
ऋग्वेद के नदी सूक्त में उल्लेख है कि इन्द्र ही है जिसने सबसे पहले नदियों के मार्गों का निर्माण किया और वर्षा को अवरुद्ध करने वाले वृत्र नामक राक्षस का संहार करके नदियों में जल की धारा को प्रवाहित किया। वृत्र ने पर्वतों के मध्य जल के अनेक स्रोतों को अवरुद्ध कर रखा था, याकि बांध बना कर पानी रोक लिया था। इन्द्र ने उसका वध कर बांधों से पानी को बहा दिया। भारत के वे प्राचीन बांध जिनके साक्ष्य हमें न केवल साहित्य में अपितु भूमि पर भी उपलब्ध मिलते हैं इनमें मौर्यकालीन सुदर्शन बांध, करिकाल चोल निर्मित कल्लनई बांध तथा परमार वंशीय राजा भोज निर्मित भोजपाल ताल के लिए बनाया गया बांध प्रमुख है। भारत के प्राचीनतम बांध की बात करें तो इसमें सुदर्शन बांध का नाम प्राथमिकता से आता है।
इंटरनेशनल कमीशन ऑनइरिगेशन एण्ड डैंमस् (आईसीआईडी) द्वारा ‘हिस्टोरिकलडैम्स’ शीर्षक से पुस्तक प्रकाशित की गई थी जिसके अनुसार सुदर्शन बांध का निर्माण लगभग 322 वर्ष ईसा पूर्व हुआ है। यदि हम उस प्राचीनतम बांध की बात करें जिसका निर्माण राजा कारिकालचोल द्वारा लगभग दूसरी सदी में करवाया गया परंतु यह आज भी कल्लनई बांध के नाम से जाना जाता है और अनवरत अब भी अपनी सेवाएं प्रदान कर रहा है। हम प्राचीनतम अर्थात् सुदर्शन बांध के तकनीकी पहलुओं पर बात करते हैं। इस आलेख के लिए विभिन्न साहित्यिक सामग्रियों के अतिरिक्त मैंने विशेष रूप से उमेश चौबे, हिमांशु चौबे तथा शिवम चतुर्वेदी का शोधपत्र ”सम टेक्निकल एस्पेक्सट्स ऑफ दिएनशिएन्ट सुदर्शन डैम इन इंडिया” का उपयोग किया है।
सौराष्ट्र में गिरनार से निकलती सुवर्णरेखा (सुवर्णसुकता) नदी पर निर्मित सुदर्शन झील का निर्माण सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के शासन समय में उनके द्वारा नियुक्त सौराष्ट्र के प्रांतीय शासक पुष्यगुप्त ने वर्ष 322 ईसा पूर्व कराया था। कालांतर में अशोक के राज्यपाल तुशाष्प ने इस बांध तथा उससे जनित जलाशय में से सिंचन हेतु नहरें निकालीं। अनेक तर्कशास्त्री (?)इस तथ्य को झुठलाने के लिए भांति-भांति के जतन करते हैं तो उन्हें संज्ञान में लेना चाहिए कि इस बांध के न केवल पुरातात्विक साक्ष्य, बल्कि साहित्यिक साक्ष्य भी उपलब्ध हैं। मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त के शासन समय में बांधों को लेकर विस्तृत जानकारी उपलब्ध थी, जिसका दस्तावेजीकरण उनके महा अमात्य आचार्य चाणक्य द्वारा अपनी कृति अर्थशास्त्र में किया गया है। चाणक्य ने अर्थशास्त्र में