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शुकदेव जी के जन्म की कथा

इनकी उत्पत्ति के सम्बन्ध में अनेक कथाएँ मिलती हैं। कहीं इन्हें व्यास की पत्नी वटिका के तप का परिणाम और कहीं व्यास जी की तपस्या के परिणामस्वरूप भगवान शंकर का अद्भुत वरदान बताया गया है। विरजा क्षेत्र के पितरों के पुत्री पीवरी से शुकदेव का विवाह हुआ था।

 

एक कथा ऐसी भी है कि जब जब इस धराधाम पर भगवान श्रीकृष्ण और  श्रीराधिका जी का अवतरण हुआ, तब श्रीराधिकाजी का क्रीडाशुक भी इस धराधाम पर आया। उसी समय माता पार्वती ने भगवान शिव से ऐसे गूढ़ ज्ञान देने का अनुरोध किया जो संसार में किसी भी जीव को प्राप्त न हो. वह अमरत्व का रहस्य प्रभु से सुनना चाहती थीं।

अमरत्व का रहस्य किसी कुपात्र के हाथ न लग जाए इस चिंता में पड़कर महादेव पार्वती जी को लेकर एक निर्जन प्रदेश में गए।

 

उन्होंने एक गुफा चुनी और उस गुफा का मुख अच्छी तरह से बंद कर दिया. फिर महादेव ने देवी को कथा सुनानी शुरू की. पार्वती जी थोड़ी देर तक तो आनंद लेकर कथा सुनती रहीं।

 

जैसे किसी कथा-कहानी के बीच में हुंकारी भरी जाती है उसी तरह देवी काफी समय तक हुंकारी भरती रहीं लेकिन जल्द ही उन्हें नींद आने लगी।

 

उस गुफा में तोते यानी शुक का एक घोंसला भी था. घोसले में अंडे से एक तोते के बच्चे का जन्म हुआ. वह तोता भी शिव जी की कथा सुन रहा था।

 

महादेव की कथा सुनने से उसमें दिव्य शक्तियां आ गईं. जब तोते ने देखा कि माता सो रही हैं. कहीं महादेव कथा सुनाना न बंद कर दें इसलिए वह पार्वती की जगह हुंकारी भरने लगा।

 

महादेव कथा सुनाते रहे. लेकिन शीघ्र ही महादेव को पता चल गया कि पार्वती के स्थान पर कोई औऱ हुंकारी भर रहा है. वह क्रोधित होकर शुक को मारने के लिए उठे.

शुक वहां से निकलकर भागा. वह व्यास जी के आश्रम में पहुंचा. व्यास जी की पत्नी ने उसी समय जम्हाई ली और शुक सूक्ष्म रूप धारण कर उनके मुख में प्रवेश कर गया।

 

महादेव ने जब उसे व्यास की शरण में देखा तो मारने का विचार त्याग दिया. शुक व्यास की पत्नी के गर्भस्थ शिशु हो गए. गर्भ में ही इन्हें वेद, उपनिषद, दर्शन और पुराण आदि का सम्यक ज्ञान हो प्राप्त था।

 

शुक ने सांसारिकता देख ली थी इस लिए वह माया के पृथ्वी लोक की प्रभाव में आना नहीं चाहते थे इसलिए ऋषि पत्नी के गर्भ से बारह वर्ष तक नहीं निकले. व्यास जी ने शिशु से बाहर आने को कहा लेकिन वह यह कहकर मना करता रहा कि संसार तो मोह-माया है मुझे उसमें नहीं पड़ना. ऋषि पत्नी गर्भ की पीड़ा से मरणासन्न हो गईं.

भगवान श्री कृष्ण को इस बात का ज्ञान हुआ. वह स्वयं वहां आए और उन्होंने शुक को आश्वासन दिया कि बाहर निकलने पर तुम्हारे ऊपर माया का प्रभाव नहीं पड़ेगा.

