
किसी विश्वामित्र के पत्रे में सावन से नववर्ष मिल जाय तो आश्चर्य चकित न हों, उस दिन ग्रीष्म अयनांत होता है, सूर्य देव अधिकतम उत्तरी झुकाव से दक्षिण की यात्रा आरम्भ करते हैं अर्थात घनघोर बरसते पर्जन्य की भूमिका। मानसून कब प्रबल होता है?
वर्षा न हो तो धरा कैसे तृप्त हो? स्थावर जङ्गम को जीवन कैसे मिले? हरियाली कैसे हो?
सावन से नववर्ष मनाने की तुक तो है ही, देखें तो उसके निकट कौन सी संक्रांति है? कहीं मनायी जाती है क्या?
चार षडशीति
४ × ८६ = ३४४
मिथुन, कन्या, धनु व मीन की संक्रांति षडशीति कहलाती हैं।
इसमें पितरपक्ष के १६ दिन जोड़े
३४४+१६=३६०.
एक सावन वर्ष तीन सौ साठ दिन का होता है।
विष्णु के तीन क्रम (पद) कहे गये , किन्तु विष्णुपदी राशियाँ ४ क्यों हैं ?
अथर्ववेदीय गोपथ तथा शुक्लयजुः में निम्न पद आये हैं
*आक्रमो ऽसि संक्रमो ऽस्य् उत्क्रमो ऽस्य् उत्क्रान्तिर् असीति*
अयन तथा विषुव का ज्ञान अति प्राचीन काल में हो चुका था । संवत्सर पर ही बहुत कुछ उपलब्ध हो जाता है .
विष्णुपदी राशियों का कुम्भ पर्व से सम्बन्ध है , एक राशि का नाम ही कुम्भ है ।
सङ्क्रान्ति पर्व को मनाये जाने के विषय में पुराणों का वर्णन है ही , सङ्क्रान्ति से उत्तरायण पर्व के जुड़ने से मकर सङ्क्रम का विशेष महत्व हुआ ।
राशि हेतु प्राचीन शब्दावली अरा , ज्या , जीवा है ।
संवत्सर के चार बिन्दुओं २ विषुव तथा २ अयनारम्भ बिन्दु में खिसकन ८६ अंश की हो गई , इस कारण चार राशियों की सञ्ज्ञा षडशीतिमुख हुई ?
षडशीति अथर्ववेद में भी है ।
*अमावास्याष्टका वृद्धिः कृष्णपक्षोऽयनद्वयम् ।*
*द्रव्यं* *ब्राह्मणसंपत्तिर्विषुवत्सूर्यसंक्रमः । ।*
*व्यतीपातो गजच्छाया ग्रहणं चन्द्रसूर्ययोः ।*
*श्राद्धं प्रति रुचिश्चैते श्राद्धकालाः प्रकीर्तिताः । ।*
*-याज्ञवल्क्यस्मृतिः आचाराध्यायः श्राद्धप्रकरण*
यहाँ भी सूर्यसङ्क्रम की बात है ।
ऋग्वेदसंहिता में १०८०० ऋक्
४३२००० अक्षर, १० मण्डलों में
एकत्र किये गये।
एक सावन वर्ष में १०८०० मुहूर्त ,
एक युग में ४३२००० दिव्य दिन होते हैं। अर्थात् १२०० दिव्य वर्ष।
प्रजापति संवत्सर के कारक विष्णु अर्थात् आदित्य एवं अदिति सहित सौरमण्डल में निर्मित होने वाले दसों मण्डलों को कल्पित कर, ऋतु विभाग की अवधि की गणनानुसार सूक्त एवं उनकी ऋक् सँख्या निर्धारित है।
शक्तिपूजा के दस रूप हैं, एक सावन वर्ष में ७२० अहोरात्र
अतः अनुष्टुप के ७२० मन्त्रों में देवी का चरित्र गाया जाता है।
शक्ति का प्रादुर्भाव समस्त देवताओं के समवेत तेज से हुआ और दैत्यों का विनाश हुआ।
*नमश्चण्डिकायै*
✍🏻 आगे और हे
सावन वर्ष- समाज तथा शासन की सुविधा के लिये ३०-३० दिनों के १२ मास होते थे तथा अन्त में ५ या ६ दिन जोड़ते थे (पाञ्चरात्र या षळाह)। यह वत्सर कहलाता था। इसके अनुसार १५-१५ दिन का तिथि आदि का चार्ट बनता था, जिसे वेद में पतरा कहा है।
