प्रश्नोत्तर शैली में महाराज भोज द्वारा लिखे गए समरांगणसूत्रधार को पढ़े बिना अधूरा है - वास्तु का ज्ञान विगत दो दशकों से गृह-निर्माण में ‘#वास्तुशास्त्र’ का प्रचलन बढ़ा है। नया घर बनवाते समय अथवा मरम्मत करवाते समय या घर की इंटीरियर डिजायनिंग के समय पेशेवर वास्तुविद की मदद ली जा रही है. प्रयास यह रहता है कि घर वास्तुशास्त्र के अनुकूल हो। पेशेवर वास्तुविद यह दावा करते हैं कि उन्हें वास्तु की पूर्ण जानकारी है और उनके बनाए नक़्शे के अनुसार घर/ऑफिस का निर्माण किया जाए तो भविष्य में कोई समस्या नहीं आएगी। हालाँकि उनमें से अधिकांश ने वास्तुशास्त्र के मूल ग्रंथों का नाम भी नहीं सुना होता। आज हम आपको वास्तुशास्त्र के एक ऐसे ग्रन्थ के विषय में बताते हैं जिसे ‘भारतीय वास्तुकला का प्रतिनिधि-ग्रन्थ’ कहा जाए तो अतिश्योक्ति न होगी. यह ग्रन्थ है— समरांगणसूत्रधार, जिसे 11वीं शताब्दी में #धार, मध्यप्रदेश के परमारवंशीय नरेश महाराजाधिराज भोज ने लिखा था। भोज एक बहुत प्रतापी राजा होने के साथ-साथ भारतीय वाङ्मय के प्रकाण्ड विद्वान् भी थे। कहा जाता है कि उन्होंने #धर्म, #दर्शन, #संगीत, #खगोल, #कोश, #भवन_निर्माण, #काव्य, #चिकित्सा, व्याकरण, आदि #भारतीय_ज्ञान_विज्ञान पर लगभग 84 ग्रंथों की रचना की थी, जिसमें ‘समरांगणसूत्रधार’ अत्यन्त प्रसिद्ध है। Playlist 3 Videos Sshree Astro Vastu | Cleared SSB And Selected For Navy | Review By - Mr Sushil | In Hindi 1:20 Sshree Astro Vastu | Gujarati | Job, Career Challenges | Review - Er Nilesh Jain 1:33 Sshree Astro Vastu | Gujarati | Family Challenges , Pregnancy | Review - Astro - Bipin Ji 9:31 ‘समरांगणसूत्रधार’ ग्रन्थ की एक प्रमुख विशेषता यह है कि इस ग्रंथ को लिखते समय महाराजा भोज ने #वैदिक_वाङ्मय, #गर्गसंहिता, #बृहत्संहिता, #विश्वकर्माप्रकाश, #नाट्यशास्त्र, #मयमतम, #बृहद्योगयात्रा, #चित्रलक्षणशास्त्र, #वायुपुराण, #देवीपुराण, #विष्णुधर्मोत्तरपुराण, #मत्स्यपुराण, #लिंगपुराण, #किरणागम, #कामिकागम, #कौटलीय_अर्थशास्त्रादि ग्रंथों में प्राप्त वास्तु-निर्देशों को ध्यान में रखा। तात्पर्य यह कि समरांगणसूत्रधार उपर्युक्त सभी ग्रंथों का समन्वय है। इसलिए आधुनिक वास्तुशास्त्रियों को समरांगणसूत्रधार का अध्ययन अवश्य करना चाहिये। समरांगणसूत्रधार मूलतः वास्तुकला का ग्रंथ है, किन्तु इसमें अन्य कई कलाओं का भी समावेश है। नवीं-दसवीं शती तक भारत में जिन कलाओं पर आधारित शास्त्रों का प्रणयन हो चुका था, उन सभी के मतों का सम्यक् निरूपण इस ग्रंथ में हुआ है। यन्त्र-निर्माण कला, #मूर्तिकला, #चित्रकला और #नृत्यकला भी इसमें शामिल है। समरांगणसूत्रधार, महाराज भोज का अक्षय कीर्ति स्तम्भ है। महाराजा #सयाजीराव_गायकवाड़_ओरियंटल_इंस्टीट्यूट_बड़ौदा