बांध के निर्माण, सिंचन व्यवस्था और कृषि पर बहुत विस्तार से लिखा है। उन्होंने अर्थशास्त्र में जल संग्रहण के लिए सेतु, नहर के लिए परिवह, जलाशय के लिए तातक, नदी जल के लिए नद्ययतना, नदी पर बनने वाले बांध के लिए नदिनीबंधयतन, इस बांध से निकली नहर के लिए निबंधयतन शब्दों का प्रयोग किया है। कौटिल्य ने लिखा है- *आधारपरिवाह केद्रोपभोग्या* जिसका अर्थ है ‘जलागार की नहरों से सिंचित खेतों का उपयोग।’ ये उदाहरण संक्षेप में इसलिए जिससे कि कोई भ्रम न रहे कि अभियंता केवल आज के दौर में होते हैं, *यह भ्रम टूटना चाहिए कि पुरातन को बांध निर्माण या कि सिंचन के तरीकों की जानकारी नहीं थी।*
उस दौर में अनेक छोटे-बड़े बांध निर्मित कराए गए होंगे चूंकि अर्थशास्त्र में बाँधों को तोडऩे या नुकसान पहुँचाने पर मौर्यकालीन मुद्रा पण में लगने वाले जुर्माने की मात्रा का उल्लेख है। यू. सी. चौबे तथा साथियों द्वारा एक शोधपत्र *‘जर्नल ऑफ इंडियन वाटर रिसोर्सेजसोसाईटी’* में प्रकाशित हुआ था, जिसका शीर्षक था ‘फिस्कलएस्पेक्ट ऑफ इरिगेशन एडमिनिस्ट्रेशन इन मौर्यन पीरियड: अकाम्प्रीहेन्सिव स्टडी विथद्प्रेजेंड’। इस प्रपत्र के अनुसार कराधान और कठोर दंड के परिणामस्वरूप मौर्य काल में सिंचाई प्रणाली अपेक्षाकृत कुशल हो गई। शोधकर्ताओं ने मौर्य काल और तत्पश्चात वर्ष 2016 की तुलना में गेहूँ की समान क्रय शक्ति के संदर्भ में मौर्यकालीन मुद्रा पण (3.5 ग्राम वजन का एक चाँदी का सिक्का) की तुलना 237.5 रुपए (आधुनिक भारतीय मुद्रा; फरवरी 2021 में 1 अमेरिकी डॉलर = 72.92 रुपए) से की। इस आधार पर ज्ञात होता है कि यदि कोई व्यक्ति ऐसे बांध को तोड़ देता था जिसके जलाशय में पानी की उपलब्धता है तो उसे उस स्थान पर जलमग्न कर देने की कठोर सजा देने का प्रावधान था। यदि किसी ने ऐसे बांध को नुकसान पहुंचाने का यत्न किया जिसके जलाशय में उस समय पानी की उपलब्धता नहीं है, तो उसे 750 पण अथवा 1,78,117 रुपयों का अर्थदंड देना होता था। किसी ऐसे बांध को जो अब उपयोग में नहीं रहा उसे नुकसान पहुंचाने की स्थिति में 350 पण अथवा 83,121 रुपए अर्थदण्ड की व्यवस्था थी। बांध के तटबंधों को नुकसान पहुंचाने की स्थिति में जितनी हानि की गई है उसका आँकलन कर दुगुनी राशि अर्थदण्ड के रूप में राज्य द्वारा ली जाती थी।
