
विश्वेश्वरैयाजी के जन्मदिवस को अभियंता दिवस के रूप में भी मनाया जाता है।आप आधुनिक भारत के विश्वकर्मा व शिल्पी माने जाते हैं।
बहुत कहानियां हैं आपकी ईमानदारी,बुद्धि और योजना के क्रियान्वयन की।91 साल के थे 1951 में जब नेहरू जी ने भारत में सड़कों का जाल बिछाने के लिये विश्वेश्वरैया जी को योजना प्रमुख बनाया,ऐसी और कोई मिसाल नहीं थी जब 91 साल के इंसान पर इतनी बड़ी योजना की जिम्मेदारी हो।
मैसूर का वृंदावन उद्यान भी एक अद्भुत परिकल्पना और इंजीनियरिंग का अद्भुत मेल है जहां बिना बिजली के सैकड़ों फव्वारे चलते हैं और इसे बेहद खूबसूरत पानी का उद्यान बना देते हैं।
सभी अभियंता मित्रों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।
हमारे यहां सूत्रधारों को वही सम्मान पर्याय मिला है, जो आज अभियंता को है। यह सम्मान उनको उनकी चिर स्थायी कला के सर्जक और निर्माता होने के कारण मिला है। अधकचरा काम, अल्पकालीन कला अथवा प्रयोग के नाम पर बेशकीमती जिंदगी खर्च कर देने वालों के लिए सम्मान तो छोड़िए, उनको याद रखने का निर्देश भी नहीं है। उम्र और अनुभव की परिपक्वता देखनी चाहिए! जिनकी कला सदियों के पार झांक सकी, उनका महत्व राजा सहित प्रजा आंक सकी। निर्माण कार्यों के लिए ऐसा सम्मान सूत्रधार को मिला, वे “विश्वकर्मा” कहे गए।
ऐसी सेवाओं के लिए शासक, सामंतों ने उनको सिंहासन पर विराजित कर उचित मान दिया गया, गज हस्त, सोने के सिक्के और उपकरण देकर, भूमि, गौ, अन्न और ग्रामदान किया, जैसा कि अपराजित पृच्छा और प्रासाद मंडन, वास्तु मंजरी आदि कहते हैं।
फिर से…
आज अभियंता दिवस की शुभ कामनाएं..
इंजीनियरों की शास्त्रीय परिभाषा
Definition of an engineer – a complement for my fellow professionals
मैंने कभी 1943 कि इंस्टीट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स कि एक मैगज़ीन में इंजीनियर की परिभाषा देखी थी जो द्वापर युग में मय द्वारा रचित मयमत पुस्तक के पांचवें अध्याय से ली गयी थी. कहा है,
I had read this definition in a magazine of the Institutions of Engineers – India (1943 issue). It quoted Maya, the great engineer, of the Dwapar era, from Chapter-5 of his famous book Mayamat.
“निर्माण कला में पारंगत स्थापत्यकार को सभी शास्त्रों का ज्ञाता होना चाहिए. उसका न तो कोई अंग कम हो और ना अधिक हो. उसे धर्म का पालन करने वाला तथा दयावान होना चाहिए. वह राग-द्वेष से मुक्त तथा कर्मठ हो. वह अपने वृत्ति की उच्च परम्पराओं के प्रति समर्पित रहे. अपने दायित्व की पृष्ठभूमि से भली भाँति परिचित हो, गणितग्य, पुराणग्य और जितेन्द्रिय तथा सत्यवान हो और निर्णय करते समय पक्षपात का आश्रय न ले. वह अपने दायित्व को समग्रता में देखे तथा देश-काल के अनुरूप काम करने वाला हो. वह अन्नदाता हो और किसी भी प्रकार के लोभ से अपने को बचा कर रखने वाला हो. वह निरोग हो और उसकी निर्णय क्षमता निर्विवाद हो तथा वह सात प्रकार के व्यसनों से मुक्त हो.”
जहां तक सात प्रकार के व्यसनों का सवाल है उनमें शास्त्रों में जुआ खेलना, मांस भक्षण, मद सेवन, वेश्यागमन, शिकार खेलना, चोरी और परस्त्री रमण को सात व्यसन की संज्ञा दी गयी है.
मैंने इंजीनियरों की यह परिभाषा बहुत से इंजीनियर मित्रो को सुनाई है और स्वयं भी इस पर मनन किया है. सबका मानना है कि यदि परिभाषा यही है तो हम में से कोई भी इंजीनियर नहीं है. काश! यह परिभाषा हमें पढ़ाई गयी होती.