ने पहली बार इस महान् ग्रंथ को सन् 1924 एवं 1925 में 2 खण्डों में प्रकाशित किया। इनका संपादन #त्रिवेन्द्रम_संस्कृत_महाविद्यालय में प्राचार्य और त्रिवेन्द्रम् संस्कृत सीरीज़ के सम्पादक, महामहोपाध्याय श्री टी गणपति शास्त्री (1860-1926) ने किया था। गायकवाड़ ओरियंटल सीरीज़ के अंतर्गत ग्रंथ-क्रमांक 25 एवं 32 में ये ग्रंथ प्रकाशित हुए। श्री टी गणपति शास्त्री ने समरांगणसूत्रधार की तीन पाण्डुलिपियों के आधार पर ग्रंथ का संपादन किया। पहली #पाण्डुलिपि विक्रम संवत् 1594, अर्थात् सन् 1537 ई. की है, जो बड़ौदा के #केन्द्रीय_पुस्तकालय में है और इसमें 82 अध्याय हैं। दूसरी पाण्डुलिपि भी इसी पुस्तकालय में थी और इसमें खण्डात्मक रूप से 55 अध्याय थे। तीसरी पाण्डुलिपि पाटन के ग्रंथ-भण्डार से प्राप्त की गई थी, जिसमें 49 अध्याय थे। कागज और लिपि आदि की दृष्टि से यह पहली पाण्डुलिपि के कालखण्ड की थी। सन् 1966 में प्रख्यात इतिहासकार एवं #भारतीय_विद्या के अनन्य विद्वान् डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल (1904-1966) ने बड़ौदा ओरियंटल इंस्टीट्यूट के तत्कालीन निदेशक #डॉ_बी_जे_सान्देसारा द्वारा उपलब्ध करवाई गई एक अन्य पाण्डुलिपि के आधार पर इस संस्करण का पुनर्सम्पादन किया। इस पाण्डुलिपि में 83 अध्याय थे। इस पाठ के आधार पर #डॉ_अग्रवाल ने पूर्व-प्रकाशित संस्करण में श्लोक और शब्दों के पाठान्तर को नये संस्करण पाद-टिप्पणियों में देकर उसे बहुत उपादेय बना दिया। डॉ. अग्रवाल ने इसकी एक भूमिका भी लिखी, जिसमें उन्होंने पूर्व प्रकाशित संस्करण और उपलब्ध पाण्डुलिपियों की सूचना दी। #डॉ_वासुदेवशरण_अग्रवाल द्वारा सम्पादित समरांणसूत्रधार के प्रकाशन के बाद इस ग्रंथ के कुछ और भी संस्करण प्रकाशित हुए, जिनमें पाठ की प्रामाणिकता की दिशा में और प्रयास शेष था। इस दिशा में कार्य किया प्राच्यविद्या के सुप्रसिद्ध विद्वान्, उदयपुर-निवासी डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू' ने, जिन्होंने संस्कृत के वयोवृद्ध विद्वान् प्रो. भँवर शर्मा के साथ मिलकर समरांगणसूत्रधार का सम्पूर्ण मूल पाठ का पुनर्संपादन, हिंदी-अनुवाद, मूल पाठ और पाद-टिप्पणियों सहित कर डाला, जिसे #चौखम्बा संस्कृत सीरीज़ ऑफि़स, वाराणसी ने दो जिल्दों में प्रकाशित किया। इस संस्करण में पहली बार प्रत्येक स्थल पर उपशीर्षक देते हुए विषय-वस्तु के वैविध्य को भी प्रकट करने का प्रयास किया गया है। यह विशेष संस्करण केवल अनुवाद नहीं है, बल्कि पूरा भाव भी ग्रहण करने का प्रयास है। इस अनुवाद में उत्तर-मध्य भारत के तत्कालीन शिल्प और स्थापत्य शैली सहित एतद्विषयक परम्पराओं का भी ध्यान रखा गया है। महाराजा भोज ने यह महान् ग्रंथ संवाद या प्रश्नोत्तर-शैली में लिखा है और इसका पता समरांगणसूत्रधार