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ऋषि या कृषि पंचमी ?

भादौ की पंचमी को ऋषि पंचमी के रूप में मनाया जाता है। मैं अकसर देखता हूं कि इस दिन व्रतार्थी महिलाएं अपने घर के आसपास खड़ी वनस्‍पति को खोजने जाती हैं। सांवा, मलीचि, अपामार्ग, दूर्वा आदि को खोजती है और उखाड़कर ले आती है। घर पर उनको पीले परिधान या धागों में लपेटती हैं और ऋषि बनाकर पूजा करती हैं। व्रतवार्ता ताे महाभारत के प्रसंग की करती हैं ही… मगर मैं यह परंपरा देखकर हर बार सोचता हूं कि कहीं यह कृषि पर्व तो नहीं है ? ऋषियों ने इस विद्या के विषय में कहा है-

 

*सस्‍यविद्या च वितता एता विद्या महाफला। धर्माधर्मप्रणयिनी धर्माधर्म प्रसाधिका।। (सस्यवेद)*

 

क्‍योंकि, कृषि की खोज का श्रेय नारियों को जाता है। विल डूईरां ने ‘द लाईफ ऑफ ग्रीस’ में मिथकों पर विचार करते हुए माना है कि औरतें हल के प्रयोग में आने से पहले फावड़े से कृषि कार्य करती थीं, जब हल खेती के लिए आया तो यह कार्य पुरुषों के हाथ चढ़ गया तथापि महिलाएं इससे जुदा नहीं हुईं।

आदिम दौर में पुरुष शिकार के लिए भटकते रहते थे और औरतें जानवरों की हडि्डयों और लक‍ड़ी की गोदनियों से भूमि खोदकर विभिन्‍न कन्‍द-मूल आदि जमा करती थीं, इससे स्‍वाभाविक रूप से औरतों को यह जानकारी मिली कि कौन से पाैधे कहां, किस रूप में और किस मौसम में मिल सकते हैं और उनकी क्‍या किस्‍में-प्रजातियां होती हैं ?

मैंने भी अपनी *’काश्‍यपीय कृषि पद्धति’* की भूमिका में इस बात को उठाया है। वैसे हमारे यहां देवियों का नामकरण भी इसी कृषि-वनस्‍पति के कारण हुआ है। जैसा कि मार्कण्‍डेय पुराण में कुष्‍मांडा व शाकम्‍भरी के लिए कहा गया है और यही मत बाद में शिवपुराण में भी लिया गया है कि शाक-सब्जियां उगाने के कारण देवी का नाम *शाकम्‍भरी* हुआ –

 

*आत्‍मदेह समुद्भूतै: शाकैर्लोका भृता यत:। शाकम्‍भरीति विख्‍यातं तत्‍ते नाम भविष्‍यति।। (शिवपुराण उमासंहिता 50, 35)*

 

क्‍यों अधिकांश औषधियों, सब्जियों आदि का नामकरण स्‍त्रीलिंगवाची हैं, क्‍यों हल की रेखा के नाम ‘सीता’ से औरतों का भी नामकरण किया जाने लगा ? हां, सांवा धान्‍य प्रारंभिक खाद्य औषधि के रूप में माना गया, जैसा कि ‘समरांगण सूत्रधार’ आदि में आया है जो बिना खेत को हांके ही उत्‍पन्‍न हो जाता है और फिर ऋषि पंचमी के दिन इसी का आहार यह मानकर किया जाता है कि इस दिन औरतें हल हांककर उपजाया धान्‍य नहीं खातीं… जरूर ऋषि पंचमी के साथ कहीं न कही कृषि की परंपरा का तथ्‍य निहित लगता है। मित्रगण इस संबंध में अधिक विचार करेंगे। हाँ, इसी दिन रक्षा बंधन की परिपाटी उस युग की याद दिलाती है जबकि भारतीय मूल के कपास के पौधे रुई वाले हो जाते थे और वह ऋषि ज्ञानोपज रक्षात्मक होकर पारस्परिकता का भाव पोषित करती लगती थी।

यों इस दिन कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वसिष्ठ ,    *सप्त ऋषि* का पूजन, स्मरण होता है और इनमें से अधिकांश का सम्बन्ध कृषि से रहा है, हमें यह नहीं भूलना चाहिए : *कश्यपोत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोय गौतम:। जमदग्निर्वसिष्ठश्च सप्तैते ऋषय: स्मृता:।। गृह्णन्त्वर्ध्य मया दत्तं तुष्टा भवत मे सदा।।*

