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शनि ऐसा ग्रह है, जो कुंडली के सभी भावों में अपना अलग अलग प्रभाव रखता है।

आपकी कुंडली में शनि किस भाव में है, इससे आपके पूरे जीवन की दिशा, सुख, दुख आदि सभी बात निर्धारित हो जाती है। शनि को कष्टप्रदाता के रूप में अधिक जाना जाता है। किसी ज्योतिषाचार्य से अपना अन्य प्रश्न पूछने के पहले व्यक्ति यह अवश्य पूछता है कि शनि उस पर भारी तो नहीं। भारतीय ज्योतिष में शनि को नैसर्गिक अशुभ ग्रह माना गया है। शनि कुंडली के त्रिक (6, 8, 12) भावों का कारक है।

शनि से अधर्मियों व अनाचारियों को ही दंड स्वरूप कष्ट मिलते हैं। मत्स्य पुराण के अनुसार शनि की कांति इंद्रनीलमणि जैसी है। कौआ उसका वाहन है। उसके हाथों में धनुष बाण, त्रिशूल और वरमुद्रा हैं। शनि का विकराल रूप भयानक है। यह मकर और कुंभ राशियों का स्वामी तथा मृत्यु का देवता है। यह ब्रह्म ज्ञान का भी कारक है, इसीलिए शनि प्रधान लोग संन्यास ग्रहण कर लेते हैं।

शनि सूर्य का पुत्र है। इसकी माता छाया एवं मित्र राहु और बुध हैं। शनि के दोष को राहु और बुध दूर करते हैं।

शनि दंडाधिकारी भी है। यही कारण है कि यह साढ़े साती के विभिन्न चरणों में जातक को कर्मानुकूल फल देकर उसकी उन्नति व समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है। कृषक, मजदूर एवं न्याय विभाग पर भी शनि का अधिकार होता है। जब गोचर में शनि बली होता है तो इससे संबद्ध लोगों की उन्नति होती है।

 

शनि भाव 3, 6,10, या 11 में शुभ प्रभाव प्रदान करता है। प्रथम, द्वितीय, पंचम या सप्तम भाव में हो तो अरिष्टकर होता है। चतुर्थ, अष्टम या द्वादश भाव में होने पर प्रबल अरिष्टकारक होता है। यदि जातक का जन्म शुक्ल पक्ष की रात्रि में हुआ हो और उस समय शनि वक्री रहा हो तो शनिभाव बलवान होने के कारण शुभ फल प्रदान करता है।

 

शनि सूर्य के साथ 15 अंश के भीतर रहने पर अधिक बलवान होता है। जातक की 36 एवं 42 वर्ष की उम्र में अति बलवान होकर शुभ फल प्रदान करता है। उक्त अवधि में शनि की महादशा एवं अंतर्दशा कल्याणकारी होती है।

 

जिस व्यक्ति की कुंडली में शनि प्रथम भाव में हो वह व्यक्ति राजा के समान जीवन जीने वाला होता है। यदि शनि अशुभ फल देने वाला है तो व्यक्ति रोगी, गरीब और बुरे कार्य करने वाला होता ह

 

जिन जातकों के जन्म काल में शनि वक्री होता है वे भाग्यवादी होते हैं। उनके क्रिया-कलाप किसी अदृश्य शक्ति से प्रभावित होते हैं। वे एकांतवासी होकर प्रायः साधना में लगे रहते हैं।धनु, मकर, कुंभ और मीन राशि में शनि वक्री होकर लग्न में स्थित हो तो जातक राजा या गांव का मुखिया होता है और राजतुल्य वैभव पाता है।

 

जिस जातक की कुंडली में दूसरे घर में शनि हो, वह लकड़ी संबंधी व्यापार ,कोयला एवंलोहे के व्यापार में धन अर्जित करता हैं। उसे निंदित कार्यो तथा साधनों से प्रचुरसंपाति प्राप्त होती हैं। वह श्रेष्ठ व बिना स्वीकारी जाने वाली विधाओ का अध्यनकरता हैं।

