
फाल्गुन का ये दिन आप सबके नाम। हम साल के समापन और चैत्र की ओर अग्रसर हैं। फागुन या फाल्गुन, वह मास जो वीरवर अर्जुन का भी एक नाम था हमारे लिए एक मास ही है। फाल्गुनी नक्षत्र पर इस मास का नाम है।
यह वसन्त की वेला का मास है, ऐसी वेला जिसकी पहचान कोई पंद्रह सौ साल पहले भी आज के रूप में ही की गई थी, खासकर उन शिल्पियों ने जो #दशपुर में रंग-बिरंगी रेशम की साडियां, दुकूल बनाते थे और देश ही नहीं, समंदर पार भी अपनी पहचान बनाए हुए थे।
उन्होंने फागुन की ऋतु को बहुत अच्छा माना है, उनके कवि वत्सभट्टि ने लिखा है –
फागुन वही है जिसमें महादेव के विषम लोचनानल से भस्मीभूत, अतएव पवित्र शरीर वाला होकर कामदेव जैसा अनंग देव अशोक वृक्ष, केवडे, सिंदूवार और लहराती हुई अतिमुक्तक लता और मदयन्तिका या मेहंदी के सद्य स्फुटित पुंजीभूत फूलों से अपने बाणों को समृद्ध करता है। ये ही वनस्पतियां इन दिनों अपना विकास करती है।
यह वही फागुन है जिसमें मकरंद पान से मस्त मधुपों की गूंज से नगनों की शाखा अपनी सानी नहीं रखती और नवीन फूलों के विकास रोध्र पेडों में उत्कर्ष और श्री की समृद्धि हो रही है। (कुमारगुप्त का 473 ई. का मंदसौर अभिलेख श्लोक 40-41)
इस अभिलेख में इस मास का नाम ‘तपस्य’ कहा गया है। यही नाम पुराना है, नारद संहिता (3, 81-83) में मासों के नाम में यह शामिल है। ज्योतिष रत्नमाला (1038 ई.) में भी ये पर्याय आए हैं। बारह मासों के बारह सूर्यों में इस मास के सूर्य का नाम सूर्य ही कहा गया है, देवी धात्री और देवता गोविन्द को बताया गया है।
यही मास है जो नवीन वर्ष को निमंत्रित करता है, होलिका दहन के साथ इस मास का समापन होगा। बहरहाल गांव गांव होलिकाएं रोंपी जा चुकी हैं, ये एक महीने की अवधि वाली हैं। मगर, ज्ञात रहे होलिका के लिए सेमल के पेडों को काटा जाना ठीक नहीं हैं, सेमल बहुत उपयोगी है।
आगे और भी हे
फागुन बहुत उदास है।
उदास है, क्योंकि उसके निकट अब वे हुरियारे नहीं रहे जिन्हें फागुन का वास्तविक अर्थ ज्ञात था।
वे हुरियारे अब नहीं रहे जो पलाश – पुष्पों जैसे शब्दों से जनों के मनों में टहटह गुलनार फागुन घोल देते थे।
नहीं रहे वे हुरियारे,
जो वासकज्जा, विरहोत्कंठिता, स्वाधीनपतिका, कलहांतरिता, खंडिता, विप्रलब्धा, प्रोषितभर्तृका
एवं अभिसारिका के नवोढ़ा, मुग्धा एवं प्रौढा रूपों में महीन विभेद जान कर उनके मन के अनुरूप ऐसी मीठी गारियाँ गढ़ सकें कि नायिकायें एक साथ कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात कह उठें कि “भाग हियंवाँ से निर्लज्ज!” और उनकी भंगिमाएँ बोलें – “ए गो अउरो सुनाउ न!”
