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षट्तिला एकादशी व्रत पूजा विधि

“षटतिला” का अर्थ है  ” षट” यानी 6 {छे} “तिला” यानी  तिल

 

कुल मिलाकर 6 प्रकार से तिल के प्रयोग को “षटतिला एकादशी” कहते हैं

 

एकादशी व्रत पूजा विधि

 

“षट्तिला एकादशी” के दिन मनुष्य को भगवान विष्णु के निमित्त व्रत रखना चाहिए। व्रत करने वालों को गंध, पुष्प, धूप दीप, ताम्बूल सहित विष्णु भगवान का षोड्षोपचार से पूजन करना चाहिए। उड़द और तिल मिश्रित खिचड़ी बनाकर भगवान को भोग लगाना चाहिए। रात्रि के समय तिल से 108 बार ‘ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय स्वाहा’ इस मंत्र से हवन करना चाहिए।

{तिल की उत्पत्ति प्रभु श्री हरि विष्णु के शरीर से हुई है इसीलिए तिल को धार्मिक कार्यों में पवित्र माना जाता है}

षटतिला एकादशी का व्रत रखने वालों को उस दिन तिल (Sesame) का प्रयोग करना होता है. इस व्रत में तिल का प्रयोग करने से सुख और सौभाग्य बढ़ता है. माघ मास में सर्दी होती है, तिल की तासीर गरम होती है और यह स्वास्थ्यवर्धक भी होता है. इस व्रत में तिल का प्रयोग करने से सेहत भी अच्छी रहती है

 षटतिला एकादशी के दिन तिल का प्रयोग 6 प्रकार से करते हैं. तिल के प्रयोग के बिना षटतिला एकादशी व्रत पूरा नहीं होता है, इसलिए आप भी यदि व्रत रखते हैं, तो इस प्रकार से तिल का प्रयोग करें

 

आइए जानते हैं कि “षटतिला एकादशी” व्रत में तिल का छे {6} प्रकार से प्रयोग कैसे करना है

 

  1. यदि आप षटतिला एकादशी का व्रत रखते हैं, तो उस दिन प्रात:काल में स्नान करने से पूर्व तिल का उबटन शरीर पर लगाएं . उसके बाद ही स्नान करें

 2 . स्नान करने के लिए तिल मिले हुए पानी का प्रयोग करें. इसके लिए आप बाल्टी में पानी भर लें और उसमें तिल मिला दें. फिर स्नान करें.

 3 .षटतिला एकादशी का व्रत रहने वाले व्यक्ति को तिल मिश्रीत जल पीना  एवं शरीर में तिल के तेल से मालिश करना चाहिए. ऐसा धार्मिक विधान है. ऐसा करना सेहत के लिए लाभदायक होता है

  1. षटतिला एकादशी व्रत के पूजा के समय भगवान विष्णु को तिल से बने खाद्य पदार्थों का भोग लगाएं . ऐसा करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और मनोकामनाओं को पूरा करते हैं. इस दिन व्रत रहने वालों को भी तिल से बने खाद्य पदार्थों को फलाहार में शामिल करना चाहिए

 5 . भगवान विष्णु की पूजा करते समय तिल से हवन करना चाहिए . इसके लिए आप ​तिल में गाय का घी मिलाकर हवन कर सकते हैं

  1. षटतिला एकादशी के दिन तिल का दान करना उत्तम माना जाता है .तिल का दान करने से व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त होता है. उसे स्वर्ग में स्थान मिलता है

माघ माह में तिल

 माघ माह में ‘संकष्टी चतुर्थी, ‘षटतिला एकादशी, ‘लोहड़ी”, ‘मकरसंक्रान्ति’ इन सभी त्यौहारों पर तिल का सर्वाधिक महत्व है। इसके पीछे हैं तिल के विशेष गुण जिनकी बजह से माघ माह में तिल को इतना महत्व दिया जाता है।