 

भृगु सूत्र के अनुसार दूसरे भाव में शनि से जातक निर्धनहोता हैं । आंखो की बीमारियाँ उसे कष्ट देती रहेगी। ऐसे जातक के दो विवाह भी हो सकते हैं।

 

दूसरे भाव में शनि जातक को परिवार से दूर करता हैं। ऐसाजातक सुख साधन – समार्धी की खोज में दूर देश–विदेश की यात्रा करता हैं। ऐसा जातक पिता के साथ रहा कर धन कभी अर्जित कभी नहीं कर सकता।

यदि शनि दूसरे घर में हो तो जातक का चेहरा अच्छा न होगा। ऐसे लोगों को किसी न किसी प्रकार के नशे(पान , सिगरेट , शराब आदि ) की आदत होती हैं।

शनि का समाप्त होने वाली घटना या वस्तु से सम्बन्ध|| शनि बूढ़ा ग्रह है।पुरानी वस्तु या जिस भी विषय से सम्बंधित विषय पुराना है उन विषयो का कारक होता है।जिस वस्तु की समाप्ति या किसी भी घटना,प्राणी के अंत का नाम शनि है क्योंकि शनि का स्वभाव कमी करना होता है इसकी दृष्टि जहाँ भी पड़ती है उस स्थान सम्बंधित फल की हानि करते कमी करती है।शनि मृत्यु का कारक होता है किसी भी जातक की मृत्यु होने में किसी न किसी माध्यम से शनि का योगदान होता है।जातक की मृत्यु होने के बाद जब इहलोक का जीवन समाप्त हो जाता है तब उसका शरीर शमशान में लेकर जलाया जाता है,कब्रस्थान में दफनाया जाता है इन जगहों का कारक भी शनि है।इन स्थानों पर शनि का वास रहता है, अधिकतर इन जगहों पर सुनसान रहती है अकेला पन रहता है जो शनि के ही कारक तत्व है।शनि की दृष्टि में क्रूरता होती है जिस कारण यह जहाँ दृष्टि डालता है वहाँ के फल में कमी कर देता है।कुंडली के जिस भाव पर शनि की दृष्टि होती है उस भाव के फल में कुछ न कुछ हानि/कमी आ ही जाती है।छठे भाव और शनि की दृष्टि शुभ फल देती है क्योंकि छठा भाव रोग, ऋण, शत्रुबाधा और कर्ज का होता है इस भाव पर शनि दृष्टि इन दुःख फलो का नाश करके जातक के कल्याणकारी बन जाती है।कोई वस्तु पुरानी या उस वस्तु के आखरी समय मतलब पुरानी हो जाने के बाद आपको मिलती है तो समझ जाइए इस पुरानी वस्तु मिलने का कारण शनि होता है राहु का भी इसमें योगदान होने पर वस्तु बहुत पुरानी हो जाती है या बहुत खंडित।इस तरह के विषय से सम्बंधित वस्तुए पहले ही उपयोग ही चुकी होती है।जातक का मन सबसे ज्यादा जातक को प्रभावित करता है मन का कारक चंद्र है।जब शनि चंद्र के साथ युति या दृष्टि सम्बन्ध बनाता है या शनि कि दृष्टि चंद्र पर होती है तब जातक का मन उदास ज्यादा रहता है क्योंकि शनि उदासी का कारक है तो चंद्र मन का।इस तरह चंद्र जो मन है वह शनि के प्रभाव में आ जाता है तब वह मानसिक ख़ुशी या सुख जातक को उठाने नही देता।सुख और ख़ुशी होते हुए भी जातक को सुख और ख़ुशी की कमी महसूस होती है।यह सब शनि का ही प्रभाव होता है।शनि के कारण शुभ फल में कमी आ रही हो तो शनि शांति के लिए शनि की वस्तुओ से पीपल पूजा, शमी वृक्ष पूजा, शनि मन्त्र जप, शनि स्त्रोत का पाठ करना, गरीबो और असहाय लोगो की सहायता करने से, शनि का प्रभाव् शुभ प्रभाव देने लगता है।

