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काल गणना - Time Secrets

हिन्दू काल गणना हमारे ऋषियों की अद्भुत खोज थी उन्होंने खगोलीय गति के आधार पर काल का मापन किया, वहीं काल की अनंत यात्रा और वर्तमान समय तक उसे जोड़ना तथा समाज में सर्वसामान्य व्यक्ति को इसका ध्यान रहे इस हेतु एक अद्भुत व्यवस्था भी की थी.

हमारे देश में कोई भी कार्य होता हो चाहे वह भूमिपूजन हो, वास्तुनिर्माण का प्रारंभ होगृह प्रवेश हो, जन्म, विवाह या कोई भी अन्य मांगलिक कार्य हो, वह करने के पहले कुछ धार्मिक विधि करते हैं। उसमें सबसे पहले संकल्प कराया जाता है। यह संकल्प मंत्र यानी अनंत काल से आज तक की समय की स्थिति बताने वाला मंत्र है। इस दृष्टि से इस मंत्र के अर्थ पर हम ध्यान देंगे तो बात स्पष्ट हो जायेगी।

संकल्प मंत्र में कहते हैं….
 

 

अस्य श्री विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्राहृणां द्वितीये परार्धे–  अर्थात् महाविष्णु द्वारा प्रवर्तित अनंत कालचक्र में वर्तमान ब्रह्मा की आयु का द्वितीय परार्धवर्तमान ब्रह्मा की आयु के 50 वर्ष पूरे हो गये हैं। श्वेत वाराह कल्पेकल्प याने ब्रह्मा के 51वें वर्ष का पहला दिन है।

वैवस्वतमन्वंतरेब्रह्मा के दिन में 14 मन्वंतर होते हैं उसमें सातवां मन्वंतर वैवस्वत मन्वंतर चल रहा है।

अष्टाविंशतितमे कलियुगेएक मन्वंतर में 71 चतुर्युगी होती हैं, उनमें से 28वीं चतुर्युगी का कलियुग चल रहा है।

कलियुगे प्रथमचरणेकलियुग का प्रारंभिक समय है।

कलिसंवते या युगाब्देकलिसंवत् या युगाब्द वर्तमान में 5104 चल रहा है।

जम्बु द्वीपे, ब्रह्मावर्त देशे, भारत खंडेदेश प्रदेश का नाम

अमुक स्थानेकार्य का स्थान

अमुक संवत्सरेसंवत्सर का नाम

अमुक अयनेउत्तरायन/दक्षिणायन

अमुक ऋतौवसंत आदि छह ऋतु हैं

अमुक मासेचैत्र आदि 12 मास हैं

अमुक पक्षेपक्ष का नाम (शुक्ल या कृष्ण पक्ष)

अमुक तिथौतिथि का नाम

अमुक वासरेदिन का नाम

अमुक समयेदिन में कौन सा समय

अमुकव्यक्तिअपना नाम, फिर पिता का नाम, गोत्र तथा किस उद्देश्य से कौन सा काम कर रहा है, यह बोलकर संकल्प करता है।

 

इस प्रकार जिस समय संकल्प करता है, उस समय से अनंत काल तक का स्मरण सहज व्यवहार में भारतीय जीवन पद्धति में इस व्यवस्था के द्वारा आया है।

काल की सापेक्षताआइंस्टीन ने अपने सापेक्षता सिद्धांत में दिक् काल की सापेक्षता प्रतिपादित की। उसने कहा, विभिन्न ग्रहों पर समय की अवधारणा भिन्नभिन्न होती है। काल का सम्बन्ध ग्रहों की गति से रहता है। इस प्रकार अलगअलग ग्रहों पर समय का माप भिन्न रहता है।

