
शिव : स्वयं ताे आशु आराधना से संतुष्ट हो जाने वाले आशुतोष, मगर उनके स्वरूप और साधना के संबंध में इतना लिखा गया है कि पढ़ने, समझने में और आचरण में लाने में कई जन्म पूरे हो जाएं।
*क्या आप जानते है वो सच्चितानंद स्वरूप के ध्यान में मग्न हे।*
*क्या आप ने इस स्वरूप को जान ने का कभी प्रयत्न भी किया है??*
*या सिर्फ बाहरी क्रिया कलापों में संतुष मान लिये।*
शैवागमों की शृंखला ही बहुत विस्तृत है। वैरोचन के ‘लक्षणसार समुच्चय’ में इन आगमों के विशाल वांगमय पर विस्तार से विमर्श हुआ है।
शिव के शास्त्र के रूप में *’शिवधर्म’ और ‘शिवधर्मोत्तर’* ग्रंथों को रचा गया। दोनों में से पहले ग्रंथ में ब्राह्मीलिपि का जिक्र है जबकि दूसरे में नंदिनागरी लिपि का। इसी कारण से लगता है कि पहला ग्रंथ गुप्तकाल के आसपास लिखा गया जबकि दूसरा वातापी के चालुक्य के शासनकाल का होना चाहिए। ये वे ग्रंथ माने जा सकते हैं जो कि लिंगपुराण, शिवपुराण, नंदिपुराण, सौरपुराण आदि के आधारभूत रहे हैं। इन दोनों के ही पहली बार संपादन-अनुवाद के दौरान मुझे लगा कि जटिल परंपराओं के विपरीत धर्म को आचरणमूलक अंग बनाने का प्रयास होना चाहिए।
जीवन में सब पर करुणा, दया और सहयोग हो और स्वाध्याय को सर्वोच्च प्राथमिकता मिले और सरलतम रूप में शिव की आराधना हो। आतंक, द्वेषमूलक कुकर्मों से मुक्त होकर शिवानंद का अनुभव किया जा सकता है। शिव कल्याणकारी है, उनका यह भाव जीवन का ध्येय होना चाहिए। इनमें शिवरात्रि का विधान नहीं आया किंतु लिंगपुराण, शिवपुराण, स्कंदपुराण और गरुड़पुराण में इस व्रत का विधान विशेषरूप से आता है। आबू के एक आदिम-आख्यान को इस व्रत का उत्स माना गया है। आज यह आख्यान इतना लोकप्रिय है कि इस कथा को सुने बिना इस पर्व का विधान पूरा नहीं होता। न केवल भारत बल्कि मारीशस तक यही कथा लोकप्रिय है… *शिव सदैव कल्याणकारी रहें.. जय जय।*
✍🏻आगे और बाकी है
आपके पूर्वानुमान पर, आपके पूर्वाग्रहों पर कोई चीज़ सही सही ना बैठे तो बड़ी समस्या होती है | इस से नैरेटिव बिल्ड करने में दिक्कत हो जाती है | आप ये नहीं कह सकते कि “मैंने तो पहले ही कहा था” तो आपके अहंकार को भी चोट पहुँचती है | ज्ञानी सिद्ध होने में दिक्कत हो जाती है | हिन्दुओं के बारे में पूर्वाग्रहियों को यही सबसे बड़ी दिक्कत रही | उनके रिलिजन के कांसेप्ट पर हम फिट नहीं आते | कई बार हमारे बारे में चुप्पी साधनी पड़ती है | महाशिवरात्रि की कहानी के साथ भी ऐसा ही है |
यही वजह है कि जैसे होलिका दहन का किस्सा सुनाया जाता है वैसे शिवरात्रि के लिए नैरेटिव बिल्ड करने की कोशिश कम होती है | ऐसे में कोशिश की जाती है कि चुप रहकर शिवरात्रि की कहानी को भुला देने की कोशिश की जाए | इस त्यौहार से जुडी कहानी छोटी सी है, और एक व्याध यानि बहेलिये या शिकारी की कहानी है | चित्रभानु नाम के इस शिकारी ने कुछ कर्ज ले रखा होता है जिसे ना चुकाने पर साहूकार उसे बंद कर देता है | संयोग से उसी दिन शिवरात्रि थी और बंद पड़ा चित्रभानु बाहर धार्मिक चर्चा कर रहे लोगों को सुन रहा होता है | शाम में जब उसे खोला गया तो वो कर्ज चुकाने का वादा करके छूटता है |
