
आपकी कुंडली में शनि किस भाव में है, इससे आपके पूरे जीवन की दिशा, सुख, दुख आदि सभी बात निर्धारित हो जाती है। शनि को कष्टप्रदाता के रूप में अधिक जाना जाता है। किसी ज्योतिषाचार्य से अपना अन्य प्रश्न पूछने के पहले व्यक्ति यह अवश्य पूछता है कि शनि उस पर भारी तो नहीं। भारतीय ज्योतिष में शनि को नैसर्गिक अशुभ ग्रह माना गया है। शनि कुंडली के त्रिक (6, 8, 12) भावों का कारक है।
शनि से अधर्मियों व अनाचारियों को ही दंड स्वरूप कष्ट मिलते हैं। मत्स्य पुराण के अनुसार शनि की कांति इंद्रनीलमणि जैसी है। कौआ उसका वाहन है। उसके हाथों में धनुष बाण, त्रिशूल और वरमुद्रा हैं। शनि का विकराल रूप भयानक है। यह मकर और कुंभ राशियों का स्वामी तथा मृत्यु का देवता है। यह ब्रह्म ज्ञान का भी कारक है, इसीलिए शनि प्रधान लोग संन्यास ग्रहण कर लेते हैं।
शनि सूर्य का पुत्र है। इसकी माता छाया एवं मित्र राहु और बुध हैं। शनि के दोष को राहु और बुध दूर करते हैं।
शनि दंडाधिकारी भी है। यही कारण है कि यह साढ़े साती के विभिन्न चरणों में जातक को कर्मानुकूल फल देकर उसकी उन्नति व समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है। कृषक, मजदूर एवं न्याय विभाग पर भी शनि का अधिकार होता है। जब गोचर में शनि बली होता है तो इससे संबद्ध लोगों की उन्नति होती है।
शनि भाव 3, 6,10, या 11 में शुभ प्रभाव प्रदान करता है। प्रथम, द्वितीय, पंचम या सप्तम भाव में हो तो अरिष्टकर होता है। चतुर्थ, अष्टम या द्वादश भाव में होने पर प्रबल अरिष्टकारक होता है। यदि जातक का जन्म शुक्ल पक्ष की रात्रि में हुआ हो और उस समय शनि वक्री रहा हो तो शनिभाव बलवान होने के कारण शुभ फल प्रदान करता है।
शनि सूर्य के साथ 15 अंश के भीतर रहने पर अधिक बलवान होता है। जातक की 36 एवं 42 वर्ष की उम्र में अति बलवान होकर शुभ फल प्रदान करता है। उक्त अवधि में शनि की महादशा एवं अंतर्दशा कल्याणकारी होती है।
जिस व्यक्ति की कुंडली में शनि प्रथम भाव में हो वह व्यक्ति राजा के समान जीवन जीने वाला होता है। यदि शनि अशुभ फल देने वाला है तो व्यक्ति रोगी, गरीब और बुरे कार्य करने वाला होता ह
जिन जातकों के जन्म काल में शनि वक्री होता है वे भाग्यवादी होते हैं। उनके क्रिया-कलाप किसी अदृश्य शक्ति से प्रभावित होते हैं। वे एकांतवासी होकर प्रायः साधना में लगे रहते हैं।धनु, मकर, कुंभ और मीन राशि में शनि वक्री होकर लग्न में स्थित हो तो जातक राजा या गांव का मुखिया होता है और राजतुल्य वैभव पाता है।
जिस जातक की कुंडली में दूसरे घर में शनि हो, वह लकड़ी संबंधी व्यापार ,कोयला एवंलोहे के व्यापार में धन अर्जित करता हैं। उसे निंदित कार्यो तथा साधनों से प्रचुरसंपाति प्राप्त होती हैं। वह श्रेष्ठ व बिना स्वीकारी जाने वाली विधाओ का अध्यनकरता हैं।
भृगु सूत्र के अनुसार दूसरे भाव में शनि से जातक निर्धनहोता हैं । आंखो की बीमारियाँ उसे कष्ट देती रहेगी। ऐसे जातक के दो विवाह भी हो सकते हैं।
दूसरे भाव में शनि जातक को परिवार से दूर करता हैं। ऐसाजातक सुख साधन – समार्धी की खोज में दूर देश–विदेश की यात्रा करता हैं। ऐसा जातक पिता के साथ रहा कर धन कभी अर्जित कभी नहीं कर सकता।
यदि शनि दूसरे घर में हो तो जातक का चेहरा अच्छा न होगा। ऐसे लोगों को किसी न किसी प्रकार के नशे(पान , सिगरेट , शराब आदि ) की आदत होती हैं।