*पतरेव चर्चरा चन्द्र-निर्णिक् मन ऋङ्गा मनन्यान जग्मी॥८॥ (ऋक् १०/१०६/८)*
जैसे चर्चरा (चचड़ा- नाले के ऊपर बांस का पुल चलने पर चड़चड़ करता है) पर चलने से नीचे पानी दीखता है, उसी प्रकार नक्षत्र मार्ग पर चन्द्रमा के चलने से आकाश दीखता है। उसके अनुसार पतरा /जन्म पत्र बनता है और मनुष्यों का मन बदलता है (चन्द्रमा मनसो जातः)।
हिन्दू कैलेण्डर के बारह मासों में से सावन का महीना अपनी विशेष
पहचान रखता है। इस माह में चारों ओर
हरियाली छाई रहती है। ऐसा लगता है मानों प्रकृति में एक नई जान आ गई है। वेदों में मानव तथा प्रकृति का बड़ा ही गहरा संबंध बताया गया है। वेदों में लिखी बातों का अर्थ है कि बारिश में ब्राह्मण वेद पाठ तथा धर्म ग्रंथों का अध्ययन करते हैं। इन मंत्रों को पढऩे से व्यक्ति को सुख तथा शांति मिलती है। सावन में बारिश होती है। इस बारिश में अनेक प्रकार के जीव-जंतु बाहर निकलकर आते हैं। यह सभी जन्तु विभिन्न प्रकार की आवाजें निकालते हैं। उस समय वातावरण ऐसा लगता है कि जैसे किसी ने अपना मौन व्रत तोड़कर अभी बोलना आरम्भ किया हो।
जीव-जन्तुओं की भाषा का वर्णन इस प्रकार किया गया है कि जिस प्रकार बारिश होने पर जीव-जन्तु बोलने लगते हैं उसी प्रकार व्यक्ति को सावन के महीने से शुरु होने वाले चौमासों (चार मास) में ईश्वर की भक्ति के लिए धर्म ग्रंथों का पाठ सुनना चाहिए।
धर्मिक दृष्टि से समस्त प्रकृति ही शिव का रुप है। इस कारण प्रकृति की पूजा के रुप में इस माह में शिव की पूजा विशेष रुप से की जाती है। सावन के महीने में वर्षा अत्यधिक होती है। इस माह में चारों ओर जल की मात्रा अधिक होने से शिव का जलाभिषेक किया जाता है।
शिव पूजन क्यों किया जाता है:
प्राचीन ग्रंथों के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान समुद्र से विष निकला था। इस विष को पीने के लिए शिव भगवान आगे आए और उन्होंने विषपान कर लिया। जिस माह में शिवजी ने विष पिया था वह सावन का माह था। विष पीने के बाद शिवजी के तन में ताप बढ़ गया। सभी देवी – देवताओं और शिव के भक्तों ने उनको शीतलता प्रदान की लेकिन शिवजी भगवान को शीतलता नहीं मिली। शीतलता पाने के लिए भोलेनाथ ने चन्द्रमा को अपने सिर पर धारण किया। इससे
उन्हें शीतलता मिल गई। ऐसी मान्यता भी है कि शिवजी के विषपान से उत्पन्न ताप को शीतलता प्रदान करने के लिए मेघराज इन्द्र ने भी बहुत वर्षा की थी। इससे भगवान शिव को बहुत शांति मिली। इसी घटना के बाद
सावन का महीना भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए मनाया जाता है। सारा सावन, विशेष