सुदर्शन बांध का अगला स्पष्ट उल्लेख हमें शक महाक्षत्रप रुद्रदामन के शासन काल में मिलता है। रुद्रदामन के विषय में विस्तृत जानकारी उनके शक संवत् 72 अर्थात वर्ष 150 ई. के जूनागढ़ अभिलेख से प्राप्त होती है। जूनागढ़ अभिलेख कहता है कि महाक्षत्रप रुद्रदामन के शासन काल में एक भयंकर तूफान आया। यह कोई साधारण तूफान नहीं था। वर्णन है कि जल से भरे मेघों ने सम्पूर्ण धरती को आच्छादित कर दिया। इतनी घनघोर वर्षा हुई कि सारी धरती ही मानो महासागर में परिवर्तित हो गई हो। इस समय उरजयत अथवा गिरनार पर्वत से निकलने वाली सुवर्नासिकता, प्लासीनी तथा अन्य स्थानीय नदियों में विकराल बाढ़ आ गयी। प्रलंयकारी तूफान जिसने पर्वतों को, वृक्षों को, कंगूरों को, किनारों को, दो मंजिलें भवनों को, प्रवेश द्वारों को, ऊंचाई पर बने प्रासादों को और सभी आश्रयों को ध्वस्त कर दिया, इससे लग रहा था मानो सृष्टि का अंत होने जा रहा है। शिलाएं, वृक्ष, झाड़ी और लताएं चारों ओर अस्त—व्यस्त हो गई थीं। इस तूफान ने 420 क्यूबिट लम्बे और चौड़े तथा 75 क्यूबिट गहरे हिस्से को उखाड़ दिया, जिससे जलाशय का सम्पूर्ण जल बाहर आ गया और जब तूफान थमा तब झील बालूका राशि वाली मरूभूमि के सदृश्य दिखलाई पडऩे लगी।
कीलहॉर्न लिखते हैं कि लोगों ने इस प्रलयंकारी घटना के बाद बहुत विलाप किया। विनाश के आयाम इतने भयंकर थे कि रुद्रदामन के सलाहकारों और प्रधान अधिकारियों ने यह सोच लिया था कि अब सुदर्शन झील का पुनर्निर्माण संभव नहीं है। रुद्रदामन इस विकट घड़ी में उठ खड़े हुए और उन्होंने जलाशय के पुनर्निर्माण का आदेश दिया। पुनर्निर्माण कार्य अनर्ता और सुराष्ट्र के प्रान्तीय प्रशासक अमात्य सुविशाखा की देखरेख में शुरू हुआ। सुविशाखा का आज भी एक योग्य अधिकारी के रूप में दृष्टांत दिया जाता है। रुद्रदामन के आदेश पर निर्मित की जा रही झील की लम्बाई व चौड़ाई को, सभी ओर से, अत्यंत अल्प समय में, पहले से तीन गुणा अधिक मजबूत बनाया गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि राज्य द्वारा इस बांध के पुनर्निर्माण के लिए अपनी प्रजा पर किसी तरह का कोई कर नहीं थोपा गया था। अभिलेख स्पष्ट करता है कि महाक्षत्रप रुद्रदामन ने यह कार्य जनहित में एवं धर्म के पालनार्थ करवाया था। कौटिल्य का हमने उदाहरण लिया था जिन्होंने तटबंध के लिए सेतु शब्द का प्रयोग किया है। सेतु और सेतुबंधन शब्द कई संस्कृत ग्रंथों में भी मिलते हैं। रुद्रदमन के शिलालेख में इन शब्दों के अतिरिक्त जो दूसरे शब्द प्रयोग किए गए हैं वे हैं- नहर के लिए ‘प्रणाली’, कचरा बंधारा के लिए ‘परिवह’, झील से गाद की सफाई के लिए ‘मिधविधान’। इन सभी शब्दों की परिभाषायें हमें तत्कालीन बांध निर्माण के तरीकों से परिचित कराती हैं।