इसकी जानकारी के संकेत हमारे ग्रंथों में मिलते हैं। पुराणों में कथा आती है कि रैवतक राजा की पुत्री रेवती बहुत लम्बी थी, अत: उसके अनुकूल वर नहीं मिलता था। इसके समाधान हेतु राजा योग बल से अपनी पुत्री को लेकर ब्राहृलोक गये। वे जब वहां पहुंचे तब वहां गंधर्वगान चल रहा था। अत: वे कुछ क्षण रुके। जब गान पूरा हुआ तो ब्रह्मा ने राजा को देखा और पूछा कैसे आना हुआ? राजा ने कहा मेरी पुत्री के लिए किसी वर को आपने पैदा किया है या नहीं? ब्रह्मा जोर से हंसे और कहा, जितनी देर तुमने यहां गान सुना, उतने समय में पृथ्वी पर 27 चर्तुयुगी बीत चुकी हैं और 28 वां द्वापर समाप्त होने वाला है। तुम वहां जाओ और कृष्ण के भाई बलराम से इसका विवाह कर देना। साथ ही उन्होंने कहा कि यह अच्छा हुआ कि रेवती को तुम अपने साथ लेकर आये। इस कारण इसकी आयु नहीं बढ़ी। यह कथा पृथ्वी से ब्राहृलोक तक विशिष्ट गति से जाने पर समय के अंतर को बताती है।

आधुनिक वैज्ञानिकों ने भी कहा कि यदि एक व्यक्ति प्रकाश की गति से कुछ कम गति से चलने वाले यान में बैठकर जाए तो उसके शरीर के अंदर परिवर्तन की प्रक्रिया प्राय: स्तब्ध हो जायेगी। यदि एक दस वर्ष का व्यक्ति ऐसे यान में बैठकर देवयानी आकाशगंगा (Andromeida Galaz) की ओर जाकर वापस आये तो उसकी उमर में केवल 56 वर्ष बढ़ेंगे किन्तु उस अवधि में पृथ्वी पर 40 लाख वर्ष बीत गये होंगे।

योगवासिष्ठ आदि ग्रंथों में योग साधना से समय में पीछे जाना और पूर्वजन्मों का अनुभव तथा भविष्य में जाने के अनेक वर्णन मिलते हैं।

हिन्दू ब्रह्माण्डीय समय चक्र सूर्य सिद्धांत के पहले अध्याय के श्लोक 11–23 में आते हैं.[1]:

“(श्लोक 11). वह जो कि श्वास (प्राण) से आरम्भ होता है, यथार्थ कहलाता है; और वह जो त्रुटि से आरम्भ होता है, अवास्तविक कहलाता है. छः श्वास से एक विनाड़ी बनती है. साठ श्वासों से एक नाड़ी बनती है.

(12). और साठ नाड़ियों से एक दिवस (दिन और रात्रि) बनते हैं. तीस दिवसों से एक मास (महीना) बनता है. एक नागरिक (सावन) मास सूर्योदयों की संख्याओं के बराबर होता है.

 

(13). एक चंद्र मास, उतनी चंद्र तिथियों से बनता है. एक सौर मास सूर्य के राशि में प्रवेश से निश्चित होता है. बारह मास एक वरष बनाते हैं. एक वर्ष को देवताओं का एक दिवस कहते हैं.

(14). देवताओं और दैत्यों के दिन और रात्रि पारस्परिक उलटे होते हैं. उनके छः गुणा साठ देवताओं के (दिव्य) वर्ष होते हैं. ऐसे ही दैत्यों के भी होते हैं.

(15). बारह सहस्र (हज़ार) दिव्य वर्षों को एक चतुर्युग कहते हैं. यह चार लाख बत्तीस हज़ार सौर वर्षों का होता है.

(16) चतुर्युगी की उषा और संध्या काल होते हैं। कॄतयुग या सतयुग और अन्य युगों का अन्तर, जैसे मापा जाता है, वह इस प्रकार है, जो कि चरणों में होता है:

(17). एक चतुर्युगी का दशांश को क्रमशः चार, तीन, दो और एक से गुणा करने पर कॄतयुग और अन्य युगों की अवधि मिलती है. इन सभी का छठा भाग इनकी उषा और संध्या होता है.

