*पूर्व जन्म में वे दक्ष प्रजापति की पुत्री – सती थीं।*
*बाद में वे – उमा रूप में कैसे उत्पन्न हुई ।*
*शैलराज हिमवान् ने – उन्हें पितरों की कन्या सेना में उत्पन्न किया – ऐसी प्रसिद्धि है ।*
*पितर गण कौन हैं, जिनकी मानसी कन्या मेना हैं ? भैनाक उनका दौहित्र है।*
*तपस्या के समय एक पर्ण पर जीवन रखनेवाली – उमा उनकी दौहित्री है।*
*सबों को पूर्वज समस्त सरिताओं में श्रेष्ठ – सुरसरि उनकी सब से बड़ी सन्तति है।*
*इन सब बातों को तो हम लोग बहुत पहले ही से सुन चुके हैं। पर हमारी यह जिज्ञासा आप सुनिये कि ये पितरगण कौन हैं ? कहाँ निवास करते हैं ? इनके श्रद्धादि की विधियाँ क्या हैं।*
*इन सब बातों को हम जानना चाहते हैं, आप का कल्याण हो ॥२-६॥*
*ये किसके पुत्र है, और किस कारण वंश पितर नाम से विख्यात है ? ये लोग कैसे उत्पन्न हुए ? किसके पुत्र हैं ? कैसा इनका स्वरूप है ?*
*स्वर्ग में जो पितर निवास करते हैं, – वे देवताओं के भी देवता (पूज्य) कहे जाते हैं, वे कौन हैं ? इन सब पितरों की सृष्टि (उत्पत्ति) सम्बन्धी कल्याण दायिनी उत्तम बातें हम लोग सुनना चाहते हैं ।*
*हम लोग श्रद्धा एवं विधि पूर्वक उन पितरों को जो कुछ अर्पित करते हैं, – वह वस्तुएँ उन्हें (पितरों) प्रसन्न एवं सन्तुष्ट रखती हैं ।*
*वे लोग दृष्टिगोचर नहीं होते – इसका क्या कारण प्रसिद्ध है ॥७-८॥*
*कौन से पितर गण स्वर्ग में निवास करने वाले हैं, – और कौन से नरक में।*
*पिता को, पिता के, पिता को, पिता के पितामह को – तीनों पिण्डदानों में नामोच्चारण पूर्वक विधिसमेत कौन-कौन से श्राद्ध देने चाहिये।*
*अर्थात् किन-किन श्राद्धों में पितामह, तथा प्रपितामह का नाम – लेकर तीन (३) पिण्ड दान किये जाते हैं ।*
*ये श्रद्धादि में दी गई वस्तुएँ पितरों को किस प्रकार प्राप्त होती हैं । और जो स्वयमेव नरक में निवास करते हैं, वे किस प्रकार फलप्रदान में समर्थ हो सकते हैं ?*
*ये पितर नामधारी कौन हैं ?, किन की हम पूजा करें ?, हम ऐसा सुना है कि स्वर्ग लोग में देवगण भी पितरों की पूजा तथा श्राद्धादि किया करते हैं ।*
*हे बहुश्रुत ! इस विषय को हम विस्तारपूर्वक सुनना चाहते हैं ? इन सबों का स्पष्ट अभिप्राय आप बतलाइये ।*
*ऋषियों की ऐसी बातें सुन तत्त्वार्थदर्शी सून ऋषियों के प्रश्नगत एवं मनोगत जिज्ञासाओं को शान्ति करते हुए बोले -॥९-१४॥*
*श्राद्ध महात्तम अध्याय – ०२:–*
*(श्राद्ध प्रक्रिया आरम्भः – पितरगण का वर्णन)*
*ये पितर नामधारी कौन हैं ?, किन की हम पूजा करें ?, हम ऐसा सुना है कि स्वर्ग लोग में देवगण भी पितरों की पूजा तथा श्राद्धादि किया करते हैं ।*
*हे बहुश्रुत ! इस विषय को हम विस्तारपूर्वक सुनना चाहते हैं ? इन सबों का स्पष्ट अभिप्राय आप बतलाइये ।*
*ऋषियों की ऐसी बातें सुन तत्त्वार्थदर्शी सून ऋषियों के प्रश्नगत एवं मनोगत जिज्ञासाओं को शान्ति करते हुए बोले -॥*
*सूत जी ने कहा – ऋषिवृन्द ! आप लोगों को पूछी हुई बातों का उत्तर अपनी बुद्धि एवं श्रुति के आधार पर दे रहा हूँ ।*
*प्रत्येक मन्वन्तरों में – ये क्रमशः ज्येष्ठ और कनिष्ठ रूप में प्रादुर्भूत होते हैं।*
*व्यतीत मन्वन्तरों के – जो पितरगण, देवताओं के साथ उत्पन्न हुए थे, और अतीत हो चुके,*
*उन्हें तथा सम्प्रति जो पितरगण विद्यमान हैं, उन दोनों को निश्चय पूर्वक बतला रहा हूँ ।*
*मनुष्यों द्वारा श्रद्धापूर्वक दी गई वस्तुएँ ही – श्राद्ध कही जाती हैं ।*
*पूर्वकाल में ब्रह्मा ने देवताओं की सृष्टि की – तो उन लोगों ने पूजा आदि कुछ भी नहीं किया, और उनको छोड़कर स्वार्थ में लिप्त हो अपने ही सृष्टि विस्तार में लग गये ।*
