Sshree Astro Vastu

सावन सोमवार विशेष - भोलेभाले शिव-शम्भु सबके आश्रय हैं,

सुर-असुर, मनुज-दनुज,पशु-पक्षी यानी उद्भिज, अण्डज, स्वेदज, जरायुज,  नद-समुद्र, पर्वत-पृथिवी, सूर्य-चन्द्र, विष-अमृत, स्मृत-विस्मृत समस्त विश्वके अपने हैं और वह स्वयं विश्वनाथ !

 

यानी परमात्मा का स्वरूप परस्पर विरुद्ध धर्मानुष्ठान है,

 

भूधर सुता यानी पर्वत की पार्वती गोद में – यह है पृथिवी से भोले का सम्बन्ध, साथ ही देवापगा मस्तके – मस्तक पर वैकुण्ठ/ब्रह्मलोक का सम्बन्ध गंगा के माध्यम से है ।

 

पराम्बा को भोले की गोद में बैठा देख-आलिङ्ग्याङ्कीकृतां देवीं बहुना – विद्याधर चित्रकेतु बोल पड़ा – अङ्गीकृत्य स्त्रियं – मिथुनीभूय हुये भरी सभा में निर्लज्जता से बैठे हैं,

सिर पर गंगा रूप में दूसरी स्त्री – हद है !!

 

पर वहीं विराजमान अम्बाने कहा – ब्रह्मा, भृगु, नारद, परमर्षि सनकादि, कपिलदेव, मनु ने धर्म नहीं टोका, तुम लोकों पर शासन करने वाले दंडधारी हो ?

भोले ने विषय-भोग का रूप प्रकट किया है तो वहीं सर पर विष्णुपदी गंगा उनके परम भक्तियोग को प्रकट करती है,

 

कामुक हैं या कि

कामदेव को भस्म करनेवाले कामारि हैं !

 

एक ओर गोद में राग है दूसरी ओर समस्त संसार को भस्मीभूत कर भभूत अंगों पर विभूषित है – यानी वैराग्य की पराकाष्ठा !

 

परस्पर विरोधी धर्मानुष्ठान !!

 

भगवान विष्णु का साला चन्द्र, अमृत रूप में उनके ललाट पर विराजित हो उन्हें चन्द्रशेखर , चंद्रमौली, शेखरेंदु आदि आदि बनाये है तो उन्हीं की ससुराल-समुद्र से मिला पहुरा हलाहल विष नीलकण्ठ को नीलकण्ठ बनाये है,

 

तीसरे नेत्र की अग्नि भभक रही तो वहीं शीतल जल धार गङ्गाधर बने बैठे हैं,

 

भभूत लगाकर  प्रेत-पिशाच-भूतभावन हैं,ठीक उससे विपरीत सुरवर हैं समस्त देवों के देव हैं – महादेव !!

 

शर्व हैं – संहारक हैं

पर वहीं,

सर्वाधिप हैं – सबके अधिपति हैं, सबके रक्षक हैं, मृत्युञ्जय हैं !

 

इनके अंग संग द्विजी अक्षुश्रुवा,  यानी साँप हैं – बिना कान के

तो वहीं शुक द्विज भी हैं सुनानेवाले !!

 

कपाली हैं यानी ढंग की एक माला तक नहीं,

तो वहीं दिक्पाल पाली हैं,

 

अनाथ हैं

(ईश्वर का कोई ईश्वर नहीं होता)

पर, विश्वनाथ हैं !

 

*खप्परधारी हैं इतने विकटपर, धनपति कुबेर सन्निकट !*

 

मुण्डमाल धारी हैं

पर गणपति, दक्ष आदि के मुण्ड सँवारी हैं !

 

जिनके डमरू से अक्षर नाद नि:सृत होते

वह स्वयं मौनव्रतधारी हैं !

 

हे परमात्मा ! आपका यह स्वरूप परस्पर विरुद्ध धर्मानुष्ठान है,

 

हमारी बुद्धि पार नहीं जा सकती, हम आपकी शरण हैं,

रक्षा करो, रक्षा करो रक्षा करो !!

 

आशुतोष तुम अवढर दानी

 

शिव पञ्चवक्त्र हैं यानी उनके पाँच मुख हैं, दस हस्त हैं, पञ्च-दश यानी पन्द्रह नेत्र हैं …

 

सुनते ही विधर्मी अट्टहास लगाता है .. तुम्हारा ईश्वर है या कॉमेडी फ़िल्म का कोई कार्टून ?

