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राम के तुलसी भाग – 12

घर के अन्दर से दो-तीन नारी कण्ठों के कल्हाटे सुनाई पड़ने लगे। पंडाइन डाटँना भूल गई।

“हाय मोर हुलसिया। अरे मोर मूबोली-ननदिया… अरे हमको छोड़के तुम कहाँ गईं, रा….म !”

पंडाइन वहीं की वहीं धम्म से बैठ गईं और दोनो हाथ अपनी आँखो पर रखकर विलाप करना आरम्भ कर दिया। मंगने बाजा बजाना बन्द करके किंकर्तव्यविमूढ़ से खड़े-खड़े कभी पंडाइन और कभी आपस में एक दूसरे को मुँह बाये ताकने लगे। इसी समय पंडाइन के पति यानी बचवा के बप्पा और भैरोसिह भी दौड़ते हुए आ पहुँचे। पण्डित आत्माराम भी उसी समय अपने घर के द्वार पर दिखलाई दिए। दोनों हाथों से किवाड़ों का सहारा लेकर वे ऐसे खड़े हुए मानों कोई बेजान मूर्ति खड़ी हो। आँखें शून्य में खोते-खोते सूज गई थीं। पुरुषों का साहस न हुआ कि मुँह से कुछ कहे, नारी- क्रंदन बाहर भीतर एक-सी ऊंची गति पर बढ़ रहा था।अधेड़ आयु के हट्ट -कट्टे पांडे यानी बचवा के बाप, आत्माराम जी के पास जाकर खड़े हो गए। भैरोंसिह उनके पीछे-पीछे चले आए।

बधावा बजाने वाले चुपचाप सिर लटकाकर उल्टे पावों लौट चले। पंडाइन धरती पर हाथ पटक- पटककर विलाप करती रही। पांडे की आँखे कटोरियों सी भर उठी, भरे कण्ठ से कहने लगे- “चार बरसों मे भैया-मैया पुकार के मोह लिया और अब आप चली गई निगोड़ी।अब कौन राखी बाँधेगा मुझे ? हुलसिया, तू कहाँ गई री, हाय, ये क्या हो गया राम।” दीवार से सिर टिकाकर पांडे फूट-फूटकर रोने लगे।आत्माराम वैसे ही खड़े रहे।दो-तीन और लोग भी आ गये-

“हरे राम, आज तो गाँव की विपदा का अंत नहीं है।”

“पांडे जी, यह रोने-घोने का समय नही है। वेडिनें कुवँरीजू को लेके मसान की राह से ही जमना पार जाएँगी। अभी पता लगा है कि चार नावें रोकी गई हैं। हम सबको लेके उधर ही जाते हैं। चार-पाँच जने यहाँ हैं। जल्दी-जल्दी अर्थी लेके पहुँचों और मेहरारू सब जमना जी नहाय के वहीं कोनेवाले टूटे सिवाले में जायके बैठें, जरूरत पड़े तो सिवाला के नीचे जोगी बाबा की गुफा है, चमेलिया जानती है, वहाँ छिपके बैठ जाना। अच्छा तो हम आतमा…. क्या कहें भैया ? ऐसा अभागा जन्मा तुम्हारे घर कि घर ही उजड़ गया।”

पंडाइन उठकर रोती बिलखती भीतर चली।

 

आत्माराम एक ओर सरक गए और उनसे कहा- “भौजी, मुनियां को भेज देना।”

बाहर खडा पुरुषवर्ग टिकड़ी बनाने के लिए बाँस काटने चला गया। आत्मा- राम दरवाजे से बाहर आकर खड़े हो गए। गाँव एकदम सूना, घर सूने और आत्माराम के लिए तो बाहर-भीतर सब सूना ही सूना था, सब मनहूस था।

मुनिया दासी आँसू पोंछती हुई बाहर आई। आत्माराम ने उसे एक बार देखा फिर मुँह घुमाकर दूसरी ओर देखते हुए कहा- “उस अभागे को गाँव से बाहर फेंक आओ मुनियाँ”

“कहाँ फेकव महाराज ?”

“जहाँ जी चाहे ,उसकी महतारी का कहा कर ”

“जमना पार हमारी सास रहती हैं। आप कहो तो उनकी …..”