रुप से सोमवार को, भगवान शिव को जल अर्पित किया जाता है। महाशिवरात्रि के बाद पूरे
वर्ष में यह दूसरा अवसर होता है जब भग्वान शिव की पूजा बड़े ही धूमधाम से मनाई जाती है।
सावन माह की विशेषता: हिन्दु धर्म के अनुसार सावन के पूरे माह में भगवान शंकर का पूजन किया जाता है। इस माह को भोलेनाथ
का माह माना जाता है। भगवान शिव का माह मानने के पीछे एक पौराणिक कथा है।
*कामार्थी>काँवारथी>काँवरिया*
काम और अर्थ के लिये धर्म का आश्रय लेने वाले कांवरिये आपका रुद्री पाठ या कोई स्तोत्र नहीं जानते । ये भोले भालेे भोले भक्त बस बम भोले बोल अपना पूजन कर लेते हैं।
भारत में दो ही महीनें कुछ खास हैं एक सावन दूजा फागुन , ज्यों शरद और बसंत। सावन में स्त्रियाँ चहकती हैं तो फागुन में पुरुष बहकते हैं । दोनों ही मासों में कांवर यात्रा होती है । *शिवतत्व लोक में रचा बसा हुआ है यही भारत हैं।*
महाभारत की कथा में जब पांडव वनवासी हुये तब द्रौपदी सहित भीमसेन ने भी युधिष्ठिर को युद्ध के लिये खूब उकसाया । वनपर्व के तेतीसवें अध्याय में भीमसेन ने युधिष्ठिर को उपदेश किया जिसके कुछ श्लोकों का संक्षेप इस प्रकार है
राजन् ! धनकी इच्छा रखनेवाले पुरूष महान् धर्म की अभिलाषा रखता है और कामार्थी मनुष्य धन चाहता है जैसे धर्म से धनकी और धन से काम की इच्छा करता है, उस प्रकार वह कामसे किसी दूसरी वस्तु की इच्छा नहीं करता है। ‘जैसे फल उपभोग में आकर कृतार्थ हो जाता है, उससे दूसरा फल नहीं प्राप्त हो सकता तथा जिस प्रकार काष्ठ से भस्म बन सकता है; इसी तरह बुद्धिमान् पुरूष एक कामसे किसी दूसरे काम की सिद्धि नहीं मानते, क्योंकि वह साधन नहीं, फल ही है। ‘राजन् ! जो खोटी बुद्धिवाला मनुष्य काम और लोभ के वंशीभूत होकर धर्म के स्वरूप को नहीं जानता, वह इहलोक और परलोक में भी सब प्राणियों का वध्य होता है। ‘राजन् ! आपको यह अच्छी तरह ज्ञात है कि धनसे ही भोग्य-साम्रगी का संग्रह होता हैं और धनके द्वारा जो बहुत-से कार्य सिद्ध होते हैं, उसे भी आप जानते हैं। ‘उस धनका अभाव होने पर अथवा प्राप्त हुए धनका नाश होने पर अथवा स्त्री आदि धन के जरा-जीर्ण एवं मृत्यु-ग्रस्त होने पर मनुष्य की जो दशा होती है, उसी को सब लोग अनर्थ मानते हैं। वही इस समय हमलोगों को भी प्राप्त हुआ है।। ‘पांचों ज्ञानेन्द्रियों, मन और बुद्धि की अपने विषयों में प्रवृत होने के समय जो प्रीति होती है, वही मेरी समझ में काम है। वह कर्मों का उत्तम फल है। इस प्रकार धर्म, अर्थ और काम तीनों को पृथक्-पृथक् समझकर मनुष्य केवल धर्म, केवल अर्थ अथवा केवल काम के ही सेवन में तत्पर न रहे। उन सबका सदा इस प्रकार सेवन करे, जिससे इनमें विरोध न हो। इस विषय शास्त्रों का यह विधान है कि दिन के पूर्वभाग में