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राम के तुलसी भाग – 17

छप्पर के नीचे अम्मा की लठिया झाँकती नजर आई। उसे लपककर खीच लिया और उसके सहारे से किसी प्रकार दूसरा सिरा भी ऊँचा उठा ही लिया। दो-एक क्षणों तक अपने श्रम की सफलता को विजय पुलक भरें संतोष से निहारता रहा, फिर पार्वती अम्मा के सिरहाने की तरफ बढा़।भीगते हुए भी अम्मा निर्विकार मुद्रा में काठ सी पड़ी थीं। उनके कान से मुँह सटाकर रामबोला ने जोर से कहा-“अम्मा, जरा सी सरक जाओ तो भींजोगी नहीं।”

“मोरि देह तो पाथर हुई गई है रे।कैसे सरकी?”

सुनकर रामबोला हताश हो गया। एक बार शिकायत भरा सिर उठाकर बरसते आकाश को देखा, फिर और कुछ न सूझा तो अम्मा से लिपटकर लेट गया। स्वयं भीगते हुए भी उसे यह संतोष था कि वह अपनी पालनहारी को वर्षा से बचा रहा है। पर यह संतोष अधिक देर तक टिक न पाया। पार्वती अम्मा तब भी पानी से भीग रही थी।आकाश में बिजली के कौधें बीच-बीच में लपक उठते थे।बादलों की गड़गड़ाहट सुनकर रामबोला को लगा कि मानों चैनसिह ठाकुर अपने हलवाहा को डांट रहे हैं। रामबोला अनायास ही ताव में आ गया। उठा और फिर नये श्रम की साधना में लग गया। दूसरे छप्पर के ढीले पड़ गए अजंर-पंजर को कसने के लिए पास ही खलार में उगी लम्बी घास-पतवार उखाड़ लाया। रामबोला ने भिखारी बस्ती के और लोगों को जैसे घास बंटकर रस्सी बनाते देखा था वैसे ही बंटने लगा। जैसे तैसे रस्सियाँ बंटी, जस तस ट्ट्टर बाँधा। अब जो उसकी आधी से अधिक उघड़ी हुई छावन पर ध्यान गया तो नन्हे मन के उत्साह को फिर काठ सा गया। घास-फूस, ज्यौनारों में जूठन के साथ-साथ बाहर फेंकी गई पत्तलों और चिथड़े -गुदड़ों से बनाई गईं वह छोटी-सी छपरिया फिर से छाने के लिए वह सामान कहाँ से जुटाए? कूढ़े पर पड़ा हुआ माल वह इस बरसात में कहाँ ढूढे़गा। देव आज प्रलय की बरखा करके ही दम लेगें। हवा के मारे औरों के छप्पर भी पेगें ले रहें हैं। अभी तक अपनी-अपनी छाबनों को बचाने के लिए सभी तो तूफान से जूझ रहे हैं-

“तब हम अब का करीं ? हमारी पेट भी भूखा है। हम नान्हें से तो हैं हनुमान स्वामी, अब हम थक गए भाई।अब हम अपनी पार्वती अम्मा के लग जायके पौढंगे। अब बरसे तो बरसा करे। हम क्या करे बजरंगबली, तुम्हीं बताओ।तुमसे बने भाई तो राम जी के दरबार में हमारी गुहार लगाय आओ, और न बने तो तुमहुँ अपनी अम्मा के लग जायके पौढौ।”

रामबोला खिसियाना सा होकर रेंगकर अपनी छपरिया में घुसा। उससे खीचकर पार्वती अम्मा का हाथ सीधा किया तो वे पीड़ा से कराह उठी, पर बड़ी देर से एक ही मुद्रा में पड़ी हुई जड़ बाहँ सीधी हो गई। स्नायुकंपन हुआ, जिससे उनके शरीर का आधा भाग थोड़ी देर तक काँपता रह।बालक के लिए यह आश्चर्यजनक, भयदायक दृश्य तो अवश्य था पर उसे यह कंपित देह पहले की मृतवत्‌ देह की स्थिति से कहीं अधिक अच्छी भी लगी।

“पार्वती अम्मा, पार्वती अम्मा”