सुदर्शन झील के निर्माण के लिए आरम्भ में तटबंधों को मिट्टी से बनाया गया जिनके दोनों तरफ पत्थर लगाए गए थे। बाँध के ऊपरी हिस्से में कटाव को नियंत्रित करने के लिए पत्थर की पिचिंग के द्वारा उसे ढका गया था। नदी के दोनों ओर स्थित गिरनार पहाडिय़ों ने बाँध के लिए मज़बूत आधार प्रदान किए। सुदर्शन बाँध का निर्माण बलुआ पत्थर के उभार पर किया गया था इससे एक मज़बूत नींव प्राप्त हुई थी।
रुद्रदामन के शिलालेखों से यह ज्ञात होता है कि बाँध के मुख्य भाग में गाद को साफ़ करने के उपरांत बाढ़ को नियंत्रित करने के उद्देश्य से उनमें नालियाँ प्रदान की गईं थीं। सुदर्शन जलाशय और जलग्रहण क्षेत्र के 10 मीटर की कंटूर रेखाओं को प्रदर्शित करता मानचित्र आप देख सकते हैं। बांध की नदी तल से ऊँचाई 139.9 मीटर है। बांध का कुल जलग्रहण क्षेत्र 15.53 वर्ग कि. मी और जलग्रहण परिधि 17.97 कि.मी है। क्षेत्र में अनुकूल स्थलाकृति और वर्षा को ध्यान में रखते हुए, अधिक ऊँचाई का एक बाँध बनाया जा सकता था।
वर्ष 455 ई. में अत्यधिक वर्षा होने के कारण एक बार फिर सुदर्शन झील के तटबंध नष्ट हो गए। भारत में यह समय था गुप्त शासकों का। इस समय सम्राट स्कन्दगुप्त सिंहासन पर थे जिन्होंने सौराष्ट्र में गिरिनार के पास फटी सुदर्शन झील का पुर्ननिर्माण करवाया था। सम्राट स्कंदगुप्त ने सौराष्ट्र के प्रान्तकालपर्णदत्त के पुत्र चक्रपालिन को इस झील के पुनर्निर्माण का आदेश दिया। चक्रपालिन की देखरेख में सुदर्शन झील के तटबंधों को सुधारा गया। कार्य के पूर्ण होने के बाद सम्राट ने पिता की स्मृति में झील के किनारे भव्य विष्णुमंदिर का निर्माण करवाया। सुदर्शन झील सम्भवत: आठवीं या नौंवी ई. में प्रयोग के लिए उपयुक्त नहीं रही थी। इसके बाद से यह पूर्णरूपेण इतिहास हो गई थी। उमेश चौबे और साथियों के शोधपत्र में इस बात का उल्लेख है कि सुदर्शन बांध की सक्रियता कम से कम 750 वर्ष तक रही है जबकि वर्तमान समय में निर्माण किए गये इसी बांध के आसपास के क्षेत्रों के कुछ बांधों से तुलना की जाये तो वे पचास वर्ष के जीवन को भी पूर्ण करने योग्य नहीं हैं और किसी न् किसी समस्या से, विशेष रूप से गाद से भर कर समाप्त होते जा रहे हैं। क्या ये विवरण हमें प्राचीन भारत पर, उसके ज्ञान पर, अभियांत्रिकी पर, गौरव करने के कारण नहीं देता? भारतीय इतिहास के गौरव को इस दृष्टि से भी देखना परखना चाहिए।
क्या इसे इतिहास में नए पीढ़ी को पढ़ना चाहिए या नहीं,
आप को क्या लगता हे?
