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राम के तुलसी भाग – 14

इस हल्ले-हुल्लड़ में रामजियावन का स्वमहत्त्व भाव जो उमड़ा तो ऊँचे स्वर मे लहककर गाने लगे-

चित्रकूट महिमा अमित, कही महामुनि गाय।

आइ नहाये सरितवर सिय समेत द्वय भाय॥

किसी का भाव से राम-महिमा को छेड़-भर देना ही बाबा को बहिर्लोक से प्रभुलोक में ले जाने के लिए यथेष्ट होता है। पयस्विनी की घारा में राम- लक्ष्मण उन्हें तैरते हुए अपने पास आते दिखाई देने लगे। गदगद होकर हाथ जोड़े हुए उन्हे मार्ग देने के लिए वे जो हड़बड़ाकर पीछे हटे तो पैर लड़खड़ाया और वे जल में ही फिसल पड़े।

घाट पर हाहाकार मच गया। नदी गहरी नहीं, डूबने का भय नहीं, पर चोट लगने का तो है। कई लोग उन्हे बचाने के लिए जल मे कूद पड़े, किन्तु बाबा के पास ही खड़े रामू ने चट से उन्हें थाम लिया।तब तक और लोग भी पहुँच गए थे। उसी समय चित्रकूट नगर के महासेठ भी पालकी पर आरूढ़ होकर आ पहुँचे। बाबा थोड़ा पानी पी गए थे और एक पैर में मोच भी आ गई थी, वैसे वे मन से स्वस्थ थे। लगभग सत्तर वर्ष की आयु के रौबीले सेठ जी ने घाटवाले के तखत तक सहारा देकर लाए जाते ही बाबा को घुटने टेककर प्रणाम किया। पहचानने की मुद्रा के साथ बाबा ने पूछा- “जगन्नाथ साहू के पुत्र है? ”

“जी हाँ महाराज, वेदेहीशरण मेरा नाम हैं। आप ही का दिया हुआ।”

“हाँ , याद आया। आपके विवाह के समय की बात है, पहले आपका नाम….”

सेठ जी हँसकर बोले- “अरे अब उसकी याद भी न दिलाइए महाराज जी, नाम का बड़ा प्रभाव होता है। चलिए आपको लेने आया हूँ। घटा बड़ी जोर से घिर आई है, जाने कब बरस पड़े।”

बाबा मीठे भाव से बोले- “आपके घर फिर कभी अवश्य आऊँगा । इस समय तो मैं अपने स्वर्गवासी मित्र ब्रह्मदत्त के घर जाकर अपनी राम कोठरिया में ही विश्राम करूँगा।”

“जहाँ महाराज जी की इच्छा हो, रहें।इनके यहाँ भी सब प्रबन्ध हो चुका है। (आकाश की ओर देखकर ) घटा घिरी है, दिन भी चढ़ रहा है, भोजन विश्राम की बेला हुई। आपके वास्ते पालकी आई है।”

मोच के कारण गोस्वामी जी ने सेठ जी की यह सेवा स्वीकार कर ली। पालकी पर विराजमान, भीड़ से घिरे हुए बाबा प्रसन्न मुद्रा में भी ऐसे अलिप्त भाव से चले जा रहे थे कि मानों वह अपनी काया में रहते हुए भी उससे बाहर हों। चामत्कारिक रूप से अपनी ख्याति के बढ़ने पर बाबा को प्राय: अपने ऊपर गर्व हो जाया करता था।इस खोखले अभिमान के नशे से वे बहुत जूझे हैं और सधते-सधते अब मन ऐसा हो गया है कि जप की गुफा में बैठकर उनका मन बेहोशी के पत्थर से स्वयं को ढकँ लेता है। फिर बाहर सड़क चलती रहे, या हजारों के मजमें में रहे लेकिन उससे मन के निरालेपन को कोई आँच नहीं आती। वह अपने में मगन रहता है, न देखता है, न सुनता है। केवल गगन शब्द सुनता है। सधते सधते नाम जप अब बाबा का विश्वास बन गया है। घर पहुँचते न पहुँचते तक बादल गड़गड़ाने लगे थे। रामजियावन के घर के लम्बे चबूतरे पर, छतों पर स्त्रियाँ ही स्त्रियाँ खड़ी थीं । रामजियावन की ओर देखकर बाबा हँसते हुए बोले- “ओहो आज तो तेरे घर पर धावा हुआ है रे”

