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सोमनाथ रुद्राभिषेक

रुद्राभिषेक अर्थात रूद्र का अभिषेक करना यानि कि शिवलिंग पर रुद्रमंत्रों के द्वारा अभिषेक करना । जैसा की वेदों में वर्णित है शिव और रुद्र परस्पर एक दूसरे के पर्यायवाची हैं। शिव को ही रुद्र कहा जाता है। क्योंकि- रुतम्-दु:खम्, द्रावयति-नाशयतीतिरुद्र: यानि की भोले सभी दु:खों को नष्ट कर देते हैं। हमारे धर्मग्रंथों के अनुसार हमारे द्वारा किए गए पाप ही हमारे दु:खों के कारण हैं।

रुद्राभिषेक करना शिव आराधना का सर्वश्रेष्ठ तरीका माना गया है । रूद्र शिव जी का ही एक स्वरूप हैं । रुद्राभिषेक मंत्रों का वर्णन ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद में भी किया गया है। शास्त्र और वेदों में वर्णित हैं की शिव जी का अभिषेक करना परम कल्याणकारी है।

रुद्रार्चन और रुद्राभिषेक से हमारे पटक-से पातक कर्म भी जलकर भस्म हो जाते हैं और साधक में शिवत्व का उदय होता है तथा भगवान शिव का शुभाशीर्वाद भक्त को प्राप्त होता है और उनके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि एकमात्र सदाशिव रुद्र के पूजन से सभी देवताओं की पूजा स्वत: हो जाती है।

रूद्रहृदयोपनिषद में शिव के बारे में कहा गया है कि- सर्वदेवात्मको रुद्र: सर्वे देवा: शिवात्मका: अर्थात् सभी देवताओं की आत्मा में रूद्र उपस्थित हैं और सभी देवता रूद्र की आत्मा हैं।

वैसे तो रुद्राभिषेक किसी भी दिन किया जा सकता है परन्तु त्रियोदशी तिथि,प्रदोष काल और सोमवार को इसको करना परम कल्याण कारी है | श्रावण मास में किसी भी दिन किया गया रुद्राभिषेक अद्भुत व् शीघ्र फल प्रदान करने वाला होता है |

आइये रुद्राभिषेक से जुड़े कुछ अहम बातो को जाने

 

रुद्राभिषेक क्या है ?

 

अभिषेक शब्द का शाब्दिक अर्थ है – स्नान (Bath) करना अथवा कराना। रुद्राभिषेक का अर्थ है भगवान रुद्र का अभिषेक अर्थात शिवलिंग पर रुद्र के मंत्रों के द्वारा अभिषेक करना। यह पवित्र-स्नान रुद्ररूप शिव को कराया जाता है। वर्तमान समय में अभिषेक Rudrabhishek के रुप में ही विश्रुत है। अभिषेक के कई रूप तथा प्रकार होते हैं। शिव जी को प्रसंन्न करने का सबसे श्रेष्ठ तरीका है Rudrabhishek करना अथवा श्रेष्ठ ब्राह्मण विद्वानों के द्वारा कराना। वैसे भी अपनी जटा में गंगा को धारण करने से भगवान शिव को जलधाराप्रिय माना गया है।

 

रुद्राभिषेक क्यों किया जाता हैं?

 

रुद्राष्टाध्यायी के अनुसार शिव ही रूद्र हैं और रुद्र ही शिव है। रुतम्-दु:खम्, द्रावयति-नाशयतीतिरुद्र: अर्थात रूद्र रूप में प्रतिष्ठित शिव हमारे सभी दु:खों को शीघ्र ही समाप्त कर देते हैं। वस्तुतः जो दुःख हम भोगते है उसका कारण हम सब स्वयं ही है हमारे द्वारा जाने अनजाने में किये गए प्रकृति विरुद्ध आचरण के परिणाम स्वरूप ही हम दुःख भोगते हैं।

 

रुद्राभिषेक का आरम्भ कैसे हुआ ?

 

प्रचलित कथा के अनुसार भगवान विष्णु की नाभि से उत्पन्न कमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई। ब्रह्माजी जबअपने जन्म का कारण जानने के लिए भगवान विष्णु के पास पहुंचे तो उन्होंने ब्रह्मा की उत्पत्ति का रहस्य बताया और यह भी कहा कि मेरे कारण ही आपकी उत्पत्ति हुई है। परन्तु ब्रह्माजी यह मानने के लिए तैयार नहीं हुए और दोनों में भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध से नाराज भगवान रुद्र लिंग रूप में प्रकट हुए। इस लिंग का आदि अन्त जब ब्रह्मा और विष्णु को कहीं पता नहीं चला तो हार मान लिया और लिंग का अभिषेक किया, जिससे भगवान प्रसन्न हुए। कहा जाता है कि यहीं से रुद्राभिषेक का आरम्भ हुआ।

 

एक अन्य कथा के अनुसार ––

 

