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राम के तुलसी भाग – 5

संत वेनीमाधव जी की आयु पचास-पचपन के बीच में थी और रामू पण्डित अभी इकतीस के ही थे। वेनीमाधव गत सात-आठ वर्षों से अपने आपको बाबा का शिष्य मानते हैं। कुछ महीनों तक वे काशी मे उनके पास ही रहे थे किन्तु उनके बेलगाम मन को बाबा के सिद्ध गोस्वामीत्व से इतना भय लगता था कि उनमें प्रतिक्रियाएं उठने लगी थीं। तब बाबा ने उनसे कहा-“वटबृक्ष के नीचे दूसरा पौधा नहीं उगता, बेनीमाधव, तुम वाराह क्षेत्र में रहो और मन को सधाओ। बीच-बीच में जब जी चाहे यहाँ आ जाया करो।”

तबसे वे प्रति वर्ष अपना कुछ समय गुरु सेवा में बिताते हैं।

रामू बचपन से ही उनके साथ है। काशी की महामारी के दिनों मे उसमे बाबा के आदेशानुसार किशोरों का सेवक दल सगंठित करके काशी में बड़ा काम किया, फिर अपने पितामह के देहान्त के बाद वह उन्हीं के पास रहने लगा। बाबा ने ही उसे संस्कृत पढ़ाई है। अब वही उनकी देखभाल करता है, हरदम बाबा का मुखारविन्द ही निहारता रहता है। वह उनकी एक-एक भाव-भंगिमा को पहचानता है। उसकी अचूक और निष्कपट सेवा-भावना, अध्ययनशीलता और गायन तथा काव्य-प्रतिभा से प्रसन्‍न होने के कारण बाबा उसे पुत्रवत‌ चाहते हैं।

इन दोनों शिष्यों के साथ बाबा जब घर पहुँचे तो देखा कि लेटने के लिए उनकी चौकी बाहर चबूतरे पर लगाई गई है और गणपति उपाध्याय पास ही में खड़े उनकी बाट देख रहे हैं। घर का द्वार खुला देखकर वे भीतर चले गए। दालान से बैठक मे झाँककर देखा, जहाँ उनकी पत्नी ने प्राण तजे थे वहीं श्यामो की बुआ दिये की बत्ती ठीक कर रही थी। बाबा रात में पहचाने नहीं, पूछा- “कौन है भाई।”

“अरे हमको चीन्हें नाहीं भैया, हम है सिउदत्त सिंह की बहिन गंगा।”

“भला-भला, यहाँ सोएगी तू ?”

“हम न सोवैगें तो दिया कौन देखी?”

“हम”

“अरे इत्ते बड़े महात्मा हुइके तुम हियाँ पौढियों? बड़ी उमस है।”

“और तेरे लिए उमस नहीं है ?”

“हम तौ भैया, तुम जानौ कि जवते तुम सन्यासी भये तब से यहीं पर भौजी की सेवा में ही रहीं हैं। भौजी कहै, स्यामो की बुआ, तुम्हारी ऐसी सेवा कोई नही कर सकत है। हमहीं तो आज भिनसारे मैनो को हियाँ बैठाय के बाहर लोगन का बुलाव की खातिर गई रही। इत्ते में तुम आय गयौ, औरन क़ो भीतर आवे न दियो, मना कि हैव। हम आन लागे तो सव पंच हमैं रोकि लिहिन। कहार की पतोहू निगोड़ी अंतकाल के दरसन पाय गई और हम जो जनम-भर उनकी असल चेली रही सो बाहर रह गईं।” श्यामो की बुआ पछतावे के मारे रो पड़ी।

भोले मुँह से शिकायत और रोना सुनकर बाबा को मन ही मन में हँसी आ गई, समझाते हुए कहा- “अच्छा, अच्छा, सोच न करो। तुम्हारी सेवा राम जी के खाते मे लिखी है।”