✍🏻गुरुकुल में ऋषि मूल्य सिखाते थे, और कॉलेज में मार्क के  लिए अंधे चूहों की दौड़

 

*रकेशर यानी ऋषि जो चंद्रेश्वर है !*

 

 

लोक हमेशा शास्त्र की व्यावहारिक पृष्ठभूमि को धारण करता है। शास्त्र के सत्य लोक से अधिग्रहित होते हैं और कहीं न कहीं उनका व्यावहारिक पक्ष प्रकट रूप होता ही है।

पूर्वजों की स्मृति का पर्व ऋषि पंचमी है। अनेक स्थानों पर इस दिन सरोवर या नदी के तट की पवित्र मिट्टी से सप्त ऋषि (जिनके शास्त्रीय नाम हैं – वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जगदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्वाज) बनाए जाते हैं। उनका विधिपूर्वक पूजन किया जाता है। कुश व मंशा (श्यामक, सांवा धान्य) जो ऋषि धान्य है, से सप्त ऋषि व देवी अरुंधति को तर्पण दिया जाता है। उसके बाद अपने कुल, गोत्र के पूर्वज व मातृपक्ष के पूर्वज के नाम पर तर्पण दिया जाता है।

 

ऋषि पंचमी की परम्परा में प्राय: लोक वार्ताएं सुनी जाती है। सब की सब कंठस्थ होती हैं और कंथस्थ करवाई जाती हैं। उपवास रखा जाता है। फलाहार के रूप में सांवा के आटे का हलवा, मंशा की ही खीर व तुरी की सब्जी को भोग के बाद काम में लिया जाता है। फलाहार के बाद ये ऋषि विग्रह पुनः विसर्जन किए जाते हैं : *आए जहां से, वहां पधारो। आशीष बांटो, जन्म सुधारो।*

 

ग्रामीण महिलाएं इन ऋषि को *रकेशर* कहती हैं। तर्पण के समय सात रकेशर और एक रकेशर रानी को तर्पण देती है। यह शब्द राकेश्वर का देशज भी है जो चंद्रेश्वर होते हैं। इसलिए ऋषियों को चंद्रमा सी धवल कला, यानी वृद्ध जैसी दाढ़ी आदि धारण करवाई जाती है। ये सब चन्द्रमा के गुण नियामक भी हैं और चंद्रलोक से ऊपर भी।

 

ये हमारी पुरातन परम्परा है जिसमें प्रकृति प्रदत्त अनमोल महीन धान्य चाहे वो आज खरपतवार कहा जाता हो, उनका विशेष महत्व स्वयं सिद्ध है। यह जीवन में कृषि के महत्व और विकास की स्मृतियां संजोए हुए हैं जबकि आहार के लिए बीज और परिधान के लिए कपास का प्रयोग शुरू हुआ। यही नहीं, गृहस्थ में स्त्री को सम्मान मिला, उपयोगी वस्तुओं के संग्रह का भाव जागा, कला की प्रवृत्ति और कल्पना को साकार करने का मन बना।

 

मिट्टी से निर्मित ये ऋषि विग्रह मृण कला का बोध देते हैं। मिट्टी हमारी सृजन धरमिता की आधार है। वह नश्वरता का संदेश देती है लेकिन पककर चिरायु होने का ज्ञान भी देती है। *पकी मिट्टी ने ही पुरातत्व का आधार स्थिर किया है।* पूर्वजों की स्मृति बनाए रखने वाला यह पर्व कितने अर्थों को संजोकर हमें प्रेरित करता है!

 

 

*भाद्रपद शुक्ल पञ्चमी अर्थात् ऋषि-पञ्चमी ।*

 

सूर्योदय से पूर्व स्नान, सप्तर्षियों की पूजा आदि व्रताचरण मेरी माँ किया करती थी । आज विशिष्ट फलाहार होता था ।

 

कृषि-उपज का सेवन निषिद्ध था, इसलिए फल, दूध, (दही-भादो में दही निषेध है)सिवैय्या, कुटू के आटे की पुडियाँ आदि रोचक भोजन होता था । अभी भी स्मरण है ।

 

मैं उच्चशिक्षा के लिए बाहर गया, मेरा विवाह हुआ और माँ के स्वर्गवास के बाद यह व्रत पता ही नहीं चला कब बन्द हो गया ।

 

आजकल यह व्रत मनानेवाले परिवार मैं ने तो नहीं देखे ।

 

फिर भी ! सभी पढ़े लिखे समाज को – ऋषि-पञ्चमी की शुभकामनाएँ !