एक बार भगवान शिव सपरिवार वृषभ पर बैठकर विहार कर रहे थे। उसी समय माता पार्वती ने मर्त्यलोक में रुद्राभिषेक कर्म में प्रवृत्त लोगो को देखा तो भगवान शिव से जिज्ञासा कि की हे नाथ मर्त्यलोक में इस इस तरह आपकी पूजा क्यों की जाती है? तथा इसका फल क्या है? भगवान शिव ने कहा – हे प्रिये! जो मनुष्य शीघ्र ही अपनी कामना पूर्ण करना चाहता है वह आशुतोषस्वरूप मेरा विविध द्रव्यों से विविध फल की प्राप्ति हेतु अभिषेक करता है। जो मनुष्य शुक्लयजुर्वेदीय रुद्राष्टाध्यायी से अभिषेक करता है उसे मैं प्रसन्न होकर शीघ्र मनोवांछित फल प्रदान करता हूँ। जो व्यक्ति जिस कामना की पूर्ति के लिए रुद्राभिषेक करता है वह उसी प्रकार के द्रव्यों का प्रयोग करता है अर्थात यदि कोई वाहन प्राप्त करने की इच्छा से रुद्राभिषेक करता है तो उसे दही से अभिषेक करना चाहिए यदि कोई रोग दुःख से छुटकारा पाना चाहता है तो उसे कुशा के जल से अभिषेक करना या कराना चाहिए।

 

रुद्राभिषेक की पूर्ण विधि ।

 

इसमें में रुद्राष्टाध्यायी के एकादशिनि रुद्री के ग्यारह आवृति पाठ किया जाता है। इसे ही लघु रुद्र कहा जाता है। यह पंच्यामृत से की जाने वाली पूजा है। इस पूजा को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। प्रभावशाली मंत्रो और शास्त्रोक्त विधि से विद्वान ब्राह्मण द्वारा पूजा को संपन्न करवाया जाता है। इस पूजा से जीवन में आने वाले संकटो एवं नकारात्मक ऊर्जा से छुटकारा मिलता है।

 

रुद्राभिषेक से लाभ

 

शिव पुराण के अनुसार किस द्रव्य से अभिषेक करने से क्या फल मिलता है अर्थात आप जिस उद्देश्य की पूर्ति हेतु रुद्राभिषेक करा रहे है उसके लिए किस द्रव्य का इस्तेमाल करना चाहिए का उल्लेख शिव पुराण में किया गया है उसका सविस्तार विवरण प्रस्तुत कर रहा हू और आप से अनुरोध है की आप इसी के अनुरूप रुद्राभिषेक कराये तो आपको पूर्ण लाभ मिलेगा।

Rudrabhishek अनेक पदार्थों से किया जाता है और हर पदार्थ से किया गया रुद्राभिषेक अलग फल देने में सक्षम है जो की इस प्रकार से हैं ।

 

रुद्राभिषेक कैसे करे

 

1) जल से अभिषेक

– हर तरह के दुखों से छुटकारा पाने के लिए भगवान शिव का जल से अभिषेक करें

– भगवान शिव के बाल स्वरूप का मानसिक ध्यान करें

– ताम्बे के पात्र में ‘शुद्ध जल’ भर कर पात्र पर कुमकुम का तिलक करें

– ॐ इन्द्राय नम: का जाप करते हुए पात्र पर मौली बाधें

– पंचाक्षरी मंत्र ॐ नम: शिवाय” का जाप करते हुए फूलों की कुछ पंखुडियां अर्पित करें

– शिवलिंग पर जल की पतली धार बनाते हुए रुद्राभिषेक करें

– अभिषेक करेत हुए ॐ तं त्रिलोकीनाथाय स्वाहा मंत्र का जाप करें

– शिवलिंग को वस्त्र से अच्छी तरह से पौंछ कर साफ करें

2) दूध से अभिषेक

– शिव को प्रसन्न कर उनका आशीर्वाद पाने के लिए दूध से अभिषेक करें

– भगवान शिव के ‘प्रकाशमय’ स्वरूप का मानसिक ध्यान करें

– ताम्बे के पात्र में ‘दूध’ भर कर पात्र को चारों और से कुमकुम का तिलक करें

– ॐ श्री कामधेनवे नम: का जाप करते हुए पात्र पर मौली बाधें

– पंचाक्षरी मंत्र ॐ नम: शिवाय’ का जाप करते हुए फूलों की कुछ पंखुडियां अर्पित करें

– शिवलिंग पर दूध की पतली धार बनाते हुए-रुद्राभिषेक करें.

– अभिषेक करते हुए ॐ सकल लोकैक गुरुर्वै नम: मंत्र का जाप करें

– शिवलिंग को साफ जल से धो कर वस्त्र से अच्छी तरह से पौंछ कर साफ करें

3) फलों का रस

– अखंड धन लाभ व हर तरह के कर्ज से मुक्ति के लिए भगवान शिव का फलों के रस से अभिषेक करें

– भगवान शिव के ‘नील कंठ’ स्वरूप का मानसिक ध्यान करें

– ताम्बे के पात्र में ‘गन्ने का रस’ भर कर पात्र को चारों और से कुमकुम का तिलक करें

