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राम के तुलसी भाग – 6

बाबा बेचारे उन्हें कैसे मना करें। काल, समाज अथवा अपने ही मन से आघात खाकर वे भी तो अपने आराध्य से ऐसा ही हठ करतें हैं। ऐसी ही विनय, ऐसा ही विलाप, अश्रुवर्षण उन्होंने भी बार-बार किया है। अपने भीतर राम- भरोसा पाने से पूर्व वे भी श्रद्धावश ऐसे ही अनेक साधु-संतो के पैर पकड़कर राम जी का दर्शन कराने के लिए गिड़गिड़ाते थे। उन्होनें भी गहरी उपेक्षा, तीखे- कड़वे वचन, भूख- दारिद्रय क्या नहीं सहा? आज राम- नाम के प्रताप से वे यह दिन भी देख रहे है कि राजा-रंक सब उनके आगे भिखारी बनकर चिनौरिया करते हैं। फिर भी उन्हे लगता है कि श्रीराम के चरणों में उनकी प्रीति-अतीति अभी पूरी नही हुई परन्तु दुनिया समझती है कि वे श्रीराम सरकार के दर्शन करा सकते हैं। “हे राम, तुम्हारे नाम की महिमा और तुम्हारे ही शील से आज मुझे तो यह गौरव देखने को मिला है उसे देखकर मैं बहुत संकुचित हो रहा हूँ।

भावों ने उद्देलित होकर अपनी अंत:स्थल का स्पर्श पाया, मन में चलते हुए शब्द अब लयात्मक गति पाने लगे-

“द्वार द्वार दीनता कही काढ़ि रद, परि पाहूँ।

हैं दयालु दुनी दस दिसा दुख दोष दलन छम…..

दया कियो न संभाषन काहू।

द्वार द्वार…..

 

“जा बहिनी जा। राम-राम रटती आगँन में सो जा। राम जी तुझे सपने में दर्शन देंगे।”

फिर गाते हुए बैठक में प्रवेश कर गए, मृतक के रिक्त स्थान पर दिया जल रहा था। एक क्षण उसे देखते खड़े रहे, फिर बाहर का द्वार खोला और चबूतरे पर आ गए।

रामू की एक आदत पड़ गई है, गुरू जी जब बिना कागद-कलम लिए ही भाव- वश होकर गुनगुनाने लगते हैं तो उनके पीछे-पीछे वह आप भी उन्ही शब्दों को उसी गायन पद्धति से दोहराने लगता है। उसे एक बार का सुना याद हो जाता है।

बाबा चौकी पर बैठ गए। पद गुनगुनाते दोहराते हुए रामू झट से अपने कंधे पर रखा अ्ंगोछा उतारकर गुरू जी के चरण पोंछने लगा। गुरु के चलित अन्तर्भाव का झटका बाहर पैरों मे प्रदर्शित हुआ। एक चरण का झटका रामू के हाथों को और दूसरा घुटने को लगा। बहते भाव को अपनी इस बाहरी हरकत से ठेस न पहुचें इसलिए उसने बड़ी फुर्ती और मुलायमियत से गुरु का लटका हुआ बाँया चरण अपने दाहिने हाथ से दबा लिया और गुनगुनाहट को तनिक ऊँचा उभार देकर गुरुमुख की ओर आदतवश देखने लगा, यद्यपि अधेरे पांख की रात में इतनी दूर से उसे बारीकी से कुछ सूझ नहीं सकता था। बाबा की भाव-घारा, अवाघ गति से बढ़ रही थी, किन्तु अब स्वर में रोष भी प्रकट हो रहा था।

 