शनि का समाप्त होने वाली घटना या वस्तु से सम्बन्ध|| शनि बूढ़ा ग्रह है।पुरानी वस्तु या जिस भी विषय से सम्बंधित विषय पुराना है उन विषयो का कारक होता है।जिस वस्तु की समाप्ति या किसी भी घटना,प्राणी के अंत का नाम शनि है क्योंकि शनि का स्वभाव कमी करना होता है इसकी दृष्टि जहाँ भी पड़ती है उस स्थान सम्बंधित फल की हानि करते कमी करती है।शनि मृत्यु का कारक होता है किसी भी जातक की मृत्यु होने में किसी न किसी माध्यम से शनि का योगदान होता है।जातक की मृत्यु होने के बाद जब इहलोक का जीवन समाप्त हो जाता है तब उसका शरीर शमशान में लेकर जलाया जाता है,कब्रस्थान में दफनाया जाता है इन जगहों का कारक भी शनि है।इन स्थानों पर शनि का वास रहता है, अधिकतर इन जगहों पर सुनसान रहती है अकेला पन रहता है जो शनि के ही कारक तत्व है।शनि की दृष्टि में क्रूरता होती है जिस कारण यह जहाँ दृष्टि डालता है वहाँ के फल में कमी कर देता है।कुंडली के जिस भाव पर शनि की दृष्टि होती है उस भाव के फल में कुछ न कुछ हानि/कमी आ ही जाती है।छठे भाव और शनि की दृष्टि शुभ फल देती है क्योंकि छठा भाव रोग, ऋण, शत्रुबाधा और कर्ज का होता है इस भाव पर शनि दृष्टि इन दुःख फलो का नाश करके जातक के कल्याणकारी बन जाती है।कोई वस्तु पुरानी या उस वस्तु के आखरी समय मतलब पुरानी हो जाने के बाद आपको मिलती है तो समझ जाइए इस पुरानी वस्तु मिलने का कारण शनि होता है राहु का भी इसमें योगदान होने पर वस्तु बहुत पुरानी हो जाती है या बहुत खंडित।इस तरह के विषय से सम्बंधित वस्तुए पहले ही उपयोग ही चुकी होती है।जातक का मन सबसे ज्यादा जातक को प्रभावित करता है मन का कारक चंद्र है।जब शनि चंद्र के साथ युति या दृष्टि सम्बन्ध बनाता है या शनि कि दृष्टि चंद्र पर होती है तब जातक का मन उदास ज्यादा रहता है क्योंकि शनि उदासी का कारक है तो चंद्र मन का।इस तरह चंद्र जो मन है वह शनि के प्रभाव में आ जाता है तब वह मानसिक ख़ुशी या सुख जातक को उठाने नही देता।सुख और ख़ुशी होते हुए भी जातक को सुख और ख़ुशी की कमी महसूस होती है।यह सब शनि का ही प्रभाव होता है।शनि के कारण शुभ फल में कमी आ रही हो तो शनि शांति के लिए शनि की वस्तुओ से पीपल पूजा, शमी वृक्ष पूजा, शनि मन्त्र जप, शनि स्त्रोत का पाठ करना, गरीबो और असहाय लोगो की सहायता करने से, शनि का प्रभाव् शुभ प्रभाव देने लगता है।
शनिभावफल
जिसके शनि जन्मसमय लग्नमें विद्यमान होवे वह अल्पगतिवाला, मदकरके पीडित अर्थात् मदी, अधम छोटे २ वालोंवाला और दुर्बल होता है, यदि शनैश्चर शत्रुके घरमें होय तो अपने बंधुमित्रोंसे विग्रह होवै ।
जिसके शनि दूसरे भावमे स्थित होय वह सत्य बोलनेवाला धनकरके युक्त, चंचलनेत्रोंवाला, संग्रह करनेमें रत, चौर्यपरायण और सदा नियत होता है ।
जिसके शनि तीसरे भावमें स्थित होय उसके सर्व सहोदरों ( भाइयों ) के नाश करनेवाला होता है, अपने कुलके अनुकूल वह राजाके समान और अपने पुत्रकलत्र आदिसे युक्त होता है ।
जिसके शनि चौथे भावमें स्थित होय तो उसके बंधुओंका विनाशक होता है तथा रोगको करता है, यदि व्रकी शनि होय तो स्त्री, पुत्र, नौकर आदिसे रहित और ग्रामान्तरमें दुःखको देनेवाला होता है ।