(18). इकहत्तर चतुर्युगी एक मन्वन्तर या एक मनु की आयु होते हैं. इसके अन्त पर संध्या होती है, जिसकी अवधि एक सतयुग के बराबर होती है और यह प्रलयहोती है. (19). एक कल्प में चौदह मन्वन्तर होते हैं, अपनी संध्याओं के साथ; प्रत्येक कल्प के आरम्भ में पंद्रहवीं संध्या/उषा होती है. यह भी सतयुग के बराबर ही होती है।

(20). एक कल्प में, एक हज़ार चतुर्युगी होते हैं और फ़िर एक प्रलय होती है. यह ब्रह्मा का एक दिन होता है. इसके बाद इतनी ही लम्बी रात्रि भी होती है.

(21). इस दिन और रात्रि के आकलन से उनकी आयु एक सौ वर्ष होती है; उनकी आधी आयु निकल चुकी है और शेष में से यह प्रथम कल्प है.

(22). इस कल्प में, छः मनु अपनी संध्याओं समेत निकल चुके, अब सातवें मनु (वैवस्वत: विवस्वान (सूर्य) के पुत्र) का सत्तैसवां चतुर्युगी बीत चुका है.

(23). वर्तमान में, अट्ठाईसवां चतुर्युगी का कॄतयुग बीत चुका है. उस बिन्दु से समय का आकलन किया जाता है.

हिन्दू समय मापन, (काल व्यवहार) का सार निम्न लिखित है:

लघुगणकीय पैमाने पर, हिन्दू समय इकाइयाँ

नाक्षत्रीय मापन संपादित करें

एक परमाणु मानवीय चक्षु के पलक झपकने का समय = लगभग सैकिण्ड

एक विघटि = परमाणु = २४ सैकिण्ड

एक घटि या घड़ी = ६० विघटि = २४ मिनट

एक मुहूर्त = घड़ियां = ४८ मिनट

एक नक्षत्र अहोरात्रम या नाक्षत्रीय दिवस = ३० मुहूर्त (दिवस का आरम्भ सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक, ना कि अर्धरात्रि से)

विष्णु पुराण में दी गई एक अन्य वैकल्पिक पद्धति समय मापन पद्धति अनुभाग, विष्णु पुराण, भाग, अध्याय तॄतीय निम्न है:

१० पलक झपकने का समय = काष्ठा

३५ काष्ठा= कला

२० कला= मुहूर्त

१० मुहूर्त= दिवस (२४ घंटे)

३० दिवस= मास

मास= अयन

अयन= वर्ष, = दिव्य दिवस

छोटी वैदिक समय इकाइयाँ संपादित करें

तृसरेणु समय की सबसे सूक्ष्मतम इकाई है। यही से समय की शुरुआत मानी जा सकती है। यह इकाई अति लघु श्रेणी की है। हालांकि इससे भी छोटी इकाई होती है अणु।

1. एक तृसरेणु = 6 ब्रह्माण्डीय अणु।

2. एक त्रुटि = 3 तृसरेणु या सेकंड का 1/1687.5 भाग।

3. एक वेध = 100 त्रुटि।

4. एक लावा = 3 वेध।

5. एक निमेष = 3 लावा या पलक झपकना।

6. एक क्षण = 3 निमेष।

7. एक काष्ठा = 5 क्षण अर्थात 8 सेकंड।

8. एक लघु = 15 काष्ठा अर्थात 2 मिनट। आधा लघु अर्थात 1 मिनट।

9. पंद्रह लघु = एक नाड़ी, जिसे दंड भी कहते हैं अर्थात लगभग 30 मिनट।

10. दो दंड = एक मुहूर्त अर्थात लगभग 1 घंटे से ज्यादा।

11. सात मुहूर्त = एक याम या एक चौथाई दिन या रात्रि।

12. चार याम या प्रहर = एक दिन या रात्रि।

13. पंद्रह दिवस = एक पक्ष। एक पक्ष में पंद्रह तिथियां होती हैं।

14. दो पक्ष = एक माह। (पूर्णिमा से अमावस्या तक कृष्ण पक्ष और अमावस्या से पूर्णिमा तक शुक्ल पक्ष)

