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राम के तुलसी भाग – 4

ध्यान पट अरुण पीत हो गया, जैसे किसी रंगमंच की काली यवनिका उठा दी गई हो और यवनिका चारों ओर से गोलाकार होकर सिमटती हुई पीतपट के बीचों बीच अधर मे लटककर नाचने लगी।वह पीतपट ऐसा है जैसे विद्युत रेखा चौड़ी होकर फर्श की तरह फैल जाय और उसका अणु-अणु निरंतर कौंधने लगे। यह चमक श्याम बिन्दु के चारों ओर आ-आकर यों पछड़ती है जैसे तट पर सागर की लहरें पछाड़ खाती हैं। लहरों के छीटों से श्याम बिन्दु में एक आकार निर्मित होने लगता है। बिन्दु की श्यामता को वह आकार अपने आप में तेजी से समोने लगता है।अरूण पट के मध्य में कोटि मनोज लजावन हारे, सर्वशक्तिमान परम उदार सीतापति रामचन्द्र का आकार इस तरह झलकने लगा कि जैसे ब्रह्म बेला में दुनिया झलकती है।इस दृश्य का आनन्द हृदय में भरने लगता है और अधिक स्पष्टता से दर्शन कर पाने का आग्रह ध्यान को और एकाग्र करता है। बाबा को लगता है कि गंगा मानो उलटकर अपने उद्यम स्रोत श्रीरामचन्द्र के कंजारुण पद-नख मे फिर से समा रही हो, फिर और कुछ ध्यान नहीं रहा।भीतर बाहर केवल भाव भगवान है, तुलसीदास की कंचन काया एकदम निश्चेष्ट है। वे समाधिलीन हैं।

दोपहर तक राजापुर गाँव में कही तिल रखने की भी जगह नही बची थी। हर व्यक्ति बाबा के दर्शन पाना चाहता था। घकापैल मच रही थी। ‘तुलसी बावा की जय, रतना मैया की जय, जय-जय सीताराम” के गगनभेदी नारों से किसी की बात तक नहीं सुनाई पड़ रही थी । गोस्वामी जी महाराज का आगमन सुनकर आस-पास के अनेक छोटे बड़े ज़मींदार और सेठ-साहुकार भी आए थे। मखाने, ताबे के टके, चांदी के दिरहम, सोने के फूल, पंचमेल रत्नों की खिचड़ी, जो जिससे बन पड़ा , अर्थी पर लुटाया। गरीबो-मंगतो की झोलिया भर गईं। विमान के झागे ढोल-दमामे, नरसिहे, घंटा-शंख-घडियाल बजाते कोस-भर का रास्ता चार घंटे में पार हुआ। सूर्यास्त के लगभग बाबा ने मैया की चिता में अग्नि दी। उस समय विरक्त महात्मा की आँखों से भी आँसू टपकने लगे। यह देखकर आस-पास खड़े उनके भक्तगण भाव विगलित हो गए। जन समाज सीताराम- सीताराम की रटन में लीन हो गया ।

सीताराम की गुहार बाबा के कानों में ऐसे पड़ी जैसे कोई अंधा बन्द गली में चलते-चलते दीवार से टकराकर अपना सिर चुटीला कर ले।मन को पछतावा हुआ, ‘हे प्रभु, तुम्हारी यह माया ऐसी है कि जन्म भर जप-तप साधन करते- करते पच मरो तब भी इससे पार पाना उस समय तक महा कठिन है जब तक कि तुम्हारी ही पूर्ण कृपा न हो। सुनता हूँ , विचारता हूँ , समझता भी हूँ , यहाँ तक कि अब तो दूसरों को विस्तार से समझा भी लेता हूँ पर मौके पर यह सारा किया धरा चौपट हो जाता है। हे हरि, वह कौन-सी अनुभूति है जिसे पाकर मैं इस मोह जनित भव दारुण विपत्तियों के संत्रास से मुक्त हो सकूँगा। मेरे मन को वह ब्रह्म-पीयूष मृदु शीतल रस पान करने का कब अवसर मिलेगा कि जिससे वह झूठी मृग जल तृष्णा से मुक्त हो सके। अगले शुक्ल पक्ष की सप्तमी को आयु के नव्बे वर्ष पूरे हो जायगें। अब भला मैं और कितने दिन जिऊँगा जो तुम मुझे आशा निराशा की चकरघिन्नी में नचाते ही चले जाते हो। दया करो राम, अब तो दया कर ही दो।आँखें फिर भर गईं।