जिसके शत्रुघरमें प्राप्त शनैश्चर पंचमभावमें स्थित होय तो उसे पुत्रार्यसे हीन और दुःखको करता है, यदि शनैश्चर उच्चका हो, अपने घरका हो अथवा मित्रके घरका हो तो कभी एक पुत्रको देता है ॥१-५॥
जिसके शनैश्चर हीनवली अथवा शत्रु व नीचराशिमें प्राप्त होकर छठे भावमें स्थित होय तो उस मनुष्यके कुलको क्षय करनेवाला होता है और अन्यत्र अथवा उच्चका होकर स्थित होय तो शत्रुओंका नाश करनेवाला और पूर्ण अर्थ कामको देनेवाला होता है,
मनुष्योंके शनि सप्तम भावमें स्थित स्त्रियोंका विनाश करता है, रोगको देता है और दंभवान् होता है अंगहीन और मित्रके वंशकी कन्यासे मित्रता करनेवाला होता है ।
जिसके शनैश्चर अष्टमभावमें स्थित होय वह देशान्तरमें निवास करता है और दुःखका भागी ( दुःखी ) होता है एवं चोरीके अपराध करके नीचजनकरके मृत्युको प्राप्त होता है और ऑंखोंका रोगी होता है ।
जिसके शनि नवमभावमें स्थित होय वह पाखंडका करनेवाला, धर्मार्थसे रहित, पितासे छल करनेवाला, मदमें अनुरक्त, धनहीन, रोगी, दुष्टस्त्रीवाला और हीनवीर्यवाला होता है ॥६-९॥
जिसके शनैश्चर दशमभावमें स्थित होय बडा धनवान् और नृत्य करनेवाले मनुष्योंमें रत रहनेवाला, परदेशमें लाभवाला, राजमंदिरमें निवास करनेवाला, शत्रुवर्गसे अभय और मानी होता है ।
जिसके शनैश्चर ग्यारहवें भावमें स्थित होय वह धनवान्, विमृश्य, बहुतभोग्यका भागी, उज्ज्वलताका अनुरागी, प्रतापवान्, शीलवान् और बालअवस्थामें रोगी होता है ।
जिसके शनि बारहवें भावमें स्थित होय वह पंचगणका स्वामी, रोगकरके युक्त, छोटे कदवाला, दुःखी, जंघामें व्रण ( फोडा ) वाला दुष्टबुद्धिवाला, दुर्बल अंगोंवाला और सदा पक्षी आदि जीवोंके मारनेमें रत होता है ॥
*शनि मंगल की युति*
शनि को कार्य के लिये और मंगल को तकनीक के लिये माना जाता है। शनि का रंग काला है तो मंगल का रंग लाल है,दोनो को मिलाने पर कत्थई रंग का निर्माण हो जाता है।
कत्थई रंग से सम्बन्ध रखने वाली वस्तुयें व्यक्ति स्थान पदार्थ सभी शनि मंगल की युति में जोडे जाते है।
शनि जमा हुआ ठंडा पदार्थ है तो मंगल गर्म तीखा पदार्थ है,दोनो को मिलाने पर शनि अपने रूप में नही रह पाता है जितना तेज मंगल के अन्दर होता है उतना ही शनि ढीला हो जाता है।
इस बात को रोजाना की जिन्दगी में समझने के लिये घर मे बनने वाली आलू की सब्जी के लिये सोचिये,आलू की सिफ़्त शनि में जोडी जाती है कारण जमीन के अन्दर से यह सब्जी उगती है जड के रूप में इसका आस्तित्व है,जब निकाला जाता है तो जमा हुआ पानी और अन्य पदार्थों का मिश्रण होता है।
यह सूर्य की गर्मी से सड जाता है इसके लिये इसे कोड स्टोरेज में रखा जाता है और समय पर निकाल कर इसे प्रयोग में लाया जाता है, सब्जी बनाते वक्त इसे छिलके को निकाल कर मिर्च मशाले आदि के साथ सब्जी के रूप में पकाया जाता है जितनी गर्मी इसे दी जायेगी उतना ही पतला यह पक जायेगा,लेकिन अपने अन्दर के पानी के अनुसार ही यह ढीला या कडक बनेगा,भोजन के समय इसे प्रयोग करने पर अपने रूप परिवर्तन से आराम से खाया जा सकता है।
अगर इसे गर्म नही किया जाये तो यह पकेगा नही और कसैला स्वाद देगा और खाया भी नही जायेगा। सीधे आग में डालने पर यह जल जायेगा, फ़्लेम वाली आग में यह पकेगा नही,जितनी मन्दी आग से इसे पकाया जायेगा उतना ही स्वादिष्ट बनेगा।