श्री कृष्ण से मिले वरदान के बाद ही शुक ने गर्भ से निकल कर जन्म लिया. जन्म लेते ही शुक ने श्री कृष्ण और अपने पिता-माता को प्रणाम किया और तपस्या के लिये जंगल चले गए।

 

व्यास जी उनके पीछे-पीछे ‘पुत्र !, पुत्र कह कर पुकारते रहे, किन्तु शुक ने उस पर कोई ध्यान न दिया. व्यास जी चाहते थे कि शुक श्रीमद्भागवत का ज्ञान प्राप्त करें. किन्तु शुक तो कभी पिता की ओर आते ही न थे. व्यास जी ने एक युक्ति की. उन्होंने श्री कृष्ण लीला का एक श्लोक बनाया और उसका आधा भाग शिष्यों को रटा कर उधर भेज दिया जिधर शुक ध्यान लगाते थे.

एक दिन शुकदेव जी ने भी वह श्लोक सुना. वह श्री कृष्ण लीला के आकर्षण में खींचे सीधे अपने पिता के आश्रम तक चले आए.

पिता व्यास जी से ने उन्हें श्रीमद्भागवत के अठारह हज़ार श्लोकों का विधि वत ज्ञान दिया. शुकदेव ने इसी भागवत का ज्ञान राजा परीक्षित को दिया, जिस के दिव्य प्रभाव से परीक्षित ने मृत्यु के भय को जीत लिया।

 

शुकदेव मुनि का परिवार एवं जीवनी

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मुनिश्रेष्‍ठ शुकदेव जी महर्षि वेदव्‍यास जी के पुत्र थे। आपने प्रारंभिक अध्‍ययन अपने पिताश्री वेदव्‍यासजी से ही उनके आश्रम में किया। कालांतर में वेदाध्‍ययन के लए देवगुरु बृहस्‍पति जी के पास उनको भेजा गया, जहां उन्‍होंने वेदशास्‍त्र, इतिहास आदि का अध्‍ययन पूर्ण किया।

विद्याध्‍ययन के पश्‍चात आप पिताश्री के आश्रम में आकर रहने लगे। सांसारिक बंधन एवं जीवों के जन्‍म-मरण से आपका मन व्‍यथित रहने लगा। आप सांसारिक बातों से उदासीन रहने लगे। अपनी अप्रतिम प्रतिभा के कारण प्रारंभ से ही आप देवताओं एवं ऋषियों एवं मानव मात्र के श्रद्धापत्र हो गये। अपका गृहस्‍थाश्रम के प्रति विमोह देखकर व्‍यासजी चिंतित होने लगे, तथा विवाह बंधन में आबद्ध करने हेतु व्‍यास जी इन्‍हें समझाने एवं प्रेरित करने लगे। इस प्रसंग में पिता पुत्र के मध्‍य विचार विमर्श भी होता। व्‍यास जी जहां गृहस्‍थाश्रम से श्रेष्‍ठ कोई दूसरा धर्म नहीं मानते वहीं शुकदेव जी गृहस्‍थाश्रम के कष्‍ट गिनाते। व्‍यास जी शुकदेव को समझाते ब्रह्मचारी, वानप्रस्‍थी, संन्‍यासी तथा गृहस्‍थी सभी गृहस्‍थाश्रम से ही पैदा होते हैं। वेद और स्‍मृतियों के विधानानुसार भी गृहस्‍थाश्रम ही श्रेष्‍ठ है तथा तीनों अन्‍य आश्रम वालों का पोषणकर्ता भी गृहस्‍थाश्रम है, यहां तक कि देवता भी अपना पोषण गृहस्‍थाश्रम से ही पाते हैं। व्‍यास जी उन्‍हें समझाते कि मनुष्‍य के चार ऋण होते हैं। पितृऋण, देवऋण, ऋषिऋण और मनुष्‍य ऋण। इन ऋणों की मुक्ति गृहस्‍थाश्रम से ही संभव है। जहां वह माता-पिता की सेवा व भरण-पोषण कर पितृ ऋण से, यज्ञादि सम्‍पन्‍न कराकर देव ऋण से, वेदों का अध्‍ययन और तपस्‍या कर ऋषि ऋण से तथा दान, दया, सहायता आदि द्वारा मनुष्‍य ऋण से उऋण हो सकता है।

 