 

आज ऋषि पंचमी है। मैंने देखा कि जिन्हें तथाकथित छोटी जातियाँ कहा जाता है, उनके घरों में भी ऋषि पूजा होती है। मेरे तथा आसपास के कई भृत्य आज ऋषि पंचमी की पूजा के कारण छुट्टी पर हैं।

अपने आप को पिछड़ा जाति कहने वाले यह क्यों भूल गए

*विवाह के पहले जाति नहीं गोत्र पूछा जाता है*

 

गोत्र हमारे ऋषी यो की देन है…

जाति का जाल तो लुटेरे  बिछा कर गए, और हम आज तक उसमें फंसे हैं…

इतिहास में यह क्यों नही पढाया जाता…

 

हमारी संस्कृति में इन ऋषियों का सुबह सुबह स्मरण किया जाता है:

 

*भृगुर्वसिष्ठः क्रतुरङ्गिराश्च मनुः पुलस्त्यः पुलहश्च गौतमः ।  रैभ्यो मरीचिश्च्यवनश्च दक्षः कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम् ॥ (वामनपु० १४ । ३३)*

 

‘भृगु, वसिष्ठ, क्रतु, अङ्गिरा, मनु, पुलस्त्य, पुलह, गौतम, रैभ्य, मरीचि, च्यवन और दक्ष – ये समस्त ऋषिगण मेरे प्रातःकालको मङ्गलमय करें ।

 

यह वह देश है जिसके संस्कारों में गुरुओं और ऋषियों का सम्मान है।

 

पर यदि गुरु पूर्णिमा राज्य के लिए पर्याप्त नहीं थी तो ऋषि पंचमी कैसे होती।

 

कितने शहर हैं जो ऋषियों के नाम पर हैं। *पर आज के दिन काश ग्वालियर में ऋषि गालव पर कोई समारोह हो।*

*जबलपुर में ऋषि जाबालि पर हो।*

* *इंदौर जमदग्नि और परशुराम की याद करे।*

*  *भोपाल पतंजलि की।* *मंडला मार्कंडेय की।* *चित्रकूट चित्रा ऋषि की।*

* *कोंच नगर क्रौंच ऋषि की।*

* *मंडी मांडव्य ऋषि की।*जालौन जलवान् ऋषि की।*

*ऋषि गौतम की नासिक*

*ऋषि अगस्त्य की अगस्त्यपुरी/अकोला*

 

ऋषियों की तपोभूमि तपोवन

*न तप करने वाले रहे और न ही वन…*

 

वाह रे भले मानस

 

राजाओं के नाम पर नगर नहीं बसे। ऋषियों के नाम पर बसे।

 

ऋषि यानी वे जिनकी एक वैश्विक सोच है। वे जो इस सर्वमिदं की ज्योति हैं। ऋषि जो आकाश, अन्तरिक्ष और शरीर तीनों में होते हैं। ऋषि यानी ऋतंभरा प्रज्ञा से सम्पन्न।

 

ऋषि माने वह जो *‘मैं कहता आँखन देखी’।*

 

कबीर ही कहते थे न कि: अपनी आँखों देख लो, यों क्या कहे कबीर। ऋषि वही थे। यास्क ( निरुक्त 2.111) *‘ऋषिर्दर्शनात्’* इसी विचार से कहे होंगे। वे सिर्फ़ शब्द-सजग ही नहीं थे, वे उस विचार से भी जुड़े थे। शब्द के हिसाब से ‘दृशिर् प्रेक्षणे’ से ऋषि शब्द बना होगा। उसमें दकार का लोप करके ऋषि शब्द बना है।

*ऋषि यानी दृष्टा।* जो कर्तापन के किसी भी अहंकार से दूर होकर सिर्फ़ सत्य का साक्षात्कार करता है। ऋचाएँ उस तप का परिणाम हैं जिसमें यह संभव होता है। ऋषि’ *’तिरोहित वेदमन्त्रों का तपस्या द्वारा आविर्भाव करनेवाला’* होता है। महाभारत भी यही कहता है।

 

*युगान्तेऽन्तर्हितान् वेदान् सेतिहासान् महर्षयः । तपसा लेभिरे पूर्वमनुज्ञाताः स्वयम्भुवा ॥*

 

तपस्या – इसलिए उसे रेखांकित किया जा रहा है कि यदि यह सावधानी न रखो तो आज के इस सुविधावादी दौर में किताब कल्चर का विरोध कर लोग प्रैक्टीकल नॉलिज और बुकिश नॉलिज में फर्क निकालने बैठ जाते हैं और अपने कंफर्ट ज़ोन में ही बंद रहे आते हैं।

