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राम के तुलसी भाग – 19

“तो क्या सारे पाप हमनें ही किए थे अम्मा और ये सुखचेनसिह ठाकुर, पुत्तन महाराज, जो हम गरीबों को मारते-पीटते है, वो क्या पाप नही कर रहें हैं अम्मा?”

बच्चे का तेहा देखकर अम्मा बोली-“ब्राम्हन के पूत हो ना।अच्छा, एक कहानी सुनोगे रामबोला?”

“इसी बात पर?”

“हाँ “

“सुनाओ”

“एक आदमी रहा और एक कुत्ता रहा,तो कुत्ता किनारे पर सोता रहा। आदमी अपने रास्ते जा रहा था। तो ठलुहाई में उस आदमी ने पत्थर उठाके कुत्ते को मार दिया | कुत्ता सीधा राम जी के पास गया और कहा कि राम जी हमारा न्याय करो। राम जी ने पूछा- हम तुम्हारा क्या न्याय करें? कुत्ता बोला कि राम जी इस आदमी को खूब दण्डो। कैसे दण्डें कुतवा- राम जी ने पूछा। तो कुत्ता बोला कि इसे किसी बड़े मठ का महंत बनाय देव राम जी। राम जी बोले, अरे, तू तो इसे बड़ा सुख देने को कह रहा है रे।कुत्ता बोला, नाहीं राम जी, पिछले जनम में हम भी महंत थे तो खूब खा-खा के मोटाए और दीन-दु्बेलों को दबाने लगे । हमने सबके ऊपर अत्याचार किया, उसी का दण्ड भोग रहा हूँ । तो राम जी बोले कि अरे कुतवा, इसे दण्ड न कह, यह तेरी तपस्या है। इससे तुम्हें ज्ञान मिलेगा।”

तुलसी बाबा बतला रहे थे- “मेरी आदि गुरु परम तपस्विनी पार्वती अम्मा ही थीं, मानों शंकर भगवान ने मुझे जिलाए रखने के लिए ही जगदम्बा पार्वती को भिखारिन बनाकर भेज दिया था। दरिद्रता में इतना वैभव, दुर्बलता में इतनी शक्ति और कुरूपता में इतनी सुन्दरता मैंने पार्वती अम्मा के अतिरिक्त औरों में प्राय: कम ही देखी।”

“तो क्या यही पार्वती जी तुम्हें पढ़ाइन-लिखाइन भैया?” राजा भगत ने पूछा।

“पार्वती अम्मा तो बेचारी मुझे इतना ही पढ़ा गई कि जब-जब पीर पड़े तब-तब बजरंगबली को टेरो। कहो कि हे हनुमान स्वामी, तुम हमें राम जी के दरबार में पहुँचा दो जिससे कि हम अपनी भली-बुरी उनसे निवेदन कर लें। वर्षा से भीगनें के बाद मेरी पालनहार बहुत खींच खाँच कर भी कदाचित्‌ पाँच- छ: महीने से अधिक नही जी पाई थी। एक दिन जब भिक्षाटन से लौटकर आया तो बच्चा रामबोला भीख भरी झोली लिए अपनी कुटिया में प्रवेश करता है तो देखता है कि पार्वती अम्मा ठण्डी पड़ी है। उनके मुख पर मक्खियाँ आ-जा रही हैं और वह बुलाए से भी नही बोलती है। बालक रामबोला घबराया हुआ पड़ोस की झोंपड़ी में जाता है, वहाँ जाकर आवाज देता है- “फेंकुआ की अजिया, मेरी अम्मा को क्या हो गया? बोलती ही नही है।आँख भी नहीं खोल रही है।”

फेंकुआ की आजी रामबोला के साथ उसकी झोंपड़ी में आती है। पार्वती अम्मा की देह टटोलती है फिर मुँदी आँखें खोलकर निहारती है और कहती है- “गई तोरी पार्वती अम्मा, अब का धरा है।”

“कहाँ”

“राम जी के घर और कहाँ।जाओ बस्ती से सबको बुला लाओ।”

 

बस्ती के लोग आते हैं, फिर कहीं से बाँसों की भीख माँगकर लाई जाती है। लकडि़यों का दान माँगा जाता है। बुढ़िया फुँकती है और बालक रामबोला पत्थर होकर सब कुछ देखता है। बड़े लोग जो कहते है वही करता है। अपनी पालनहारी को ठिकाने लगाकर अपनी कुटी में आकर अकेला बैठ जाता है-“अब हमारा क्‍या होगा बजंरगी स्वामी? राम जी के दरबार में हमारी गोहार लगा दो। हे राम जी, अम्मा बिना अब हम क्‍या करें?”