विभिन्‍न उदाहरण देकर व्‍यास जी जब शुकदेव जी को गृहस्‍थाश्रम के लिए तैयार नहीं कर सके तो उन्‍होंने शुकदेव जी को अपने यजमान मिथिलापुरी नरेश राजा जनक के पास धर्म और मोक्ष का यथार्थ ज्ञान प्राप्‍त करने हेतु भेजा। राजा जनक गृहस्‍थ होते हुए भी प्रवृत्ति और निवृत्ति मार्ग के पूर्ण और मुमुक्षु थे। सही नहीं वे शास्‍त्र मर्यादानुसार- रहकर गृहस्‍थी ही नहीं अपितु सुचारू रूप से राज्‍य संचालन भी करते थे। वे अपने को राजा नहीं बल्कि प्रजा का प्रतिनिधि मानते थे। उनमें न राजमद था न ही राज के प्रति लिप्‍सा। वे देह में रहकर भी विदेह कहलाते थे।

 

राजा जनक ने शुकदेव जी की अनेकानेक विधियों से परीक्षा ली और अन्‍त में राजा ने उनकी गृहस्‍थाश्रम की शंकओं का समाधान किया तथा यह भी बताया कि सभी आश्रमों में गृहस्‍थाश्रम ही सबसे बड़ा आश्रम है। राजा के उपदेशों से शुकदेव मुनि की शंकओं का सामधान हो गया और वे अपने पिता के आश्रम में आ गये।

शुकदेव जी का विवाह वहिंषद जी, जो स्‍वर्ग में वभ्राज नाम के सुकर लोक में रहने वाले पितरों के मुखिया थे, की पुत्री पीवरी से हुआ। विवाह के समय शुकदेव जी 25 वर्ष के थे। गृहस्‍थाश्रम में रहकर भी शुकदेव जी योग मार्ग का अनुसरण करने लगे। उन्‍होंने राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत की कथा सुनाई जिसके श्रवण फल से सर्पदंश-मृत्‍यूपरांत भी परीक्षित को मोक्ष की प्राप्ति हुई।

 

पीवरी से शुकदेव जी के 12 महान तपस्‍वी पुत्र हुए जिनके नाम भ‍ूरिश्रवा, प्रभु, शम्‍भु, कृष्‍ण और गौर, श्‍वेत कृष्‍ण, अरुण और श्‍याम, नील, धूम वादरि एवं उपमन्‍यु थे। जिनके गुरुकृत नाम क्रमश: भारद्वाज, पराशर(द्वितीय), कश्‍यप, कौशिक, गर्ग, गौतम, मुदगल, शाण्डिल्‍य, कौत्‍स, भार्गव, वत्‍स एवं धौम्‍य हुए और कीर्तिमती नामक एक योगिनी पतिधर्म पालन करने वाली कन्‍या। कीर्तिमती का विवाह भारद्वाज वंशज काम्पिल्‍य नगर के राजा अणुह से हुआ। महान योगी ब्रह्मदत्त जी को कीर्तिमती ने जन्‍म दिया। हरिवंश पुरण में शुकदेव जी का वंश विस्‍तार बताया गया है। शुकदेव जी के संतान होने के सम्‍बंध में भ्रांति है।

 

शुकदेव जी के विवाह एवं उनकी संतान के सम्‍बंध में देवी भागवत का वृत्तांत

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“पितरों की एक सौभाग्‍यशाली कन्‍या थी। इस सुकन्‍या का नाम पीवरी था। योग पथ के पथिक होते हुए भी शुकदेव जी ने उसे अपनी पत्‍नी बनाया। उस कन्‍या से उन्‍हें चार पुत्र हुए कृष्‍णख्‍ गौर प्रभ, भूरि और देवश्रुत। कीर्ति नाम की एक कन्‍या हुई। परम तेजस्‍वी शुकदेव जी ने विभ्राज कुमार महामना अणुह के साथ इस कन्‍या का विवाह कर दिया। अणुह के पुत्र ही ब्रह्मदत्त हुए। शुकदेव जी के दोहित्र ब्रह्मदत्त बड़े प्रतापी राजा हुए। साथ ही ब्रह्म ज्ञानी भी थे। नारद जी ने उन्‍हें ब्रह्म ज्ञान का उपदेश दिया था।

 

हरिवंश पुरण में शुकदेव जी की संतान के सम्‍बंध में जो वर्णन किया गया है उसके अनुसार-

 

स तस्‍यां पितृकन्‍यायां पीवयां जनयिष्‍यति।

कन्‍यां पुत्रांश्‍च चतुरो योगाचार्यान महाबलान।।52।।

 