 

भक्त प्रशान्त था – उसने प्रतिप्रश्न कर दिया – चचा ! तुम्हरे कितने मुँह हैं ?

 

भक्त भक्त होत हैं – तुमको इतना भी नहीं पता ? अरे सभी का एक ही मुँह होता केवल दुमुँहे साँप और दोगलों को छोड़ कर,

 

भक्त मन ही मन बुदबुदाता है – हां, बेटा … आस्तीन में रहो या बाहर अपने आपको बहुत अच्छे से पहचानते हो तुम !

 

वो बोला – तुमने कुछ कहा ? तुम्हारे ओठ फड़फड़ा रये !

 

भक्त बोला – आँख रूप रूपी भोजन करती है, नासिका गंध का भोजन करती है, कान ध्वनि का भोजन करते हैं, जिह्वा स्वाद-रस का भोजन करती है, त्वचा स्पर्श का भोजन करती है ..

 

अब बताओ तुम्हारे पास कितने मुख हैं ?

 

सन्नाटा !!

 

दस दिशाएं ही महादेव का वरद हस्त हैं – कुछ भी उनकी पहुँच से बाहर नहीं,

 

हाथ,पाँव, बोलने वाली जिह्वा आदि पांच कर्मेन्द्रिय कान,आँख, नासिका, रसनादि पाँच ज्ञानेन्द्रिय !

यह भी दस !

 

और; इन सब पर दृष्टि रखते 15 नेत्र !

 

बाह्यकरण और अन्त:करण का भेद भी लौकिक दृष्टि से है – शिव सनातन हैं – उनमें यह भेद भी नहीं, वह घोर अघोरतम हैं और पवित्र से पवित्रतर, पवित्रतम् भी …

 

और बताऊँ ?

 

सामने वाला अदृश्य हो चुका था..

 

ऐसी सुतर्की सूत्र की बुद्धि देनेवाले आशुतोष तुम अवढर दानी ही हो !

 

विरुपाक्ष शिव समदृष्टि वाले हैं,

माने हैं तो विषम नेत्रों वाले,

पर संहार करते समय सबको सम दृष्टि से देखते ,

कोई भी हो छोटा – बड़ा, धनी – निर्धन सब बराबर !

 

भूतभावन भावभावेश्वर के संग, भव को भय से उद्धारने वाली, उबारनेवाली भवानी की दृष्टि शिव को देखते हुये माधुर्य के कारण तिरछी हो जाती है , विषम हो जाती है, पर उनकी दृष्टि में समता है, करुणा है , कृपा है ,

 

एक ही सृष्टि है,

उस पर इनकी दृष्टि भिन्न भिन्न होते हुये भी अभिन्न है,

 

अद्भुत विषमता से अपनी गृहस्थी को समता पर जमा रखे हैं,

 

*गृहस्थ आश्रम शेष तीन आश्रमों का आधार है,*

*इसी से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास सम्पुष्ट होते हैं,*

 

आश्रम और वर्ण व्यवस्था सनातन के आधार हैं और सनातन को सम्पुष्ट करते हैं,

 

शिव सनातन हैं,

उनका आदि यानी आरम्भ नहीं है, वे आदि हैं पर अनादि हैं,

इसी अनादि को हिंदी वालों ने अनाड़ी बोल दिया ,

अनाड़ी माने जो कोई काम आरम्भ ही न कर सके,

कर भी ले तो कदाचित पूरा न कर सके,

 

शिव का अन्त भी नहीं, वह अनंत हैं,

 

मने सनातन का अर्थ हुआ अनादि-अनन्त !

 

राग इतना कि वैराग्य अचम्भित और वैराग्य की पराकाष्ठा ऐसी कि राग सोचता है कि कामदेव भस्म करनेवाले मेरा नम्बर न लगा दें ?

 

और, यह दोनों के अनुरागी हैं!!

 

यह किसी भी आरम्भ और अन्त की गणना से परे है,

 

पता नहीं ब्रह्मा ने कैसे कुण्डली  लग्न गुण गण बैठाये होंगे ?

 

कुण्डली कागज पर इनकी बन ही नहीं सकती,  योगियों के कुण्डली जागरण के गुरु जो स्वयं हो, उनकी कुण्डली कागज पर बनेगी भी कैसे ?

 

लगन राम से लग रखी हो,

लग्न मिले कैसे ?

 

गुण गिने ही न जा सकें –  अनंत गुण हैं,

 

और गण ? गण हैं भूत भैरव !!