बच्चा फूट-फूटकर रोने लगता है, धरती से चिपट-चिपटकर रोता है मानों धरती ही उसकी अब पार्वती अम्मा है। फिर वही रोज का भीख माँगने का क्रम-राम जपाकर, राम जपाकर, राम जपाकर भाई रे…..

“ए रामबोला, हियाँ आओ।”

“नहीं हमें काम है।”

“अब क्या काम है।तेरी झोली में इतनी तो भीख भरी है। आओ, हमारे साथ खेलो। हम तुम्हें अम्मा से कहके दो रोटी ला देंगे।”

“हम अब तुम्हारें यहाँ से भिक्षा नहीं लेते। तुम्हारे बप्पा ने हमको डाँटा था।”

“अरे हमने तो नहीं डाँटा था। आओ खेले।”

“नहीं, तुम्हारे बप्पा ने मना किया है, मारेंगे।”

“बप्पा है नहीं। दूर गए हैं। आओ खेलें, आओ, आओ न।”

रामबोला झोली कन्धे से उतारकर पीपल के चबूतरे पर रखता है और लड़के से डण्डा लेने के लिए हाथ बढ़ाता है। वह गढ्ढे पर पुल्‍ली रखकर रामबोला से कहता है-“पहला दांव मेरा होगा।”

रामबोला कहता है-“नहीं भाई, तुम अपना दांव लेकर भाग जाते हो, मैं नहीं खेलूँगा, जाता हूँ।”

“अरे नहीं, हम तुम्हें दांव जरूर देंगे।”

“न तो खाओ सौंह।”

“धरी सौंह खाता हूँ।”

“ऐसी सौंह तुम क्या मानोंगे, राम जी की सौंह खाओ तब हम मानें।”

“राम जी की सौंह, हम तुम्हे जरूर दांव देंगे।”

खेल होने लगा। एक बार हारकर भी उस लड़के ने अपनी हार न मानी।रामबोला मान गया, फिर खिलाने लगा। लड़का दुबारा हारा। उसने फिर हार न मानी और अपना गुल्ली-डण्डा उठाकर जानें लगा। रामबोला को ताव आ गया। उसकी शिकायत थी कि लड़के ने राम जी की शपथ खाकर भी धोखा दिया, यह क्‍या भले घर के लोगों का काम है।रामबोला ने छीना-झपटी में गुल्ली और डण्डा दोनों ही उससे छीन लिये। लड़का क्रोध में बावला होकर उसे मारने झपटा। सामने से जाते हुए दो हलवाहों ने मना भी किया किन्तु वह और भी उलझ पड़ा। रामबोला ने उसकी बाँह पकड़ ली और मरोड़ने लगा। लड़के ने अपने बचाव के लिए रामबोला की बाँहों पर अपने दाँत चुभो दिए। रामबोला पीड़ा से कराह उठा और साथ ही उसे ऐसा क्रोध आया कि बायें हाथ से काटनेवाले लड़के के जबड़े पर ही मुक्का मारा।हाथ मुक्त हो गया।अपनी बाँह से बहते हुए लहू को देखकर रामबोला की आँखो में खून उतर आया। लड़के को पटककर उसने उसकी अच्छी तरह से गत बनानी आरम्भ की। पस्त होकर अपने बचाव के लिए जब वह जोर जोर से डकराने लगा तभी उसे छोड़ा  और चबूतरे से अपनी झोली उठाकर चल दिया।

 

उस दिन छुटपुटी शाम के समय रामबोला अपनी झोपड़ी में चूल्हे पर तवा चढ़ाकर कच्ची पक्की रोटियाँ सेंक रहा था। तभी उसे झोपड़ी के बाहर दो-तीन आवाजे सुनाई पड़ी। उसी बस्ती में रहनेवाला भिखारी युवक भैसियाँ किसी से कह रहा था- “अरे, यह रामबोला बड़ा चोर और बेइमान है। गाँव भर के लड़कों से झगड़ा करता है।”

क्रमशः

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