“हाँ, बचवा” पार्वती अम्मा का वेदना में बुझा स्वर सुनाई दिया।

“हम तुमको आगे ढकेलेंगे। तुम एक बार जोर से कराहोंगी तो जरूर, पर तुम्हारी ये जकड़ी देह खुल जायगी। बरखा से तुम्हार बचाव भी हुई जायगा।”

बुढ़िया माई ना-ना कहती ही रही पर रामबोला ने उनकी बगल में लेटकर कोहनी से ढकेलना आरम्भ कर दिया। ‘जय हनुमान स्वामी’ का नारा लगाकर, दातँ भींच और सिर झटकाकर रामबोला ने अपनी पूरी की पूरी शक्ति लगा दी। पार्वती अम्मा कराहती हुई पीछे धकिल गई। बालक अपनी जीत से खुश हआ। गौर से देखा पर इस बार पार्वती अम्मा के किसी भी अंग में कंपन न हुआ।उन्हें खाँसी अवश्य आई और वे देर तक ‘राम-राम” शब्द में कराहती रहीं बस, परन्तु अब वे भीग‌ तो नही रहीं हैं।बरसात झेलने के लिए रामबोला की पीठ है। खाँसती कराहती अम्मा की पीठ सहलाते हुए, विजयी पूत ने इठलाते स्वर में ऐसे चुमकारीं भरे अन्दाज से पूछा कि मानों बड़ा छोटे से पूछ रहा हो- “पार्वती अम्मा, बहुत पिरात है ?”

“चुपाय रहौ बच्चा, राम-राम जपौ |”

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“राम-राम राम-राम रटते ही मैंने दुखों के पहाड़ झेले हैं” – स्मृतियों में खोकर बोलने वाले बाबा का करुण स्वर अब वर्तमान की पकड़ लेकर बातें करने लगा-“अपना-पराया दुख देखता हूँ तो मन अवश्य ही भर उठता है। पर उस कोमलता में भी मेरी सहनशक्ति राम के सहारे ही अडिग बनी रहती है।अपने तो एक अवलम्ब समर्थ सीतानाथ सब संकट विमोचन हैं-

“तुलसी की साहसी सराहिये कृपाल राम

तास के भरोसे परिनाम को निसोच है।”

 

वातावरण बाबा के ओजस्वी स्वर के जादू से बँध गया था। मंत्र-मुग्धता के क्षणों को कथारस के आग्रह से भंग करते हुए वेनीमाघव जी ने विनयपूर्वक पूछा- “आप उन्हे अम्मा न कहकर पार्वती अम्मा क्यों कहते थे गुरू जी? ”

“उन्होंने ही सिखलाया था। बड़े होकर एक बार हमने पूछा तो कहा कि ब्राह्मण के बालक हो। हमें अम्मा कहते हो यही बहुत है, बाकी हमारा नाम भी लिया करो।”

“फिर उनका क्या हुआ प्रभु? वे स्वस्थ हो गईं ?” रामू ने पूछा।

“अभागे का करम-खाता क्या कभी सरलता से चुकता है? बिना किसी औषधि के, बिना खाए-पिए राम-राम करती वे फिर चंगी हो गईं। उस घटना के कदाचित‌ चार-छह महीनों के बाद तक वे जीवित रहीं थीं | पर उन अन्तिम महीनों मे भीख माँगने के लिए मैं ही जाया करता था। बीच में कभी एक आराध बार कदाचित‌ वह मेरे साथ गईं हों तो उसका कोई विशेष स्मरण अब नहीं रहा।”

“आपका रामबोला नाम उन्होंने ही रखा था?” रामू ने फिर प्रश्न किया।

“राम जाने, बेटा। हाँ, पार्वती अम्मा से यह अवश्य सुना था कि मैंने बोलना राम शब्द से ही आरम्भ किया था। भिखारिन की गोद में पला, भूख के हेतु सहानुभूति जुटाने का साधन बनकर अपना चेतनाक्रम पानेवाला बालक भला और बोल ही क्या सकता था।कदाचित्‌ पार्वती अम्मा ने या मेरी तोतली वाणी से राम-राम सुनकर किसी और ने इस विशेषण को मेरी संज्ञा बना दिया।

क्रमशः

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