 1 .तिल का सेवन हमारे शरीर के लिए बहुत लाभदायक होता है। सर्दियों में तिल व उसके तेल दोनों का ही सेवन करना चाहिए। काले तिल व सफेद तिल दोनों का ही उपयोग औषधीय रूप में भी किया जाता है। तिल का तेल एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होता है। वाइरस, एजिंग और बैक्टीरिया से शरीर की रक्षा करता है।

  1. ठंड में तिल गुड़ दोनो समान मात्रा में लेकर मिला लें। उसके लड्डू बना लें। प्रतिदिन 2 बार 1-1 लड्डू दूध के साथ खाने से मानसिक दुर्बलता एवं तनाव दूर होते है। शक्ति मिलती है।
  1. कठिन शारीरिक श्रम करने पर सांस फूलना जल्दी बुढ़ापा आना बन्द हो जाता है। इससे चुस्ती व स्फूर्ती बनी रहती है।
  1. तिल व तिल के तेल के सेवन से व सिर में इसकी मालिश करने से न केवल बाल घने और चमकदार होते हैं बल्कि बालों का गिरना भी कम हो जाता है।
  1. प्रतिदिन दो चम्मच काले तिल को चबाकर खाइए और उसके बाद ठंडा पानी पीजिए। इसका नियमित सेवन करने से पुराना बवासीर भी ठीक हो जाता है।

 6 .ठंड में तिल और गुड़ सर्द हवा से बचाता है। जिससे सर्दी, खाँसी जैसे रोग भी दूर रहते हैं ।

  1. तिल का उपयोग चेहरे पर निखार के लिए भी किया जाता है। तिल को दूध में भिगोकर उसका पेस्ट चेहरे पर लगाने से चेहरे पर प्राकृतिक चमक आती है, और रंग भी निखरता है। इसके अलावा तिल के तेल की मालिश करने से भी त्वचा क्रांतिमय हो जाती है ।

 ৪. शरीर के किसी भी अंग की त्वचा के जल जाने पर, तिल को पीसकर घी और कपूर के साथ लगाने पर आराम मिलता है, और घाव भी जल्दी ठीक हो जाता है ।

  1. सूखी खाँसी होने पर तिल को मिश्री व पानी के साथ सेवन करने से लाभ मिलता है। इसके अलावा तिल के तेल को लहसुन के साथ गर्म करके, गुनगुने रूप में कान में डालने पर कान के दर्द में आराम मिलता है ।

 

* षटतिला एकादशी के दिन 6 तरह से तिल का प्रयोग करें।

* इस दिन तिल का दान अवश्‍य करना चाहिए।

* दुर्भाग्य, दरिद्रता दूर होकर मोक्ष देती है यह एकादशी।

 

 माघ कृष्ण पक्ष की यह एकादशी बहुत ही खास मानी गई है। इस दिन तिल के उपयोग के साथ-साथ निम्न कथा पढ़ने से दुर्भाग्य, दरिद्रता, कष्ट दूर होकर मोक्ष प्राप्त होता है।

 

आइए यहां पढ़ें खास कथा-

 

षट्तिला एकादशी कथा:-
 

षट्तिला एकादशी की कथा के अनुसार प्राचीन काल में मृत्युलोक में एक ब्राह्मणी रहती थी। वह सदैव व्रत किया करती थी। एक समय वह एक मास तक व्रत करती रही। इससे उसका शरीर अत्यंत दुर्बल हो गया। यद्यपि वह अत्यंत बुद्धिमान थी तथापि उसने कभी देवताओं या ब्राह्मणों के निमित्त अन्न या धन का दान नहीं किया था।

इससे मैंने सोचा कि ब्राह्मणी ने व्रत आदि से अपना शरीर शुद्ध कर लिया है, अब इसे विष्णुलोक तो मिल ही जाएगा परंतु इसने कभी अन्न का दान नहीं किया, इससे इसकी तृप्ति होना कठिन है। भगवान ने आगे कहा- ऐसा सोचकर मैं भिखारी के वेश में मृत्युलोक में उस ब्राह्मणी के पास गया और उससे भिक्षा मांगी। ब्राह्मणी बोली- महाराज किसलिए आए हो?