यह परिभाषा मय ने दी है जिसे पांडवों के खांडवप्रस्थ के महल का निर्माण किया था. इसी महल में दुर्योधन को पानी होने का भ्रम हुआ था जहां पानी नहीं था और उसने भींगने के डर से धोती ऊपर उठा ली थी. इसके बाद वह एक दीवार से टकरा गया था जहां उसे लगा था कि रास्ता साफ़ है। कहते हैं कि कौरवों ने पांडवों और कुंती को मारने के लिए जो लाक्षागृह तैयार किया था उसका निर्माणकर्ता भी वही मय था.
मय के वास्तु, शिल्प मत कैकई देश से सिंहल तक अनेक सदियों तक प्रचलन में रहे। महाभारत के सभा पर्व और रामायण के युद्ध कांड में मय के शिल्प प्रसंग सच में बड़े प्रेरक रहे। और, मय के ग्रंथों का विशिष्ट हिंदी अनुवाद और संपादन हुआ :
मय चरित
रामायण में मय का चरित आता है। महाभारत में भी है लेकिन वाल्मीकि ने मय को दानवराज कहा जिसने निर्जन वन में भी जन सुविधादायक निर्माण किए- ऐसा मय की बनाई गुफा निवासिनी स्वयंप्रभा ने कहा।
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मय के निर्माण सूत्र शिल्पियों में बहुत प्रचलित रहे। प्रसिद्ध बृहद्देश्वर मन्दिर के निर्माण के दौरान, 1000 ई. में राजराजेश्वर चोल ने मयसूत्रों को संगृहीत करवाया और नाम दिया गया :
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( दक्षिण भारत में मय को प्रमुख स्थापत्य विशारद माना गया है और आज तक उसके मत के प्रति सम्मान है। हालांकि उत्तर में प्रचलित “सूर्यसिद्धांत” भी मय कृत कहा जाता है।)
वितस्ति , अरत्नि , हस्त , पद । चार मापों का प्रदर्शक एक उत्कीर्णन प्राप्त हुआ पार्थिनॉन में। वर्ष 2010 नेशनल जिओग्राफिक पर किसी कार्यक्रम में इसके विषय में दिखाया गया था, उसी समय कुछ बातें नोट की थीं।
कार्यक्रम का नाम याद नहीं रहा मन में दोबारा देखे जाने की इच्छा को पूरा किया उन अज्ञात लोगों ने जिन्होंने वीडिओ अपलोड कर रखे हैं।
खोज में समय लगता ही है।
2500 वर्ष पुराने मन्दिरों के बनाने वाले चार प्रकार के लोग थे जो अपनी अपनी मापों का व्यवहार करते थे। पार्थिनॉन की इस रचना में स्तम्भों आदि की ऊँचाई में चारों मापों का समन्वय किया गया, किसी भी प्रकार से मापने पर पूरी पूरी सँख्या प्राप्त हो जाये। और इस प्रकार जो प्राप्त हुआ उससे प्रसिद्ध *गोल्डन रेशिओ* का जन्म हुआ।
जिओमेट्री के लिये भारतीय शब्द *शुल्ब* है, आप कहेंगे शुल्ब का अर्थ डोरी होता है तो शुल्ब सूत्रों में डोरी के लिये रज्जु शब्द का व्यवहार किया गया है।
‘ज्यामिति’ कहने पर क्या यह अर्थ ध्वनित नहीं होता कि केवल ‘ज्या’ का ही मापन होगा? ‘शुल्ब’ अन्तर्गत रेखागणित, त्रिकोणमिति, ज्यामिति , क्षेत्रमिति सभी आ जाते हैं।
चार ओर समुद्र से घिरी भूमि में शिल्पियों ने अद्भुत कौशल दिखलाया, वहाँ सबसे पुराना सूर्य मन्दिर ही बना फिर अन्य देवियों के मन्दिर बनाये गये।
✍️*हमने इसी भारत में अवतार लिया, पर हमे इसका ज्ञान नहीं*