 

शनिभावफल

 

जिसके शनि जन्मसमय लग्नमें विद्यमान होवे वह अल्पगतिवाला, मदकरके पीडित अर्थात् मदी, अधम छोटे २ वालोंवाला और दुर्बल होता है, यदि शनैश्चर शत्रुके घरमें होय तो अपने बंधुमित्रोंसे विग्रह होवै ।

 

जिसके शनि दूसरे भावमे स्थित होय वह सत्य बोलनेवाला धनकरके युक्त, चंचलनेत्रोंवाला, संग्रह करनेमें रत, चौर्यपरायण और सदा नियत होता है ।

 

जिसके शनि तीसरे भावमें स्थित होय उसके सर्व सहोदरों ( भाइयों ) के नाश करनेवाला होता है, अपने कुलके अनुकूल वह राजाके समान और अपने पुत्रकलत्र आदिसे युक्त होता है ।

 

जिसके शनि चौथे भावमें स्थित होय तो उसके बंधुओंका विनाशक होता है तथा रोगको करता है, यदि व्रकी शनि होय तो स्त्री, पुत्र, नौकर आदिसे रहित और ग्रामान्तरमें दुःखको देनेवाला होता है ।

 

जिसके शत्रुघरमें प्राप्त शनैश्चर पंचमभावमें स्थित होय तो उसे पुत्रार्यसे हीन और दुःखको करता है, यदि शनैश्चर उच्चका हो, अपने घरका हो अथवा मित्रके घरका हो तो कभी एक पुत्रको देता है ॥१-५॥

 

जिसके शनैश्चर हीनवली अथवा शत्रु व नीचराशिमें प्राप्त होकर छठे भावमें स्थित होय तो उस मनुष्यके कुलको क्षय करनेवाला होता है और अन्यत्र अथवा उच्चका होकर स्थित होय तो शत्रुओंका नाश करनेवाला और पूर्ण अर्थ कामको देनेवाला होता है,

 

मनुष्योंके शनि सप्तम भावमें स्थित स्त्रियोंका विनाश करता है, रोगको देता है और दंभवान् होता है अंगहीन और मित्रके वंशकी कन्यासे मित्रता करनेवाला होता है ।

 

जिसके शनैश्चर अष्टमभावमें स्थित होय वह देशान्तरमें निवास करता है और दुःखका भागी ( दुःखी ) होता है एवं चोरीके अपराध करके नीचजनकरके मृत्युको प्राप्त होता है और ऑंखोंका रोगी होता है ।

 

जिसके शनि नवमभावमें स्थित होय वह पाखंडका करनेवाला, धर्मार्थसे रहित, पितासे छल करनेवाला, मदमें अनुरक्त, धनहीन, रोगी, दुष्टस्त्रीवाला और हीनवीर्यवाला होता है ॥६-९॥

 

जिसके शनैश्चर दशमभावमें स्थित होय बडा धनवान् और नृत्य करनेवाले मनुष्योंमें रत रहनेवाला, परदेशमें लाभवाला, राजमंदिरमें निवास करनेवाला, शत्रुवर्गसे अभय और मानी होता है ।

 

जिसके शनैश्चर ग्यारहवें भावमें स्थित होय वह धनवान्, विमृश्य, बहुतभोग्यका भागी, उज्ज्वलताका अनुरागी, प्रतापवान्, शीलवान् और बालअवस्थामें रोगी होता है ।

 

जिसके शनि बारहवें भावमें स्थित होय वह पंचगणका स्वामी, रोगकरके युक्त, छोटे कदवाला, दुःखी, जंघामें व्रण ( फोडा ) वाला दुष्टबुद्धिवाला, दुर्बल अंगोंवाला और सदा पक्षी आदि जीवोंके मारनेमें रत होता है ॥१०-१२॥

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