के तीसरे अध्याय से चलता है। इसमें प्रश्नकर्ता विश्वकर्मा के मानसपुत्र जय और उत्तरदाता स्वयं विश्वकर्मा हैं। जय ही विश्वकर्मा के सम्मुख विभिन्न प्रश्न रखते हैं, इन प्रश्नों के रूप में ग्रंथ की विषय-सूची या इसके वर्ण्य विषयों का बोध होता है। संस्कृत में प्रश्नोत्तर शैली में ग्रंथों की रचना की प्राचीन परिपाटी रही है। न केवल संस्कृत बल्कि प्राकृत और पाली में भी यह परम्परा रही है। समरांगणसूत्रधार में 83 अध्याय हैं, जिनमें नगर-स्थापत्य, मन्दिर-स्थापत्य, गृह-स्थापत्य, मूर्तिकला तथा मुद्राओं सहित विभिन्न प्रकार के यंत्रों के बारे में भी वर्णन है। समरांगणसूत्रधार के प्रारम्भ में कहा गया है कि विश्वकर्मा ने जय, विजय, सिद्धार्थ और अपराजित नामक अपने मानसपुत्रों को वास्तु-विनिवेश का निर्देश देते हुए कहा था कि तुम चारों ही दिशाओं में पृथक्-पृथक् जनों के लिए आश्रय-स्थान, उनके रहने के लिए निर्धारित और निर्मित करो। इन निर्मितियों के बीच-बीच में अन्तरपथ, सागर, शैल-पर्वत, नदियों का विधान भी रखते हुए महाराज पृथु के भय को शान्त करने हेतु दुर्ग की रचना भी करो। प्रत्येक वर्ण की प्रकृति के अनुसार लक्षणोंवाले संस्थान और आवासों को प्रत्येक ग्राम में, प्रत्येक दुर्ग में, प्रत्येक पत्तन में बनाओ। समरांगणसूत्रधार में मुख्य रूप से वास्तुशिल्प का ही वर्णन है और बहुत सूक्ष्मता से सैद्धान्तिक और व्यावहारिक विषयों का प्रतिपादन किया गया है। इसमें गणितादि संख्यात्मक गणनाएँ हैं, त्रिभुज से लेकर बहुभुजों की रचना, भवनों-ग्रामों के तलच्छन्द, प्रासादों के भेदोपभेद का विस्तृत वर्णन भी है। समरांगणसूत्रधार में यंत्रों का विशद वर्णन हुआ है। इसका 31वाँ अध्याय ‘#यन्त्रविधान’ के नाम से मिलता है, जिसमें #द्वारपाल_यंत्र, #गजयंत्र, #व्योमचारी_विहंगम_यंत्र, #आकाशगामी_दारुमय_विमान_यंत्र, #नरसिंह_यंत्र, #योध_यंत्र, #वारि_यंत्र, #धारा_यंत्र, #रथ_दोला_यन्त्रादि का सटीक वर्णन हुआ है। लकड़ी के विमान, यान्त्रिक दरबान तथा सिपाही का भी उल्लेख है। इनमें रोबोट की झलक मिलती है। यही वर्णन इतना सजीव है कि ऐसा लगता है मानो उस काल में इन यंत्रों को बनाकर देखा गया हो। यंत्र-विमान के वर्णन में यह कहना कि जब सिंह के समान गर्जना करता हुआ चलित होगा तो अंकुश का भय त्यागकर हाथी भाग खड़े होंगे— ऐसा वही लिख सकता है जिसने इन यंत्रों को बनाकर उसका सार्वजनिक तौर पर परीक्षण किया हो। किसी भी यंत्र के मुख्य गुण क्या-क्या होने चाहिए, इसका वर्णन समरांगणसूत्रधार में करते हुए पुर्जों के परस्पर सम्बंध, चलने में सहजता, चलते समय विशेष ध्यान न देना पड़े, चलने में कम ऊर्जा का लगना, चलते समय ज्यादा आवाज न करें, पुर्जे ढीले न हों, गति कम-ज्यादा न हो, विविध कामों में समय संयोजन निर्दोष हो तथा लंबे समय तक काम करना आदि प्रमुख 20 गुणों की चर्चा करते हुए ग्रंथ में कहा गया है— समयानुसार स्वसंचालन के लिए यंत्र से शक्ति-निर्माण होता रहना चाहिए।