– ॐ कुबेराय नम: का जाप करते हुए पात्र पर मौली बाधें

– पंचाक्षरी मंत्र ॐ नम: शिवाय का जाप करते हुए फूलों की कुछ पंखुडियां अर्पित करें

– शिवलिंग पर फलों का रस की पतली धार बनाते हुए-रुद्राभिषेक करें

– अभिषेक करते हुए -ॐ ह्रुं नीलकंठाय स्वाहा मंत्र का जाप करें

– शिवलिंग पर स्वच्छ जल से भी अभिषेक करें

4) सरसों के तेल से अभिषेक

– ग्रहबाधा नाश हेतु भगवान शिव का सरसों के तेल से अभिषेक करें

– भगवान शिव के ‘प्रलयंकर’ स्वरुप का मानसिक ध्यान करें

– ताम्बे के पात्र में ‘सरसों का तेल’ भर कर पात्र को चारों और से कुमकुम का तिलक करें

– ॐ भं भैरवाय नम: का जाप करते हुए पात्र पर मौली बाधें

– पंचाक्षरी मंत्र ॐ नम: शिवाय” का जाप करते हुए फूलों की कुछ पंखुडियां अर्पित करें

– शिवलिंग पर सरसों के तेल की पतली धार बनाते हुए-रुद्राभिषेक करें.

– अभिषेक करते हुए ॐ नाथ नाथाय नाथाय स्वाहा मंत्र का जाप करें

– शिवलिंग को साफ जल से धो कर वस्त्र से अच्छी तरह से पौंछ कर साफ करें

5) चने की दाल

– किसी भी शुभ कार्य के आरंभ होने व कार्य में उन्नति के लिए भगवान शिव का चने की दाल से अभिषेक करें

– भगवान शिव के ‘समाधी स्थित’ स्वरुप का मानसिक ध्यान करें

– ताम्बे के पात्र में ‘चने की दाल’ भर कर पात्र को चारों और से कुमकुम का तिलक करें

– ॐ यक्षनाथाय नम: का जाप करते हुए पात्र पर मौली बाधें

– पंचाक्षरी मंत्र ॐ नम: शिवाय का जाप करते हुए फूलों की कुछ पंखुडियां अर्पित करें

– शिवलिंग पर चने की दाल की धार बनाते हुए-रुद्राभिषेक करें

– अभिषेक करेत हुए -ॐ शं शम्भवाय नम: मंत्र का जाप करें

– शिवलिंग को साफ जल से धो कर वस्त्र से अच्छी तरह से पौंछ कर साफ करें

6) काले तिल से अभिषेक

– तंत्र बाधा नाश हेतु व बुरी नजर से बचाव के लिए काले तिल से अभिषेक करें

– भगवान शिव के ‘नीलवर्ण’ स्वरुप का मानसिक ध्यान करें

– ताम्बे के पात्र में ‘काले तिल’ भर कर पात्र को चारों और से कुमकुम का तिलक करें

– ॐ हुं कालेश्वराय नम: का जाप करते हुए पात्र पर मौली बाधें

– पंचाक्षरी मंत्र ॐ नम: शिवाय का जाप करते हुए फूलों की कुछ पंखुडियां अर्पित करें

– शिवलिंग पर काले तिल की धार बनाते हुए-रुद्राभिषेक करें

– अभिषेक करते हुए -ॐ क्षौं ह्रौं हुं शिवाय नम: का जाप करें

– शिवलिंग को साफ जल से धो कर वस्त्र से अच्छी तरह से पौंछ कर साफ करें

7) शहद मिश्रित गंगा जल

– संतान प्राप्ति व पारिवारिक सुख-शांति हेतु शहद मिश्रित गंगा जल से अभिषेक करें

– भगवान शिव के ‘चंद्रमौलेश्वर’ स्वरुप का मानसिक ध्यान करें

– ताम्बे के पात्र में ” शहद मिश्रित गंगा जल” भर कर पात्र को चारों और से कुमकुम का तिलक करें

– ॐ चन्द्रमसे नम: का जाप करते हुए पात्र पर मौली बाधें

– पंचाक्षरी मंत्र ॐ नम: शिवाय’ का जाप करते हुए फूलों की कुछ पंखुडियां अर्पित करें

– शिवलिंग पर शहद मिश्रित गंगा जल की पतली धार बनाते हुए-रुद्राभिषेक करें

– अभिषेक करते हुए -ॐ वं चन्द्रमौलेश्वराय स्वाहा’ का जाप करें

– शिवलिंग पर स्वच्छ जल से भी अभिषेक करें

8) घी व शहद

– रोगों के नाश व लम्बी आयु के लिए घी व शहद से अभिषेक करें

– भगवान शिव के ‘त्रयम्बक’ स्वरुप का मानसिक ध्यान करें

– ताम्बे के पात्र में ‘घी व शहद’ भर कर पात्र को चारों और से कुमकुम का तिलक करें

– ॐ धन्वन्तरयै नम: का जाप करते हुए पात्र पर मौली बाधें

– पंचाक्षरी मंत्र ॐ नम: शिवाय” का जाप करते हुए फूलों की कुछ पंखुडियां अर्पित करें

– शिवलिंग पर घी व शहद की पतली धार बनाते हुए-रुद्राभिषेक करें.