✍🏻आगे और बाकी है
*चतुष्की : चौकड़ी खुदी तो जलाशय*
*#जलस्थापत्य*
सरोवर बड़ा और सार्वजनिक महत्व का जलस्रोत है। इसके निर्माण के पुण्यों का वर्ण पुराणों से लेकर शिल्प शास्त्रों तक मिल जाते हैं। अनेक प्रकार और रूप हैं सरोवरों के, अपराजित पृच्छा, राजवल्लभ, सुखानंद वास्तु, वास्तु मंडन आदि में विस्तृत विमर्श हुआ है, लेकिन बनाया कैसे जाए, एेसा व्यावहारिक विवरण नहीं मिलता ।
सराेवर की मरम्मत व निर्माण के पुण्य व संकल्प का पहला विवरण जूनागढ़ में सुदर्शन झील की प्रशस्ति में है और अन्य विस्तृत व तकनीकी विवरण “राज प्रशस्ति” जैसे सबसे बड़े अभिलेख में है और उसी के लेखक रणछोड़ भट्ट कृत “जयप्रशस्ति” में भी लिखा गया है।
सरोवर बनवाने के लिए निर्धारित नदी, नद अथवा नाला प्रवाह क्षेत्र में प्राय: एेसी जगह को चुना जाता जिसके दोनों बाजू पहाड़ हो। दोनों के बीच मजबूत बांध तैयार किया जाता। यह बांध दो तरह का होता :
बांध के तीन हिस्से होते :
जलभरणं चावरोधकं तदनन्तरे प्रवाहमिति।
बात बांध बनाने के काम में मिट्टी निकालने की हो तो चौकड़ियां खोदी जाती है। यह विधि सैकड़ों साल से आज तक व्यवहार में है। इसे संस्कृत में “चतुष्की” कहा गया है। राजप्रशस्ति में चतुष्की का बहुविध प्रयोजन आया है :
आशा१० चतुष्का४गत मानवै:
*नवैर्नाना चतुष्क्य:[] खनिता जलाशये।दृष्ट्या चतुष्कीयुत एष सोद्भुतो नृणांपुमयोच्च चतुष्कदो भवेत्।।*
प्रशस्तिकार ने चौकड़ी खोदने को कला कहा है और खोदने में दक्षजनों को “चतुष्कीकरणे प्रवीण” बताया है। उस काल में ये चौकड़ियां 8 × 5 × 6 आकार की होती अर्थात् 8 हाथ लंबी, 5 हाथ चौड़ी व 6 हाथ गहरी। महिमा रूप में कहा गया है –
*ईदृक्कालकृतस्यास्य दृष्टया सिध्यष्टकं नृणाम्।पंचैन्द्रियाणां पापान्त: षडूर्मिहरणं भवेत्।।*
काम की प्रगति, मजदूरों को भुगतान आदि में भी इससे सहायता मिल जाती। यह काम उस जयसमंद झील के इलाके मैं आज भी वैसे ही हो रहा है जैसा 17वीं सदी में होता था।
इसे पढ़कर आप के इलाके में बांध कैसे बनते थे, जरूर बताइयेगा….
जय जय।
रानी बंधाई बावड़ी
( कथा जलस्रोत की)
पाटन में पड़ा अकाल! पशुओं को लेकर चरवाहे नर्मदा को नापने निकले और व्यापारियों ने ऊंटों को साज लिया। बच्चे क्या करते! बाप अपने जायों को बेचने निकले और माएं क्या करतीं। हाथ पग चूल्हे में देने को तैयार लेकिन हांडी में कोई दाना तो पकने को तैयार हो! ना आकाश को रहम आए और न धरती दया उगले! पाटण का तो डांटण ही हो गया!
दिन दुश्मन जैसा लगता। धूप सुबह से ही सूखा डालने जैसे तेवर लेकर पसरती जाती थी। जब तब भतूलिए उठते और सबको ही खाने का भभड़का उठता। कहीं से खबर आती थी कि कोई सतुआ बांट गया है या कोई मुट्ठी भर चने फैंक गया है। कभी पता लगता था कि भूंगड़ों से भरे मोटक लुट गए।
मुंहअंधेरे नारियों के मुंह फूट जाते। जब जिसका घर वाला चल पड़ता, रुदन मच जाता। कोई बिना बताए पाटन छोड़ जाता और कोई सोया का सोया रह जाता! कोई किसी को उठाने आगे नहीं आता। घुटनों में ताकत ही नहीं बची। घर घर मसान मचा था!
अकाल अभी अकेला नहीं आता। छः छः पीड़ा साथ लाता है! कोई मौत से कम नहीं। तब बैठ बेगार और ली जाती। बेगार न करने वालों के लिए कोप भवन खोल दिए जाते। रोजाना कान उमठाए जाते!