 

दो हाथ पति के, दो हाथ पत्नी के –  यही चतुर्भुज रूप है गृहस्थी का,

 

पशुपति होते हुए भी चतुष्पाद न होकर ‘चतुर्भुज गृहस्थी’ का दान देते – गौरांग स्वर्णांगी सपरिवार हम पर प्रसन्न हों,

आनंदहू के आनंद दाता … आनंदेश्वर !!

 

वर्ग शब्द से वे भलीभांति परिचित होंगे जो हिन्दी माध्यम से अपनी ऋषिकुलीय यानी स्कूलीय विद्या प्राप्त किये होंगे,

 

एक तो कक्षा का वर्ग ही होता,

जैसे कक्षा ४, वर्ग क, ४ ख, ४ ग आदि आदि,

यही वर्ग इंग्लिश मीडियम वालों का सेक्शन हो जाता है फोर्थ ए, फोर्थ बी, फोर्थ सी…

 

वर्ग गणित में चौकोर आकार ले लेता है  यानी जिसकी चार भुजाएं हों और बराबर हों मने स्क्वायर !

 

यही ईश्वर – स्वरूप में चतुर्भुज हो जाता धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष  – धाता-प्रदाता!

 

वर्गमूल यानी स्क्वायर रूट,

 

अब देखिए, एक ही शब्द ‘वर्ग’ पर आशय परिवर्तित होते जा रहे,

हमारे यहां एक वर्ग और है जो इंग्लिश के अल्फाबेट में नहीं है,

जैसे कि क वर्ग, इसमें क, ख, ग, घ ..आ जाते,

च वर्ग है – च, छ, ज, झ!

इस जानकारी को बचा कर रखिए, जैसे किसी योग जोड़ में इकाई  की हासिल अलग रखते हैं दहाई में जोड़ने के लिए, वैसे। आगे आवश्यकता पड़ेगी।

 

वैसे ही विद्वानों ने, ऋषियों ने हमारे-आपके पूर्वजों ने चतुर्वर्ग बोल सृष्टि को समझा,

 

आपने सुंदरकाण्ड में पढ़ा सुना होगा 

*तात स्वर्ग अपवर्ग सुख …*

 

इसमें पवर्ग यानी दुनिया का समस्त सुख आ जाता है, उसके बाद स्वर्ग सुख, उसके बाद अपवर्ग यानी मोक्ष।

 

अर्थ पूर्ति यानी पैसा, काम पूर्ति यानी मन की इच्छा पूर्ति, धर्म पूर्ति यानी स्वर्ग इन तीनों से ऊपर उठना मोक्ष ।

 

भगवान शिव ने हाथ में पिनाक नामक धनुष रख छोड़ा है जो तन, धन,भवन, प्रियजन आदि की रक्षा में है यानी कर्म शक्ति, पुरुषार्थ का प्रतीक। यह बाहर से दीखता है।

 

गले में फण वाला सर्प है, जैसे संसारी के भीतर इच्छा विषय रूपी विष भरा रहता है,

 

हम मरेंगे ऐसा किसी को सूझता ही नहीं, यही अमरता सर पर सवार होने का प्रतीक है अमृतत्व रूपी बालचंद्रमा।

 

भस्म है संसार की नि:सारता की प्रतीक, और मंदाकिनी यानी गंगा है ज्ञान, भक्ति, कर्म को सफल बनानेवाली धारा …

 

अब पहले हासिल रखा वर्ग प के साथ जोड़िए तो हुआ पवर्ग, यानी प फ ब भ म इनसे युक्त भगवान भोले अपवर्ग प्रदान करने में तनिक विलम्ब नहीं करते,

अब ये प वर्ग आपने ऊपर पढ़ा है, फिर से पढ़ लीजिए प से पिनाक, फ से फणिन्द्र, ब से बालेन्दु चन्द्रमा, भ से भस्म, म से मंदाकिनी इन सबसे युक्त यानी पवर्गीय शिव अपवर्गीय पद प्रदान करते हैं,

 

मने वही परस्पर विरुद्ध धर्माश्रय ।

 

देखिए ! उन्होंने जहां हाथ टिकाया है वह है सुमेरु पर्वत, यानी सोने का पहाड़, उनको कोई क्या ही सोना चढ़ाएगा? आप धन भेंट देने की सोच रहे तो देवताओं को भी धन देनेवाले कुबेर शिव की भ्रू भंगिमा की प्रतीक्षा करते हैं कि कब संकेत मिले और कब खजाना खाली करूँ,