15. दो माह = एक ॠतु।

16. तीन ऋतु = एक अयन

17. दो अयन = एक वर्ष।

18. एक वर्ष = देवताओं का एक दिन जिसे दिव्य वर्ष कहते हैं।

19. 12,000 दिव्य वर्ष = एक महायुग (चारों युगों को मिलाकर एक महायुग)

20. 71 महायुग = 1 मन्वंतर (लगभग 30,84,48,000 मानव वर्ष बाद प्रलय काल)

21. चौदह मन्वंतर = एक कल्प।

22. एक कल्प = ब्रह्मा का एक दिन। (ब्रह्मा का एक दिन बीतने के बाद महाप्रलय होती है और फिर इतनी ही लंबी रात्रि होती है) इस दिन और रात्रि के आकलन से उनकी आयु 100 वर्ष होती है। उनकी आधी आयु निकल चुकी है और शेष में से यह प्रथम कल्प है।

* मन्वंतर की अवधि : विष्णु पुराण के अनुसार मन्वंतर की अवधि 71 चतुर्युगी के बराबर होती है। इसके अलावा कुछ अतिरिक्त वर्ष भी जोड़े जाते हैं। एक मन्वंतर = 71 चतुर्युगी = 8,52,000 दिव्य वर्ष = 30,67,20,000 मानव वर्ष।

नोट : इस कल्प में 6 मन्वंतर अपनी संध्याओं समेत निकल चुके, अब 7वां मन्वंतर काल चल रहा है जिसे वैवस्वत: मनु की संतानों का काल माना जाता है। 27वां चतुर्युगी बीत चुका है। वर्तमान में यह 28वें चतुर्युगी का कृतयुग बीत चुका है और यह कलियुग चल रहा है।

अन्य अस्तित्वों के सन्दर्भ में कालगणना

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पितरों की समय गणना

15 मानव दिवस = एक पितॄ दिवस

30 पितॄ दिवस = 1 पितॄ मास

12 पितॄ मास = 1 पितॄ वर्ष

पितॄ जीवन काल = 100 पितॄ वर्ष= 1200 पितृ मास = 36000 पितॄ दिवस= 18000 मानव मास = 1500 मानव वर्ष

देवताओं की काल गणना

1 मानव वर्ष = एक दिव्य दिवस

30 दिव्य दिवस = 1 दिव्य मास

12 दिव्य मास = 1 दिव्य वर्ष

दिव्य जीवन काल = 100 दिव्य वर्ष= 36000 मानव वर्ष

विष्णु पुराण के अनुसार काल गणना

चार युग

2 अयन (छः मास अवधि, ऊपर देखें) = 360 मानव वर्ष = एक दिव्य वर्ष

4,000 + 400 + 400 = 4,800 दिव्य वर्ष = 1 सत युग

3,000 + 300 + 300 = 3,600 दिव्य वर्ष = 1 त्रेता युग

2,000 + 200 + 200 = 2,400 दिव्य वर्ष = 1 द्वापर युग

1,000 + 100 + 100 = 1,200 दिव्य वर्ष = 1 कलि युग

12,000 दिव्य वर्ष = 4 युग = 1 महायुग (दिव्य युग भी कहते हैं)

ब्रह्मा की काल गणना

1000 महायुग= 1 कल्प = ब्रह्मा का 1 दिवस (केवल दिन) (चार खरब बत्तीस अरब मानव वर्ष; और यही सूर्य की खगोलीय वैज्ञानिक आयु भी है).