*किताब भी नहीं पढ़ते और न दृष्टा ही होते हैं।*

 

उज्जैन के महाकाल लोक में सप्तर्षि प्रतिष्ठित किये गये हैं। आज के दिन वहाँ उनके लिए कुछ विशेष विधान होने चाहिए।

वैसे भारत में जगह जगह ऋषियों की यादें हैं।

हरिद्वार में तो सप्तर्षि आश्रम ही है।

पटना के पास सप्तर्षि महादेव मंदिर है।

 बाराबंकी में सप्तर्षि आश्रम से तो राम-स्मृति भी जुड़ी हुई है।

 देश भर में उनकी उपस्थिति का उत्सवन हुआ करता था।

 

शतपथ ब्राह्मण और बृहदारण्यक उपनिषद के अनुसार सप्तर्षि अत्रि, भारद्वाज, गौतम, जमदग्नि, कश्यप, वशिष्ठ और विश्वामित्र  थे। कृष्ण यजुर्वेद के अनुसार-अंगिरस, अत्रि, भृगु, गौतम, कश्यप, कुत्स और वशिष्ठ थे। बृहत संहिता के अनुसार मरीचि, वशिष्ठ, अंगिरस, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु थे।

 

और ऋषिकाओं को कोई कैसे भूल सकता है? वो विश्ववारा, वो वसुक्रपत्नी, वो लोपामुद्रा, वो अपाला, वो अगस्तस्वसा, वो घोषा, वो रोमशा, सूर्यासावित्री, वो सूर्यासावित्री, वो गार्गी, वो अरुन्धती।

 

सप्तर्षि कोई सात ऋषि नहीं हैं। परंपरा यह कहती है कि प्रत्येक कल्प के प्रत्येक मन्वन्तर में सात ऋषि होते हैं। अकेले ऋग्वेदीय ऋषियों की बात करें तो 403 हैं।

 

वे पृथ्वी पर थे पर दृष्टि उनकी विराट् थी। इसलिए आकाश में भी उन दृष्टाओं की ऊर्ध्वाधर दृष्टि को देखिये।

 

हम कहाँ आ गए हैं

मंडी नगर नाम पर मांडव्य ऋषि के नाम की याद आती

 न  मांडूक्य उपनिषद की न मंडन मिश्र की

 

ग्वालियर   गालव ऋषि के नाम की कहानी हम भूल चुके

 

नारदा गांव भिंड में  ऋषि नारद की याद नहीं आती

 

जबलपुर को लोग भूल गया कि जाबालि ऋषि एक महत्वपूर्ण व्यक्तिव थे

 

 

 

उस पूरे प्रसंग में मुझे भारत की विराट् सांस्कृतिक विस्मृति का ध्यान आता है। लोगों को उस स्थान का बाज़ार के अर्थ में प्रयोग तो ध्यान रहा पर मांडव्य ऋषि की याद किसी को न आई जिनके नाम पर उस स्थान का नाम पड़ा। भारत में अपनी ही पौराणिकी का निरसन कितना गहरा हो चुका है, देख के हैरत होती है।

 

और मांडव्य ऋषि की कहानी भी सत्ता और सत्य के बीच संघर्ष की कहानी है।

 

यह देश इतना पुराना है पर इसके पास स्मृति की वह निरन्तरता नहीं है और उस सामूहिकता का भी विखंडन हो गया है।

 

न किसी को मांडूक्य उपनिषद् की याद आती है, न किसी को मंडन मिश्र की- कि इतिहास और स्मृति के बीच इतना बड़ा अंतराल हो गया है कि कोई औत्सुक्य तक नहीं बचा। वैसे मंडी और मांडव्य ऋषि का रिश्ता माना जाता रहा है और वह एक हेरिटेज सिटी है, यह भी स्थानीय लोग जानते हैं, पर मंडी नामक स्थान की अर्थ-साम्य के आधार पर चर्चा इस बात का प्रमाण है कि संस्कृति पर बाज़ार कितना हावी हो गया है।

 

संस्कार शून्य घमंडी को मंडी के नाम पर बाज़ार ही समझ आता है, यह भूमंडीकरण का ही प्रभाव है।

 और यह साहित्यिक संपादक रहीं लेखिकाओं के साथ भी है। यह वह देश था जिसमें नगरों या बस्तियों के नाम लुटेरों और विध्वंसकों के नाम पर नहीं रखे जाते थे बल्कि ऋषियों और विद्वानों के नाम पर रखे जाते थे। यहां जालंधर नाथ के नाम पर जालंधर शहर बस गया…