– अभिषेक करते हुए -ॐ ह्रौं जूं स: त्रयम्बकाय स्वाहा” का जाप करें

– शिवलिंग पर स्वच्छ जल से भी अभिषेक करें

9 ) कुमकुम केसर हल्दी

– आकर्षक व्यक्तित्व का प्राप्ति हेतु भगवान शिव का कुमकुम केसर हल्दी से अभिषेक करें

– भगवान शिव के ‘नीलकंठ’ स्वरूप का मानसिक ध्यान करें

– ताम्बे के पात्र में ‘कुमकुम केसर हल्दी और पंचामृत’ भर कर पात्र को चारों और से कुमकुम का तिलक करें – ‘ॐ उमायै नम:’ का जाप करते हुए पात्र पर मौली बाधें

– पंचाक्षरी मंत्र ‘ॐ नम: शिवाय’ का जाप करते हुए फूलों की कुछ पंखुडियां अर्पित करें

– पंचाक्षरी मंत्र पढ़ते हुए पात्र में फूलों की कुछ पंखुडियां दाल दें-‘ॐ नम: शिवाय’

– फिर शिवलिंग पर पतली धार बनाते हुए-रुद्राभिषेक करें.

– अभिषेक का मंत्र-ॐ ह्रौं ह्रौं ह्रौं नीलकंठाय स्वाहा’

– शिवलिंग पर स्वच्छ जल से भी अभिषेक करें

रुद्राभिषेक में शिव निवास का विचार ●

किसी कामना, ग्रहशांति आदि के लिए किए जाने वाले रुद्राभिषेक में शिव निवास का विचार करने पर ही अनुष्ठान सफल होता है और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

प्रत्येक मास की तिथियों के अनुसार जब शिव निवास गौरी पार्श्व में, कैलाश पर्वत पर, नंदी की सवारी एवं ज्ञान वेला में होता है तो रुद्राभिषेक करने से सुख-समृद्धि, परिवार में आनंद मंगल और अभीष्ट सिद्धि की प्राप्ति होती है।

“परन्तु शिव वास श्मशान, सभा अथवा क्रीड़ा में हो तो उन तिथियों में शिवार्चन करने से महा विपत्ति, संतान कष्ट व पीड़ादायक होता है।”

  • रुद्राभिषेक करने की तिथियां-

कृष्णपक्ष की प्रतिपदा, पंचमी, अष्टमी, एकादशी, द्वादशी, अमावस्या, शुक्लपक्ष की द्वितीया, पंचमी, षष्ठी, नवमी, द्वादशी, त्रयोदशी तिथियों में अभिषेक करने से सुख-समृद्धि संतान प्राप्ति एवं ऐश्वर्य प्राप्त होता है।

कालसर्प योग, गृहकलेश, व्यापार में नुकसान, शिक्षा में रुकावट सभी कार्यो की बाधाओं को दूर करने के लिए रुद्राभिषेक आपके अभीष्ट सिद्धि के लिए फलदायक है।

 किसी कामना से किए जाने वाले रुद्राभिषेक में शिव-वास का विचार करने पर अनुष्ठान अवश्य सफल होता है और मनोवांछित फल प्राप्त होता है।

  • शिव वास कब कहा
  1. प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की प्रतिपदा, अष्टमी, अमावस्या तथा शुक्लपक्ष की द्वितीया व नवमी के दिन भगवान शिव माता गौरी के साथ होते हैं, इस तिथिमें रुद्राभिषेक करने से सुख-समृद्धि उपलब्ध होती है।
  1. कृष्णपक्ष की चतुर्थी, एकादशी तथा शुक्लपक्ष की पंचमी व द्वादशी तिथियों में भगवान शंकर कैलाश पर्वत पर होते हैं और उनकी अनुकंपा से परिवार मेंआनंद-मंगल होता है।
  1. कृष्णपक्ष की पंचमी, द्वादशी तथा शुक्लपक्ष की षष्ठी व त्रयोदशी तिथियों में महादेव नंदी पर सवार होकर संपूर्ण विश्व में भ्रमण करते है।अत: इन तिथियों में रुद्राभिषेक करने पर अभीष्ट सिद्ध होता है।
  1. कृष्णपक्ष की सप्तमी, चतुर्दशी तथा शुक्लपक्ष की प्रतिपदा, अष्टमी, पूर्णिमा में भगवान महाकाल श्मशान में समाधिस्थ रहते हैं।

अतएव इन तिथियों में किसी कामना की पूर्ति के लिए किए जाने वाले रुद्राभिषेक में आवाहन करने पर भगवान शिव की साधना भंग होती है, जिससे अभिषेककर्ता पर विपत्ति आ सकती है।

  1. कृष्णपक्ष की द्वितीया, नवमी तथा शुक्लपक्ष की तृतीया व दशमी में महादेव देवताओं की सभा में उनकी समस्याएं सुनते हैं। इन तिथियों में सकाम अनुष्ठान करने पर संताप या दुख मिलता है।
  1. कृष्णपक्ष की तृतीया, दशमी तथा शुक्लपक्ष की चतुर्थी व एकादशी में सदाशिव क्रीडारत रहते हैं। इन तिथियों में सकाम रुद्रार्चन संतान को कष्ट प्रदान करते है।
  1. कृष्णपक्ष की षष्ठी, त्रयोदशी तथा शुक्लपक्ष की सप्तमी व चतुर्दशी में रुद्रदेव भोजन करते हैं।

इन तिथियों में सांसारिक कामना से किया गया रुद्राभिषेक पीडा देते हैं।

इसके अतिरिक्त ज्योर्तिलिंग-क्षेत्र एवं तीर्थस्थान में तथा शिवरात्रि-प्रदोष, श्रावण के सोमवार आदि पर्वो में शिव-वास का विचार किए बिना भी रुद्राभिषेक किया जा सकता है।

