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स्वाभिमान और अभिमान में बहुत थोड़ा सा भेद होता है

जो इस भेद को समझता है, वो अपना आत्मसम्मान कायम रखते हुए, सदैव विनम्रता बनाए रखता है। श्रेष्ठ मनुष्य इन बातों का ध्यान रखता है।

 व्यक्ति के सामने उसकी प्रशंसा की जाये तो उसके अन्दर अभिमान का भाव आ ही जाता है ,लेकिन स्वयं को संयत रखते हुए प्रशंसा सुनने के पश्चात भी अपने आप को सामान्य रूप में ही प्रस्तुत करना चाहिए, जिस तरह प्रभु श्रीराम के समक्ष हनुमानजी ने किया था।

पवनपुत्र बजरंगवली श्रीराम के परम भक्त थे, और उनकी सेवा करते हुए कई ऐसे कार्य भी किये जो किसी के लिए भी संभव नहीं थे|

जब हनुमानजी माता सीता का पता लगाने के लिए लंका पहुंचे, तो वहां पहुंचकर न सिर्फ माता सीता का पता लगाया, बल्कि बड़े बड़े असुरों का अंत करते हुए रावण का अहंकार तोड़ते हुए उसी के सामने उसकी सोने की लंका को जलाकर राख कर दिया।  वहां विभीषण को श्रीराम के पक्ष में किया, सीता को श्रीराम का संदेश दिया और इतने बड़े काम करने के बाद हनुमानजी सकुशल श्रीराम के पास लौट आए।

इतनी बड़ी सफलता के बाद भी वे श्रीराम के सामने मौन खड़े थे। वो इस बात को भली भाँति समझते थे कि, स्वयं अपनी प्रशंसा नहीं करनी चाहिए। उस समय जामवंत और सुग्रीव ने उनकी प्रशंसा की और श्रीराम को वह सब बताया, जो हनुमानजी ने लंका में किया था।

 

सब कुछ जानने के बाद भगवान श्रीराम ने भी हनुमानजी की प्रशंसा की, तो उन्होंने भगवान के चरण पकड़ लिए कहा, ‘प्रभु ऐसा न करें, आप तो मेरी रक्षा करें।’ हनुमानजी ने ऐसा इसलिए किया, क्योंकि प्रशंसा सुनने पर कहीं अहंकार न आ जाए।

उस समय किसी ने हनुमानजी से पूछा, ‘जब श्रीराम प्रशंसा कर रहे थे, तो आपने उनके पैर क्यों पकड़ लिए थे?’

तब हनुमानजी ने समझाया, ‘जब भी कोई आपकी प्रशंसा करे, आपकी लोकप्रियता बढ़े तो भगवान, माता-पिता, गुरू, मातृभूमि के साथ और  जिन्होंने हमारी सहायता की है, उनके चरणों में हमारी सफलता को अर्पित करना चाहिए.’।

 

यही यथार्थ “प्रबोध” है यही “सुमिरन” है, जिसके लिए हमारे महर्षियों ने भक्ति का मार्ग दिखाया॥ 

संकट ते हनुमान छुड़ावै, मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।

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