यंत्रों की विविध क्रियाओं मे संतुलन एवं सहकार हो।सरलता से, मृदुलता से चले।यंत्रो को बार-बार निगरानी की आवश्यकता न पड़े।बिना रुकावट के चलता रहे।जहाँ तक हो सके, यांत्रिक क्रियाओं में ज़ोर दबाब नहीं पड़ना चाहिए।आवाज़ न हो तो अच्छा, हो तो धीमी।यंत्र से सावधानता की ध्यानाकर्षण की ध्वनि निकलनी चाहिए।यंत्र ढीला, लड़खड़ाता या कांपता न हो।अचानक बंद या रुकना नहीं चाहिए।उसके पट्टे या पुर्जों का यंत्र के साथ गहरा संबंध हो।यंत्र की कार्यप्रणाली मे बाधा नहीं आनी चाहिए।उससे उद्देश्य की पूर्ति होनी चाहिए।वस्तु-उत्पादन मे आवश्यक परिवर्तन आदि यांत्रिक क्रिया अपने आप होती रहनी चाहिए।यंत्र-क्रिया सुनिश्चित क्रम में हो।एक क्रिया का दौर पूर्ण होते ही यंत्र मूल स्थिति पर यानी आरम्भ की दशा पर लौट जाना चाहिए।क्रियाशीलता मे यंत्र का आकार ज्यों-का-त्यों रहना चाहिए।यंत्र शक्तिमान हो।उसकी कार्यविधि सरल और लचीली हो।यंत्र दीर्घायु होना चाहिए।✍🏻आगे और हे यांत्रिकी समरांगणसूत्रधार के ३१वें अध्याय में यन्त्रों की क्रियाओं का वर्णन निम्न प्रकार है- कस्यचित्का किया साध्या,कालः साध्यस्तु कस्यचित्। शब्दः कस्यापि चोच्छायोरूपस्पर्शो च कस्यचिद् ॥ क्रियास्तु कार्यस्य वशादनंत्ताः परिकीर्तिताः। तिर्यगूर्ध्वमद्यः पृष्ठपुरतः पार्श्वयोरपि॥ गमने सरणं पातः इति भेदाः कियोद्य्भवाः उपरोक्त पंक्तियो मे विविध यंत्रों की क्रियाओ का वर्णन इस प्रकार है- (१) कुछ यंत्र एक ही क्रिया बार-बार करते रहते है, (२) कुछ यंत्र समय-समय पर अथवा विशिष्ट कालांतर मे अपनी निश्चित कृति करते रहते हैं, (३) कुछ यंत्र विशिष्ट ध्वनि उत्पन्न करने के लिए या ध्वनि संचलन या परिवर्तन के लिए होते हैं। (४) कुछ यंत्र विशिष्ट क्रियाओं के लिए या वस्तुओं का आकार बड़ा या छोटा करना, आकार बदलने या धार चढाने के लिए होते हैं, किसी भी यंत्र के मुख्य गुण क्या-क्या होने चाहिए, इसका वर्णन समरांगण सूत्रधार में करते हुए पुर्जों के परस्पर सम्बंध, चलने में सहजता, चलते समय विशेष ध्यान न देना पड़े, चलने में कम ऊर्जा का लगना, चलते समय ज्यादा आवाज न करें, पुर्जे ढीले न हों, गति कम-ज्यादा न हो, विविध कामों में समय संयोजन निर्दोष हो तथा लंबे समय तक काम करना आदि प्रमुख २० गुणों की चर्चा करते हुए ग्रंथ में कहा गया है- यन्त्राणामाकृतिस्तेन निर्णेतुं शक्यते। यथावद्बीजसंयोगः सौश्लिष्ट्यं श्लक्ष्णतापि च ॥ अलक्षता निर्वहणं लघुत्वं शब्दहीनता। शब्दे साध्ये तदाधिक्यमशैथिल्यमगाढता ॥ वहनीषु समस्तासु सौश्लिष्ट्यं चास्खलद्रति। यताभीष्टार्थकारित्वं लयतालानुगामिता ॥ इष्टकालेऽर्थदर्शित्वं पुनः सम्यक्त्वसंवृतिः। अनुल्बणत्वं ताद्रूप्यं दाढर्येमसृणता तथा ॥ चिरकालसहत्वं च यन्त्रस्यैते गुणः स्मृताः। अर्थात् (१) समयानुसार स्वसंचालन के लिए यंत्र से शक्ति-निर्माण होता रहना चाहिए। (२) यंत्रों की विविध क्रियाओं मे संतुलन एवं सहकार हो। (३) सरलता से , मृदुलता से चले। (४) यंत्रो को बार-बार निगरानी की आवश्यकता न पड़े। (५) बिना रूकावट के चलता रहे। (६) जहाँ तक हो सके यांत्रिक क्रियाओ मे जोर दबाब नहीं पडना चाहिए। (७) आवाज न हो तो अच्छा, हो तो धीमी। (८) यंत्र से सावधानता की ध्यानाकर्षण की ध्वनि निकलनी चाहिए। (९) यंत्र ढीला, लडखडाता या कांपता न हो। (१०) अचानक बंद या रूकना नहीं चाहिए (११) उसके पट्टे या पुर्जो का यंत्र के साथ गहरा संबंध हो। (१२) यंत्र की कार्यप्रणाली मे बांधा नही आनी चाहिए। (१३) उससे उद्देश्य की पूर्ति होनी चाहिए। (१४) वस्तु उत्पादन मे आवश्यक परिवर्तन आदि यांत्रिक क्रिया अपने आप होती रहनी चाहिए। (१५) यंत्र क्रिया सुनिश्चित क्रम में हो। (१६) एक क्रिया का दौर पूर्ण होते ही यंत्र मूल स्थिति पर यानी आरम्भ की दशा पर लौट जाना चाहिए। (१७) क्रियाशीलता मे यंत्र का आकार ज्यों का त्यों रहना चाहिए। (१८) यंत्र शक्तिमान हो। (१९) उसकी कार्यविधि सरल और लचीली हो (२०) यंत्र दीर्घायु होना चाहिए। विविध कार्यों की आवश्यकतानुसार विविध गतियाँ होतीं हैं जिससे कार्यसिद्धि होती है। (१) तिर्यग्- slanting (२) ऊर्ध्व upwards (३) अध:- downwards (४) पृष्ठे- backwards (५) पुरत:-forward (६) पार्श्वयो:- sideways समरांगणसूत्रधार के इस श्लोक में इसी का वर्णन है। तिर्यगूर्ध्वंमध: पृष्ठे पुरत: पार्श्वयोरपि। गमनं सरणं पात इति भेदा: क्रियोद्भवा:॥ (समरांगणसूत्रधार, अध्याय ३१) तरलयांत्रिकी हाइड्रोलिक मशीन (Turbine)-जलधारा के शक्ति उत्पादन में उपयोग के संदर्भ में ‘समरांगण सूत्रधार‘ ग्रंथ के ३१वें अध्याय में कहा है- धारा च जलभारश्च पयसो भ्रमणं तथा॥ यथोच्छ्रायो यथाधिक्यं यथा नीरंध्रतापि च। एवमादीनि भूजस्य जलजानि प्रचक्षते॥ बहती हुई जलधारा का भार तथा वेग का शक्ति उत्पादन हेतु हाइड्रोलिक मशीन में उपयोग किया जाता है। जलधारा वस्तु को घुमाती है और ऊंचाई से धारा गिरे तो उसका प्रभाव बहुत होता है और उसके भार व वेग के अनुपात में धूमती है। इससे शक्ति उत्पन्न होती है। संगृहीतश्च दत्तश्च पूरित: प्रतनोदित:। मरुद् बीजत्वमायाति यंत्रेषु जलजन्मसु॥ समरांगण-३१ पानी को संग्रहीत किया जाए, उसे प्रभावित और पुन: क्रिया हेतु उपयोग किया जाए, यह मार्ग है जिससे बल का शक्ति के रूप में उपयोग किया जाता है। इसकी प्रक्रिया का विस्तार से इसी अध्याय में वर्णन है।✍🏻अआगे और हे एक हजार साल पहले राजा भोज एक पोथी लिख गये जिसका नाम #समरांगणसूत्रधार है।