पीछे भीड़ में’सीताराम-सीताराम’ हो रहा था, कहीं-कहीं बातें भी हो रही थीं-

“चुपाय रहो शास्त्री, अवसर देखी, यह प्रेमाश्रु हैं”

“प्रेमाश्रु और ज्ञानी बहावे? अरे, भरी जवानी में हमारी दुइ-दुइ पत्नियाँ मरीं, और कसी रस की गगरिया,मदनमोहिनी, जिन पर आठौं पहर हम प्रेम से अपने प्राण निछावर करते रहे पर हमने तो एक्कौ आँसू न बहाया। चट से तीसरी ब्याह लाए और आत्मसंगम के बदले गर्ग संहिता का उपदेश याद करे लगे कि–

“दुर्जृदा शिल्पिना दासा दुष्टस्य पटहा: स्त्रिय ताडिता मार्दव यान्ति नते सत्कार भाजनम्‌।”

 

“यौं तौं इन्होंने भी लिखा है कि ‘शुद्र, गंवार, ढोल, पशु, नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी।”

“लिखने से क्या होता है जो अमल में लावे सो ज्ञानी”

“पण्डितवर, अपने गाल बजाने के लिए क्या यही अवसर मिला है आपको?”-उत्तेजनावश रामू का स्वर तनिक ऊंचा उठ गया ।

“रामू ” बाबा ने पीछे घूमकर देखा।रामू और बेनीमाघव बाबा के पीछे खडे थे। उनसे दस कदम पीछे कोनें में अघेड़ वय के वैष्णव तिलकधारी शास्त्री और त्रिपुण्डधारी सुमेरु जी थे | बाबा की गर्दन पीछे मुड़ते ही वे दोनों चोर की तरह पीछे दुबक गए, यद्यपि बाबा ने उनकी ओर देखा तक न था। बाबा का आदेश पाते ही रामू का क्रोध से तमतमाया हुआ चेहरा विवश भाव से नीचे झुक गया।

शमशान से लौटने पर बाबा की इच्छा थी कि संकटमोचन हनुमान जी के चबूतरे पर सोएँ, पर बड़े-बड़े लोग उनके विश्राम के लिए राजसी ,सुख प्रस्तुत करने को आतुर थे। हर एक उन्हे अपने शिविर में ठहराना चाहता था। राजा अहिर इन बड़ो की बातों से बिगड़ गए, बोले-“भैया औरे काहे सोवैं? अरे, हियाँ उनका घर है, गाँव है, जन्मभूमि है।”

 

घर, गाँव , जन्मभूमि, यह शब्द बाबा के मन में तीन फाँसों से चुभे, व्यंग फटा, हँसीं आई, कहा- “घर घरेतिन के साथ गया। गाँव तुम्हारे नाम से बजता है और रही जन्मभूमि वह तो सूकर खेत में है भाई।यहाँ से तो कुटिल कीट की तरह माता-पिता ने मुझे जन्मते ही निकाल फेंका था।”

राजा के चेहरे पर ऐसी कंप चढ़ी कि मानो बाबा को घर-गाँव से निकाल फेंकने का अपराध उन्ही से हुआ हो, किन्तु उनका मन बचाव के लिए तुरंत ही एक सूझ पा गया, मुस्कराये, फिर कहा-“तो उसमे बुराई क्या भयी? गाँव से निकले तो राम जी की सरन में पहुंच गये हैं”

तुलसी बाबा भीतर ही भीतर कट गए, सिर भुकाकर कहा- “नीकी कही। तुम खरे गोस्वामी हो रजिया, मेरा बहका पशु पकड़ लाए। ठीक है, मैं उसी घर मे रहूँगा जिसे तुम मेरा कहते हो।”

राजा और बाबा की बातो में ऐसी पहेली उलझी थी कि जिसे सुलझाए बिना न तो बेनीमाधव जी को चैन पड़ सकता था और न राम द्विवेदी को।

क्रमशः

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