मैंने कहा- मुझे भिक्षा चाहिए। इस पर उसने एक मिट्टी का ढेला मेरे भिक्षापात्र में डाल दिया। मैं उसे लेकर स्वर्ग में लौट आया। कुछ समय बाद ब्राह्मणी भी शरीर त्याग कर स्वर्ग में आ गई। उस ब्राह्मणी को मिट्टी का दान करने से स्वर्ग में सुंदर महल मिला, परंतु उसने अपने घर को अन्नादि सब सामग्रियों से शून्य पाया।

घबरा कर वह मेरे पास आई और कहने लगी कि भगवन् मैंने अनेक व्रत आदि से आपकी पूजा की, परंतु फिर भी मेरा घर अन्नादि सब वस्तुओं से शून्य है। इसका क्या कारण है?

इस पर भगवान कहा- पहले तुम अपने घर जाओ। देवस्त्रियां आएंगी तुम्हें देखने के लिए। पहले उनसे षटतिला एकादशी का पुण्य और विधि सुन लो, तब द्वार खोलना। मेरे ऐसे वचन सुनकर वह अपने घर गई।

जब देवस्त्रियां आईं और द्वार खोलने को कहा तो ब्राह्मणी बोली- आप मुझे देखने आई हैं तो षट्तिला एकादशी का माहात्म्य मुझसे कहो। उनमें से एक देवस्त्री कहने लगी कि मैं कहती हूं। जब ब्राह्मणी ने षट्तिला एकादशी का माहात्म्य सुना तब द्वार खोल दिया। देवांगनाओं ने उसको देखा कि न तो वह गांधर्वी है और न आसुरी है वरन पहले जैसी मानुषी है। उस ब्राह्मणी ने उनके कथनानुसार षट्तिला एकादशी का व्रत किया।

इसके प्रभाव से वह सुंदर और रूपवती हो गई तथा उसका घर अन्नादि समस्त सामग्रियों से युक्त हो गया। अत: मनुष्यों को मूर्खता त्याग कर षट्तिला एकादशी का व्रत और लोभ न करके तिलादि का दान करना चाहिए। इससे अनेक प्रकार के कष्ट, दुर्भाग्य, दरिद्रता दूर होकर मोक्ष मिलता है।

 

सभी सनातनी हिन्दूओं के लिये एकादशी ग्यारस का उपवास करना बहूत अनिवार्य हैं।

 

 

इस दिन छ: कामों में तिल का उपयोग करने के कारण यह एकादशी ‘षटतिला’ कहलाती है, जो सब पापों का नाश करनेवाली हैं।

 

१] पानी में तिल डाल के स्नान करना।

२] तिलों का उबटन लगाना।

३] तिल डालकर पितरों का तर्पण करना, अर्घ्य देना।

४] अग्नि में तिल डालकर यज्ञादि करना।

५] तिलों का दान करना।

६] तिल को भोजन के काम में लेना।

 

तिलों की महिमा तो है लेकिन तिल की महिमा सुनकर तिल अति भी न खायें और रात्रि को तिल और तिलमिश्रित वस्तु खाना वर्जित हैं।

तेलों में सर्वश्रेष्ठ बहुगुण सम्पन्न तिल का तेल

तेलों में तिल का तेल सर्वश्रेष्ठ हैं। यह विशेषरूप से वातनाशक होने के साथ ही बलकारक, त्वचा, केश व नेत्रों के लिए हितकारी, वर्ण ( त्वचा का रंग ) को निखारने वाला, बुद्धि एवं स्मृतिवर्धक, गर्भाशय को शुद्ध करने वाला और जठराग्निवर्धक हैं। वात और कफ को शांत करने में तिल का तेल श्रेष्ठ हैं।