(दो कल्प ब्रह्मा के एक दिन और रात बनाते हैं)

30 ब्रह्मा के दिन = 1 ब्रह्मा का मास (दो खरब 59 अरब 20 करोड़ मानव वर्ष)

12 ब्रह्मा के मास = 1 ब्रह्मा के वर्ष (31 खरब 10 अरब 4 करोड़ मानव वर्ष)

50 ब्रह्मा के वर्ष = 1 परार्ध

2 परार्ध= 100 ब्रह्मा के वर्ष= 1 महाकल्प (ब्रह्मा का जीवन काल)(31 शंख 10 खरब 40अरब मानव वर्ष)

ब्रह्मा का एक दिवस 10,000 भागों में बंटा होता है, जिसे चरण कहते हैं:

चारों युग

4 चरण (1,728,000 सौर वर्ष) सत युग

3 चरण (1,296,000 सौर वर्ष) त्रेता युग

2 चरण (864,000 सौर वर्ष) द्वापर युग

1 चरण (432,000 सौर वर्ष) कलि युग

[5]

यह चक्र ऐसे दोहराता रहता है, कि ब्रह्मा के एक दिवस में 1000 महायुग हो जाते हैं

एक उपरोक्त युगों का चक्र = एक महायुग (43 लाख 20 हजार सौर वर्ष)

श्रीमद्भग्वदगीता के अनुसारसहस्रयुग अहरयद ब्रह्मणो विदुः“, अर्थात ब्रह्मा का एक दिवस = 1000 महायुग. इसके अनुसार ब्रह्मा का एक दिवस = 4 अरब 32 खरब सौर वर्ष. इसी प्रकार इतनी ही अवधि ब्रह्मा की रात्रि की भी है.

एक मन्वन्तर में 71 महायुग (306,720,000 सौर वर्ष) होते हैं. प्रत्येक मन्वन्तर के शासक एक मनु होते हैं.

प्रत्येक मन्वन्तर के बाद, एक संधिकाल होता है, जो कि कॄतयुग के बराबर का होता है (1,728,000 = 4 चरण) (इस संधिकाल में प्रलय होने से पूर्ण पॄथ्वी जलमग्न हो जाती है.)

एक कल्प में 864,000,0000 – अरब ६४ करोड़ सौर वर्ष होते हैं, जिसे आदि संधि कहते हैं, जिसके बाद 14 मन्वन्तर और संधि काल आते हैं

ब्रह्मा का एक दिन बराबर है:

(14 गुणा 71 महायुग) + (15 x 4 चरण)

= 994 महायुग + (60 चरण)

= 994 महायुग + (6 x 10) चरण

= 994 महायुग + 6 महायुग

= 1,000 महायुग

पाल्या संपादित करें

पाल्यासमय की एक इकाई है. यह इकाई, भेड़ की ऊन का एक योजन ऊंचा घन (यदि प्रत्येक सूत्र एक शताब्दी में चढ़ाया गया हो) बनाने में लगे समय के बराबर है। दूसरी परिभाषा अनुसार, यह एक छोटी चिड़िया (यदि वह प्रत्येक रेशे को प्रति सौ वर्ष में उठाती है) द्वारा किसी एक वर्गमील के सूक्ष्म रेशों से भरे कुएं को रिक्त करने में लगे समय के बराबर है.

यह इकाई भगवान आदिनाथ के अवतरण के समय की है। यथार्थ में यह 100,000,000,000,000 पाल्य पहले था।

हम वर्तमान में वर्तमान ब्रह्मा के इक्यावनवें वर्ष में सातवें मनु, वैवस्वत मनु के शासन में श्वेतवाराह कल्प के द्वितीय परार्ध में, अठ्ठाईसवें कलियुग के प्रथम वर्ष के प्रथम दिवस में विक्रम संवत 2070 में हैं। इस प्रकार अबतक १५ नील, ५५ खरब, २१ अरब, ९७ करोड़, १९ लाख, ६१ हज़ार, ६२० वर्ष इस ब्रह्मा को सॄजित हुए हो गये हैं।

