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राम के तुलसी भाग – 18

इतना हमको याद है कि रामबोला नाम धारण करके कंधे पर छोटी- सी गाँठ बँधी झोली लटकाए हाथ में एक लाठी लिए हुए हम ऐसे ठाठ के साथ भीख माँगने के लिए पार्वती अम्मा के साथ जाया करते थे कि मानों त्रैलोक्य विजय के लिए जा रहे हों।

स्मृतिलोक की झाँकी लेने के लिए आँखें फिर मुँद गईं।एक गाँव के एक घर के द्वार पर रामबोला और पार्वती अम्मा सुर में सुर मिलाकर कह रहे है “राम के नाम पै कुछ मिल जाय-ए माई……”

शिशु रामबोला अपने तोतले किन्तु मीठे स्वर में भजन गाता है-

“राम कहत चले राम

कहत चले राम, कहत चले भाई रे।”

 घर के भीतर से एक छोटी आयु की कुलवधू कटोरी भर आटा लेकर आती है। रामबोला गाना बन्द करके उसके सामने अपनी झोली फैला देता है। युवती मुस्कराकर कहती है- “गाना काहे बंद किया रामबोला? ” बच्चा झोली फैलाए चुपचाप खड़ा रहा, पार्वती अम्मा ने अपना हाथ रामबोला के सिर पर प्यार से फेरते हुए युवती से कहा- “अभी इसे याद नही बहुरिया। अभी नन्‍हा-सा ही तो है।”

“पर बड़ा मीठा गाता है। तुम्हारा पोता है न, पार्वती।”

“हाँ जब पाला है तो जो चाहे समझों।बाकी ब्राह्मन पण्डित का पूत है। इसके जनमते ही इसकी महतारी मर गई। बाप बड़े जोतसी रहे तो पत्रा विचार के बोले कि इसे घर से निकालो, यहाँ रहेगा तो सबका बुरा करेगा। हमारी पतोहू उनके हियाँ टहल करती रही तो वह हमें दे गई। हम कहा कि हमें मरे जिए की चिन्ता नहीं, अभागी वैसे ही है, पाल देगें। बुढ़ापा काटने का एक बहाना मिल गया।”

अतीत में लीन होकर बाबा कह रहे थे- “पार्वती अम्मा हमें भजन याद कराती थी। महात्मा सूरदास, कबीरदास और देवी मीराबाई आदि संतों के भजन उस समय बड़े प्रचलित थे। मुझे सब याद हो गए। यद्यपि भिक्षा देनेवालों के आग्रह पर गाना मुझें प्राय: अच्छा नही लगता था। मेरे ब्राह्मण संतान होने और मेरे दुर्भाग्य की बातें सुना-सुनाकर वे मेरे प्रति सहानुभूति जगाया करती थी। यह बात आरम्भ ही से मेरे स्वाभिमान को धक्के मारती थी। बड़ी कठिन तपस्या थी यह। जब मैं अकेला जाने लगा तो यह अनुभव और भी अधिक हुआ।”

 

शिशु भिक्षुक गा रहा है-

“हम भक्तन के भक्त हमारे

सुन अर्जुन परतिग्या मेरी यह ब्रत टरत न ठारे।

टरत न टारे….टरत न ठारे रे रे।”

 

सिर में जोर से खुजली मची। “टारे’ शब्द की रे-रे ध्वनि भी सिर के साथ ही हिलने लगी। “भकते काज सा…….” नाक पर मक्खी बैठ गई। उसे उड़ाने में गला बेसुरा हो गया और नाक भी खुजला उठी। कभी एक टाँग उठाकर उसे सुस्ताने का अवसर दिया और कभी दूसरी को। चेहरे पर ऊब भरी क्षोभ की मचलती परछाइयों में, ‘हे माई, दया हुई जाय। बड़ी देर तें ठाढे हैं।’- रूलाई भी लग जाती। बीच-बीच से जुमुहाइयाँ भी आ जातीं।धरती आकाश पर सूनी दृष्टि घूमने लगती। फिर किसी मक्खी के उत्पात से “हम भक्तन के भक्‍त हमारे’ भजन की पुनरावृत्ति हो जाती, फिर ‘हे माई दया हुई जाय’ – इस उबा देनेवाली दीर्घकालीन तपस्या के बाद एक कर्कशा प्रौढ़ा कटोरी में चुट्की भर आटा लेकर भीतर से आती है। उसका देनेवाला हाथ वित्ता-भर ही आगे बढ़ता है मगर जबान गज भर की हो जाती है- “मुँह जला हमारी ही देहरी में टे- टें करत है जब देखौ तो……..”