भोजराज ने उस काल की टेक्नोलोजी से निर्मित यन्त्रों के विषय में भी लिखा है, ३१वाँ अध्याय बड़ा ही रुचिकर है।पार्कों में फौव्वारे बनाने के बारे में भी विवरण है और अन्य अनेक खेल खिलौनों के विषय में भी लिखा है, पढ़ेंगे तो आनन्द आयेगा, हो सकता है कुछ बनाने का ही सूझ जाये।भोजराजा एक ऐसे इञ्जन की भी बात करते हैं जिसमें पारा और पानी की सम्मिलित वाष्प शक्ति के प्रयोग से विमान के उड़ाये जाने का सजीव चित्रण है।समरांगण सूत्रधार राजा भोजदेव का कालजयी ग्रन्थ। ऋषि देव ने आज इसे शेयर किया तो मैं भी शेयर करने का लोभ संवरण नहीं कर सका। लगातार दस बरस तक लगकर 83 अध्याय व् करीब 8000 श्लोक वाले इस ग्रन्थ के लगभग हर विषय की परंपरा को खोजा, हर सन्दर्भ को टटोला और सिद्ध किया कि भारतीय विज्ञान के उत्कर्ष को बताने के लिये यह एक ही ग्रन्थ काफी है। यह तकनीक का नियमन और मानवीय आवश्यकता का रूपायन करता है। इसे केवल वास्तु का ग्रन्थ कहना नासमझी है, 10वीं सदी तक के लोकोपयोगी रसायन शास्त्र, यंत्र विद्या, रत्न, धातु, वनस्पति... शताधिक अनुशासन इसमें आ जाते है। इसमें आतंक से प्रथमतः सावधानी बरतने और तकनीकी ज्ञान के अदेय का निर्देश है। भोज के बसाये भोपाल में अब इस ग्रन्थ पर जो विशिष्ट शोध हो रहा है, उसकी सूचना स्वयं वहां के कुलपतिजी ने सार्वजनिक दी। मैंने कहा था कि अभी तो मैं स्वयं इस पर इतना ही बड़ा काम करने का इच्छुक हूँ। यह ग्रन्थ विदेशों में भी पहुँच चुका है और अगले कई सालों तक इसमें वर्णित विगत पर काम होगा। मित्रों को बताना चाहूंगा कि हाल ही मेरे इस ग्रन्थ का दूसरा विशिष्ट संस्करण चौखम्बा संस्कृत सीरीज़ ऑफिस, वाराणसी ने जारी किया है। मैं इसे अपना सौभाग्य मानता हूँ कि जितना इसे मूल रूप में रचा गया, उससे अधिक मैंने अपनी पाद टिप्पणियां देकर कहीँ विषय को सरल बनाया तो कहीं जटिल भी, ताकि इस पर और काम हो सके।✍🏻आगे और हे प्रियवर Dr. Shri Krishan Jugnu जी ने शिल्पशास्त्र के दो पृष्ठ उपलब्ध कराये हैं। वास्तुशास्त्र में दिक्-शोधन अर्थात् दिशा का निर्धारण करना अनिवार्य प्रक्रिया है। शिल्पशास्त्रकार दिक् निर्धारण की बोधायन प्रोक्त विधि का स्मरण कर रहा है, जिसे उसने प्राचीन मत का नाम दिया है।समुद्र-यात्रा के समय दिशा ज्ञान हेतु चुम्बक का प्रयोग भारत में कम से कम वैशेषिक दर्शन के प्रवचन के समय से हो ही रहा है।एक बौद्ध-ग्रन्थ लङ्कावतारसूत्र में भी चुम्बक का उल्लेख है। बौद्धों द्वारा ही चुम्बक के प्रयोग का ज्ञान चीन में ले जाया गया था, यही एक कारण है कि चीन में बौद्ध-सम्पर्क से पूर्वकाल का कोई चुम्बक प्रयोग का उल्लेख वहाँ प्राप्त नहीं होता है।दिशायें आठ हैं, पूर्व पश्चिम उत्तर दक्षिण तथा इनके मध्य के चार कोण .. ईशान आग्नेय नैऋत्य वायव्य ।आठ दिशाओं के सूचक किसी यन्त्र में भी आठ अवयवों की आवश्यकता है, आठ सुईयाँ इस कार्य को कर देंगी।