नारी मन को नारी ही जानती। महारानी उदयमती तक रोजाना बात जाती थी। लेकिन, उपाय क्या था! ईश्वर का आसरा परंतु कैसे और कब तक! रानी ने अपने महल की राणकुई को गहरा करवाया तो पानी अच्छा मिल गया। उसने सोचा कि यह जलधारा महलों की अपेक्षा प्रजा के लिए ज्यादा जरूरी है किंतु पानी भरने कोई नहीं आता था! पानी पिलाने को एक पौ बिठा दी! एक खेलकी चौपायों के लिए भरी जाती!
रानी पौ फटने से पहले खुद छकड़े पर ललतई कपड़ों से ढके पानी भरे मटके लेकर निकलती थी और हर घर जाकर महिला को आवाज देती : पानी खूट गया हो तो ले लो! महिलाएं द्वार खोलकर बाहर आती और जयकारा कर मटका भर ले जाती! पाटन में पानी अमृत जैसा हो गया! वेदना में भी महिलाएं रानी के पानी का गान करतीं :
*राणी पावै पाणी, गंगाजी पाटन अवतरी!*
एक रात कब बादल आए, पता नहीं लेकिन खूब पानी बरसा लेकिन रानी बैचेन थी। पानी रानी के मन में आशा के अंकुर जगा गया। अब मेरे लिए कौन गायेगा! अब तो सबको सहज पानी मिल जायेगा! लेकिन, उसने प्रधानजी से कहा कि मेवाड़ जाओ! सरवाले हरवो को लाओ और बावड़ी के बराबर जलधारा का पता लगाओ। पाताल फूटे और गले की हांसल जैसा झांझराए तो जानो कि नाम उदयमती!
ऐसा ही हुआ! ऊंठी दौड़े। मेवाड़ से हरवा और मालवा से ओड आए। सोमनाथ से सूत्रधार, सगोड़ा से सलावट, चित्तौड़ के चेजारा, भरोड़ के भारिए, बंका के बांस और राणका के रस्सिए। पलक पड़े तो टंक तड़े! राई राई, आंगल आंगल, गज गज और पुरुषा पुरषा पहाड़ को बौना करता बाव का काम चला।
रानी ने संकल्प किया कि जब तक बावड़ी के लिए पानी नहीं आता, वह चरणामृत जितना ही जल लेंगी! प्रजा चकित थी। श्रमिक ने रात नहीं देखी। पानी की शिराएं जल्दी ही मिल गईं! *पग पग पानी! समंदर दानी!*
रानी ने नया संकल्प किया : जब तक बावड़ी पक्की ना बंधेगी, वह महल को छोड़कर कुटी में ही रहेगी! तब कुटी साधन किसी कल्प से कम नहीं था। बारह बरस तक अगला अकाल पड़े तब तक रानी कुटी में ही रहीं। अणोदरी, अनशन, वास, अनबोल्या, ऊबथाक, एकपगां, ऊबहूक जैसा विचार होता, रानी व्रत ठान लेती! *जीवड़ी जोड़े बावड़ी! रानी काया कलपावे और मजूर हाथ पग चालावै!*
हजार हाथ काम करते रहे! बैठकी भूमि होने से काम लगातार चला! रहटों, कावडों और जल्गियों से पानी तोड़ा जाता रहा। पत्थर रज रज रजत होते गए। रानी सुबह सुबह देवदर्शन करती थी और शिल्पकार हर दर्शनीय देवता को बावड़ी पर साकार करते जाते! राजमहल की बातों को भी पत्थर में चित्रपटीदार किया गया। वाव क्या बनी, मंदिर ही बन गया! उल्टा मंदिर। नर की नारी और नारी की वारी ( बाव) !
