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झांसी की रानी लक्ष्मीबाई द्वारा महाराजा मर्दन सिंह जुदेव को सैन्य सहायता के लिए लिखा गया हस्तलिखित दुर्लभ पत्र.. !!

अंग्रेजो के दांत खट्टे करने वाली,झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के शौर्य और पराक्रम की शौर्यगाथा इतिहास के स्वर्णिम पन्ने मे दर्ज है !!

 

बुन्देलो हर बोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ||

 

स्वतंत्रता सेनानी ,भारत देश की वीरांगना झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई व बुंदेला वीर महाराजा मर्दन सिंह जूदेव व बाबू वीर कुंवर सिंह जैसे अनेक स्वतंत्रता सेनानी भारत देश की स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजो के विरूद्ध विगूल फूंक ,अंग्रेजो के नाक में दम कर रखा था !!

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई झांसी परास्त होते ही, वह दत्तकपुत्र के साथ बडी चतुरता से निकालकर १०७ मील दूर काल्पी पहुंची ।उनके अंदर अंग्रेजों से बदला प्रतिशोध लेने की अग्नि धधक रही थी और वह अंग्रेजो पर हमले करने की रणनीति बनाने लगी ! उधर कैप्टन ह्यूरोज रानी लक्ष्मीबाई को मारने की रणनीति से पीछे पड़ा हुआ था ! इन सबसे स्वयं को सुरक्षित न देखकर झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने मध्यप्रदेश के बानपुर-चंदेरी रियासत के बुंदेल वंशी महाराजा मर्दन सिंह जूदेव जी को मदद के लिए पत्र लिखा !! और संदेशा भिजवाया कि एक नारी पर फिरंगियों द्वारा संकट आन पड़ा है ,मै आपसे मदद की गुहार करती हु आप अपने क्षत्रिय धर्म का पालन करे और हमारी रक्षा करे व इस युध्द मे हमारी सहयोग करें  !!

 

महाराजा मर्दन सिंह बुंदेला भोजन करने बैठे थे ,सामने भोजन की थाली थी तभी उनके दूत ने आकर यह समाचार राजा साहब को सुनाया !! मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए एक जुटता व एक नारी मदद की गुहार सुनते ही महाराजा मर्दन सिंह जूदेव भोजन की थाली छोड़कर उठ गये व शाहगढ नरेश राजा बखतवली जूदेव बुंदेला और अपने विश्वासपात्र, कुशल सेनापतियों को बुलाकर सैनिकों की टुकड़ी तैयार किया और झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की मदद के लिए निकल पड़े ||

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ,महाराजा मर्दन सिंह जूदेव व राजा बखतवली जूदेव बुंदेला जी की संयुक्त सेनाओं व अंग्रेजो के बीच 18 जून सन् 1858 को ग्वालियर के पास कोटा की सराय में भीषण युध्द हुआ !!

जिस युध्द में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई व बखतवली जूदेव बुंदेला जी मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए और महाराज मर्दन सिंह जूदेव जी को अंग्रेजो ने पकड़कर कारागार मे डाल दिया ||

 

कारागार में डालने के बाद अंग्रेजो ने उनके सामने शर्त रखा कि वह अंग्रेजो की अधिनता स्वीकार कर लें और अंग्रेजो से मित्रता कर ले और उनका साथ दे तो महाराजा मर्दन सिंह जूदेव जो छोड़ दिया जाएगा व उनका राज-पाट  उन्हे वापस लौटा दिया जाएगा |

 

लेकिन क्षत्रिय रक्त,मातृभूमि रक्षक बुंदेला वीर मर्दन सिंह जूदेव जी ने अंग्रेजो की अधिनता ठुकरा दिया !!

और अंग्रेजो की अधिनता की राजपाठ को ठुकरा मातृभूमि की रक्षा मे वीरगति को चुना !! महाराजा मर्दन सिंह जूदेव के इस ढृढ संकल्प और राष्ट्रभक्ति को देखकर अंग्रेज गुस्सा हुए और 12  दिसंबर 1860 को महाराजा मर्दन सिंह जी का समस्त राजपाठ छीन लिया और लाहौर जेल मे बंद कर दिया ||

 

27 वर्ष तक अंग्रेज महाराजा मर्दन सिंह जूदेव को प्रताड़ना देते रहे और अंग्रेजो की अधिनता स्वीकार करने के लिए विवश करते रहे लेकिन महाराजा मर्दन सिंह जूदेव फिरंगियों की अधिनता स्वीकार नही किए ! इससे और अधिक नाराज होकर अंग्रेज महाराजा मर्दन सिंह जी को अधिनता स्वीकार करने व झुकने के लिए विवश करने लगे और उन्हे 27 वर्ष बाद 1874 मे लाहौर कारावास से निकालकर मथुरा कारावास मे नजरबंद कर अधिनता स्वीकार करने के लिए प्रताड़ित करने लगे ||

 

लेकिन अपने जीवन के अंतिम पल तक महाराजा मर्दन सिंह जूदेव अंग्रेजो की अधिनता स्वीकार नही किए,और अपने जीवन के अंतिम पल मे यही दुहराते रहे कि –

 

‘हुकुमत पर कब्जा करके हिन्दुस्तानियन खां गुलाम नही बनाओं जा सकत ,

जीते जी मर जैहों पर गुलामी न स्वीकारहौं” !! 

 

और यही कहते हुए 22 जुलाई 1879 को वीरगति को प्राप्त हो गये ||

 

महाराजा मर्दन सिंह जूदेव जी गहरवार वंश की शाखा बुंदेला वंशीय क्षत्रिय थे !! वह महान प्रतापी योध्दा,मुगलों के काल महाराजा छत्रसाल बुंदेला जी के वंशज थे ||

 

महाराजा मर्दन सिंह जूदेव के बलिदान दिवस पर कोटिशः नमन् ||

जय भारत

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