वस्तुत: शिवलिंग का अभिषेक आशुतोष शिव को शीघ्र प्रसन्न करके साधक को उनका कृपा पात्र बना देता है और उनकी सारी समस्याएं स्वत: समाप्त हो जाती हैं।

अतः हम यह कह सकते हैं कि रुद्राभिषेक से मनुष्य के सारे पाप-ताप धुल जाते हैं।

स्वयं श्रृष्टि कर्ता ब्रह्मा ने भी कहा है की जब हम अभिषेक करते है तो स्वयं महादेव साक्षात् उस अभिषेक को ग्रहण करते है।

  • विभिन्न प्रकार के अभिषेक का फल

ऐसे तो अभिषेक साधारण रूप से जल से ही होता है । परन्तु विशेष अवसर पर या सोमवार, प्रदोष और शिवरात्रि आदि पर्व के दिनों मंत्र गोदुग्ध से विशेष रूप से अभिषेक किया जाता है ।

विशेष पूजा में दूध, दही, घृत, शहद और चीनी से अलग-अलग अथवा सब को मिला कर पंचामृत से भी अभिषेक किया जाता है।

तंत्रों में रोग निवारण हेतु अन्य विभिन्न वस्तुओं से भी अभिषेक करने का विधान है।

इस प्रकार विविध द्रव्यों से शिवलिंग का विधिवत् अभिषेक करने पर अभीष्ट कामना की पूर्ति होती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि किसी भी पुराने नियमित रूप से पूजे जाने वाले शिवलिंग का अभिषेक बहुत ही उत्तम फल देता है।

 

किन्तु यदि पारद , स्फटिक , नर्मदेश्वर, अथवा पार्थिव शिवलिंग का अभिषेक किया जाय तो बहुत ही शीघ्र चमत्कारिक शुभ परिणाम मिलता है । रुद्राभिषेक का फल बहुत ही शीघ्र प्राप्त होता है ।

 

* जल से अभिषेक करने पर वर्षा होती है।

* असाध्य रोगों को शांत करने के लिए कुशोदक से रुद्राभिषेक करें।

दध्ना च पशु कामाय श्रिया इक्षु रसेन च । मध्वाज्येन धनार्थी स्यान्मुमुक्षुस्तीर्थ वारिणः ।।

* भवन-वाहन के लिए दही से रुद्राभिषेक करें।

* लक्ष्मी प्राप्ति के लिये गन्ने के रस से रुद्राभिषेक करें।

* धन-वृद्धि के लिए शहद एवं घी से अभिषेक करें।

* तीर्थ के जल से अभिषेक करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।

* पुत्र प्राप्ति के लिए दुग्ध से और यदि संतान उत्पन्न होकर मृत पैदा हो तो गोदुग्ध से रुद्राभिषेक करें।

* रुद्राभिषेक से योग्य तथा विद्वान संतान की प्राप्ति होती है।

* ज्वर की शांति हेतु शीतल जल/गंगाजल से रुद्राभिषेक करें।

* सहस्रनाम-मंत्रों का उच्चारण करते हुए घृत की धारा से रुद्राभिषेक करने पर वंश का विस्तार होता है।

* प्रमेह रोग की शांति भी दुग्धाभिषेक से हो जातीहै।

* शक्कर मिले दूध से अभिषेक करने पर जडबुद्धि वाला भी विद्वान हो जाता है।

* सरसों के तेल से अभिषेक करने पर शत्रु पराजित होता है।

* शहद के द्वारा अभिषेक करने पर यक्ष्मा (तपेदिक) दूर हो जाती है।

*पातकों को नष्ट करने की कामना होने पर भी शहद से रुद्राभिषेक करें।

* गो दुग्ध से तथा शुद्ध घी द्वारा अभिषेक करने से आरोग्यता प्राप्त होती है।

* पुत्र की कामनावाले व्यक्ति शक्कर मिश्रित जल से अभिषेक करें।

 

भगवान_सदाशिव ●

 

शिव को प्रसन्न करने के लिए अनेक मंत्र, स्तुति व स्त्रोत की रचना की गई है। इनके जप व गान करने से भगवान शिव अति प्रसन्न होते हैं।

 

“श्री शिव रुद्राष्टक स्त्रोत्र” भी इन्हीं में से एक है। यदि प्रतिदिन शिव रुद्राष्टक का पाठ किया जाए तो सभी प्रकार की समस्याओं का निदान स्वत: ही हो जाता है। साथ ही भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है।

 

 नित्य,सोमवार,महाशिवरात्रि, श्रावण अथवा चतुर्दशी तिथि को इसका जप किया जाए तो विशेष फल मिलता है।

 

श्री रामचरित्र मानस के उत्तर काण्ड में वर्णित इस रूद्राष्टक की कथा कुछ इस प्रकार है।कागभुशुण्डि परम शिव भक्त थे। वो शिव को परमेश्वर एवं अन्य देवों से अतुल्य जानते थे। उनके गुरू श्री लोमेश शिव के साथ-साथ राम में भी असिम श्रद्धा रखते थे। इस वजह से कागभुशुण्डि का अपने गुरू के साथ मत-भेद था।