“जौन उचित समझ वही कर। हम तुम्हें चाँदी के पाँच,सिक्‍के देंगे। अपनी सास को दे देना।जा, उसकी महतारी की मिट्टी उठने से पहले ही उस अभागे को दूर ले जा, जिससे उसकी पाप छाया अब किसी को भी न छू पावे।”

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नब्बे वर्षीय महामुनि महाकवि गोस्वामी तुलसीदास के शान्त सौम्य मुखमण्डल पर बकरीदी द्वारा कहे गए अपने पिता के इन शब्दों को सुनकर पीड़ा की लहराती छाया पड़ने लगी। वे आँखे मूँदे घ्यानावस्थित मुद्रा में बैठे थे। राम उन्हे पंखा झल रहा था।बकरीदी मियाँ सुना रहे थे- “बड़े महाराज तो शमशान ही से क्या जाने कहाँ चले गए। बुजुर्ग लोगों का कहना रहा कि संन्यासी हुई गए।मुनियां जब इन महाराज को अपनी सास के पास छोड़के गाँव लौटी तब तलक हियाँ तो कयामत आ चुकी रही। मुगल और अब्यू खाँ के सिपाहियों ने मिलके बिक्रमपुर गाँव को मिट्टी मे मिला दिया। राजकुँवरी ने जमना में डूबके अपनी इज्जत बचाय ली और जो महाराज तब अभागे बताए गए रहें उनके दरसन करके अब सारी प्रजा अपना भाग सराहती है।”

बाबा सुनकर मुस्काए, मस्ती में दाहिना हाथ बढा़कर सुनाने लगे-

 

जायो कुल मंगल, बधावनों बजायो,

सुनि भयो परितापु पापु जननी-जनक को।

बारेते ललात-बिललात द्वार-द्वार दीन,

जानत हो चारि फल चारि ही चनक को।

तुलसी सो साहेब समर्थ को सुसेवक है,

सुनत सिहात सोचु विधिहुँ गनक को।

नामु राम, रावरो सयानो किधों बावरो,

ज्यों करत गरिरीते गरु तून तें तदक को।

 

सुनकर सभी गदगद हो उठे । राजा भगत ने कहा- “खरे सोने-सी बात कही भैया, जिसके राम रखवारे हों उसका ग्रह-नक्षत्र भी कुछ नहीं बिगाड़ सकते हैं।

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चित्रकूट क्षेत्र में प्रवेश करते ही बाबा के जरा-जीर्ण गात में मानों फिर से तरुणाई आ गई। उनके मानस-लोचनों में सीता सहित तापस वेषधारी धनुर्धर राम लक्ष्मण ललक-ललककर उभरने लगे। दूर हरे-भरे पर्वतों की चोटियाँ, जगह जगह झरते हुए मनोरम झरने, धनुष की कमान-सी बहती हुई पयस्विनी नदी… बाह्म दृष्टि को जिधर भी सौन्दर्य लुभाता था उधर ही उन्हें अपने आराध्य दिखलाई पड़ने लगते थे। राम सौन्दर्य-पुँज हैं। बाबा ने जब-जब जितनी सुन्दरता देखी है तब-तव उनकी कल्पना का राम-सौन्दर्य अवचेतना के कुहासे से और अधिक निखरकर प्रकट हुआ है। यह भाव-विकास का क्रम पिछले ४०-४५ वर्षो में आगे बढ़ा है। सारा चित्रकूट क्षेत्र राम मे रमा हुआ आत्मविस्मृतिकारी लग रहा है | बाबा चल रहे है पर बाहरी गति में उनका ध्यान इस समय तनिक भी नही है। वह खुली आँखों देख भी रहे है पर दृष्टि बाहर से भीतर तक प्रशस्त राजमार्ग-सी दौड़ रही है। हरीतिमा है, कालिमा है, अनन्त प्रकाशमय नीलिमा है जो स्मृति के क्षेत्र में साकार होते हुए भी विस्मृति का छोर छूकर निराकार हो जाती है। कुछ बखानते नहीं बनता। गूँगा गुड़ खाए पर बताए कैसे। यह सौन्दर्य नदी-सा तरल, फूल-पत्तों सा कोमल, झरनों -सा प्रवाहमान और पर्वतों -सा अडिग वज्र कठोर है। ये कुसुम और वृक्ष दोनों के छोर छूकर सर्वशक्तिमान-सा आभासित हो रहा है।सैलाब-सा उमड़कर भाव अपनी उमड़न में अब सहज हो चला। पशु-पक्षियों से भरा-पूरा वन जिसमें यत्र-तत्र सिद्धों और साधकों की पर्ण कुटिया बनी हैं।

क्रमशः

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