 

कल्पवृक्ष, सुरभि कामधेनु आगे पीछे जिनके हों, चिंतामणि जैसी मणियों का ढेर लगा हो,

जैसे बच्चे घर में कंकड़ उछाल खेलते हैं वैसे ही गणपति कार्तिकेय मणियां उछालते फेंकते रहते,

 

ऋद्धि – सिद्धि – सी बहुयें आँगन में सहमी-सहमी आदर देते हुए डोलती हैं, एक बार  खोंख – खखार दें तो ये किसी का भी वारा न्यारा कर दें,

 

अमृत का आकर खजाना जिनका आश्रय पा पूजित होता है वह किसको अमरता देने में कंजूसी करेगा ?

 

इन सबको लेकर आप हमारे हृदय में आइये,

आप जब मेरी ओर चलेंगे

इस प्रसन्नता में मैं इंद्र द्वारा प्रस्तावित स्वर्ग का राज्य छोड़ सकता हूं, धन्वंतरि के अमृत कलश को सविनय ना कर सकता हूं, रत्नाकर समुद्र से विमुख मुद्रा हो सकता,

 

पर, हे शंभो!! आपके चलने से उड़ती पग धूलि कण से वंचित नहीं रहना चाहता, आप कीड़ा बना दें, चींटी बना दें, पर पग कनिका से वंचित न कीजियेगा..

 

आप आ रहे हैं अपने विचित्र कुनबे के संग,

मेरे मन को अद्भुत आनंद रंग का दान देने ..

 

आइये ! आइये !!

हे आसुतोष ! तुम अवढर दानी !!

 

*श्रीकृष्ण नटवर हैं, शिव नटराज हैं,*

*रसवर हैं श्रीकृष्ण,रसराज हैं शिव !!*

 

उनके अंक में, उनके अंक के सामने, उनके वामांग में विराजती हैं राजराजेश्वरी पराम्बा पार्वती, यह है भोले का #शृंगार रस !

 

भोले के सर गंगा विराज रही, और उछाल मार रही हास्य की उन्मुक्त अजस्र धारा,

साली को सिर चढ़ा रखने के आदि-अनादि गुरु हुये भोले !

 

कोई सर साली चढ़ा रखे तो हँसी का पात्र ही तो बनेगा !!

 

गंगा भोले की साली हैं ? ये कैसे ? बोले – जो घर पार्वती का, सो घर गंगा का, दोनों हिमराज हिमालय के घर की !

प्रकट हो गया भोले का *#हास्य रस,*

 

कलंकित चन्द्रमा भी जिनके आश्रय से वन्दनीय हो जाता है और सर पर विराजता है,  बाल भाल चन्द्र है भोले का #अद्भुत रस !

 

समस्त सृष्टि को अपने भ्रू विलास मात्र से भस्मीभूत करने की सामर्थ्य रखने वाले को #रौद्र नहीं कहेंगे तो और भला किसको कहेंगे ?

 

श्रीकृष्ण के समक्ष कुचाग्र कालकूट नामक विष से पाला पड़ा था, इधर समुद्र मन्थन में लिप्त मंदरकूटाग्र नि:सृत हलाहल से समस्त व्यष्टि समष्टि को रक्षित करने हेतु करुणावरुणालय भोले ने  कंठस्थ कर लिया !

विष भीतर क्यों न लिया ?

बोले – भगवान का रूप है उधर हृदय में,

अच्छा ! तो पान जैसे घुला कर रखते मुख में ?

नहीं, इधर जिह्वा पर भगवान का नाम है !

कुल्ला कर देते ?

फिर तो सृष्टि ही भस्म हो जाती ! यह है उनका  #करुण रस !

 

 

किसी की छाती पर विषधर साँप लटकें, कान में, जटा में, करधनी- बेल्ट भी भयंकर सर्पों की हो , इससे भयानक भी कुछ हो सकता ? यह है भोले का #भयानक रस !

 

किसी से भी युद्ध करना हो इनके पास पिनाक जैसा धनुष, सुदर्शन जैसा चक्र विद्यमान है, त्रैताप विनाशक त्रिशूल – वीर भोग्या वसुन्धरा – पार्वतीपति से वीर भला विश्व भर में और कौन ? #वीर रस गाथा लिखने में तो पृथ्वी को कागज बनाइये तो भी छोटी पड़ेगी,

 

त्रिनेत्री, अलालाटाक्षी,धूर्जटी, शूलपाणि, खटवांगी, गजाम्बरी, भस्मभूषित, त्रिपुण्ड्री, उग्र, कपाली, कामारि को #वीभत्स रस भूषित ही कह सकते,

 

उक्त आठ रसों से सुशोभित शिव स्वयं शान्त हैं और उनका ध्यान करते ही मन शान्त होने लगता है , ऐसे #शान्त रसाचार्यआप शिव को न भज यह बावरा मन भला किसको भजे ?