मर्कटिका अर्थात् मकड़ी के आठ पैर होते हैं, जब आप आठ तीरों वाली कम्पास बनायेंगे तो वह मर्कटिका ही दिखाई पड़ेगी। अष्टाश्रि - यूप का प्रयोग दिक्-शोधन प्रक्रिया का ही अङ्ग है।दक्षिण भारत में श्रीलङ्का से समुद्री यात्रा करने वाले को कैसे उत्तरी ध्रुवतारा और सप्तर्षियों के दर्शन होंगे, इसे अनुभव करने के लिये श्रीलङ्का के कैण्डी तट पर जाना होगा.. उसके बाद आप राजवल्लभ-मण्डन मिश्र को उसी दीप की लौ में जला देंगे। प्राची मेषतुलारवावुदयति स्याद्वैष्णवे वह्निभेचित्रास्वातिभमध्यगा निगदिता प्राची बुधैः पञ्चधा।प्रासादो भवनं करोति नगरं दिङ्मूढमर्थक्षयंहर्म्ये देवगृहे पुरे च नितरामायुर्धनं दिङ्मुखे॥तारे मार्कटिके ध्रुवस्य समतां नीति बले वैनतेदीपाग्रेण तदैक्यतश्च कथिता सूत्रेण सौम्या दिशा।शङ्कोर्नेत्रगुणेन (३६) मण्डलवरे छाया तयोर्मत्स्ययोर्जाता पत्रयुतिस्तु शङ्कुतलतो याम्योत्तरैस्तत्त्रुटेः॥ग्रन्थकारों ने नक्षत्रों के गणित से किया गया निर्माण अयादी वास्तु में योगी, सूक्ष्म योगी नक्षत्रों का ज्ञान होना आवश्यक बताया गया हेजिसकी गणना करने के लिए नक्षत्रों का ज्ञान होना अति आवश्यक है आईए जानते हैं वास्तु दोष रहित मकान कैसा होना चाहिए आईए जानते हैं वास्तु दोष रहित मकान कैसा होना चाहिए 🔊 Listen to this वास्तु शास्त्र के अनुसार मकान केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि जीवन की ऊर्जा का केंद्र होता है। जब घर वास्तु दोष रहित होता है, तो उसमें रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य, धन, सुख-शांति, संबंध और भाग्य स्वतः मजबूत होते हैं। आइए जानते हैं कि वास्तु दोष रहित आदर्श मकान कैसा होना चाहिए— मकान की दिशा (Facing) 💐💐पूर्वमुखी या उत्तरमुखी मकान सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं। 💐💐पूर्व से सूर्य ऊर्जा, आत्मविश्वास व मान-सम्मान प्राप्त होता है। 3.💐💐 उत्तर से धन, करियर और वास्तु देवता की संतुष्टि के लिए करें वास्तु देवता की संतुष्टि के लिए करें 🔊 Listen to this श्री गणेश जी की आराधना ब्रह्माजी ने वास्तु पुरुष की प्रार्थना पर वास्तुशास्त्र के नियमों की रचना की थी। इनकी अनदेखी करने पर उपयोगकर्ता की शारीरिक, मानसिक, आर्थिक हानि होना निश्चित रहता है। वास्तु देवता की संतुष्टि गणेशजी की आराधना के बिना अकल्पनीय है। गणपतिजी का वंदन कर वास्तुदोषों को शांत किए जाने में किसी प्रकार का संदेह नहीं है। नियमित गणेशजी की आराधना से वास्तु दोष उत्पन्न होने की संभावना बहुत कम होती है। यदि घर के मुख्य द्वार पर एकदंत की प्रतिमा या चित्र लगाया आप सभी लोगों से निवेदन है कि हमारी पोस्ट अधिक से अधिक शेयर करें जिससे अधिक से अधिक लोगों को पोस्ट पढ़कर फायदा मिले | Join Our Whatsapp Group