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राम के तुलसी भाग – 7

मैं तो प्रभु का एक तुच्छ सेवक मात्र हूँ।”

“तो क्‍या मेरी इच्छा पूरी न होगी, महाराज?”

“रामचंद्र जाने। सब कुछ उन्हीं की इच्छा से होता है किन्तु हमारे जीवन- वृत्त में धरा ही क्‍या है। जन्म-काल से लेकर अब तक केवल अपार दुःख-दुर्भाग्य ही मेरे साथ रहा है। लोक में कहीं ठौर-ठिकाना न मिला, परलोक की जानता नहीं। मेरे जीवन में जो सारतत्त्व है वह केवल राम ही है”

“वही तो दर्शाना चाहता हूँ , गुरू जी

चरितों में रामचरित ही श्रेष्ठ है”- रामू बोला-“आप ही ने बखाना है प्रभु कि राम के दास का महत्व राम से भी अधिक होता है। संत जी की इच्छा लोका की इच्छा है।”

“मानस में, विनय पदों मे, कवितावली और दोहों में अपनी अनेक रचनाओं में मैंने अपने जीवन की अनुभूतियाँ ही तो समर्पित की हैं।कुछ पण्डितों नें दग्ध वाण द्वारा मुझ पर यह लाछंन लगाया कि नारी के प्रति मेरे मन में घृणा और उपेक्षा का भाव है।”

“यदि हो भी तो इसमे अनुचित क्या है प्रभु? विर्वत को सांसारिक सामनाओं और कामिनियों से मन मोड़ने के लिए उनकी उपेक्षा करनी ही पड़ती है।सत्य है महाराज, भगवान शंकराचार्य भी कह गए हैं कि नारी नरक का द्वार है। इस वासना के…..”

 

बाबा ने टोका- “यह चर्चा फिर कभी हो सकती है।विश्वास करो बेनीमाथो।रामू, भीतर का दीप जला दे पुत्र, मैं वहीं सोऊँगा।

“जो आज्ञा प्रभु, किन्तु भीतर तो बड़ी गर्मी है।”

“भीतर की गर्मी बाहर की गर्मी को दबा देती है।”

रामू को फिर कुछ कहने का साहस न हुआ।वह भीतर वाले दालान के अहाते से दिया उठा लाया, कमरे का बुझा दीप आलोकिक किया फिर मृतक के स्थान का दीप भी जलाने चला तो बाबा बोले-“उसे रहने दे। दालान का दिया यहीं रख दे और विश्राम कर।”

“आप अकेले रहेंगे, प्रभु ?

“अकेला क्यों, मेरी बुढ़िया मेरे साथ रहेगी, भाई।”

“तो चौकी …..”

“चौकी बिछावन की दरकार नहीं।उसके धरती पर छूटे हुए प्राण मुझे यहीं मिलेंगे, जा।”

रामू आधे क्षण तक स्तब्ध खड़ा रहा, फिर कुछ कहने पूछने का साहस न बटोर सकने के कारण दिया बालकर द्वार बन्द कर दिए। चबूतरे बाले द्वार के सामने वेनीमाघव खड़े थे। बाबा ने उधर के द्वार भी बन्द कर लिए और उस स्थान पर जा बैठे जहाँ उनकी पत्नी ने अपनी देह त्यागी थी। थोड़ी देर सिर झुकाए बैठे अपने दाहिने हाथ से उस जगह की मिट्टी सहलाते रहे, जहाँ रत्ना का मस्तक था। ध्यान में प्रिया का अंतिम रूप दर्शन था और मनोदृष्टि में चार आँखे एक-दूसरे मे लीन होकर आनन्दमग्न थीं।

 

“सीताराम ! सीताराम “- रत्ना का स्वर है। कहाँ से आ रहा है? सबेरे धरती पर दिखलाई पड़ती अद्धांगिनी अब माया की तरह विलुप्त है।

“सीता- राम ! सीताराम ! – कहाँ है? ” मन के झरोखे से झाँक रही है, दिये की लौ में देख रही हैं। धरती पर टिकी हथेली उठकर गोद में बाये हाथ की खुली हथेली पर आ जाती है, काया में सधाव आता है, आँखें दिये की लौ पर टिक जातीं हैं। दोनों भौहों के बीच बाबा के ध्यान-बिन्दु में उसका सूक्ष्म मन जुगनू- सा उड़ता हुआ प्रकट होता हैं और शीश दिये की लौ में समा जाता है। उनकी अन्तंदृष्टि में लौ लघु से विराट होती जाती है। उनकी कल्पता में पूरा कमरा अनंत विद्युत प्रकाश से ऐसा जगमगा जाता है, मानों कमरे का फर्श और दीवारें ईंट -चूने की न होकर मणिजटित हों।