दूसरा उदाहरण मंगल की भोजन में प्रयोग की जाने वाली मिर्च से भी लिया जाता है,जब मिर्च अधिक हो जाती है तो शरीर के अन्दर जमा हुआ कफ़ जो शनि के द्वारा पैदा किया जाता है पिघलना शुरु हो जाता है, जितनी अधिक मिर्च खायी जाती है उतना अधिक कफ़ शरीर से पिघलना शुरु हो जाता है, यहां तक कि अगर अधिक मिर्ची खायी जाये तो शरीर में जलन पैदा हो जाती है,शरीर में वसा के रूप में जमा शनि का पदार्थ पिघल कर आन्सू की रूप में कफ़ के रूप में नाक के रूप में पेशाब के समय चर्बी के रूप में मल को पतला करने के बाद दस्त के रूप में निकल जायेगा।
अधिक मिर्च के प्रयोग करने पर यह शरीर की रक्षा के रूप में उपस्थित और सर्दी गर्मी से शरीर को बचाने वाले पदार्थ को शरीर से निकाल कर बाहर कर देगी।उसी प्रकार से धीमी आंच पर रखा हुआ पानी भी भाप की शक्ल में बर्तन से विलीन हो जायेगा।
यह मंगल की सिफ़्त है। एक बात और भी मानी जाती है कि शनि का स्थान गन्दी जगह पर होता है और मंगल का स्थान गर्म जगह पर होता है, जिन जातकों की कुंडली में शनि मंगल की युति होती है उनका खून किसी न किसी प्रकार के इन्फ़ेक्सन से युक्त होता है।
शनि के अन्दर एक बात और देखी जाती है कि वह जड है उसे कोई भान नही है,जैसे सूर्य देखने की क्षमता रखता है चन्द्र सोचने की क्षमता को रखता है।
मंगल हिम्मत को दिखाने की क्षमता को रखता है बुध गन्द को सूंघने की क्षमता को रखता है,गुरु सुनने और काम शक्ति के विकास की क्षमता को रखता है शुक्र स्पर्श से समझने की क्षमता का रूप होता है।
राहु आकस्मिक घटना को देने की ताकत को रखता है तो केतु स्वभाव से ही सहायता के लिये सामने होता है, लेकिन शनि जड है उसे जैसा साधनों से बनाया जाता है वैसा ही वह बन जाता है।मंगल के साथ तकनीकी कारण से शनि जमे हुये कार्य को पिघलाने का काम करता है।
शनि पत्थर है और उसे लाल रंग से रंग दिया जाये तो वह धर्म के रूप में बन जायेगा,शनि चोर है तो मंगल सिपाही है।
शनि पत्थर है तो मंगल लोहा है,इसलिये ही शनि के लिये लोहे का छल्ला पहिना जाता है।
रिस्तो मे देखा जाये तो शनि कर्म है मंगल भाई है, शनि दुख है तो मंगल भाई का दुख है, शनि खेती का काम है तो मंगल मशीनरी है, शनि जेल है तो मंगल उसका प्रहरी है, शनि विदेशी है तो मंगल उसे कन्ट्रोल करने वाला है, शनि कोयला है तो मंगल तपती हुई आग है,शनि कमजोर है तो मंगल उसके अन्दर शक्ति को देने वाला है।
शनि डाकू है तो मंगल उसकी उसकी साहस की सीमा है, शनि बुजुर्ग दार्शनिक है तो मंगल उसके तामसिक विचार है, शनि कब्रिस्तान है तो मंगल जलती हुई आग है, शनि खंडहर है तो मंगल उसके अन्दर तपती हुयी रेत है, शनि बाल है तो मंगल उसे काटने वाला नाई है, शनि लकवा है तो मंगल गर्म सेंक है, शनि फ़ोडा है तो मंगल आपरेशन है, शनि कर्म है तो मंगल रसोई है, शनि मधुमक्खी है तो मंगल उसके अन्दर का जहर है, शनि आलू का पकौडा है तो मंगल उसके अन्दर मीठी चटनी है।
शनि काम करने वाले कर्मचारी है तो मंगल कार्य स्थल की रखवाली करने वाला गार्ड है।
शनि घर है तो मंगल उसका दरवाजा है। मंगल खून चोट चेचक अपेन्डिक्स हार्निया देता है तो शनि वात लकवा ह्रदय की बीमारी ट्यूमर ब्रांकाइटिस की बीमारी देता है।
मंगल शनि की युति में कार्य तकनीकी होते है मशीन के कार्य भी होते है,व्यापारिक राशि तुला में अगर युति है तो मारकेटिंग की क्षमता भी होती है,एमबीए• आदि करने के बाद बाजार का तकनीकी ज्ञान भी होता है।