ग्रेगोरियन कैलेण्डर के अनुसार वर्तमान कलियुग दिनाँक 17 फरवरी / 18 फरवरी को 3102 .पू. में हुआ था।

ब्रह्मा जी के एक दिन में १४ इन्द्र मर जाते है और इनकी जगह नए देवता इन्द्र का स्थान लेते है. इतनी बड़ी ही ब्रह्मा की रात्रि होती है. दिन की इस गणना के आधार पर ब्रह्मा की आयु १०० वर्ष होती है फिर ब्रह्मा मर जाते है और दूसरा देवता ब्रह्मा का स्थान ग्रहण करते हैं . ब्रह्मा की आयु के बराबर विष्णु का एक दिन होता है. इस आधार पर विष्णु जी की आयु १०० वर्ष है. विष्णु जी १०० वर्ष का शंकर जी का एक दिन होता है. इस दिन और रात के अनुसार शंकर जी की आयु १०० वर्ष होती है.

 

महत कल्प : इस कल के इतिहास का विवरण नहीं मिलता। इसके बाद प्रलय हुई थी तो सभी कुछ नष्ट हो गया। लेकिन माना जाता है कि इस कल्प में विचित्रविचित्र और महत् वाले प्राणी और मनुष्य होते थे।

हिरण्य गर्भ कल्प : इस काल में धरती पीली थी इसीलिए इसे हिरण्य कहते हैं। स्वर्ण के भंडार बिखरे पड़े थे। इस काल में हिरण्यगर्भ ब्रह्मा, हिरण्यगर्भ, हिरण्यवर्णा लक्ष्मी, देवता, हिरप्यानी रैडी (अरंडी), वृक्ष वनस्पति एवं हिरण ही सर्वोपयोगी पशु थे।

कल्प

ब्रह्मकल्प : इस कल्प में मनुष्य जाति सिर्फ ब्रह्म (ईश्‍वर) की उपासक थी। प्राणियों में विचित्रताएं और सुंदरताएं थी। इस काल में ब्रह्मर्षि देश, ब्रह्मावर्त, ब्रह्मलोक, ब्रह्मपुर, रामपुर, रामगंगा केंद्र स्थल की ब्राह्मी प्रजाएं परब्रह्म और ब्रह्मवाद की उपासखी। ब्रह्मपुराण, ब्रह्माण्डपुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण में इसके ऐतिहासिक विवरण संकलित किए हैं।

पद्मकल्प : इस कल्प का विवरण पद्म पुराण में मिलता है। इस कल्प में 16 समुद्र थे। यह कल्प नागवंशियों का था। इस काल में उनकी अधिकता थी। कोल, कमठ, बानर (बंजारे) किरात जातियां थीं और कमल पत्र पुष्पों का बहुविध प्रयोग होता था। सिंहल द्वीप (श्रीलंका) की नारियां पद्मिनी प्रजाएं थीं। तब के श्रीलंका की भौगोलिक स्थिति आज के श्रीलंका जैसी नहीं थी।

बाराहकल्प : वर्तमान में यह कल्प चल रहा है। वराह पुराण में इसका विवरण मिलता है। इस कल्प में वराह अवतार का वर्णन है। इसी कल्प में विष्णु के 12 अवतार हुए और इसी कल्प में वैवस्वत मनु का वंश चल रहा है। इसी कल्प में भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने नई सृष्टि की थी। वर्तमान में हम इसी कल्प के इतिहास की बात करेंगे।

अब तक वराह कल्प के स्वायम्भु मनु, स्वरोचिष मनु, उत्तम मनु, तमास मनु, रेवत मनु, चाक्षुष मनु तथा वैवस्वत मनु के मन्वंतर बीत चुके हैं और अब वैवस्वत तथा सावर्णि मनु की अंतरदशा चल रही है। सावर्णि मनु का आविर्भाव विक्रमी संवत् प्रारंभ होने से 5,630 वर्ष पूर्व हुआ था।

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