अब शिकारी था तो वो जंगल में जाकर शिकार के लिए झील के पास एक मचान बनाना शुरू करता है | इस बार किस्मत से वो बिल्व वृक्ष यानि बेल के पेड़ पर मचान बना रहा होता है जो कि शिव का प्रसाद है | मचान बनाने के लिए तोड़ी गई पत्तियां नीचे शिवलिंग पर गिर रही होती हैं | अब हिन्दुओं की कहानी है तो यहाँ अन्य जीव जंतुओं को भी मनुष्यों जैसी ही भावना, और बात-चीत में समर्थ दर्शाया जाता है | इसलिए झील पे जो पहली हिरणी आती है वो भी शिकारी को तीर चढ़ाते देख उस से बात करने लगती है।
वो हिरणी बताती है कि वो गर्भवती है इसलिए उसे अभी मारना उचित नहीं | बच्चे के जन्म तक उसे जीवनदान दिया जाना चाहिए | हिरणी वादा करती है कि प्रसव के बाद वो शिकारी के पास लौट आएगी | अब अकारण की गई भ्रूणहत्या से ठीक एक स्तर नीचे का पाप गर्भवती को मारने पर होता तो शिकारी रुक जाता है | थोड़ी देर और बीती तो दूसरी हिरणी, हिरण के बच्चों के साथ आती है | शिकारी फिर तीर चढ़ाता है लेकिन ये हिरणी भी उसे देख लेती है और वो कहती है कि उसे बच्चों को पिता के पास छोड़ कर आने का अवसर दिया जाये |
शिकारी कहता है कि वो मूर्ख नहीं कि हाथ आये शिकार को जाने दे, और हिरणी कहती है बच्चों को घर से दूर अनाथ करने का पाप उसपर आएगा | शिकारी फिर मान जाता है और हिरणी का बच्चों को घर छोड़ कर आने का वादा मानकर उसे जाने देता है | थोड़ी देर में तीसरी हिरणी आती है और वो भी शिकारी को देखकर उससे प्राणदान माँगना शुरू करती है | उसका कहना था कि उसका ऋतुकाल अभी समाप्त हुआ है इसलिए उसे पति से मिल आने का समय दिया जाए | शिकारी को पता नहीं क्या सूझा था, वो अपने बच्चों के भूखे होने वगैरह का सोचता भी है मगर फिर से हिरणी को जाने देता है |
अब तक रात का चौथा पहर हो गया था | सुबह होने ही वाली थी कि अब एक हिरण वहां पहुंचा | अब जब शिकारी तीर चढ़ाता है तो हिरण बोला कि अगर शिकारी ने तीन हिरणियों और उसके बच्चों को मार डाला है तो उसके जीने का भी कोई ख़ास मकसद नहीं बचा | इसलिए शिकारी तीर चला दे ! चित्रभानु बताता है कि तीन हिरणियां वहां आई तो थी मगर उन सब के लौट आने के वादे पर उसने सबको जाने दिया है | अब हिरण कहता है कि अगर उसे मार दिया तो तीनों हिरणियां अपना वादा तो पूरा कर नहीं पाएंगी, क्योंकि पति तो वो है, उसी से मिलने गई हैं तीनों !
जैसा कि अभ्यास से होता है, वैसे ही, बार बार भलमनसाहत दिखाने से शायद आम हिन्दुओं टाइप, शिकारी चित्रभानु को भी दया दिखाने की आदत पड़ गई थी | अब वो हिरण को भी हिरणियों से मिल कर वापिस आने की इजाजत दे देता है | अब चारों शिकारों को जाने देने वाला शिकारी सोच ही रहा होता है कि क्या करे इतने में हिरण परिवार सहित उपस्थित हो जाता है | हिन्दुओं वाले हिरण थे तो मरने की स्थिति की स्थिति में भी वादा पूरा करने चले आये | पारधी चित्रभानु भी हिन्दू ही था तो वो ऐसा होता देख कर पश्चाताप और ग्लानी से भरा अपने मचान से नीचे उतर आया |
उधर रात भर पेड़ से बेलपत्र गिरने के कारण शिव जी सोच रहे थे ये घने जंगल में पूजा कौन कर रहा है ? तो उन्होंने भी शिकारी पर नजर बना रखी थी ! शिकारी कहता नहीं मार रहा, और हिरण परिवार कहता वादा पूरा होना चाहिए, इसकी बहस हो ही रही थी कि सुबह सुबह भगवान शिव भी पूजा का फल देने प्रकट हुए | हिरण परिवार को कठिनतम परिस्थिति में भी अपना किया वादा निभाने के लिए मोक्ष मिला | शिकारी को हिंसा के त्याग और पश्चाताप के फलस्वरूप मोक्ष की प्राप्ति हुई | ये ही कहानी थोड़े बहुत अंतर के साथ सभी हिन्दू शिवरात्रि की कथा के रूप में जानते हैं |