अपनी स्निग्धता, तरलता और उष्णता के कारण शरीर में सूक्ष्म स्त्रोतों में प्रवेश कर यह दोषों को जड़ से उखाड़ने तथा शरीर के सभी अवयवों को दृढ़ व मुलायम रखने का कार्य करता हैं। टूटी हुई हड्डियों व स्नायुओं को जोड़ने में मदद करता हैं।

तिल के तेल की मालिश करने व उसका पान करने से अति स्थूल (मोटे) व्यक्तियों का वजन घटने लगता है व कृश (पतले) व्यक्तियों का वजन बढ़ने लगता हैं। तेल खाने की अपेक्षा मालिश करने से ८ गुना अधिक लाभ करता हैं। मालिश से थकावट दूर होती है, शरीर हलका होता हैं। मजबूत व स्फूर्ति आती हैं। त्वचा का रुखापन दूर होता है, त्वचा में झुर्रियाँ तथा अकाल वार्धक्य नहीं आता। रक्तविकार, कमरदर्द, अंगमर्द (शरीर का टूटना) व वात-व्याधियाँ दूर रहती हैं।शिशिर ऋतू में मालिश विशेष लाभदायी हैं।

औषधीय प्रयोग

१] तिल का सेवन १०-१५ मिनट तक मुँह में रखकर कुल्ला करने से शरीर पुष्ट होता है, होंठ नहीं फटते, कंठ नहीं सूखता, आवाज सुरीली होती है, जबड़ा व हिलते दाँत मजबूत बनते हैं और पायरिया दूर होता हैं।

२] ५० ग्राम तिल के तेल में १ चम्मच पीसी हुई सोंठ और मटर के दाने बराबर हींग डालकर गर्म किये हुए तेल की मालिश करने से कमर का दर्द, जोड़ों का दर्द, अंगों की जकड़न, लकवा आदि वायु के रोगों में फायदा होता हैं।

३] २०-२५ लहसुन की कलियाँ २५० ग्राम तिल के तेल में डालकर उबालें। इस तेल की बूँदे कान में डालने से कान का दर्द दूर होता हैं।

४] प्रतिदिन सिर में काले तिलों के शुद्ध तेल से मालिश करने से बाल सदैव मुलायम, काले और घने रहते हैं, बाल असमय सफेद नहीं होते।

५] ५० मि.ली. तिल के तेल में ५० मि.ली. अदरक का रस मिला के इतना उबालें कि सिर्फ तेल रह जाय। इस तेल से मालिश करने से वायुजन्य जोड़ों के दर्द में आराम मिलता हैं।

६] तिल के तेल में सेंधा नमक मिलाकर कुल्ले करने से दाँतों के हिलने में लाभ होता हैं।

७] घाव आदि पर तिल का तेल लगाने से वे जल्दी भर जाते हैं।

 

श्री ग्यारस एकादशी चिंतन मनन कल श्री षट्तिला एकादशी 06 फरवरी 2024, मंगलवार को मनाई रखी जाएगी।

उपवास का पारण का समय अगले दिन 7 फरवरी (बुधवार) पारण का समय सूर्योदय के पश्चात ।।

षट्तिला एकादशी पर तिल के उपयोग की बड़ी महिमा है, यथा संभव इन छः प्रकार से तिल का उपयोग अवश्य करें ।

 

  1. तिल का उबटन शरीर पर लगाएं।
  2. तिल युक्त जल से स्नान करें।
  3. तिल से बना प्रसाद भगवान को भोग लगाएं।
  4. तिल से हवन करें।
  5. तिल का दान करें।
  6. तिल से पुर्वजों पितरों का तर्पण करें।
  7. एकादशी कथा सुनें समझें कहें।
  8. नाम जप ध्यान नाम संकीर्तन करें।
  9. स्नान आदि से निर्वत होकर हाथ अक्षत पुष्प जल लेकर, अपना नाम पिता का नाम पता स्थान, कुल गौत्र वंश कहकर रिध्दी सिध्दी सहित गणेश जी का आह्वान कर साक्षी मान पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश को साक्षी मान संकल्प लेंवें।

 

जय गोमाता जय गोपाल।।

 

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