हम साहित्य ही नहीं, ऋतुओं एवं उत्सवों के भी अल्पजीवी परिवेश में जी रहे हैं जिसमें प्रत्येक को प्रत्येक अवसर, प्रत्येक घटना, प्रत्येक भावना, प्रत्येक अभिव्यक्ति को एक औपचारिकता का निर्वाह करते हुए यथासंभव शीघ्रातिशीघ्र निबटा देने की अबूझ शीघ्रता है। और आज शब्दकारों के पास ले-दे कर सरसों का एक फुलाया हुआ खेत है, जिसकी बसन्ती आभा में ही सारा बसन्त सिमटा है। किन्तु किया क्या जा सकता है? सारे पर्व, समस्त उत्सव, और उनसे संश्लिष्ट ऋतु-व्यापार तो ऋतु-विपर्यय का आखेट हो चुके हैं।
होलास्टक लग गया किन्तु कोकिल नहीं कूका। एक – दो नवहे अमोलों को छोड़ दें जिनकी युवानी तनिक पहले अँखुआ आयी थी, तो आमों पर मञ्जरियाँ तो अब तक थीं ही नहीं। प्रौढ़ सहकार तो अब जा कर धीरे-धीरे उमगने लगे हैं, उनका बसन्त में बौराना तो अभी भी ढंग से नहीं हुआ, क्योंकि आधे से अधिक फागुन तो माघ की चपेट में रहा।
फागुन बसन्त का प्रतिरूप नहीं। बसन्त की मादकता एवं सरसता का प्रतिरूप तो वैदिक मधु एवं माधव मास है। मधुमास है चैत्र और माधव मास है बैशाख। बसन्त है काम का घोषित सामन्त! काम के कोमल आक्रमण से पूर्व उसकी सैन्य-योजना का निर्धारण यह बसन्त ही करता है। गन्ध और रङ्ग से, कोकिल की कूक से, प्रकृति के हुलास से, नकुल के विलास से, किसलय से, पात से और छेड़ भरी बात से, काम के आगमन का परिवेश ये मधु एवं माधव मास ही रचते हैं। प्रकृति के गर्भाधान एवं सृजन का मास फागुन नहीं, चइत-बइसाख हैं। फागुन तो प्रकृति के प्रथम रजोदर्शन का मास है जो बताता है कि प्रकृति अब इस योग्य हो चुकी कि स्वयं काम-शर से बिद्ध हो सके एवं आपको भी बिद्ध कर सके। फागुन पियाराये झरे पातों के माध्यम से हरिद्राभिषिक्त पत्रलेख है, काम के सुबास की सूचना है, एक आमन्त्रण, काम के स्वयंवर हेतु प्रकृति का न्यौता! खर्जूर के सामयिक क्षतों से स्रवित होते रस के मदिर मधुर गंध और स्वाद के प्रति रसभाविकों को एक प्रलोभन!
फागुन बस इतना ही है।
स्वयंवर तो चइतवाँसे सजेगा!
नीरस मिथ्याडम्बर का परिवेशन करते शुष्क तर्कशास्त्री काम के सिद्धान्त से अनभिज्ञ ही रहते हैं। स्वेदन-स्नेहन की उपेक्षा कर रूक्ष घर्षण से काम का देवता तृप्त नहीं होता। उसे काया ही नहीं, मन का भी मृदु-मंथन चाहिये।
कहते हैं कि मण्डन मिश्र को शास्त्रार्थ में पराजित कर चुके आदि शंकराचार्य से मण्डन मिश्र की अर्धांगिनी श्रीमती शारदा मिश्र ने कहा था – आप ने मेरे पति को पराजित किया है आचार्य! किन्तु वह आधे हैं। गार्हस्थ पति एवं पत्नी के युग्म से पूर्ण होता है अतः उनका अर्धांग अभी अपराजित है। यदि पूर्ण विजय की अभिलाषा है तो आपको मुझसे भी शास्त्रार्थ करना होगा।
तर्कतः बात सिद्ध थी अतः शंकराचार्य ने शारदा से शास्त्रार्थ स्वीकार कर लिया।
शारदा ही शंकर एवं मण्डन के शास्त्रार्थ हेतु निर्णायक की भूमिका में थी अतः अब तक के शास्त्रार्थ में वह जान चुकी थी कि अपने विषय में तो शंकर एक घुटा हुआ तर्कशास्त्री है किन्तु रस से अनभिज्ञ है, अतः इसे घेरना हो तो इसे किसी उस भूमि में घेरना होगा जो इसका जाना न हो। इसे उस अखाड़े में पटकना होगा जहाँ इसकी गति न हो।
अतः शारदा ने पहला ही प्रश्न किया –
कलाः कियत्यो वद पुष्पधन्वनः,
किमासिका किञ्च पदं समाश्रिताः ।
पूर्वे च पक्षे कथमन्यथा स्थितिः
कथं युवत्यां कथमेव पूरुषे।।
पुष्पधन्वा कामदेव की कलायें कितनी हैं? उनका स्वरूप क्या है? वे किन-किन स्थानों का आश्रय लेती हैं? युवती हेतु एवं पुरुष हेतु उसकी स्थितियॉं कैसी हैं? पूर्व तथा पक्ष में, अर्थात प्रथम हेतु (युवती हेतु) एवं अपर हेतु (पुरुष हेतु) उसकी (काम की) स्थिति भिन्न कैसे हो जाती है?
बाल ब्रह्मचारी शंकराचार्य तो सन्न! वे क्या जानें काम की कलायें?