 

गुरू ने समझाया कि; स्वयं शिव भी राम नाम से आनन्दित रहते हैं तो तू राम की महिमा को क्यों अस्विकार करता है। ऐसे प्रसंग को शिवद्रोही मान कागभुशुण्डि अपने गुरू से रूष्ट हो गए।

 

इसके उपरांत कागभुशुण्डि एक बार एक महायज्ञ का आयोजन कर रहे थे। उन्होंने अपने यज्ञ की सुचना अपने गुरू को नहीं दी। फिर भी सरल हृदय गुरू अपने भक्त के यग्य में समलित होने को पहुँच गए।

 

शिव पुजन में बैठे कागभुशुण्डि ने गुरू को आया देखा। किन्तु कागभुशुंडी अपने आसन से न उठे, न उनका कोई आदर सत्कार ही किया। सरल हृदय गुरू ने एक बार फिर इसका बुरा नहीं माना।

 

पर महादेव तो महादेव ही हैं। वो अनाचार क्यों सहन करने लगे ??

 

भविष्यवाणी हुई – अरे मुर्ख, अभिमानी ! तेरे सत्यज्ञानी गुरू ने सरलता की कि तुझपर क्रोध नहीं किया। लेकिन, मैं तुझे श्राप दुंगा। क्योंकि नीति का विरोध मुझे नहीं भाता। यदि तुझे दण्ड ना मिला तो वेद मार्ग भ्रष्ट हो जाएंगा।

 

जो गुरू से ईर्ष्या करते हैं वो नर्क के भागी होते हैं। तू गुरू के सन्मुख भी अजगर की भांति ही बैठा रहा। अत: अधोगति को पाकर अजगर बन जा तथा किसी वृक्ष की कोटर में ही रहना।

 

इस प्रचंण श्राप से दुःखी हो तथा अपने शिष्य के लिए क्षमा दान पाने की अपेक्षा से, शिव को प्रसन्न करने हेतु; गुरू ने प्रार्थना की तथा रूद्राष्टक की वाचना की तथा आशुतोष भगवान को प्रसन्न किया।

 

कथासार में शिव अनाचारी को क्षमा नहीं करते; यद्यपि वो उनका परम भक्त ही क्यूँ ना हो।

 

परम शिव भक्त कागभुशुण्डि ने जब अपने गुरू की अवहेलना की तो; वे भगवान शिव के क्रोध-भाजन हुए। अपने शिष्य के लिए क्षमादान की अपेक्षा रखने वाले सहृदय गुरू ने रूद्राष्टक की रचना की तथा महादेव को प्रसन्न किया।

 

गुरु के तप व शिव भक्ति के प्रभाव से यह शिव स्तुति बड़ी ही शुभ व मंगलकारी शक्तियों से सराबोर मानी जाती है। साथ ही मन से सारी परेशानियों की वजह अहंकार को दूर कर विनम्र बनाती है।

 

शिव की इस स्तुति से भी भक्त का मन भक्ति के भाव और आनंद में इस तरह उतर जाता है कि; हर रोज व्यावहारिक जीवन में मिली नकारात्मक ऊर्जा, तनाव, द्वेष, ईर्ष्या और अहं को दूर कर देता है।

 

यह स्तुति सरल, सरस और भक्तिमय होने से शिव व शिव भक्तों को बहुत प्रिय भी है। धार्मिक दृष्टि से शिव पूजन के बाद इस स्तुति के पाठ से शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं।

सम्पुर्ण कथा रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में वर्णित है।

 

“श्री गोस्वामी तुलसीदास कृतं शिव रूद्राष्टक स्तोत्रं”

 

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं॥

निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं॥

 

भावार्थ:-हे मोक्षस्वरूप, विभु, व्यापक, ब्रह्म और वेदस्वरूप, ईशान दिशा के ईश्वर तथा सबके स्वामी श्री शिवजी मैं आपको नमस्कार करता हूँ। निजस्वरूप में स्थित (अर्थात्‌ मायादिरहित), (मायिक) गुणों से रहित, भेदरहित, इच्छारहित, चेतन आकाश रूप एवं आकाश को ही वस्त्र रूप में धारण करने वाले दिगम्बर (अथवा आकाश को भी आच्छादित करने वाले) आपको मैं भजता हूँ॥

 

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं॥

करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतोऽहं॥

 

भावार्थ:-निराकार, ओंकार के मूल, तुरीय (तीनों गुणों से अतीत), वाणी, ज्ञान और इन्द्रियों से परे, कैलासपति, विकराल, महाकाल के भी काल, कृपालु, गुणों के धाम, संसार से परे आप परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ॥

 

तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्रीशरीरं॥

स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा॥

 

भावार्थ:-जो हिमाचल के समान गौरवर्ण तथा गंभीर हैं, जिनके शरीर में करोड़ों कामदेवों की ज्योति एवं शोभा है, जिनके सिर पर सुंदर नदी गंगाजी विराजमान हैं, जिनके ललाट पर द्वितीया का चंद्रमा और गले में सर्प सुशोभित है॥

 

चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं॥

मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं । प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि॥

 