श्यामो की बुआ आँसू पोंछते हुए बोली -“अरे उनके खाते से हमारा कौन परोजन। भला-बुरा कहै वाले तो सब पंच हिया रहते हैं। मैना निगोड़ी दिन-भर सबते कहत फिरी कि उसने तुम्हारा चमत्कार देखा। सब जनी हमते कहै कि बुआ, मैना भागमान है, पुन्न लूट ले गई। तुमरे चरनन की सौंह भैया, आज दिन-भर हमको ऐसी रुवाई छूटी है ऐसी छूटी है कि (रोने लगी, फिर रोते-रोते ही कहा) एक तो हमार भौजी चली गईं दूसरे राम जी ने हमरा भाग खोटा कर दिया।”

बुआ फूट-फूटकर रोने लगी।बाबा थके हुए थे।एक तो अद्धांगनी के अवसान से उनका मन एक सीमा तक अवसन्न था और फिर दिन-भर अपने भक्‍तों की श्रद्धा के अंघाक्रमणों का त्रास भी सहा था। इसके अलावा आज उन्हें चलना भी अधिक पड़ा था। बाबा के आदेश से गणपति अपने घर चले गए। रामू चाहता था कि गुरू जी विश्राम करें और वह पैर दावे। आज उन्हें सोने में भी अवेर हो गई थी। रामू को गुरु का कष्ट सदा असह्य था। वह उन्हें श्यामो की बुआ के व्यर्थ क्रंदन से मुक्त कराना चाहता था।

वेनीमाधव जी भी पहली बार गुरू जी की जन्ममभूमि में आए थे। गुरु के संबंध में कुछ बाते आज वे अकस्मात्‌ ही जान गए थे और बहुत्त कुछ जानने के लिए उत्सुक थे। उनका संघर्षशील मानस एक महापुरुष के संघर्पशील जीवन से अपने लिए बल ग्रहण करना चाहता था। थोड़ी देर पहले ही गुरू जी महाराज ने अपने बालमित्र की बात का उत्तर देते हुए बड़ी कचोट और व्यंग के साथ कहा था कि जन्मते ही घर से कुटिल कीट की तरह निकाल फेंके गए थे। इस बात का क्‍या रहस्य है? उनका जीवन-वृत्त क्या है? वाराह क्षेत्र इनकी गुरुभूमि है। कौन थे इनके गुरु? वाराह क्षेत्र मे बेनीमाधव बाबा ने जब एक दिन उनसे पूछा था तो उत्तर मिला था कि नररूप में नारायण मेरी बाँह गहने के लिए आ गए थे। फिर प्रश्न किया तो कहा कि अवसर आने पर सुनाएँगे। इसके कुछ ही दिनों बाद अचानक राजापुर आने का कारण बतलाए बिना ही वे ऐसा संयोग साधकर यहाँ के लिए चले कि अपनी जीवन संगिनी का अंतिम क्षण मोक्षकारी बना दिया। क्‍या महाराज पहले ही से जान गए थे? इस प्रकार वेनीमाघव जी अपने भीतर अनेक प्रश्नों से पीड़ित थे और उसका समाधान पाने को आतुर भी। पर यह बुढ़िया तो पीछा ही नहीं छोड़ रही, क्या किया जाय।

श्यामो की बुआ बाबा के चरण पकड़कर बैठ गई थी। वह रोए ही जा रही थी, हठ साधकर अपनी ही कहती चली जा रही थी। बाबा के दोनों चेलों ने उनसे विनती करनी चाही पर वे और भी चढ़ गईं, रामू के पैर को एक हाथ से ढकेलने का आवेश दिखलाकर कोध में बोली-“दूर हटो। तुम कौन हो हमको समझावे वाले? यह हमारे भैया हैं। हजारन को राम जी के दरसन कराइन है, मरती विरिया हमारी भौजी को भी कराए। निगोड़ी मैना हमको घोखा देके पुन्यात्मा बन गई। (रोकर) हम अपती भौजी की असल चेली, और हमहीं दरसन न कर पाईं।हम अब हम इनके चरन न छोड़गें। इन्हे हमारा उद्धार करना ही पड़ेगा। भौजी कह गई है हमसे की श्यामो की बुआ, तुम्हीं असल चेली हो।” श्यामो की बुआ ने बाबा के पैर पकड़कर क्रंदन ताण्डव मचा डाला।

क्रमशः

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