कृष्‍णं गौरं प्रभुं शम्‍भुं कृत्‍वीं कन्‍यां तथैव च।

ब्रह्मदत्तस्‍य जननीं महिर्षी त्‍वणुहस्‍य च।।53।।

 

अर्थ: – वे ही शुकदेव पितरों की कन्‍या पीवरी में कृष्‍ण, गौर, प्रभु और शम्‍भु इन चार महाबली योगाचार्य पुत्रों तथा ब्रह्मदत्त की जननी और अणुह की पत्‍नी कृत्‍वी नामवाली कन्‍य को उत्‍पन्‍न करेंगे।”

पुराणें में यह आख्‍यान भी आता है – वृहस्‍पति जी ने ब्रह्मा जी के पास जा शुकदेव जी का किसी योग्‍य कन्‍या से विवाह करने की प्रार्थना की। उन्‍होंने वर्हिषद की कन्‍या पीवरी को, इनके योग्‍य मान इसके साथ विवाह करने की आज्ञा दी। वर्हिषद “स्‍वर्ण” में वभ्राज नाम के सुंदर लोक में रहने वाले पितरों के मुखिया थे, जिनकी पूजा सभी देवगण, राक्षस, यक्ष, गन्‍धर्व, नाग, सुपर्ण और सर्प भी करते हैं।” वर्हिषद को ऋषि पुलस्‍त्‍य के आशीर्वाद से एक पुत्री प्राप्‍त हुई थी। जिसका नाम पीवरी रखा गया। इस कन्‍या ने ब्रह्माजी की तपस्‍या की थी और ब्रह्माजी से उसने वेदों के ज्ञाता, ज्ञानी, योगी और अपने योग्‍य वर पाने का वरदान पाया था। ब्रह्माजी की आज्ञा से इसी पीवरी नामक कन्‍या के सा‍थ शुकदेवजी ने ब्राह्म विधि से विवाह किया। इस पीवरी को योग-माता और धृतवृता (पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली) शब्‍दों से भी पुकारा जाता है। विवाह के समय शुकदेव जी की आयु 25 वर्ष की थी। शुकदेव जी गृहस्‍थ आश्रम में रहकर तपस्‍या और योग मार्ग का अनुसरण करने लगे।

राजा परीक्षित को अपने श्रीमद्भागवत की कथा सुनाई व उसका उद्धार किया। वेदों के प्रचार के साथ-साथ शुकदेव जी युगद्रष्‍टा भी थे। वे गृहस्‍थ धर्म का पालन करते हुए पत्‍नी, पुत्रों के भी सम्‍यक रूप से पालक थे।

 

कूर्म पुराण के अनुसार शुकदेव जी

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शुकस्‍याsस्‍याभवन् पुत्रा: पञ्चात्‍यन्‍ततपस्विन:।

भूरिश्रवा: प्रभु: शम्‍भु: कृष्‍णो गौरश्‍च पण्‍चम:।

 

कन्‍या कीर्तिमतती चैव योगमाता धृतवृता।।(कूर्म पुराण)

शुकदेव जी के महान तपस्‍वी पांच पुत्र थे। जिनके नाम भरिश्रवा, प्रभु, शम्‍भु, कृष्‍ण और गौर थे और एक कन्‍या जिसका नाम कीर्तिमती था जो योगिनी और पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली थी।

सौर पुराण के अनुसार

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भूरिश्रवा: प्रभु: शम्‍भु: कृष्‍णो गौरश्‍च पण्‍चम:।

कन्‍या कीर्तिमती नाम वंशायैते प्रकीर्तिता:।। (सौर पुराण)

 

भूरिश्रवा, प्रभु, शम्‍भु, कृष्‍ण और गौर नाम के पांच पुत्र थे। तथा कीर्तिमती नामक एक कन्‍या थी। ये सब ही अपने वंश की कीर्ति बढ़ाने वाले थे।

कन्‍या कीर्तिमती भारद्वाज वंश काम्पिल्‍य नगर के नृप अणुह जी को ब्‍याही गई थी। महान योगी और सब जीवों को बोली समझने वाले ब्रह्मदत्त जी का जन्‍म इसी कीर्तिमती के उदर से हुआ था।

 