भारत की उच्च स्तरीय ज्यामिति वैदिक अनुष्ठानो के ग्रंथो से ही झलकती है। ज्यामिति का उद्भव यज्ञ की वेदी का निर्माण करने के सन्दर्भ में हुआ था। इस तरह का सबसे प्राचीनतम अभिलेख बौधायन का शुल्बसूत्र माना जाता है। यज्ञ के लिए वेदियों के निर्माण का वर्णन करते ये शुल्बसूत्र ज्यामितीय रचनाओं पर आधारित हैं। ‘शुल्बÓ का अर्थ है नापना या नापने की क्रिया। ये शुल्बसूत्र अपने लेखकों के नाम से प्रसिद्ध हुए हैं। इनमे प्रमुख हैं- बौधायन का शुल्बसूत्र, आपस्तम्ब का शुल्बसूत्र, कात्यायन का शुल्बसूत्र और मानव का शुल्बसूत्र। पाश्चात्य इतिहासकारों के अनुसार इन शुल्बसूत्रों का रचना काल 1200 से 800 ई. पू. माना गया है। शुल्बसूत्र उस काल में भारतीयों की क्षेत्रफल और माप की गहरी समझ और निपुणता को दर्शाते हैं। अपने एक सूत्र में बौधायन ने विकर्ण के वर्ग के नियम बताये हैं –
*‘दीर्घचतुरस्त्रस्याक्ष्णया रज्जु: पाश्र्वमानी तिर्यङ्मानी च यत्पृथग्भूते कुरुतस्तदुभयं करोति’*
अर्थात् एक आयत का विकर्ण उतना ही क्षेत्र इक्कठा बनाता है जितना कि उसकी लंबाई और चौड़ाई अलग अलग बनाती है। आज के दिनों में दुनिया इसे पाइथागोरस के प्रमेय के रूप में जानती है। साफ है कि भारतीय गणितज्ञ इस अवधारणा से पाइथागोरस के पहले से ही परिचित थे।
इन शुल्बसूत्रों से विभिन्न ज्यामितीय सरंचनाओं की निर्माण विधि का पता चलता है, जैसे दो वर्गों के जोडऩे या घटाने पर किसी खास क्षेत्रफल के नये वर्ग का निर्माण होना, किसी आयत को समान क्षेत्रफल के वर्ग में परिवर्तित करना, किसी वृत्त को लगभग-लगभग समान क्षेत्रफल के वर्ग में तब्दील करना और इसका उल्टा करना, ज्यामितीय तरीके से वर्गमूल ज्ञात करना और सबसे महत्वपूर्ण था श्रीयंत्र का निर्माण करना। श्रीयंत्र अपने आप में ही बेहद जटिल ज्यामितीय रचना है।
श्रीयंत्र जैसी रचना उच्च स्तरीय गणित को दर्शाती है। इस तरह की रचनाओं में कई लकीरों एवं गोलाकार चापों के समूह को एक साथ इतने सूक्ष्म तरीके से उकेरना कोई साधारण घटना नहीं है। रूसी शोधार्थी कुलैचेव (श्रीयंत्र पर इनका पत्र इंडियन जर्नल ऑफ़ हिस्ट्री ऑफ साइंस ने 1984 में प्रकाशित किया था) के अनुसार इस तरह की सूक्ष्म गणना करना नए जमाने के कम्पयूटरों की क्षमता से भी बाहर है। उनके अनुसार श्रीयंत्र के केंद्र में बने ज्यामितीय रचना (14 कोण का वह बहुभुज जो 9 त्रिभुजों के प्रतिच्छेदन से निर्मित हुआ है।), इतनी उत्तम बनी हुई है कि हस्तनिर्मित लगता ही नहीं है, चूँकि इसके लिए कई प्रतिच्छेदित बिन्दुओं का सुपर-पोजीशन करने की आवश्यकता है।
ब्रह्मगुप्त (598 ई. ) का ब्राह्म स्फुट सिद्धांत
ब्राह्म स्फुट सिद्धांत (628 ई.) के 24 अध्याय और 1022 श्लोकों में ब्रह्मगुप्त ने ज्योतिष और गणित से सम्बंधित जानकारी दी है। इस ग्रन्थ के 12 वें अध्याय गणिताध्याय में क्षेत्र व्यवहार (त्रिभुज, चतुर्भुज आदि के क्षेत्रफल), छाया व्यवहार (दीप स्तम्भ और उसकी छाया से सम्बंधित प्रश्न) का भी वर्णन किया है। ब्रह्मगुप्त ने चक्रीय चतुर्भुज के गुणों पर प्रकाश डाला। उन्होंने चक्रीय चतुर्भुज के क्षेत्रफल और विकर्णो को प्राप्त करने के लिए सूत्र दिए।
‘भुजयोगार्धचृतष्टयभुजोनघातात् पदं सूक्ष्मम्’
यदि किसी चक्रीय चतुर्भुज के बाजुओं की लम्बाई ए, बी, सी और डी है, दोनो विकर्णो की लम्बाई डी1, डी2 है और अर्ध परिधि है एस है तो
