
आज का आदमी मेहनत में कम और मुकद्दर में ज्यादा विश्वास रखता है। आज का आदमी सफल तो होना चाहता है मगर उसके लिए कुछ खोना नहीं चाहता है। वह भूल रहा है कि सफलताएँ किस्मत से नहीं मेहनत से मिला करती हैं।
किसी की शानदार कोठी देखकर कई लोग कह उठते हैं कि काश अपनी किस्मत भी ऐसी होती लेकिन वे लोग तब यह भूल जाते हैं कि ये शानदार कोठी, शानदार गाड़ी उसे किस्मत ने ही नहीं दी अपितु इसके पीछे उसकी कड़ी मेहनत रही है। मुकद्दर के भरोसे रहने वालों को सिर्फ उतना मिलता है जितना मेहनत करने वाले छोड़ दिया करते हैं।
किस्मत का भी अपना महत्व है। मेहनत करने के बाद किस्मत पर आश रखी जा सकती है मगर खाली किस्मत के भरोसे सफलता प्राप्त करने से बढ़कर कोई दूसरी नासमझी नहीं हो सकती है।
दो अक्षर का होता है “लक”, ढाई अक्षर का होता है “भाग्य”, तीन अक्षर का होता है “नसीव” लेकिन चार अक्षर के शब्द मेंहनत के चरणों में ये सब पड़े रहते हैं।
“जो लोग दिन बदलते ही देवता बदल लेते हैं,
उनसे इंसानियत की उम्मीद मत रखना…
क्योंकि जिनका मन ही स्थिर नहीं होता,
वे रिश्तों में कभी स्थिरता नहीं दे सकते।”
सोमवार आया तो महादेव,
मंगलवार को हनुमान,
गुरुवार को दत्त,
शुक्रवार को लक्ष्मी,
शनिवार को शनि…
हफ्ते के साथ देवता बदल जाते हैं,
पर स्वभाव वही का वही रहता है।
हाथों में मन्नतों की गठरी,
होठों पर मंत्रों की लंबी सूची,
और मन में शिकायतें, अपेक्षाएँ, क्रोध
और स्थायी अशांति।
देव बदलते समय उन्हें लगता है—
“शायद आज वाला देव हमें समझ लेगा…”
लेकिन अगर देव बदलने पर भी मन शांत नहीं होता,
तो समझ लेना चाहिए कि समस्या देवों की नहीं,
बल्कि हमारे भीतर के उलझाव की है।
ज्योतिषीय दृष्टिकोण कहता है—
दिन बदलने से ग्रह नहीं बदलते,
और देव बदलने से कर्म नहीं मिटते।
👉🏻 सोमवार यानी चंद्र—
मन को स्थिर रखने की सीख।
👉🏻 मंगल यानी संयम और ऊर्जा।
👉🏻 गुरु यानी विवेक और दिशा।
👉🏻 शुक्र यानी रिश्तों में सौम्यता।
👉🏻 शनि यानी जिम्मेदारी, अनुशासन
और वास्तविकता का सामना।
💁🏻♀️ लेकिन हम क्या करते हैं?
ग्रह जो गुण दिखाते हैं, उन पर काम करने के बजाय
उन्हीं को दोष देने लगते हैं।
आज शनि खराब है,
कल राहु जिम्मेदार है,
परसों चंद्र की वजह से मन अशांत है…
लेकिन अपने स्वभाव को देखने की तैयारी
कभी नहीं होती।
ईश्वर को नई आरती या नए मंत्र नहीं चाहिए,
उसे चाहिए हमारी थोड़ी-सी स्थिरता,
थोड़ा संयम
और खुद को ईमानदारी से देखने का साहस।
ईश्वर कभी नहीं बदलता,
वह हमेशा वहीं होता है।
हम ही हर हफ्ते उम्मीद का पता बदलते रहते हैं।
और इसलिए—
दिन के हिसाब से देव बदलने वाले लोग
असल में देव को नहीं खोज रहे होते…
वे खुद से भाग रहे होते हैं।
जब ईश्वर को एक बार दिल से थाम लिया,
तो दिन मायने नहीं रखता।
और जब मन बदल गया,
तो देव बदलने की ज़रूरत ही नहीं रहती।
इसलिए—
अगर गुरु की कृपा चाहिए तो विवेक बढ़ाइए,
अगर शनि का भय नहीं चाहिए तो जिम्मेदारी स्वीकार कीजिए।
तभी रिश्तों में स्थिरता आएगी,
और जीवन में सही अर्थों में ईश्वर दिखाई देगा।