गुजरात का सोमनाथ हो, या महाकाल उज्जैन, काशी विश्वनाथ का मंदिर हो या फिर त्रयम्बकेश्वर नासिक, बैजनाथ बिहार का मंदिर हो या सुदूर रामेश्वरम, दुर्गम हिमालय का केदारनाथ हो, नेपाल का पशुपतिनाथ या फिर मद्रास का शैल मल्लिकार्जुन हर जगह यही कथा सुनाई जायेगी | ग्रंथों से कम वास्ता रखने वाले अघोरी हों, या भयानक रूप से शिक्षित नागा सन्यासी, सब इसी कथा का श्रवन करेंगे | ये कहानी विविधता में एकता का उदाहरण भी है | बहेलिये की कहानी है, सुनने वाले ब्राह्मण भी होंगे, तो मोक्ष के अधिकार पर जात-पात के बंधन की गुंजाइश भी नहीं रहती |
हिरणियों या हिरण के शिकार से उनके बच्चों यानि अगली पीढ़ी पर असर ना हो ये भी याद दिलाया गया है तो आज के सस्टेनेबल डेवलपमेंट की भी कहानी है | चित्रभानु पेड़ पर बैठा अनजाने ही पूजा कर बैठा था, तो मंदिरों में प्रवेश के लिय ऊँची-नीची जाति की बात करने वालों को भी सुननी चाहिए | हां नैरेटिव बिल्ड करने, साधारण कहानियों में वर्ण भेद, स्त्री विरोध या हाशिये पर के वर्ग का शोषण ढूँढने की कहानी खोज रहे लोगों को थोड़ी निराशा होगी | वो शायद इसे ना पढ़ना-सुनना चाहें | चुप्पी साधकर वो इसे भुलाने या इग्नोर करने की कोशिश जारी रख सकते हैं |
बाकी शिवरात्रि है तो “भक्तों” के साथ साथ “विभक्तों” अर्थात बंटे हुए लोगों को भी शुभकामनाएं !
✍🏻अभी और बाकी है
शिवरात्रि
रुद्र = तीव्र या भीषण तेज, जो खण्डन तथा नाश करता है।
शिव = शान्त तेज जो निर्माण करता है।
ताण्डव = क्रम विहीन, असम्बद्ध नृत्य, जिससे प्रलय होता है। शिव ताण्डव स्तोत्र भी दण्डक छन्द है, जिसमें ह्रस्व-दीर्घ क्रम सदा बदलता रहता है।
लास्य = रास। सभी का समन्वय कर सृष्टि करता है।
मास में श्रावण रुद्र है, नमी के कारण धूप अधिक तीक्ष्ण होती है जिसे रुद्र या रौन्द कहते हैं। गर्मी शान्त करने के लिए जल चढ़ाते हैं। फाल्गुन में संवत्सर की अग्नि शान्त हो जाती है, अतः पुनः संवत् जलाते हैं। फल्गु या दोल (डोल) का अर्थ खाली बाल्टी है, जिसका तेज निकल चुका है। मनुष्य से प्राण निकलने पर वह भी फल्गु हो जाता है। सौर मण्डल से निकला प्राण गय है, अतः पृथ्वी सतह पर सूर्य की उत्तर सीमा कर्क रेखा पर गया तथा फल्गु नदी है, जहां श्राद्ध होता है। फल्गु अर्थात् शून्य से कला या तेज भेद द्वारा विविध सृष्टि होती है, जैसा गजेन्द्र मोक्ष में लिखा है-फल्ग्व्या च कलयाऽऽकृताः।
शुक्ल पक्ष रुद्र तथा कृष्ण पक्ष शिव है।
दिन रुद्र तथा रात्रि शिव है।
१४ भुवन या जीव सर्ग हैं। अतः फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि होती है।
गणित के अनुसार शुक्ल पक्ष से मास आरम्भ होता है, अतः फाल्गुन कृष्ण पक्ष को माघ में गिना जायेगा। संवत्सर चक्र में उसके ठीक विपरीत ६ मास बाद श्रावण मास होगा।
शिव विवाह
कभी कभी शिवरात्रि को शिव विवाह भी कहते हैं। इसके कई अर्थ हैं।
