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राम के तुलसी भाग – 8

अशोक वाटिका ध्यान-पटल से ओझल हो गई है। एक ओर काशी के भदैनी क्षेत्र की एक कोठरी में मानस लिखते हुए स्वयं और दूसरी ओर इस घर के ऊपर वाले कमरें में उदास रत्ना, जो मानों शब्द-प्रवाह में बहकर आती है और लिखते हुए तुलसीदास के हृदय में विराज जाती है, फिर बिन्दुवत‌ श्री सीताराम की इष्ट मूर्ति ध्यान-पट पर आती है और क्रमशः इतनी विराट हो जाती है कि अब केवल युगल चरण ही दृष्टि के सामने हैं, उसमें प्रणत रत्ना है और वे हैं। बिम्ब में ठहराव आ गया है। बिन्दु फिर बिन्दु हो जाता है। बाबा की बाहरी काया आनन्द विभोर मुद्रा मे मूर्ति सी निश्चल है।

बाहर बादलों की गड़गड़ाहट है, तेज़ तूफान और वर्षा की सायँ-सायँ है। बिजली का भयानक धमाका होता है। कमरा हिल उठता है, ध्यान भंग हो जाता है। “भैया, भैया, प्रभु जी, गुरू जी,” शब्दों की घबराहट और दालानवाले द्वार के किवाडों की भड़-भड़ सुनकर वे उठे और द्वार खोले। कमरे के भीतर तीन आकारों से पहले हवा के झोंकों ने प्रवेश किया और दिया बुझ गया।

“घर गिर रहा है, भैया, भागौ भागौ। ऊपर वाले कमरे पै गाज गिरी है, सब गिर पड़ा” -कहकर श्यामो की बुआ छाती पीटती हुई ‘राम-राम’ बड़बड़ाने लगी।

बाबा कमरे से बाहर निकलकर दालान में आ गए। तीखी बोछारों से वह जगह भीग रही थी। दीवार से चिपककर खड़े होने पर भी पानी से बचाव नहीं हो सकता था। आँगन में घना अधेरा होने के कारण ,ठीक तरह से यह अनुमान ही नहीं लग पाता था कि कितना भाग टूटा।

बाबा बोले- “यहाँ कब तक खड़े रहेगे, भीतर चलो।

“अरे भैया, जो यह भी भरभरा के गिर पड़ा तो क्या होयगा?”- श्यामो की बुआ घबराकर बोली।

“तो हम सब ढोल बजाते भये एक साथ बैकुण्ठ पहुँचेंगे और कहेगे कि रामजी इस डरपोक डोकरिया को भी ले आए हैं।”

रामू और बेनीमाधव हँस पड़े। बिजली फिर चमकी, जल्दी-जल्दी दो बार उजाला हुआ, सारा आँगन ईंटों से भरा पड़ा था। बाबा का ध्यान बीती स्मृतियों के स्पर्श से बच न सका।

जब गृह-प्रवेश हुआ था कितनी धृमधाम थी।पण्डितों की पूजा, ज्यौनार फिर गाँव की स्त्रियों ने मंगल गीत गाते हुए नववधू को प्रवेश कराया था।गाय थी, दो दास थे।रत्ना सारे घर में काम-काज करती कराती व्यस्त डोला करती थी।पति-पत्नी हिडोलें में सोते नन्हे तारापति को मुग्ध दृष्टि से देखकर फिर एक-दूसरे को देख रहे हैं- फिर कुछ ध्यान न आया, कलेजे मे साँस भर आई और ठण्डी होकर बाहर निकल गई।भीतर जाते हुए बोले- “वाह रे भाग्य। कभी घर न बसने दिया मेरा।”

“पर प्रभु जी, आपका घर तो अब जन-जन के हृदय मे बस गया है।”

“सुखी रहो बच्चे, तुमने मेरी भूल सुधारी। राम जी की उदारता को क्षण- भर के लिए भी बिसारना नमकहरामी है। इतना साधते-साघते भी मन मोह की कीच मे फिसल ही जाता है। राम-राम।”