उन्होंने शारदा से एक मास का समय माँगा।
कहते हैं कि बसन्त में मृगया को निकला राजा अमरुक वन में ही तृषा से त्रस्त अपने प्राण खो बैठा था और तभी शंकराचार्य ने उसके रोते-बिलखते परिजनों के साथ उसका शव देखा। परकाया-प्रवेश में सिद्ध शंकर ने अपने शिष्यों को अपने देह की यत्न से रक्षा करने का आदेश दे कर तत्काल अपनी मूल काया को त्याग कर उस मृत राजा के शव में प्रविष्ट हो गये एवं मास भर यथेच्छ काम-सेवन किया।
उस अवधि के अनुभव को उन्होंने अमरुक शतक नाम के ग्रंथ में लिख दिया जो शृंगार का एक अनुपम ग्रंथ है।
मास पर्यंत स्वीकृत अवधि के बीतने से पूर्व ही वे पुनः अमरुक की काया त्याग कर अपनी प्राकृत काया में आ गये एवं उस एक मास के काम-अनुभव का लाभ ले कर उन्होंने शारदा मिश्र को शास्त्रार्थ में पराजित भी किया।
किन्तु शंकर के भीतर का शुष्क तार्किक अब रस-सिद्ध हो चुका था। अब उसकी वाणी में कर्कश तर्क की रूक्षता ही नहीं थी, रस की एक निर्बाध पयस्विनी भी थी।
क्या फागुन बस इतना ही है?
फागुन बहुत उदास है।
वह उदास है, क्योंकि उसके निकट अब वे हुरियारे नहीं रहे जिन्हें फागुन का वास्तविक अर्थ ज्ञात था।
किन्तु वह किससे कहे? कैसे कहे? कि फागुन बस सरसों के फुलाये हुए खेत नहीं! फागुन इससे कहीं बहुत अलग, और बहुत कुछ और भी है।
कुछ और
अच्छा सुनिये!
ये जो फागुन के महीने में हम जैसे बूढ़े युवक बौरा कर उल्टा पुल्टा मजाक करने लगते हैं, उसका कारण बस इतना ही है कि आप हमारे जीवन का हिस्सा हैं। वरना सोचिये, कि जो लोग अपरिचित होने पर दूर गाँव की अप्सरा को भी मुँह न लगाते हों, वे ही अपनी ताड़का की मौसीआउत बहन जैसी भौजाई में ऐश्वर्या राय कैसे देख लेते हैं? यह अद्भुत नहीं है क्या?
जानती हैं फागुन क्यों आता है? फागुन आता है ताकि काम का मारा मानुस खेत में खिले सरसो की तरह महीने भर खिलखिला सके। ताकि मुस्कुरा सके मुंह में मञ्जरी ले कर मुस्कुरा रहे आम के पल्लवों की तरह… नहीं तो जीवन में जीने से अधिक तो मरता रहता है मनुष्य!
ड्यूटी में बॉस मार रहा है, बाजार में हमारी पहाड़ की तरह खड़ी हो चुकी इच्छाएं मार रही हैं, पैसे कमाने के लोभ में जीवन पर थोपी गयी व्यस्तता हमारे प्रेम को मार रही है, जिस आयु में मन को हवा में उड़ना चाहिए उस आयु में लड़कों को अधिक अंक लाने की विवशता दबा कर मार रही है। इस शमशान हो चुके संसार में कोई व्यक्ति अपने हृदय में आनंद की कोंपल उपजाने के लिए यदि थोड़ी फूहड़ खाद ही डाल ले तो क्या उसे माफ नहीं किया जाना चाहिये? बिल्कुल किया जाना चाहिये, बल्कि बदले में उसके ऊपर थोड़ी खाद और डाल देनी चाहिये। ताकि लहलहा जाय मन… फागुन में देवर के मजाक के बदले भौजाई की गालियों और रङ्ग के बदले गोबर फेंकने की परम्परा का यही एकमात्र कारण है। है न मजेदार?
कुछ लोगों को लगता है कि फागुन-चइत मनुष्य का बनाया हुआ है। ऐसा बिल्कुल नहीं है जी! फागुन को ईश्वर ने फुर्सत में बैठ कर रचा है। जभी इस महीने में आम किसान को कोई काम नहीं होता। फसल के लिए जो करना होता है वह कर चुके होते हैं लोग, अब बस पकने की प्रतीक्षा होती है। अब इस मुक्त समय में भी आनन्द न मनाया जाय तो कब मनाया जाएगा जी? फिर क्यों न बजे झांझ और क्यों न मचे फगुआ? जभी तो भगवान शिव ने भी अपने विवाह के लिए यही महीना चुना था। अब मनुष्य लोभ में अपना काम ही बदल ले तो क्या कहें…
कुछ लोग हैं जो बारहों महीने विमर्श ठेलते रहते हैं। हम कहते हैं रुको मरदे! बहुत बोरिंग है यह सब, फागुन को तो बख्स दो। ग्यारह महीने बनते रहो स्त्रीवादी, पुरुषवादी, राष्ट्रवादी, समाजवादी! फागुन में बस मानुस बने रहो… सरकार मेरी सुनती तो कहते, फागुन में सबकुछ करो बस चुनाव न कराओ… इस महीने में दोस्त को प्रतिद्वंदी बनते देखना बहुत दुख देता है यार!
हां तो महीने भर बौराये रहेंगे हम! कन्हैया का महीना है, सो बिंदास हो कर जीना है। इसमें कुछ बुरा लग जाय तो बुरा मानना नहीं है। समझे न!