“महात्माओं को ठहराने का यही फल मिलता है।” बाबा के इस कथन पर रामजियावन समेत आस-पास के सभी लोग हँस पढ़े।पालकी ज़मीन पर उतारी गई।

राजा भगत बोले- “अरे, अभी भीड़ कहाँ भई है भैया। कल परसों से देखना, धरती पर तिल रखने को भी जगह न मिलेगी।”

बाबा उतरने लगे।सेठ जी ने आगे बढ़कर सहारा दिया। भीड़ और निकट खिचँ आई, चरणरज के भूखे भिखारी झपटे।रामजियावन ने अपने भाई को ललकारा। बीस-पच्चीस जवानों ने भीड़ से जूझते हुए बाबा को अपने घेरे मे ले लिया। वे चबूतरे की ओर बढ़े। छाया की भाँति साथ रहने वाला रामू पण्डित, सेठ, राजा भगत, रामजियावन आदि भक्तों की सेवा-उमंग का मान रखते हुए भी बाबा की सुविधा-असुविधा पर पूरा ध्यान रखे हुए था। सेठ जी सहारा तो दे रहे थे परन्तु घेरा तोड़ने के लिए निकट आती भीड़ के रेलों से चौंक सहमकर आगे पीछे भी हो जाते थे। इससे बाबा के कंघे को फटका लगता था। रामू ने बड़ी विनम्रता के साथ सेठ को अलग करके बाबा का भार ले लिया। वे सुख से सीढ़िया चढ़ गए। सैकड़ों कण्ठों का जयघोष जैसे ही निनादित हुआ वैसे ही बादल भी गरज उठे। बाबा चबूतरे पर खड़े हो गए और दोनों हाथ ऊपर उठाकर जनता को शांत किया, फिर कहा- “देखो, चित्रकूट वालों की रामगुहार सुनकर गगन भी गूँज उठा। अब आप सब अपने अपने घर जाओ। परसों से हम रामायण सुनाएगें और कल हम यहाँ दिन-भर रहेगें नहीं, इसलिए कल कोई न आए। जै जै सीताराम।”

भीड़ का पिछला भाग रामघोष करता हुआ बिखरने लगा, लेकिन आगे के लोग अब अपने-आपको चरणरज पाने का अधिक हकदार समझकर चबूतरे पर चढ़ने का प्रयत्न करने लगे। वेनीमाधव, रामजियावन आदि ने तुरन्त घेरा कसने के लिए ललकारा।बाबा ने फिर सबको थामा, जोर से कहा-“हमारे पैर में मोच आ गई है। आज सब जने हमें क्षमा करें।जै-जे सियाराम।” बाबा ने स्त्री पुरुषों की भीड़ को हाथ जोड़कर प्रणाम किया। इस समय जप- विश्वास और विम्बसिद्धि का कर्म दोनों ही गतिशील थे। बाबा के सामने अनेक सीतायें और अनेक राम थे।एक रूप रूपाय, मानों मन का एक-एक अणु धरती आकाश के ओर से छोर तक अपनी बिम्बशक्ति से जागृत और सक्रिय हो उठा था। दृष्टि बाहर से भीतर तक एक सीधे राजपथ जैसी हो गई थी। जुड़े हुए हाथ भीतर नाम-जप से जुड़ कर मानों मन का प्रतीक वन गए थे।

कोठरी में प्रवेश किया।वही पुरानी जगह, वही कुश आसन बिछा पीढ़ा और सामने रखी हुई चौकी।उसपर उनकी मिट्टी की पुरानी दवात और सरकंडे की कलम भी वैसे ही रखी थीं, लेकिन उसके पास ही चाँदी का पीढ़ा, चौकी, चाँदी, की दवात और नई कलम भी रखी थी। पीढे़ पर रखी पुरानी खड़ाउएँ एक ओर रखी हुई थीं।

क्रमशः

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