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प्रेम

पहले के समय में भी प्रेम होता था, लेकिन प्रेम विवाह बहुत कम होते थे। समाज और घरवालों के प्रति आदरयुक्त भय के कारण कोई भी ऐसा कदम उठाने का साहस नहीं करता था, और यदि किसी ने ऐसा किया तो वह बहुत बड़ा क्रांतिकारी निर्णय माना जाता था। ऐसे प्रेम की राह बहुत कठिन होती थी और विवाह हो भी जाए तो जीवन-निर्वाह करना बेहद मुश्किल हो जाता था। समाज बहिष्कार कर देता था। पैदा होने वाली संतान को भी उसके परिणाम भुगतने पड़ते थे। फिल्मों में सब कुछ अच्छा दिखाया जाता था, लेकिन वास्तविकता में वह एक मृगतृष्णा ही होती थी।

लेकिन अब समय बदल गया है। चलते-फिरते, दिन में कई बार लोग प्रेम में पड़ने लगे हैं। परिणामों की चिंता करना भी जैसे छोड़ दिया गया है। अब यह रोज़मर्रा की बात हो गई है और लोग भी इसे नज़रअंदाज़ करने लगे हैं। परंतु ऐसे प्रेम को टिकने के लिए गहराई चाहिए। हृदय से की गई आराधना और सच्चा प्रेम फल अवश्य देता है; फिर उसके लिए धर्म, सीमा, देश या भाषा की कोई बाधा नहीं रह जाती। आज जो कथा साझा की जा रही है, वह किसी फिल्म की कहानी जैसी लगती है, पर यह वास्तविक है। आनंद लीजिए।

तस्वीर तेरी दिल में… जिस दिन से उतारी है!”
शार्लट से चारूलता बनने की कहानी

स्वीडन जैसे संपन्न देश के एक राजघराने में जन्मी सुंदर और सुसंस्कृत राजकन्या — शार्लट! उसके नाम की अंग्रेज़ी वर्तनी Charlotte कुछ तिरछी-सी लगती है, जिसे हम अक्सर “चार्लेट” पढ़ते हैं। यूरोप में माता-पिता अपनी बेटियों के लिए यह नाम बड़े प्रेम से चुनते हैं। इस नाम का एक अर्थ ‘नाज़ुक’ भी है, और वह सचमुच वैसी ही थी — सुघड़, सडपातली, मानो कोई कोमल लता। यही शार्लट आगे चलकर चारूलता कैसे बनी, यह एक हृदयस्पर्शी कथा है।

अठारह-उन्नीस वर्ष की शार्लट कला-प्रेमी थी। उसे लोगों और उनके चित्रों में गहरी रुचि थी। उसे यह देखकर आश्चर्य होता कि रेखाओं और रंगों से कागज़ पर जीवंत व्यक्ति उकेरा जा सकता है। वह लंदन के एक कला महाविद्यालय में चित्रकला सीख रही थी और एक ऐसे श्रेष्ठ कलाकार की तलाश में थी जो व्यक्तिचित्र बनाने में निपुण हो।

उसे पता चला कि ऐसा एक अद्भुत कलाकार उसके घर से लगभग 9700 किलोमीटर दूर भारत में है। वह उससे मिलने को उत्सुक हो उठी और अपनी वैन लेकर यात्रा पर निकल पड़ी। बाईस दिनों की लंबी यात्रा के बाद वह दिल्ली पहुँची। जिस कलाकार की वह खोज कर रही थी, वह वहीं था — प्रद्युम्न कुमार महानंदिया।

ओडिशा के एक दूरस्थ क्षेत्र में जन्मे प्रद्युम्न बचपन से ही रंगों और प्रकृति में रमते थे। उनके पिता, जो डाकिया थे, उनकी पढ़ाई को लेकर चिंतित रहते। एक ज्योतिषी ने उनकी कुंडली देखकर कहा था कि यह लड़का बड़ा कलाकार बनेगा और इसका विवाह किसी दूर देश की सुंदर, संपन्न लड़की से होगा, जिसकी राशि वृषभ होगी — और वह स्वयं इसे खोजती हुई आएगी। यह बात बालक प्रद्युम्न ने चुपके से सुन ली और याद रखी।

कठिनाइयों और जातिगत भेदभाव का सामना करते हुए प्रद्युम्न दिल्ली पहुँचे और चित्र बनाकर आजीविका चलाने लगे। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी का सजीव चित्र बनाकर प्रसिद्धि पाई और कनॉट प्लेस में पोर्ट्रेट बनाने की अनुमति ली।

सन् 1975 में वहीं उनकी मुलाकात शार्लट से हुई। उसने उनसे अपना चित्र बनाने को कहा। जब वे उसके नीले नेत्रों में देख रहे थे, तो मानो कोई जीवंत चित्र सामने बैठा हो। चित्र पूरा होते ही शार्लट मंत्रमुग्ध हो गई। तभी प्रद्युम्न ने सहज ही पूछ लिया — “क्या तुम वृषभ राशि की हो?” उसके ‘हाँ’ कहते ही वे बोले — “तो तुम मेरी पत्नी बनोगी।”

आरंभ में वह चौंकी, पर धीरे-धीरे दोनों का प्रेम प्रगाढ़ हुआ। उन्होंने हिंदू रीति-रिवाज से विवाह किया और शार्लट बन गईं — चारूलता प्रद्युम्न महानंदिया।

कुछ समय बाद चारूलता स्वीडन लौट गईं। प्रद्युम्न ने निश्चय किया कि वे अपनी मेहनत से वहाँ पहुँचेंगे। उन्होंने अपनी वस्तुएँ बेचकर 1200 रुपये जुटाए, 60 रुपये की पुरानी साइकिल खरीदी और रंग-तूलिका लेकर निकल पड़े। दिल्ली से अमृतसर, फिर अफगानिस्तान, ईरान, तुर्की, बुल्गारिया, युगोस्लाविया, जर्मनी, ऑस्ट्रिया, डेनमार्क होते हुए पाँच महीने बाईस दिनों में वे स्वीडन पहुँचे।

सीमा पर अधिकारियों को आश्चर्य हुआ, पर अंततः चारूलता स्वयं उन्हें लेने पहुँचीं। प्रेम की यह विजय थी। समाज ने भी अंततः इस भारतीय दामाद को स्वीकार कर लिया।

आज उनका विवाह लगभग स्वर्ण जयंती के करीब है। प्रद्युम्न को स्वीडन में सम्मान मिला और ओडिशा के एक विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डॉक्टरेट प्रदान की। यह कथा सिद्ध करती है कि सच्चा प्रेम सीमाओं से परे होता है।

यह कहानी पढ़कर आपके मन के कैनवास पर भी दो व्यक्तियों का सुंदर चित्र अवश्य उभर आया होगा — चार्लट-चारूलता और प्रद्युम्न।

 

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