धर्म का, दूसरे भाग में अर्थ का और अंतिम भाग में काम का सेवन करे। ‘वक्ताओं में श्रेष्ठ ! उचित काल का ज्ञान रखनेवाला विद्धान् पुरूष धर्म, अर्थ और काम तीनों का यथावत् विभाग करके उपयुक्त समयपर उन सबका सेवन करे। ‘ राजन् ! इसी प्रकार लौकिक सुख की इच्छावालों के लिये धर्म, अर्थ, कामरूप त्रिवर्ग की प्राप्ति ही परम श्रेय है। अतः महाराज ! भक्ति और योगसहित ज्ञान का आश्रयलेकर आप शीघ्र ही या तो मोक्ष ही प्राप्ति कर लीजिये अथवा धर्म, अर्थ, कामरूप त्रिवर्ग की प्राप्ति के उपायका अवलम्बन कीजिये। जो इन दोनों के बीच में रहता है, उसका जीवन तो आर्त मनुष्य के समान दुःखमय ही है। ‘मुझे मालूम है कि आपके सदा धर्मका ही आचरण किया है, इस बात को जानते हुए भी आपके हितैषी, सगे-सम्बन्धी आपको (धर्मयुक्त) कर्म एवं पुरूषार्थ के लिये ही प्रेरित करते हैं। महाराज ! इहलोक और परलोक में भी दान, यज्ञ, संतो का आदर, वेदों का स्वाध्याय और सरलता आदि ही उत्तम एंव प्रबल धर्म माने गये हैं।
शिव और उनके शास्त्र
शिव : स्वयं ताे आशु आराधना से संतुष्ट हो जाने वाले आशुतोष, मगर उनके स्वरूप और साधना के संबंध में इतना लिखा गया है कि पढ़ने, समझने में और आचरण में लाने में कई जन्म पूरे हो जाएं। शैवागमों की शृंखला ही बहुत विस्तृत है। वैरोचन के *’लक्षणसार समुच्चय*’ में इन आगमों के विशाल वांगमय पर विस्तार से विमर्श हुआ है।
शिव के शास्त्र के रूप में ‘शिवधर्म’ और ‘शिवधर्मोत्तर’ ग्रंथों को रचा गया। दोनों में से पहले ग्रंथ में *ब्राह्मीलिपि* का जिक्र है जबकि दूसरे में *नंदिनागरी लिपि* का। इसी कारण से लगता है कि पहला ग्रंथ गुप्तकाल के आसपास लिखा गया जबकि दूसरा वातापी के चालुक्य के शासनकाल का होना चाहिए। ये वे ग्रंथ माने जा सकते हैं जो कि लिंगपुराण, शिवपुराण, नंदिपुराण, सौरपुराण आदि के आधारभूत रहे हैं। इन दोनों के ही पहली बार संपादन-अनुवाद के दौरान मुझे लगा कि जटिल परंपराओं के विपरीत धर्म को आचरणमूलक अंग बनाने का प्रयास होना चाहिए।
जीवन में सब पर करुणा, दया और सहयोग हो और स्वाध्याय को सर्वोच्च प्राथमिकता मिले और सरलतम रूप में शिव की आराधना हो। आतंक, द्वेषमूलक कुकर्मों से मुक्त होकर शिवानंद का अनुभव किया जा सकता है। शिव कल्याणकारी है, उनका यह भाव जीवन का ध्येय होना चाहिए। इनमें शिवरात्रि का विधान नहीं आया किंतु लिंगपुराण, शिवपुराण, स्कंदपुराण और गरुड़पुराण में इस व्रत का विधान विशेषरूप से आता है। आबू के एक आदिम-आख्यान को इस व्रत का उत्स माना गया है। आज यह आख्यान इतना लोकप्रिय है कि इस कथा को सुने बिना इस पर्व का विधान पूरा नहीं होता। न केवल भारत बल्कि मारीशस तक यही कथा लोकप्रिय है… शिव सदैव कल्याणकारी रहें.. जय जय।