 

आशुतोष तुम अवढर दानी !

 

देखो ! पर्दा, पट हटा है, भीतर से भवानी की सेवा-सुश्रुषा में रत चामुंडा बाहर झांकती हुई आह्लादित स्वर में झटपट बोल पड़ी – “अहा! देवी से पुत्रावतरण हुआ है!”

 

शिव शक्ति जगत नियन्ता हैं,

 

जो जगतजननी हैं,

वे लीला मात्र के लिए कार्तिकेेय को जन्म का बानक बना बैठी हैं,

 

न वे सामान्य प्रसूता हैं,

न वहाँ वेदना है, मात्र आनंद उल्लास की तरंगें हिलोर मार रही हैं,

 

भक्तों को ध्यान में आलम्बन/ सहारा देने के लिए लीला रची जा रही, और कह-सुन कर निरंजनानन्द लूटने-लुटाने की व्यवस्था हो रही,

 

“कुमार स्वामि का अवतरण हुआ है  देवों की प्रार्थना से… “

 

भृङ्गकिरिटिका ने वाक्य दुहराया और झट से चामुण्डा को हर्षातिरेक से अंकवार में भर लिया,

 

उन दोनों के हिलोर खाते कर्कश उतुङ्गों मध्य बड़े-बड़े अस्थि पञ्जर की मालाएं आपस में खड़खड़ाकर टकराने लगती हैं, जिनके कोलाहल में देवताओं की ओर से बजायी जानेवाली दुन्दुभियों का सुनाद किसी को सुनायी ही नहीं पड़ रहा,

 

उधर भोले के गण प्रधान  भृङ्गिरिटि भी हर्षसंभ्रम में दोनों हाथ उठा जोर-जोर से बोल रहे – कुमार स्वामि का आगमन हुआ है, तुम लोग बैठ देख क्या रहे हो? उठो! मृदंग, झाँझ, नगाड़े , शंख आदि बाजे बजाओ, नाच प्रारम्भ करो !!

 

बधाई लेनेवालों की पंक्ति में सबसे पहले ब्रह्मा खड़े थे, भोले के पास देने को है क्या , करें तो करें क्या ?

 

कौतुकी शिव ने अपना आसन बाघाम्बर नीचे से निकाला और ब्रह्मा को ओढ़ा दिया मानो दुशाला ओढ़ाया हो, अब थी चंदन टीका लगाने की पारी, सो भभूत की ढेरी से अंजुरी भर-भर कर ब्रह्मा को पोतने लगे, और रही बात चिह्न देने की, जिसमें सामान्यत: कङ्कनादि आभूषण दिये जाते हैं, सो झट कलाई से कँगन रूपी दो सर्प निकाल ब्रह्मा के हाथ धर दिये,

 

ब्रह्मा तो छकट के भगे,

भगे तो भभूत उड़ने लगी,

बाघाम्बर गिर पड़ा – भूत बने ब्रह्मा को दी बधाई सामग्रियों (बाघम्बर, भभूत, सर्प कंकन ) के संबंध में सुन जगतजननी हँसने लगीं,

 

भवानी को प्रसन्नता का दान करते भोले शिव हम पर प्रसन्न हों,

 

एक बार इसी भभूत के चक्कर में बड़ी धमाचौकड़ी मची,

 

गले से लिपटे सर्प की आँखों में भोले के मस्तक पर विलेपित भस्म किसी वायु वेग के कारण गिर पड़ी,

 

साँप की आँख में भस्म पड़ने से उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था, वो घबड़ा कर जोर जोर से फुत्कार मारने लगा,

 

जैसे फूँक मार दी जाय तो राख में छिपी आग जल जाती है वैसे ही साँप की फुफ्कार से शिव का तीसरा नेत्र प्रज्ज्वलित हो उठा,

 

तीसरे नेत्र की ज्वाला से सर पर विराजित चन्द्रमा को आँच लगी,

 

उसमें से अमृत टपक पड़ा,

 

अमृत टपका और पड़ा कहाँ ?