रामबोला का चेहरा ताप से भर उठा। झोली आगे बढ़ाने की इच्छा तो न हुई पर बढ़ानी ही पड़ी। यह रोज का क्रम है। इससे छुटकारा नही मिल सकता।

ब्राह्मणपांडें के नुक्कड़ पर पीपल के पेड़ के पास दो-तीन लड़कों के साथ रामबोला गुल्ली-डण्डा खेल रहा था। पीपल के चबूतरे पर उसकी झोली और लाठी रखी थी। रामबोला डण्डे से गुल्ली फेंक रहा था। तभी खेतों की ओर से विद्वान से अधिक पहलवान लगनेवाले पुत्तन महाराज पघारे। रामबोला को देखते ही वे अपने लड़कों पर बमके-“फिर ईके साथ खेले लगे, ऐ ससुर नीच भिखारी, जिसकी देह से बास आती है, उसके साथ ब्राह्मण के बेटे खेलतें हैं, जो है सो हजार बार मना किया ससुरों को।”

पुत्तन महाराज के आते ही रामबोला खेल छोड़कर चबूतरे से अपनी झोली और संटी उठाने लगा था, लड़के घर के भीतर भाग गए थे। पुत्तन महाराज की बात रामबोला को अच्छी न लगी, कंधे पर झोली टाँगते हुए उसने कहा–“हम रोज नहाते है महाराज। हम भी ब्राह्मण के बेटा ………”

“हाँ हाँ साले, तू तो बाजपेई है बाजपेई। हमसे जबान लड़ाता है, जो है सो, ऐ”-पु्त्तन महाराज रामबोला के पास आकर खड़े हुए उसे अपनी लाल लाल आँखें दिखला रहे थे। बच्चा उस क्रोध मुद्रा को देखकर सहम तो अवश्य ही गया पर मन के सत्य को दबा न सका, उसने फिर कहा- “हम झूठ नाहीं बोलते महाराज।”

“साले, सत्यवादी हरिश्चन्द्र का नाती बनता है (बच्चे के सिर और गालों पर दो-तीन करारे तमाचें पड़ गए। वह लड़खड़ा गया) भाग और फिर जो तोको हियाँ खेलते देखा तो मारते-मारते हड्डी-पसली की चटनी बनाय देंगे। खबरदार, जो अब हमारे धर पे भीख माँगने आया।”

रामबोला रोता हुआ सरपट भागा।वह सीधे अपनी झोपड़ी पर आकर ही रुका और एक पड़ोसिन लड़की के सिर की जुयें बीनती हुई पार्वती अम्मा से लिपटकर फूट-फूटकर रोने लगा।

“अरे क्या भया बचवा?”

रामबोला बिलखकर बोला-“अम्मा अब हम कभी भीख माँगने नही जाएँगें“

“अरे, तो पेट कैसे भरेगा बचवा”

“हम‌ खेती करेंगे, जैसे और सब करते हैं।”

बुढ़िया पार्वती सुनकर हँसने का निष्फल प्रयत्न करती हुई रुककर बोली “अरे बेटा, हम भिखारियों को जमीन कौन देगा ? खाने को तो मिलता नहीं है, हल- बल कहाँ से मिलेगा।”

“पर हमको भीख माँगना अच्छा नही लगता है, अम्मा। द्वारे-द्वारे रिरियाओ, गिड़गिड़ाओ , कोई सुने, कोई न सुने, गाली दे। यह रोज रोज का दु:ख हमसे सहा नही जाता है।”

“हूँ”- बच्चे के सिर और पीठ पर प्रेम से हाथ फेरकर बुढ़िया बोली- “यह दु:ख नही, तपस्या है बेटा। पिछले जनमों में जो पाप किए है वो इस जनम में हम तपस्या करके हम धो रहे है कि जिससे अगले जनम में हमें सुख मिले।”

क्रमशः

 

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