पश्चिम में यह सूत्र डब्लू स्नेल ने वर्ष 1619 में प्राप्त किया था। अगर किसी एक बाजु को हटा दिया जाये या डी को सी से मिला दिया जाये ताकि सी = 0 हो जाये तो क्षेत्रफल का सूत्र हेरोन के सूत्र (त्रिभुज का क्षेत्रफल ज्ञात करने के लिए) के बराबर हो जायेगा। 1530 ई. में इस तरह के सूत्रों का सुस्पष्ट प्रमाण ज्येष्ठदेव (केरल के गणित विद्यालय) द्वारा रचित युक्तिभाषा में पाया जाता है। अत: अगर हजारों वर्षों तक चक्रीय चतुर्भुज के विकर्णो का सूत्र दुनिया के किसी दूसरे कोने में नहीं ज्ञात था तो यह अत्यंत महत्वपूर्ण घटना/विषय है।
अज्ञात राशियों के साथ गणना करने की अवधारणा ही बीजगणित जन्म देती है। पृथदुक स्वामी (830 – 890 ई.) ने इसे बीजगणित का नाम दिया। ब्राह्म स्फुट सिद्धांत में ऋणात्मक व घनात्मक अवधारणा संबंधी नियम भरे पड़े थे । इन्ही नियमो ने बीजगणित में मूलभूत नियम की भूमिका निभायी। शुल्बसूत्रों और बक्षाली की पांडुलिपि में भी बीजगणित का कुछ स्वरुप दिखाई देता है। भारत में आर्यभट के समय से बीजगणित एक स्वतंत्र शाखा के रूप में देखा जा सकता है। आर्यभट ने आर्यभटीय की रचना की। इस ग्रंथ में कुल 121 श्लोक हैं जो चार अध्यायों में विभाजित हैं – गीतिकापाद – 13 श्लोक, गणितपाद – 33 श्लोक, कालक्रियापाद – 25 श्लोक, गोलपाद – 50 श्लोक। इनमें गणितपाद में आर्यभट ने अंकगणित एवं बीजगणित पर प्रकाश डाला है।
आर्यभट अज्ञात राशियों के लिए ‘गुलिका’ शब्द का प्रयोग करते हैं। आर्यभट ने श्रेणी के पदों के योग के भी सूत्र दिए हैं। उन्होंने अनिर्धार्य समीकरण (कुट्टकार विधि) भी हल किये। आज इस तरह के समीकरणों को हल करने का श्रेय डायोफेंटस को मिलता है। भास्कराचार्य ने भी लीलावती में श्रेणी और समीकरण संबंधित अनेक सूत्र दिए हैं। कई उदाहरण तो आज की नंबर थ्योरी की नींव डालते हैं।
ब्रह्मगुप्त एक महान गणितज्ञ थे। उन्होंने ब्राह्म स्फुट सिद्धांत को 24 अध्यायों में रचा। इस ग्रंथ का 12 वां (गणिताध्याय) और 18 वां अध्याय (कुट्टकाध्याय ) गणित से सम्बंधित है। 103 श्लोकों से भरा यह कुट्टकाध्याय बीजगणित पर केन्द्रित है। चक्रीय चतुर्भुज और उसके विकर्णो के बारे में तो हम चर्चा कर ही चुके है। ब्रह्मगुप्त के सबसे महत्पूर्ण योगदानों में से एक है एक खास तरह के द्विघातीय समीकरण का हल विशेषकर पेल समीकरण का हल।
आज इस समीकरण को पेल समीकरण के नाम से जाना जाता है, यद्यपि पेल का जन्म इसके 1000 वर्ष बाद हुआ था और उनका इस समीकरण से कोई लेना देना नहीं था। ब्रह्मगुप्त की प्रमेयिका द्विचर सरंचना के लिए काफी महत्वपूर्ण साबित हुई। इस विधि का प्रयोग उपरोक्त समीकरण के हल ज्ञात करने के लिए ज्येष्ठदेव और भास्कराचार्य द्वारा खूब किया गया जो कि ‘चक्रावल विधि’ के नाम से प्रचलित हुआ। ब्रह्मगुप्त द्वारा दिए गए विधि का प्रयोग गणित के राजकुमार कहे जाने वाले ‘गॉस’ ने भी खूब किया।