रानी की हाथखर्ची से लेकर बाव बनाव व्यय का दायित्व था वर्धमान और उसके भाई वीरचंद के पास। दोनों ही सीधे सच्चे साह। मन से पूरे महाजन। अहिंसा का धर्म पालने वाले और रानी के आज्ञानुवर्ती लेकिन राज काज और कोश के ईमानदार प्रबंधक। पाई पाई का हिसाब रखते।
उस दौर में मुद्रा धातु की होती और अकाल में धातु की आवक घट गई तो वर्धमान और वीर ने सिक्कों का आकार कम करवाकर भी उनका महत्व कम न होने दिया। हर कोई मुद्रा को उदय दम्म कहने लगा। तब सूत्रधारों, कारीगरों, श्रमिकों को नकद मिलता था। काम के दाम के रूप में पेटक ( खुराक के बराबर आटा, दाल और मसाला), पली ( स्नेहन के लिए तेल और घी) और भार ( ईंधन की लकड़ी)। उनके घर वालों के लिए मुटक भेजे जाते थे। मुटक यानी जव से भरे बड़े टोकरे।
यह सब प्रबंध कैसे होगा? कहां से होगा? हारी, उधारी अथवा नामे कि जमा? सब कुछ दोनों भाई ही जानते। इस ओर से रानी थी भी निश्चिंत। जानती थी कि साह सहायक नहीं, राज्य की दो आंखें हैं। देखती हैं और सब करवा देती हैं। चौपायों से मिनख तक और उनके लिए यवस – भूसे से लेकर भोजन तक पर भाइयों की नज़र। नकदी से लेकर अग्रिम तक का हिसाब व्यवस्थित। एक – एक हुंडी तक का चोपड़ी जमा खर्च। कोई नींद में भी पूछ ले तो साह सारा तलपट सौंप दे। *गुणी ग्राहक और साफ हृदय साह का कहना ही क्या!* अकाल में बेइमानी बढ़ती है लेकिन रानी के राज में ईमान बना रहा। कहीं से कोई शिकायत नहीं।
बाव की प्रतिष्ठा और अपने प्रजा वत्सल व्रत के उद्यापन के बाद रानी ने साह परिवार का समाज रखा। दूर दूर तक न्योते भेजकर पाटन के पाहुने किए। साहों के कुनबे के कुनबे आए। कई दिनों तक आतिथ्य के बाद सबको विनती करके तीर्थाटन पर भेजा। सिद्धाचल, शत्रुंजय, पावागढ़, तारंगाजी और अर्बुदाचल तक सारा प्रबंध। पैदल न चल पाए तो नारवाहन, पालकी और सुखपाल उपलब्ध। जलपान और पयहार और सुरुचिपूर्ण भोज का जगह जगह प्रबंध।
और, जब सकुशल यात्रा हो गई, रानी ने दोनों भाइयों का बहुमान किया। उनको संघवी जैसा सबसे बड़ा राजविरुद दिया।
*साह उदार तो रानी चौगुनी उदार।* यात्रा संघ की स्त्रियां निहाल थीं। उनके कंठ फूट गए और सुर बहे : *सुरसरी जेवी मिली ऐ उदिया माय…!* पाटण के पथ में आज भी उदयमती की महिमा गूंजती है लेकिन वैसी नारियां नहीं, स्वयं भारती विरुद लिखती है। बाव को जो भी देखता है, कविहृदय हो जाता है…। (भारतीय जलस्रोत)
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संदर्भ वाले शब्द :
ओड : वह जाति समुदाय जो गधे रखते हैं और उनसे भार ढोने का काम लेते हैं। मध्य भारत में जितने भी बांध आदि बने, उनमें उनका सहयोग रहा।
सलावटी : पत्थरों का काम करने वाले कारीगर
हरवा : भूमिगत पानी को बताने वाले, दकार्गल विद्याविद
सूत्रधार : मुख्य सिविल अभियंता
भारिया : भार उठाने वाले।
✍🏻आप यदि ऐसे धरोहर को जानते हैं
तो हमें ज्ञात कराये
फिर मिलते है