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कौटल्य शब्द की व्युत्पत्ति कुटिल शब्द से नहीं हुई

इतिहासमें ये भ्रामक प्रचार किया गया है ,कि चाणक्य कुटिल होने के कारण कौटल्य नामसे प्रसिद्ध हो गए ।

 

वास्तवमें चाणक्य, बादमें कौटल्य नामसे प्रसिद्ध नहीं हो गए ,अपितु कौटल्य गोत्र होने के कारण चाणक्य स्वयं को कौटल्य लिखते थे । कौटल्य शब्दका अर्थ स्वयं आचार्य  चाणक्यने इस प्रकार किया है –

“कूटो घट: तं धान्यपूर्णं लान्ति संगृह्णन्ति इति कुटिला: ।

कुम्भीधान्या: त्यागपरा ब्राह्मणश्रेष्ठा: । तेषां गोत्रापत्यं कौटल्यो विष्णुगुप्तो नाम । “(कौटल्य-अर्थशास्त्र)

अर्थात् – ‘कूट घटका नाम है । जो लोग एक घटसे अधिक अन्नका संग्रह नहीं करते थे , उन कुम्भीधान्य नामक अत्यन्त श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका गोत्रापत्य कौटल्य कहलाता है । कौटल्यका मुख्य नाम विष्णुगुप्त है । ‘

वे आचार्य कौटल्य ही थे ,जिन्होंने चन्द्रगुप्त मौर्य को प्रजा का ऋणी कहकर प्रजा की सेवा में परोपकारोंसे ऋणमुक्त होने का आदर्श रखा था । यही नहीं ,इनके परवर्ती पञ्चतन्त्रके रचयिता आचार्य विष्णु शर्माने ३०० ई पू में ,मनु ,बृहस्पति ,शुक्र ,पराशर एवं व्यासजी जैसे ऋषियोंके साथ  आचार्य चाणक्य का नीतिशास्त्रविदों में स्मरण  किया है

” मनवे  वाचस्पते  शुक्राय   पराशराय  सशुताय ।

चाणक्याय च विदुषे  नमोऽस्तु नयशास्त्र कर्तृभ्य:।।

सकलार्थशास्त्रसारं जगति समालोक्य विष्णुशर्मेदम् ।

तन्त्रै:  पञ्चभिरेतच्चकार   सुमनोहरं   शास्त्रम् ।।”

(पञ्चतन्त्र २-३)

सर्वज्ञ शङ्कर

 

आदिअनादि अनन्तशिवहर

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