बोले – भोले के गज चर्म पर, जो भोले नीचे लपेटे हुये थे,

 

मने अग्नि जले तो ऊपर उठे और द्रव टपके तो नीचे गिरे यह विज्ञान सिद्धांत बच्चों को कथा से समझा दिया गया,

 

हाँ तो, अमृत पड़ते ही हाथी जीवित हो उठा और चिग्घाड़ता हुआ इधर उधर दौड़ने लगा,

 

उधर तो हाथी जीवित हो भगा और इधर शिव बाबा दिगंबर बाबा हो गये, मने नंगू मंगू !!

 

मुसीबत इतने पर ही नहीं रुकी,

हाथी की गर्जना से नंदी बैल भड़क कर भगा, उसको रोकने के लिए जैसे थे वैसे ही भोले भी उस बैल के पीछे भगे,

 

यह अजीबोगरीब धमाचौकड़ी, धमाल देख कर जगतजननी भवानी पेट पकड़ कर लोटपोट हुये जा रहीं,

 

भवानी को निर्मल निश्च्छल आनंद का दान देते भोले हम पर प्रसन्न हों..

 

आसुतोष तुम अवढर दानी

 

*रुद्र हैं रौद्र हैं भयंकर हैं*

*पर शान्त हैं,*

 

लोक कल्याणार्थ भिक्षाटन करते विचरण करते हैं,

पर अभी कमल पर आसन जमाये बैठे हैं या पद्मासन में बैठे हैं या दोनो – पद्म पर पद्मासन लगाये स्थिर हैं,

 

राजाओं महाराजाओं के मुकुट में हीरे, मणि जड़े होते हैं,

इनके पास मुकुट नहीं हैं,

पर ये तो राजाओ, महाराजाओं के भी महाराज हैं – राजराजेश्वर हैं सो इनका मुकुट विशिष्ट है – अमृत स्राव करता चन्द्रमा इनका मौर मुकुट है,

 

ब्रह्मा ने एक बार इनकी बराबरी, समानता करने के लिए अपने आपको पाँच मुख वाला कर लिया, जैसे फूल डाल से अलग करते हैं ऊँगली और अंगूठे के नाखून से, वैसे इन पंचवक्त्र ने ब्रह्मा के पांचवे सर को कुपुट लिया और फिर से चतुर्मुख कर दिया,

ससुर दक्ष और बेटे गणाध्यक्ष पर भी इस विद्या का प्रयोग कर चुके, गजबे हैं,

 

सोम-सूर्य-अग्नि यानी समग्र ऊर्जा – उष्मा – तेज – आह्लाद – गति आदि इनकी कृपा दृष्टि में समाये हैं,

 

दाहिने और बाएं  पाँच – पाँच हाथों में अभय प्रदान करते त्रिशूल, वज्र, खङ्ग, परशु , अभय मुद्रा और नाग, पाश, घंटा, अंकुश, प्रलयाग्नि हैं

 

प्रलयंकर हैं

पर तरह – तरह के अलंकरण यानी ज्वैलरी देख लो !!

 

स्फटिक मणि सी आभा जिनके गौर शरीर से प्रस्फुटित हो रही हो,

 

ऐसे पार्वती के ईश काशीश हमें सब देने को आतुर हैं ,

केवल महादेव महादेव महादेव बोल कर सिर झुका देना है,

 

इन दीन दयाल को देना भाता है, माँगने वाले सुहाते हैं, इनके जैसा देनेवाला कोई और नहीं,

 

दानी कहुँ संकर – सम नाहीं।

दीन-दयालु दिबोई भावै, जाचक सदा सोहाहीं ।।

 

आसुतोष तुम अवढर दानी।

💐

*शान्तं पद्मासनस्थं शशधरमुकुटं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रं* –

*शूलं वज्रं च खड्गं परशुभयदं दक्षभागे वहन्तम् ।*

*नागं पाशं च घण्टां प्रलयहुतवहं साङ्कुशं वामभागे -*

*नानालङ्कारयुक्तं स्फटिकमणिनिभं पार्वतीशं नमामि।।

सावन- उत्सव का महीना

आषाढ मास जगन्नाथ ने ले लिया तो सावन मास विश्वनाथ ने।

सावन शिवरात्रि: एक आध्यात्मिक उत्सव का दिव्य अनुभव

आप सभी लोगों से निवेदन है कि हमारी पोस्ट अधिक से अधिक शेयर करें जिससे अधिक से अधिक लोगों को पोस्ट पढ़कर फायदा मिले |
Share This Article
error: Content is protected !!
×