
1) अपने आसपास की वस्तुओं को परखने की शक्ति = विज्ञान।
पाँचों इंद्रियों के माध्यम से होने वाला कर्म ही बाह्य शिक्षा है।
2) आत्मज्ञान (अध्यात्म) = जहाँ आत्मा का ज्ञान नहीं होता, वह शिक्षा निरर्थक है।
आंतरिक शिक्षा ही वास्तविक शिक्षा है, इसी से सच्चे ज्ञान की प्राप्ति होती है।
ज्योतिष शास्त्र सीखने के लिए भी उपरोक्त दोनों बातों का लागू होना आवश्यक है।
इसके अलावा अब तक का अनुभव यही कहता है कि शिक्षा दी नहीं जाती— क्योंकि उसे दिया नहीं जा सकता, परंतु लिया अवश्य जा सकता है।
शिक्षा का स्वरूप इतना व्यापक है कि उसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन है।
“तेजस्विनावधीतमस्तु”
हम दोनों का अध्ययन तेजस्वी बने।
गणपति के समक्ष की इस आराधना में, शिक्षक भी विद्यार्थी के साथ अध्ययन कर रहा है।
इस समय जो खोज होती है, वह मनुष्य में छिपे पूर्णत्व की और उसके स्वाभाविक विकास में सहायता करने की होती है— यही शिक्षक का कार्य है।
(वेदों में शिक्षक का अर्थ है— मार्ग खोजकर दिखाने वाला।)
यदि पुस्तकें शब्द सिखाती हैं, तो उस अर्थ को समझने के लिए जीवन की ओर मुड़ना अनिवार्य है— यही उपर्युक्त दूसरा भाग है।
आत्मज्ञान से जुड़े किसी भी विषय को समझने के लिए शिक्षक और विद्यार्थी का संबंध ऐसा ही होना चाहिए।
इसी में छिपा हुआ अर्थ है।
ज्योतिष शास्त्र में प्रवेश करके चिंतन की आदत प्रत्येक अभ्यासक में होनी चाहिए।
इस क्रिया से हम अपने अहंकार और असत् भावनाओं से कुछ दूर हो जाते हैं।
जब मन इनसे अलग होता है, तब हम उस स्थान तक पहुँच सकते हैं, जो मूल स्रोत है।
किसी ने उसे सत्य कहा, किसी ने असत्य— सभी ने अपनी समझ के अनुसार उसे परखा।
जब हम उस मूल स्रोत तक पहुँचते हैं, तो अत्यंत शांति और प्रसन्नता की अनुभूति होती है।
यह अनुभव का विषय है, कल्पना नहीं।
ज्योतिष शास्त्र भले ही शब्दरूप में पुस्तक में हो, परंतु उसका वास्तविक अर्थ जीवन के अनुभवों में है।
इन्हीं अनुभवों में, अनेक श्रेष्ठ व्यक्तियों ने इसे गौरवान्वित किया है।
उन सबमें यह भी एक अत्यंत सुखद और विशिष्ट अनुभव है |