*तब ब्रह्मा ने उन्हें शाप दिया कि – मूढ़ों ! तुम्हारी चेतना नष्ट हो जायगी, तुम लोग कुछ भी नहीं जानते ।*
*ब्रह्मा के ऐसे शाप दे देने के उपरान्त – समस्त लोक मोहवश हो गया । वे सब पुनः विनम्र हुए और पितामह से याचना करने लगे !*
*प्रभु ब्रह्मा ने लोक पर अनुग्रह करने की भावना से उन देवताओं से पुन: कहा ॥१५-१८॥*
*तुम लोगों ने महान् पाप एवं अत्याचार किया है, उसका प्रायश्चित्त करो, और उसका विधान अपने-अपने पुत्रों से पूछों । – तब तुम लोगों को ज्ञान-प्राप्ति होगी ।*
*तब प्रायश्चित्त करने को इच्छुक उन देवताओं ने – आत्मा को स्ववश रख अपने पुत्रों से प्रायश्चित्त की विधियां बारम्बार पूछीं ।*
*धर्मज्ञ एवं जितेन्द्रिय देवपुत्रों ने – उन देवताओं को मनसा, वाचा, कर्मणा सम्पन्न होनेवाले अनेक प्रकार के प्रायश्चित्तों का विधान बतलाया ।*
*पुत्रों द्वारा प्रायश्चित्तों की शिक्षा प्राप्त कर – उन देवताओं को पुनः चेतना प्राप्त हुई।*
*और उन्होंने अपने पुत्रों से निवेदन किया कि – तुम लोग ही हम सबों के पिता हो, क्योंकि तुम्हीं द्वारा हमें ज्ञान, एवं चेतना की प्राप्ति हुई ।*
*तुम लोगों को धर्म, ज्ञान, एवं काम – किस वस्तु का वरदान हम लोग दें, बतलाओ ॥२०-२३॥*
*देवताओं के ऐसे मनोभावों को देखकर ब्रह्मा ने पुनः उनसे कहा, – तुम लोग सत्यवादी हो।*
*अतः जो कुछ तुम्हारे मुख से निकला है, वह सब कुछ घटित होगा, कुछ भी अभ्यथा न होगा ।*
*यतः तुम लोगों ने स्वयं अपने पुत्रों को अपना पिता कहा है, – अतः वे तुम्हारे पिता हों, यही वर उन्हें दो ॥२४-२५॥*
*परमेष्ठी पितामह की उसी बात से – वे देवपुत्र गण पितृकोटि में आ गये, और उनके पितृगण पुत्र कोटि में आ गये।*
*इसी कारण वंश वे पितरगण पुत्र (देवपुत्र) कहे जाते हैं, – और उनमें पुत्र होने पर भी पितृत्व कहा जाता है।*
*इस प्रकार पितरों को पुत्र रूप में, और पुत्रों को पितररूप में स्मरण कर – पितामह ब्रह्मा ने अपने वंश की वृद्धि के लिये पुनः पितरों से कहा -॥२६-२७॥*
*श्राद्ध कर्म में जो पितरों की पूजा बिना किये ही – किसी अन्य क्रिया का अनुष्ठान करता है, उसकी उस क्रिया का फल राक्षस, तथा दानवों को प्राप्त होता है ।*
*श्राद्धों द्वारा सन्तुष्ट किये गये, – पितरगण अव्यय सोम को सन्तुष्ट करते हैं ।*
*तुम लोगों से सन्तुष्ट प्राप्त कर – वे सर्वदा तुम्हें बढ़ायेंगे ।*
*श्राद्धादि कर्मों में इस प्रकार पितरों द्वारा संतुष्ट किया गया – सोम समस्त, पर्वत, वन, व चराचर जगत्, सब को सन्तुष्ट करेगा ।*
*जो मनुष्य लोक के पोषण की दृष्टि से श्रद्धादि करेंगे, – उन्हें पितरगण सर्वदा पुष्टि एवं सन्तति देगे ।*
*श्राद्धकर्म में – अपने प्रपितामह तक “ नाम ”, एवं “ गोत्र “ का उच्चारण कर।*
*जिन पितरों को कुछ दे दिया जायगा – वे पितरगण उस श्राद्धदान से अति सन्तुष्ट होकर देनेवाले की सन्ततियों को सन्तुष्ट रखेंगे ॥२८-३२॥*
*परमेष्ठी ब्रह्मा ने इस प्रकार की आज्ञा पूर्वकाल में दी है ।*
*उन्हीं पितरों की कृपा से – दान, अध्ययन, तपस्या – सबसे सिद्धि प्राप्त होती है ।*
*इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है कि – वे पितरगण ही हम सब को ज्ञान प्रदान करनेवाले हैं ।*
*इस प्रकार वे पितरगण देवता हैं, – और देवगण पितर हैं, और परस्पर एक दूसरे के पितर और देवता दोनों हैं ।*
*आत्मज्ञानी सूत की ऐसी बातें सुनने के उपरान्त मुनियों ने – उनसे शेष प्रश्न के बारे में पुनः पूछा ॥३३-३५॥*