भावार्थ:-जिनके कानों में कुण्डल हिल रहे हैं, सुंदर भ्रुकुटी और विशाल नेत्र हैं, जो प्रसन्नमुख, नीलकण्ठ और दयालु हैं, सिंह चर्म का वस्त्र धारण किए और मुण्डमाला पहने हैं, उन सबके प्यारे और सबके नाथ (कल्याण करने वाले) श्री शंकरजी को मैं भजता हूँ॥

 

प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं॥

त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं॥

 

भावार्थ:-प्रचण्ड (रुद्ररूप), श्रेष्ठ, तेजस्वी, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मे, करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाश वाले, तीनों प्रकार के शूलों (दुःखों) को निर्मूल करने वाले, हाथ में त्रिशूल धारण किए, भाव (प्रेम) के द्वारा प्राप्त होने वाले भवानी के पति श्री शंकरजी को मैं भजता हूँ॥

 

कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी। सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी॥

चिदानंद संदोह मोहापहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥

 

भावार्थ:-कलाओं से परे, कल्याणस्वरूप, कल्प का अंत (प्रलय) करने वाले, सज्जनों को सदा आनंद देने वाले, त्रिपुर के शत्रु, सच्चिदानंदघन, मोह को हरने वाले, मन को मथ डालने वाले कामदेव के शत्रु, हे प्रभो! प्रसन्न होइए, प्रसन्न होइए॥

 

न यावद् उमानाथ पादारविंदं। भजंतीह लोके परे वा नराणां॥

न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं॥

 

भावार्थ:-जब तक पार्वती के पति आपके चरणकमलों को मनुष्य नहीं भजते, तब तक उन्हें न तो इहलोक और परलोक में सुख-शांति मिलती है और न उनके तापों का नाश होता है। अतः हे समस्त जीवों के अंदर (हृदय में) निवास करने वाले हे प्रभो! प्रसन्न होइए॥

 

न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं॥

जरा जन्म दुःखोद्य तातप्यमानं॥ प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो॥

 

भावार्थ:-मैं न तो योग जानता हूँ, न जप और न पूजा ही। हे शम्भो! मैं तो सदा-सर्वदा आपको ही नमस्कार करता हूँ। हे प्रभो! बुढ़ापा तथा जन्म (मृत्यु) के दुःख समूहों से जलते हुए मुझ दुःखी की दुःख से रक्षा कीजिए। हे ईश्वर! हे शम्भो! मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥

 

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।

ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति॥

 

भावार्थ:-भगवान्‌ रुद्र की स्तुति का यह अष्टक उन शंकरजी की तुष्टि (प्रसन्नता) के लिए ब्राह्मण द्वारा कहा गया। जो मनुष्य इसे भक्तिपूर्वक पढ़ते हैं, उन पर भगवान्‌ शम्भु प्रसन्न होते हैं।

 

अघोरमूर्तिकवचम् ।।

           अस्य श्री अघोरकवचस्य महाकालभैरव ऋषिःअनुष्टुप् छन्दः श्रीकालाग्निरुद्रो देवता। क्ष्मीं बीजं क्ष्मां शक्तिः क्ष्मः कीलकं श्रीअघोर विद्यासिद्ध्यर्थं कवचपाठे विनियोगः॥

 

             ।।अथ मन्त्रः।।

अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः।

सर्वतः सर्वसर्वेभ्यो नमस्तेभ्यो रुद्ररूपेभ्यः॥

                   ।।कवचम्।।

ॐअघोरो मे शिवःपातुश्री मेऽघोरो ललाटकम्।

ह्रीं घोरो मेऽवतां नेत्रे क्लीं घोरो मेऽवताच्छती॥

 

सौःतरेभ्योऽवताङ्गडौक्षी नासां पातु सर्वतःक्षं।

मुखं पातु मे शर्वोऽघोरः सर्वोऽव ताङ्गलम्॥

 

घोरश्च मेऽवतात्स्कन्धौ हस्तौ ज्वलन्नमोऽवतु।

ज्वलनः पातु मे वक्षः कुक्षिं प्रज्वलरुद्रकः॥

 

पार्श्वौ  प्रज्वलरूपेभ्यो नाभिं मेऽघोररूपभृत्।

शिश्नं मे शूलपाणिश्च गुह्यं रुद्रः सदावतु॥

 

कटिं मेऽमृतमूर्तिश्च मेढ्रेऽव्यान्नीलकण्ठकः ।

ऊरू चन्द्रजटः पातु पातु मे त्रिपुरान्तकः॥

 

जङ्घे त्रिलोचनः पातु गुल्फौ  याज्ञियरूपवान्।

अघोरोऽङ्घ्री च मे पातु पादौ मेऽघोरभैरवः॥

 

पादादिमूर्धपर्यन्तमघोरात्मा शिवोऽवतु।

शिरसः पादपर्यन्तं पायान्मेऽघोरभैरवः॥

 

प्रभाते भैरवः पातु मध्याहे वटुकोऽवतु।

सन्ध्यायां च महाकालो निशायां कालभैरवः॥

 

अर्द्धरात्रे स्वयं घोरो निशान्तेऽमृत रूपधृत्।

पूर्वे मां पातु ऋग्वेदो यजुर्वेदस्तु दक्षिणे॥

 

पश्चिमे सामवेदोऽव्यादुत्तरेऽथर्व वेदकः।

आग्नेय्यामग्निरव्यान्मां नैरृत्यां नित्यचेतनः॥

 