इतने ही में गणपति और उनके कुछ बाद राजा के लड़के-पोते अपने साथ में कुछ और लोगों को लिए हुए आ पहुँचे। गाज गाँव में ही गिरी है, कहाँ गिरी, इसका सही अनुमान न होने पर भी राजा ने अपने बेटों को बाबा की कुशल- मंगल पूछने के लिए भेजा। कुछ पास-पड़ौसी भी टाट के बोरे ओढ़े आ पहुचे, फिर पड़ोस से दो मशालें आईं। कमरे-दालान की स्थिति देखी गई। यह भाग भी अधिक सुरक्षित न था।

बाबा बोले- “जो भाग गिरना था वह गिर चुका। तुम लोग भी चिन्ता मुक्त होकर अपने-अपने घर जाओ। तुलसी को एक रात शरण देने के लिए यह स्थान अभी सक्षम है।”

बाकी सब तो बाबा की आज्ञा से लौट गए पर गणपति ने वहीं रात बिताने का हठ किया। ऐसे हठ से भौजी की असल चेली का हठ भी भला क्योंकर न प्रेरित होता। बहुत कहने पर भी वह न गई।रतजगा करने का निश्चय हुआ और कीर्तन होने लगा।

 

दो दिनों तक बाबा भक्‍तों की भीड़ से इतने, घिरे रहे कि उन्हें दिन में तनिक भी विश्राम न मिला। (सबेरे संकटमोचन पर कथा सुनाते और दिन भर अपने घर पर रोग शोकधारी नर-नारियों को धीरज और विश्वास देते हुए किसीको काशी विश्वनाथ की भभूत और किसीको मत्रं देकर अपनी बला प्रेम से हनुमान जी के चरणों में फेंकते हुए उन्होंने दो दिनों में हजारों की भीड़ निबटाई। दूसरे दिन सांयकाल घोषित भी हो गया कि बाबा कल यहाँ से चले जायेगें। कहाँ जायेगें यह पूछने पर भी किसीको न बतलाया गया।

नब्बे वर्ष के तपस्वी के चेहरे पर रोग की हल्की छाप तो थी पर थकावट का नाम न था। इसे देखकर गाँववाले तो चकित हुए ही बेनीमाधव जी भी चकित हो गए। सुकर खेत में भी बाबा के दर्शनार्थ बड़ी भीड़ उमढ़ आया करती थी, पर वहाँ हवा फैल गई थी कि बाबा चार महीने रहेगें, इसलिए दर्शनार्थियों की दैनिक सँख्या मे संतुलन आ गया था। उन्हें विश्राम करने का अवसर मिल जाता था।बेनीमाधव जी ने बाबा के प्रति काशीवालों की भक्ति-भावना के भी अनेक प्रदर्शन देखे हैं। काशी में भीड़ तो नित्य ही रहती पर बाबा चूकि वहीं के निवासी रहे, गलियों -महल्लों मे प्राय: डोल भी आते हैं इसलिए वह दाल में नमक की तरह उनके जीवनक्रम में रमे हुये हैं। परन्तु राजापुर का यह विशाल जन- समूह तो वेनीमाधव जी के लिए अपूर्व था। हिन्दू, मुसलमान, अमीर, गरीब में कोई भेद नहीं, सबको जात और वर्ग एक है, वे आर्तजन है। उनके तन-मन नाना बाघाओं से पीड़ित होकर घबरा उठे हैं, उन्हें सहारा और प्रेम चाहिए। तुलसी, राम का खास दास, अथक भाव से रामजनों को सेवा करता रहा। संयोग यह भी रहा कि बदली रही पर पानी न बरसा।

तीसरे दिन तड़के मुँह अधेंरे गणपति जी और रामू पण्डित अपनी नियम पूजा से खाली हो चुके थे किन्तु बाबा का ध्यान पूरा होने में अभी देर थी। वेनीमाधव जी भी लम्बी माला जपते हैं पर उनका जप बाबा से पहले पूरा हो जाता है। उस समय तक स्नानार्थी आने लगते हैं। आज भी आने लगे थे।

क्रमशः

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