ब्रह्माण्‍ड पुराण अनुसार शुकदेव जी पुत्र-पुत्री

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श्‍लोक-

काल्‍यां पराशराज्‍जज्ञे कृष्‍णद्वैपायन: प्रभु:।

द्वैपायनादरण्‍यां वै शुको जज्ञे गुणान्वित।।

 

भूरिश्रवा प्रभु: शम्‍भु: कृष्‍णौ गौरश्‍च पण्‍चम:।

कन्‍या कीर्तिमती चैव योगमाता धृतव्रता।।

 

जननी ब्रह्मदत्तस्‍य पत्‍नी सात्‍वणुहस्‍य च।

श्‍वेता कृष्‍णाश्‍च गौराश्‍च श्‍यामा धूम्रास्‍तथारुणा।।

 

नीलो वादरिकश्‍चैव सर्वे चैते पराशरा:।

पाराशराणामष्‍टौ ते पक्षा: प्रोक्‍ता महात्‍मनाम्।।

                  

ब्रह्माण्‍डपुराण पाद 3 अध्‍याय 9 अनुसार

पाराशर मुनि से काली (सत्‍यवती) में कृष्‍ण- द्वैपायन उत्‍पन्‍न हुए। कृष्‍णद्वैपायन से आरणी में सर्वगुण सम्‍पन्‍न शुकदेव उत्‍पन्‍न हुए। शुकदेव से पीवरी से भूरिश्रवा, प्रभु, शम्‍भु, कृष्‍ण, गौर और कीर्तिमती कन्‍या जो अणुह ऋषि को ब्‍याही थी; जिसके ब्रह्मदत्त उत्‍पन्‍न हुआ (जो योग शास्‍त्र का प्रधान आचार्य था) और श्‍वेत, कृष्‍ण, गौरश्‍याम, धूम्र, अरुण, नील बादरि ये पुत्र और उत्‍पन्‍न हुए।

 

लिंग पुराण में अनुसार 12 पुत्र एवं एक कन्‍या होने का प्रमाण

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श्‍लोक-

द्वैपायनोह्यरण्‍यां वै शुकमुत्‍पादयत्‍सुतम्।

उपमन्‍यू च पीवर्यां विद्धी मे शुक सूनव:।।

भूरिश्रवा: प्रभु: शम्‍भु: कृष्‍णो गौरस्‍तु पञ्चम:।

कन्‍या कीर्तिम‍ती चैव योगमाता धृतव्रता।।

श्‍वेत: कृष्‍णश्‍च गौरश्‍च श्‍यामो धूम्रस्‍तथारुण:।

नीलो वादरिकश्‍चैव सर्वे चैते पाराशरा:।।

        

अर्थ लिंग महापुराणे अध्‍याय 65

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व्‍यास द्वैपायन से अरणी में शुक उत्‍पन्‍न हुए। शुक से पीवरी से 1. उपमन्‍यू 2. भूरिश्रवा, 3. प्रभु, 4. शम्भु 5. कृष्‍ण 6. गौर 7. कीर्तिमती कन्‍या और श्‍वेतकृष्‍ण, 8. गौरश्‍याम, 9. धूम्र, 10. अरुण, 11. नील, 12. बादरि ये पुत्र उत्‍पन्‍न हुए। इसी प्रकार अन्‍य पुराणों में भी लिखा है।

 

श्‍लोक-

ये तानुत्पाद्य धर्मात्‍मा ये योगाचार्यान्‍महाब्रतान्।

श्रुत्‍वा स्‍वजनकाद्धर्मान् व्‍यासादमितबुद्धिमान।।

 

महायोगी ततो गन्‍ता पुनर्नावर्तिनीं गतिम्।

यत्तत्‍पदमनुद्विग्‍नमव्‍ययं ब्रह्म शास्‍वतम्।। ।।

        

हरिवंशोपपुराणे पर्व 1 अध्‍याय 18

इस प्रकार महायोगी शुकदेव जी पूर्वोक्‍त 12 पुत्र और एक पुत्री को उत्‍पन्‍न करके अपने पिता वेदव्‍यास से मोक्ष धर्मों को सुनकर उस वैकुण्‍ठ लोक में जाएंगे, जिसमें जाकर कभी नहीं लौटते और जिसमें जाकर नित्‍य सुख के भागी होकर मुक्‍त हो जाते हैं।