द्विघात समीकरण के सन्दर्भ में श्रीधराचार्य (जन्म 8वीं शताब्दी) का सूत्र सदाबहार है। भास्कराचार्य ने वर्ग समीकरणों के हल के लिए श्रीधराचार्य के नियम को उधृत किया है। महावीराचार्य (9 वीं शताब्दी) ने गणित सार-संग्रह की रचना की। बीजगणित से सम्बंधित अनेक उदाहरणों में उनका प्रकृति प्रेम उजागर होता है। जैसे, पक्षी, पर्वत, फूलों और उनकी संख्या पर आधारित पहेलियाँ देना। महावीर ने अपनी पहेलियों द्वारा उच्च घातांको वाले समीकरण, प्रतिस्थापन विधि की भी व्याख्या की है। जैसे, ‘हाथियों के झुण्ड में से, उनकी संख्या के 2/3 भाग के वर्गमूल का 9 गुना प्रमाण और शेष भाग के 3/5 भाग के वर्ग मूल का 6 गुना प्रमाण और अंत में शेष 24 हाथी वन में ऐसे देखे गए जिनके विशाल गंड मंडल से मद झर रहा था। हाथियों की संख्या ज्ञात करो।’
अपनी बीजगणितीय क्षमता का उदाहरण देते हुए महावीर ने समकोण त्रिभुज के निर्माण के नियम दिए है। भास्कराचार्य ने 1150 ई. में सिद्धांत शिरोमणि ग्रंथ की रचना की। सिद्धांत शिरोमणि के चार भाग हैं – लीलावती, बीजगणित, गोलाध्याय, और ग्रह-गणित। इन सबमें लीलावती भास्कर की सबसे लोकप्रिय रचना साबित हुई। लीलावती में भास्कर ने गणितीय प्रश्नों को काव्यात्मक शैली में प्रयोग किया है। विभिन्न अलंकारों का सुंदर प्रयोग इसे और भी पठनीय बनाता है। भास्कराचार्य ने तीन और चार घाट वाले समीकरणों पे भी प्रकाश डाला है। बीजगणित के वर्गप्रकृति नामक अध्याय में भास्कराचार्य ने ब्रह्मगुप्त से सम्बंधित विधियों के उदाहरण दिए हैं, जिनमें अनंत हल प्राप्त किये जा सकते हैं। भास्कराचार्य का चक्रवाल विधि काफी प्रसिद्ध हुआ। प्रसिद्ध गणितज्ञ आंद्रे वाइल्स ने भी इस विधि को प्राप्त करना काफी असाधारण बतलाया है।
केरल के गणित विद्यालयों ने भारतीय गणित को और भी उंचाई तक पहुँचाया। इन गणित विद्यालयों ने माधव जैसे गणितज्ञ के कार्य को उजागर किया। माधव यानी माधवाचार्य (1340 ई. 1425 ई.) ने कलन (कैलकुलस), त्रिकोणमिति और अनंत श्रेणी के विस्तार में अतुलनीय योगदान दिये। ज्येष्ठदेव की युक्तिभाषा, नीलकंठ सोमयाजी के तंत्र समग्रह, पुटूमन सोमयाजी के कर्ण पद्धति में माधव के कार्य का उल्लेख मिलता है। माधव ने गणित को त्रिकोणमिति से सम्बंधित कई विस्तार दिए। उनकी कई श्रेणियों का प्रयोग विभिन्न कोणों के ज्या (साइन) और कोज्या (कोसाइन) का मान ज्ञात करने के लिए किया जाता था, जो कि बिल्कुल सटीक परिणाम देतीं। इस तरह का पैनापन यूरोप में नहीं आया था। समीकरण ख को आज ग्रेगरी श्रेणी से जाना जाता है, जबकी माधव ने ग्रेगरी से 300 वर्ष पहले ही ऐसे समीकरणों को दुनिया के सामने लाया था। माधव ने इस सुंदर सूत्र की भी खोज की – यह सूत्र प्रसिद्ध गणितज्ञ लेबनीज ने भी बाद में खोजा। युक्तिभासा में माधव के कार्य को लेकर पता चलता है कि समाकलन की अवधारणा योग या संकलन-फल की सीमा (लिमिट) से सम्बंधित थी, जो आज के आधुनिक अवकलन विधि (विस्तार और पदों का एक एक कर अवकलन करना) से मेल खाती है। माधव के गणितीय कार्य यह दर्शाते हैं कि न्यूटन और लेबनिज से तीन शताब्दी पहले ही भारत कलन और गणितीय विश्लेषण में गहराई और परिपक्वत्ता हासिल कर चुका था।
और हम…बस डिग्री को दीवार पर टांग दो…अपना जीवन सफल…
✍️फिर मिलते है