शनि कार्य होता है तो मंगल कार्य में संघर्ष भी देता है, एक भाई को कष्ट जरूर होता है, मंगल युवा होता है और शनि उसे बुजुर्ग जैसे कष्ट भी देता है, शनि कार्य है तो मंगल उत्तेजना में उसे बदलने का रूप भी बन जाता है।शत्रु अधिक होते है और किसी प्रकार से चन्द्रमा सामने हो तो नाक पर गुस्सा करने वाला व्यक्ति भी होता है।
मंगल शनि के साथ वक्री हो तो उत्साह में कमी होती है, काम शक्ति निर्बल होती है, शनि मंगल के साथ वक्री हो तो अधिकार को प्राप्त करने की जल्दबाजी होती है, और वह अधिकार भले ही खास आदमी की मौत करनी पडे लेकिन अधिकार जल्दी से लेने में दिक्कत नही होती है।
मंगल शनि की दशा में तीन महिना पहले से और तीन महिना बाद तक तथा बीच के एक महिना में घोर कष्ट भुगतने पडते है।
शनि में मंगल की दशा में उन्नीस महिने का घोर कष्ट होता है। शनि मंगल के साथ होने पर जातक को बहुत मेहनत के बाद ही सफ़लता मिलती है, हर काम में असन्तोष होता है, वह अपने तकनीकी कारणॊ से ऊंची पदवी वाले लोगो से अनबन ही रखता है, साथ ही गलतफ़हमी का शिकार भी होता रहता है, कार्य भी अक्सर चलते हुये अपने आप बन्द हो जाते है।
अगर जातक नौकरी करता है तो इन्ही कारणो से उसे बार बार कार्य बदलने पडते है, किसी के कार्य से उसे सन्तोष होता ही नही है।
यह युति अगर तीन सात या ग्यारह में चन्द्रमा के साथ होती है तो जातक को नौकरी में परेशानी होती है जीवन साथी की नाक पर गुस्सा होता है और इसी कारण से वैवाहिक जीवन और नौकरी दोनो ही परेशानी में होती है,जीवन साथी को बीमारियों की बजह से और नौकरी को तकनीकी कमियों से परेशान होने के लिये भी जाना जाता है।
धन हानि भी होती है,नौकरी करने में परेशानी भी होती है, व्यापार आदि में कठिनायी भी होती है। अगर यह युति ग्यारहवे भाव में है और राहु छठे भाव में है तो जातक को कार्य के अन्दर बहाने बनाने की आदत होती है साथ ही वह आंख बचाकर काम करने वाला होता है।
छठे से छठा कर घर कार्य में चोरी की आदत भी देता है और जातक को किसी न किसी बात पर अचानक धन का मुआवजा देने या पुलिस आदि में रिपोर्ट होने तथा परेशान होने की बात भी मिलती है।
*सूर्य चन्द्र का गुरु के साथ बनने वाला योग :*
जीवात्मा योग –
ज्योतिष में वर्णित योगो में जीवात्मा योग बहुत विशेष और शुभ फल देने वाला योग माना गया है ! ज्योतिष में “बृहस्पति” को जीव अर्थात स्वयं का कारक माना गया है और “सूर्य” आत्मा का कारक है अतः जन्मकुण्डली में बृहस्पति और सूर्य के एक साथ होने पर जीवात्मा योग बनता है और यदि बृहस्पति सूर्य का यह योग कुण्डली के शुभ भावो में बने और पाप प्रभाव से मुक्त हो तब बहुत शुभ परिणाम देता है बृहस्पति धर्म, ज्ञान, परिपक्वता, समाज सेवा और सत्कार्यो का कारक है और आत्मा के कारक सूर्य से योग करके यह व्यक्ति को सत्कार्यों से जोड़ता है ! समाज सेवा और धर्म के प्रति आस्थावान बनाता है और व्यक्ति की आंतरिक ऊर्जाओं को जागृत करता है ! जीवात्मा योग बनने पर व्यक्ति का व्यक्तित्व बहुत प्रभावपूर्ण होता है और व्यक्ति को अच्छी सामाजिक प्रतिष्ठा मिलती है ! कुण्डली में जीवात्मा योग बनने पर व्यक्ति को जीवन में उच्च पदों की प्राप्ति होती है और ऐसा व्यक्ति अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह पूरा करता है !