‘तनु जन्यों कुटिल कीट ज्यो तज्यों मातु पिताहें।

 (स्वर का रंग बदला) काहे को रोष?काहे को रोष दोष काहि घौ मेरे ही,

अभाग मोसों सकुचत छुद् सब छाहूँ।

रोष का शमन होते ही और सारी पंक्तियाँ घाराप्रवाह गति से गाई गईं।रामू को एक बार भी अपना स्वर उठाकर बाबा की सहायता नहीं करनी पड़ी। बाबा का स्वर आत्म निवेदन रस में भीगता ही चला गया। अंत तक आते-आते स्वर इतना कोमल हो गया था कि करुणा और आनन्द में भेदाभेद करना ही कठिन था।गुरुमुख गंगा में दोनो शिष्य भी तैरते और डुबकियाँ मारते हुए छक रहे थे, लेकिन सबसे अधिक सुख तो भौजी की असल चेली ने पाया। बैठक के द्वारे वह चौखट से टेक लगाए बैठी थी। बड़ी ठसक भरे संतोष के साथ अपने उठे हुए घुटनों पर मुट्ठी बँधी बाँहों को लपेटकर उन पर अपनी ठोढ़ी टिकाकर सुन रहीं थी।

संत वेनीमाघव ने उठकर गुरू जी के चरणस्पर्श करके कहा- “कृतार्थ भया महाराज। आपके जन्म-काल के त्याग वाली बात हमारे मन मे चल रही थी। उसे आपने कृपापूर्वक अपनी वाणी से और उत्तेजित कर दिया है और जब इतनी उमस बढ़ाई है तो कृपापूर्वक मेह भी अवश्य ही बरसाइयेगा। मेरे और लोक-कल्याण के लिए अनुचर की झोली मे आपका जीवन-वृत्त पड़ जाय तो सेवक का यह जन्म सफल हो जाय । वे संत कौन थे जिन्होंने….”

श्यामो की बुआ खुद भी अपने भैया से कुछ निवेदन करना चाहती थी। उन्हें भय हुआ कि एक शिष्य जब इतनी लम्बी बकवास कर रहा है तो निगोड़ा दूसरा भी कही न लपक पड़े, इसलिए झट से उठी और चलती बात में भैया के पैरों पड़कर कहना चालू किया- “भैया, तुम पूरे अन्तर्रजामी हो। हमार जी जुड़ाय गया। अरे हम अपनी भौजी की असल चेली और चमत्कार देखि निगोड़ी मैनो। अब हम कहेगी कि हमरी खातिर भैया ऐसा भजन रचि के सुनाइन कि सुनते एकदम से हमार मोच्छ हुई गई। अरे, हम तो तुम्हारी दया से तर गई भैया। चलती विरियां भौजी हमैं इन चरनन की सरग-सीढ़ी दे गई।”

भावावेश में आकर श्यामो की बुआ रोने लगी।बाबा ने बुआ की झुकी पीठ पर हल्की उंगली कोचकर छेड़ा- “अरी तू तो यहाँ तर के बैठ गई, वहाँ तेरी भौजी का दिया बुझ गया।”

“हाय राम” कहके बुआ उठने को हुई कि बाबा ने उनके सिर को अपने हाथ से थपथपाकर कहा- “रहने दे, हमने तो ऐसे ही छेड़ दिया। रतना का दीपक तो हमारे हिरदे में दीपित है। जा, सो जा।अब भौजी भैया रटना छोड़कर सीताराम सीताराम रट,जा।”

 

पद-रचना के समय पैर पोंछने का काम रुक गया था, वह रामू ने बुआ बाबा संवाद की अवधि में कर डाला। अब इस प्रतीक्षा में था कि बाबा लेटें और वह चरण चापना आरंभ करे, किन्तु बाबा पैर पर पैर रखे वैसे ही बैठे रहे।

रामू ने गद्गद स्वर मे कहा- “विनय के २७५ पद आज रच गए प्रभु।”

खोई हुईं हाँ कहकर बाबा मस्ती मे आकर धीरे-धीरे गाने लगे-

 

साथी हमरे चलि गये, हम भी चालनहार कागद में बाकी रही ताते लागत बार॥

 

बाबा ने इतने करुण स्वर में गाया कि शिष्यों की आँखें भरने लगीं। बेनीमाघव बोले-“हम तो आपका ग्रथांवतार कराने के लिए आतुर हो रहे हैं और आप कबीर साहब के शब्दों की आड़ लेकर मरण कामना कर रहे हैं । अपने अनुचरों पर इतना अन्याय न करे गुरू जी।”

“अवतार धारण करने पर अविनाशी ईश्वर को भी मृत्यु के माध्यम से ही अपनी लीला संवरण करनी पड़ती है।

क्रमशः

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