 

ऊपर लिखे हुए प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि शुकदेव जी के 12 पुत्र और 1 कन्‍या कीर्तिमती उत्‍पन्‍न हुई। कन्‍या का तो विभ्राज के पुत्र अणुह के स‍ाथ विवाह कर दिया और 12 पुत्रों को विद्या पढ़ाने के लिए 12 ऋषियों के पास भेज दिया। जिन ऋषियों के पास विद्या पढ़ने के लिए शुकदेव जी ने अपने 12 पुत्रों को भेजा था,

 

पारीक्ष संहिता(पृ. 24) के अनुसार शुकदेव जी के पुत्रों के नाम

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शुकस्‍याप्‍यभवान्‍पुत्रा द्वादशैव महातपा:।

पीवर्यां पितृकन्‍यायां द्वादशादित्‍यसन्निभा:।।

 

भ‍ूरिश्रवा प्रभु: शंभु: कृष्‍णो गौरश्‍च पंचम: ब्रह्माण्‍ड।  श्‍वेत: कृष्‍णश्‍च गौरश्‍च श्‍यामो धूम्रस्‍तथैवच।।

 

वादरिश्‍चोपन्‍युश्‍च सर्वे चैते पाराशरा:।

कन्‍या कीर्तिमती चैव योगमाता धृतव्रता।।

 

शुकदेव जी के पितृ – कन्‍यापीवरी नाम की स्‍त्री से द्वादश पुत्र उत्‍पन्‍न हुए। (1) भूरिश्रवा (2) प्रभु (3) शंभु (4) कृष्‍ण (5) गौर (6) श्‍वेत (7) कृष्‍ण (8) गौर (9) श्‍याम (10) धूम्र (11) बादरि (12) उपमन्‍यु। ये सब पराशर के वंश में है।

 

जननी ब्रह्मदत्तस्‍य पत्‍नी सा त्‍वणुहस्‍य च।

नामान्‍तरणि चैतेषां कृतानि गुरुभिस्‍तदा।।

 

भारदाजस्‍तु प्रथमो द्वितीयस्‍तु पराशर:।

तृतीय: कश्‍यपो नाम्‍ना कौशिकस्‍तु चतुर्थक:।। 

 

गर्गश्‍च पंचमो ज्ञेय उपमन्‍युस्‍तु षष्‍ठक:।

सप्‍तमों वत्‍स नामावै शाण्डिल्‍यश्‍चाष्‍टम: स्‍मृत:।।

 

भार्गवों नवमो नाम मुद्गलो दशम: स्‍मुत:।

एकादशों गौतमश्‍च द्वादश: कौत्‍सनामक:।।

 

अध्‍यापयञ्छि‍ष्‍यगणान् व्‍यास: पौत्रांश्‍च वीर्यवान्।

उवास हिमवस्‍पृष्‍ठे पारार्श्‍यो महामुनि:।।

 

कीर्तिमती नाम की कन्‍या योग विद्या की ज्ञाता और पतिव्रता धर्म को धारण करने वाली थी। इसका विवाह अणुह नाम के ऋषि के साथ हुआ था। जिसके ब्रह्मदत्त नाम का योगविद्या का ज्ञाता पुत्र हुआ। पितृकन्‍या पीवरी से शुकदेव क पूर्वोक्‍त द्वादश पुत्र हुए। इनके गुरुओं ने इनके जो दूसरे नाम रखे वे इस प्रकार हैं-

 

(1) भरद्वाज (2) पराशर (3) कश्‍यप (4) कौशिक (5) गर्ग (6) उपमन्‍यू (7) वत्‍स (8) शाण्डिल्‍य (9) भार्गव (10) मुद्गल (11) गौतम (12) और कौत्‍स।

शुकदेव जी ने गुहस्‍थाश्रम में रहकर चारों ऋणों से मुक्ति प्राप्‍त की तथा पिताजी की आज्ञा से सुमेरू पर्वत पर गये जहां जप, ध्‍यान करते हुए मोक्ष को प्राप्‍त हुए।

इस प्रकार उपरोक्‍त प्रमाणों से सिद्ध है कि शुकदेव जी के 12 पुत्र एवं कन्‍या हुई।

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