वायव्यां रौद्ररूपोऽव्यादैशान्यां कालशासनः।

ऊर्ध्वोऽव्यादूर्ध्वरेताश्च पाताले परमेश्वरः॥

 

दशदिक्षु सदा पायाद्देवः कालाग्नि रुद्रकः।

अग्नेर्मां पातु कालाग्निर्वायोर्मां  वायुभक्षकः॥

 

जलादौर्वामुखः पातु पथि मां शङ्करोऽवतु।

निषण्णं योगध्येयोऽव्याद्गच्छन्तंवायु रूपभृत्॥

 

गृहे शर्वः सदा पातु बहिः पायाद् वृषध्वजः।

सर्वत्र सर्वदा पातु मामघोरोऽथ घोरकः॥

 

रणे राजकुले दुर्गे दुर्भिक्षे शत्रु संसदि।

द्यूते मारीभये राष्ट्रे प्रलये वादिना कुले॥

 

अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्योऽवतान्मां घोरभैरवः।

घोरघोरतरेभ्यो मां पायान्मन्मथ सङ्गरे॥

 

सर्वतः सर्वसर्वेभ्यो भोजनावस रेऽवतु।

नमस्ते रुद्ररूपेभ्योऽवतु मां घोरभैरवः॥

 

सर्वत्र सर्वदाकालं सर्वाङ्गं सर्व भीतिषु।

हं यं रं लं वं शं षं सं हं लं क्षः अघोरकः॥

 

अघोरास्त्राय फट् पातु अघोरो मां  सभैरवः।

विस्मारितं च यत्स्थानं स्थलं यन्नामवर्जितम्॥

 

तत्सर्वं मामघोरोऽव्यान्मामथा घोरः सभैरवः।

भार्यान्पुत्रान्सुहृद्वर्गान्कन्यां यद्वस्तु मामकम्॥

 

तत्सर्वं पातु मे नित्यं अघोरो माथ घोरकः।

स्नाने स्तवे जपेपाठे होमेऽव्यात्क्षःअघोरकः॥

 

अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोर तरेभ्यः।

सर्वतः सर्वसर्वेभ्यो नमस्तेभ्यो रुद्ररूपेभ्यः॥

 

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं सौः क्ष्मं  पातु नित्यं मां श्री अघोरकः।

इतीदं कवचं गुह्यं त्रिषु लोकेषु दुर्लभम्॥

               ।।फल श्रुति।।

मूलमन्त्रमयं दिव्यं त्रैलोक्ये सारमुत्तमम्।

अदातव्यमवाच्यं च कवचं गुह्य मीश्वरि॥२८

 

अप्रष्टव्यमस्तोतव्यं दीक्षाहीनेन मन्त्रिणा।

अदीक्षिताय शिष्याय पुत्राय शर जन्मने॥२६

 

न दातव्यं न श्रोतव्यमित्याज्ञां मामकां श‍ृणु ।

परं श्रीमहिमानं च श‍ृणु चास्य सुवर्मणः॥३०

 

अदीक्षितो यदा मन्त्री विद्यागृध्नुः पठेदिदम्।

सदीक्षित इति ज्ञेयो मान्त्रिकः साधकोत्तमः॥३१

 

यः पठेन्मनसा तस्य रात्रौ ब्राह्मे मुहूर्त्तके।

पूजाकाले निशीथे च तस्य हस्तेऽष्टसिद्धयः॥३२

 

दुःस्वप्ने बन्धने धीरे कान्तारे सागरे भये।

पठेत् कवचराजेन्द्रं मन्त्री विद्या निधिं प्रिये॥३३

 

सर्वं तत्प्रशमं याति भयं कवचपाठनात्।

रजः-सत्त्व-तमोरूपमघोरकवचं पठेत्॥३४

 

वाञ्छितं मनसा यद्यत्तत्तत्प्राप्नोति साधकः।

कुङ्कुमेन लिखित्वा च भूर्जत्वचि रवौ शिवे॥३५

 

केवलेन सुभक्ष्ये च धारयेन्मूर्ध्नि वा भुजे।

यद्यदिष्टं भवेत् तत्तत्साधको लभतेऽचिरात्॥३६

 

यद्गृहे अघोरकवचं वर्तते तस्य मन्दिरे।

विद्या कीर्तिर्धनारोग्यलक्ष्मी वृद्धिर्न संशयः॥३७

 

जपेच्चाघोरविद्यां यो विनानेनैव वर्मणा।

तस्य विद्या जपं हीनं तस्माद्धर्मं  सदा पठेत्॥३८

 

अघोरमन्त्रविद्यापि जपन् स्तोत्रं तथा मनुम्।

सद्यः सिद्धिं समायाति अघोरस्य प्रसादतः॥३९

 

इति श्रीदेवदेवेशि अघोरकवचं स्मरेत्।

गोप्यं कवचराजेन्द्रं गोपनीयं स्वयोनिवत्॥४०

 

॥इति श्रीरुद्रयामलेतन्त्रे विश्व सारोद्धारे तन्त्रेऽघोरसहस्र नामाख्येकल्पे अघोरकवचं समाप्तम्॥

|| करालं महाँकाल कालं कृपालं||

जय जगन्नाथ 

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