पर हाय हमारा दुर्भाग्य, लुटेरे हमारा दिमाग खराब कर गए

 

फिर लुटेरे आए और हमलावरों तक के नाम पर शहर बस गये। बस्तियों के नाम अब सांस्कृतिक स्मरणों की अनुभूति ही नहीं देते। और वही ईकोसिस्टम जो अभी एक स्त्री के विरूद्ध अपनी घटिया मानसिकता का पता दे रही है, उसी की नज़र में बस्तियों का पुनर्नामकरण एक भटकाने वाला पुनरुत्थानवाद भर है।

 

मैं न्यूज़ीलैंड गया था। यह बात 2018 की है। वहाँ मैंने देखा कि सरकार ने बाक़ायदा एक न्यूज़ीलैंड ज्याग्रफिक बोर्ड बना रखा है और वह बोर्ड लगातार स्थानों के नाम बदलता रहता है। हमारे यहाँ हम बख्तियार ख़िलजी तक के नामों वाले नगर अभी तक रखे बैठे हैं , हमारी  मानसिक गुलामगिरी । उस समय अपनी फ़ेसबुक पर मैंने लिखा भी था। न्यूज़ीलैंड में तो बच्चों तक के offensive नाम रखने की मनाही है। हमारे यहाँ सब चलता है। आप  लुटेरा तैमूर रख लो।

 

जब मैं एक विभाग में था तो संयुक्त राज्य अमेरिका गया था। वहाँ मैंने देखा कि एक डिपार्टमेंट ऑफ इंटीरियर विभाग है जिसके अंतर्गत एक द बोर्ड ऑन ज्याग्रफिक नेम्स नामक मंडल है। वह छह सौ से ज़्यादा ऐसे नामों को बदलने की कसरत कर रहा है जो अपमानजनक हैं। *भारत में हमारे भीतर वो चेतना ही नहीं कि ऐसा कोई बोर्ड बनाने की हम सोचें भी।*

 

हमारी मेमोरी डिस्क में स्थाई क्षति हो चुकी है कि मंडी के नाम पर ऋषि याद नहीं आते, बाज़ार याद आता है।

 

देवेश दीक्षित की एक कविता याद आ गई जो उस बस्ती पर नहीं, राजनीति की इस मस्ती पर है जिसके चलते ये अशोभन तंज है:

 

राजनीति की इस मंडी में सारे झूठे रहते हैं

जिसको पहरेदार बना दो,बस्ती लूटे रहते हैं

 

कवष ऐलूष ऋग्वेद दशम मण्डल के ३१-३३ सूक्तों के सूक्तद्रष्टा ऋषि हैं। यह कुरुश्रवण के उपाध्याय थे।

 

एलूष के पुत्र ऋषि कवष सरस्वती नदी के किनारे अंगिरसों के सत्र में आए, तो इन्हें शूद्रापुत्र, अब्राह्मण एवं जुआरी आदि गालियाँ देकर यज्ञ के लिये अयोग्य घोषित कर दिया गया। तथा इन्हें जंगल में छोड़कर ऐसी व्यवस्था की गई कि, इन्हें पीने को पानी भी प्राप्त न हो। परंतु अपोनप्त्रीय सूक्त कहने के कारण, सरस्वती नदी स्वयं इनकी ओर मुड़ गई। अभी भी उस स्थान का नाम परिसारक है। इनका महत्त्व प्रकट होने पर इन्हें वापस बुलाया गया (ऐतरेय ब्राह्मण २.१९)।

 

सांख्यायन ब्राह्मण (१२.१-३) में यह अब्राह्मण थे, इसीलिये इन्हें यज्ञ से निकाल दिया, ऐसा स्पष्ट लिखा है। तृत्सुओं के लिये इन्द्र ने कवषों का पराभव किया तथा उनके मजबूत किले ध्वस्त कर दिए (ऋ. ७.१८.१२)। ऋषि कवष द्वारा दृष्ट सूक्त में कुरुश्रवण, उपमश्रवस् तथा मित्रातिथि का निर्देश है। मित्रातिथि की मृत्यु से दुखी उपमश्रवस् का समाचार पूछने के लिये कवष ऋषि आए थे।

 

कवष नाम के एक स्मृतिकार भी हुए हैं, कवषस्मृति का निर्देश पराशरस्मृतिव्याख्या में है। सम्भवतया यही कवष नाम के आचार्य युधिष्ठिर के राजसूययज्ञ में होता नामक ऋत्विज थे (भा. १०.७४.७)।

✍🏻फिर मिलते है….

ऋषि पंचमी

ऋषि दुर्वासा और कल्पवृक्ष

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