सम्बलपुर (पश्चिम ओड़िशा) में ज्येष्ठ शुक्ल षष्ठी (शीतल षष्ठी) को शिव विवाह उत्सव मनाया जाता है। उसमें एक यजमान कन्यादान करते हैं, अन्य वर पक्ष के होते हैं। यह मनुष्य रूप में कार्तिकेय के माता पिता का विवाह है। कार्त्तिकेय के समय अभिजित नक्षत्र का पतन होने से धनिष्ठा नक्षत्र में अर्थात् माघ मास से संवत्सर का आरम्भ हुआ था (महाभारत, वन पर्व, २३०/८-१०)। उस समय धनिष्ठा नक्षत्र से वर्षा आरम्भ होती थी, जो प्रायः १५,८०० ईपू में था। आज भी मिथिला में वर्षा से ही संवत्सर आरम्भ मानते हैं। रामचरितमानस, बालकाण्ड में सावन-भादो मास को ही राम के २ अक्षरों का स्वरूप कहा है। कार्त्तिकेय के समय माघ से वर्षा तथा ज्येष्ठ से शीत ऋतु का आरम्भ होता था। अतः आज भी ज्येष्ठ शुक्ल षष्ठी को शीतल षष्ठी कहते हैं, यद्यपि उस समय सबसे अधिक ताप होता है।
तत्त्व रूप में शिव-शक्ति का मिलन कई प्रकार से कहा जाता है। इसके वर्णन से शङ्कराचार्य ने सौन्दर्य लहरी का आरम्भ किया है-
शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुम्,
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि।
अतस्त्वामाराध्यां हरिहरविरिञ्चादिभिरपि,
प्रणन्तुं स्तोतुं वा कथमकृतपुण्यः प्रभवति॥
लक्ष्मीधर टीका में शिव-शक्ति योग के १९ अर्थ लिखे हैं। अन्य अर्थ भी हैं। शैव दर्शन या शिव सूत्र के अनुसार परमशिव का २ भागों शिव-शक्ति में विभाजन होता है। पुनः उनके मिलन से सृष्टि का आरम्भ होता है। इस मिलन या विवाह को कई प्रकार से कहा गया है-पुरुष-प्रकृति, अग्नि-सोम, भौतिक विज्ञान में पदार्थ-ऊर्ज्जा, या वेद में इट्-ऊर्क, भृगु-अङ्गिरा।
मनुष्य रूप में स्थूल शरीर शव जैसा है, वह प्राण रूपी शक्ति के मिलन से स्पन्दन करता है तथा शिव होता है। इस स्पन्दन को रव कहा है, जिससे मनुष्य कर्म तथा यज्ञ करने में सक्षम है।
चत्वारि शृङ्गा त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य।
त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति, महोदेवो मर्त्यां आविवेश॥ (ऋक्, ४/५८/३)
शरीर में यज्ञ रूपी वृषभ रव करने से ही मनुष्य सम्म्मानित होता था। सर्वप्रथम पुरु ने तीन यज्ञ संस्था प्रचलित की, जिससे उनको सम्मान के लिए पुरु-रवा कहा गया। आज भी शिव-क्षेत्र काशी में सम्मान के लिए रवा शब्द प्रचलित है। इसका विपरीत अनरवा या अनेरिया का अर्थ अकर्मण्य या बेकार है। दक्षिण भारत में भी राव सम्मान सूचक उपाधि है, राजस्थान में रावल है। स्वयं पौलस्त्य भी बहुत रव करता था जिसके कारण उसे रावण कहा गया (तमिल में शब्दके अन्त में न् लगाते हैं जैसे रामन, कृष्णन, तेलुगू में लूटने रामुलू)। केवल शरीर विश्व की प्रतिमा है जिसका वर्णन अ से ह तक के अक्षरों से होता है, जिसे वाक्-अर्थ प्रतिपत्ति कहा है। अतः स्वयं को अहं कहते हैं तथा शक्ति क्षेत्र मिथिला में अहां सम्मान के लिए कहते हैं। शरीर तथा रव रूप शक्ति संयोग आध्यात्मिक शिव-पार्वती विवाह है।
काल रूप में रात्रि शक्ति है, तेज शिव रूप है। कालरात्रि के ८ रूप रात्रि सूक्त में हैं। विश्व का निर्माण १० रात्रि या अहः में कहा है जो सृष्टि के १० सर्ग हैं-१ अव्यक्त + ९ व्यक्त-
अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वे प्भवन्त्यहरागमे (गीता, ८/१८)
मनुष्य शरीर भी गर्भ में १० चान्द्र परिक्रमा (२७३ दिन) में बनता है। चान्द्र मण्डल का प्रेत शरीर पृथ्वी की १० परिक्रमा में बनता है (दशगात्र)।
रात्रि की शान्त स्थिति में निर्माण होता है, अतः यह गर्भ रूप शक्ति है। शक्ति पूजा भी रात्रि में होती है। रात्रि को शिव पूजा ही शिव-शक्ति विवाह है।
✍🏻फिर मिलते है