गज केसरी योग –
गजकेसरी योग ज्योतिष में वर्णित अनेक ग्रहयोगों में से एक बहुचर्चित और विशेष योग है जिसे बहुत शुभ फल देने वाला योग माना जाता है ! गजकेसरी योग बृहस्पति और चन्द्रमाँ से बनने वाला एक योग है ! जन्म कुण्डली में जब बृहस्पति और चन्द्रमाँ एक साथ स्थित हो, या बृहस्पति, चन्द्रमाँ से केंद्र (1,4,7,10) में स्थित हो तब इसे गजकेसरी योग कहते हैं ! यदि कुण्डली में गजकेसरी योग अच्छी स्थिति में बन रहा हो और उस पर कोई पाप प्रभाव ना हो तब इसके बहुत शुभ फल प्राप्त होते हैं ! जिस व्यक्ति की कुण्डली में गजकेसरी योग बन रहा हो वह व्यक्ति धन, यश, प्रसिद्धि और ऐश्वर्य को प्राप्त करता है ! ज्योतिष ग्रंथों में इस योग की बहुत प्रशंसा की गयी है, ऐसा व्यक्ति लक्ष्मीवान होता है और जीवन को बहुत अच्छी स्थिति में व्यतीत करता है परन्तु यह सभी शुभ फल तभी घटित होते हैं जब गजकेसरी योग अन्य पाप योगो से बाधित न हो रहा हो !
गजकेसरी योग जब केंद्र (1,4,7,10 भाव ) या त्रिकोण (1,5,9 भाव ) में बनता है, तब अधिक शुभ होता है ! यदि गजकेसरी योग कर्क, धनु या मीन राशि में बन रहा हो तब यह बहुत शुभ फल प्रदान करता है ! मेष, कर्क, वृश्चिक और मीन लग्न की कुण्डली में यदि गजकेसरी योग बनता है तब राजयोग के समान फल प्रदान करता है, क्योंकि यहाँ बृहस्पति और चन्द्रमाँ परस्पर केंद्र और त्रिकोण के स्वामी होते हैं और केंद्र त्रिकोण के स्वामियों की युति राजयोग देती है ! यदि कुण्डली में गजकेसरी योग बन रहा हो और बृहस्पति चन्द्रमाँ कुण्डली में शुभ फलकारी ग्रह हों तब इनकी दशाओं में बहुत अच्छे परिणाम मिलते हैं ! जिससे धन, यश, प्रसिद्धि की प्राप्ति होती है !
विशेष –
गज-केसरी योग निश्चित ही बहुत शुभ फलदायी योग माना जाता है और व्यक्ति को उन्नति प्रदान करता है परन्तु बहुत बार हम देखते हैं कि कुण्डली में गजकेसरी योग बनने पर भी वह फलीभूत नहीं होता है, क्योंकि कहीं न कहीं से उस पर पाप प्रभाव पड़ने से योग भंग हो गया होता है ! यदि गजकेसरी योग में बृहस्पति, चन्द्रमाँ के साथ राहु, केतु या शनि हों तब योग फलीभूत नहीं होता ! गजकेसरी योग जब त्रिक भाव (6,8,12) में बन रहा हो, तब भी वह फलदायी नहीं रहता ! वृश्चिक और मकर राशि में बना गजकेसरी योग भी शुभ फल नहीं दे सकता, क्योंकि यहाँ बृहस्पति और चन्द्रमा नीच राशि में होने के कारण कमजोर होते हैं ! अतः कुण्डली में गजकेसरी योग अच्छी स्थिति में बन रहा है या नहीं यह देखना बहुत आवश्यक होता है !