुए इतिहास की इस त्रासदी और विडम्बना का परिप्रेक्ष्य जरूर ध्यान रखें।