“सीताराम ! सीताराम !“- कानों मे गूँज समाई है, जिसमे अपना और रत्ना का स्वर गंगा-यमुना के समान एक में घुला-मिला है। गूँज की गति तीव्र से तीव्रतर हो रही है, शब्द शब्द न रह कर मधुर वाद्यध्वनि से गुँजरित हो रहे हैं। मणि-मणि में धनुषधारी राम और जगदम्बा सीता प्रसन्‍नबदन अभय मुद्रा में खड़े हैं। बाबा का मुख-मण्डल आनन्दलीन हैं। छोटे-छोटे अनंत विद्युत्‌ कण तीव्र गति से घुलते-मिलते एकाकार धारण करते इतने बढ़ जाते हैं कि अन्तंदृष्टि में केवल युगल चरण ही दिखलाई दे रहे हैं और फिर दृष्टि को एक मीठा झटका लगता है, रत्ना माँ के चरणों में झुकी बैठी है।पर मैं कहाँ हूँ ? नई व्याहुली-सी अलंकृत रत्ना तनिक चेहरा घुमाकर इन्हें देखती है, फिर नटखट गुमानी मुद्रा में पूछती है- “मुझे साथ लाए थे? ”

प्रश्न मन को सकुचाता है, फिर किंचित उत्तेजित होकर स्वर फूटता है- “तुम कब मेरे साथ नही रहीं?”

“तुम मुझे भला क्यों रखोगे, नारी-निन्दक” -रत्ना ने मीठी आँखे तरेरी।

“कौन कहता है ?”

“सारा जग ”

“पर क्या यह सत्य है ?”

“शूद्र, गंवार, ढोल, पशु, नारी ”

“मात्र यही क्यों और भी अनेक वाक्य हैं, परन्तु वे कथा- प्रसंग मे आए हुए पात्रों के विचार हैं?”

“और तुम्हारे ?”

“जिनके श्रीचरणों में मेरी आसक्ति है उन्हीं के श्रीमुख से वे विचार भी प्रकट हुए हैं। तुम्हारे विरह और प्रेम के उद्गार इतने शुद्ध थे कि वे राम के उद्गार बनकर जानकी माता के प्रति अर्पित हो गए-

 

“देखहुँ तात बसत सुहावा, प्रिया हीन मोहि भय उपजावा।”

‘देखहुँ’ शब्द की ध्वनि मात्र से नया बिब जाग्रत‌ हो उठता है-

वन से तापस राम तुलसी के स्वर में लक्ष्मण से कह रहे हैं-

 

“लछिमन देखत काम अनीका।

रहहिं धीर तिन्हें कै जग लीका।

एहिकें एक परम बल नारी।

तेहिं तें उबर सुभट सोइ भारी।”

 

“उबर कर अपना पल्‍ला छुड़ा तो लिया मुझसे। फिर मैं कहाँ?

“तुम्हारी वासना से तो उबरा किन्तु तुम्हारे प्रेम में भी तो डूब गया और ऐसा डूबा कि…..

“पता ही न चला” (हँसती है)

“प्रेम हो और पता न चले?”

अशोक बाटिका में राम-विरहिणी सीता के पास कपीवर श्रीराम का सदेश लेकर पहुँचतें हैं….मन के संकेत मात्र से कल्पना का दृश्य उभर आता है। हनुमान के हृदय में खड़े राम अशोक वन में बैठी सीता को देख रहें है और कपि कह रहे हैं-

 

“कहेउ राम वियोग तब सीता। मोकहूँ सकल भये बिपरीता॥

नवतरुकिसलय मनहुँ कृसानू। काल निसा सम निसि ससि भानू॥

कुवलय विपिन कुत वन सरिसा। वारिद तपत तेल जनु वरिसा॥

जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिविध समीरा॥

कहेहु ते कछु दुख घटि होई। काहि कहहुँ यह जान न कोई॥

तत्त्व प्रेम करि मर्म अरु तोरा। जानत प्रिया एक मन मोरा॥”

क्रमशः

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