
मानव जीवन में मन ही प्रधान है। शास्त्र कहते हैं कि मन ही बंधन का कारण है और मन ही मोक्ष का हेतु है। जब मन विकृत होता है तो जीवन नरक बन जाता है। ज्योतिष शास्त्र ने मानसिक रोगों के गूढ़ कारणों को भाव ग्रह और योगों के माध्यम से स्पष्ट किया है।
शास्त्र का वचन है
क्षीणे विधौ रन्ध्रगते सपापे लग्ने च पापैर्यदि वीक्षिते वा । उन्मादवान् स्यान्मनुजोऽथवा स्यात् क्षीणेन्दुना पापखगान्तरस्थे ॥
इसका तात्पर्य यह है कि यदि क्षीण चंद्रमा अष्टम भाव में पाप ग्रहों से युक्त हो जाए अथवा लग्न पाप ग्रहों से दृष्ट हो जाए अथवा क्षीण चंद्रमा दो पाप ग्रहों के मध्य में आ जाए तो मनुष्य को उन्माद रोग होता है।
यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि केवल चंद्रमा का छठे सातवें आठवें या बारहवें भाव में स्थित होना उन्माद का कारण नहीं है। पाप ग्रहों का संबंध अनिवार्य रूप से होना चाहिए। साथ ही चंद्रमा कब क्षीण माना जाता है यह भी जानना आवश्यक है। शुक्ल पक्ष की एकादशी से लेकर कृष्ण पक्ष की पंचमी तक चंद्रमा बली रहता है। इसके अतिरिक्त तिथियों में चंद्रमा क्षीण कहा जाता है।
ग्रंथ कहता है
चन्द्रे रन्ध्रगते मन्दारफणीन्दुजे संयुते । जडोन्मादादि रोगः स्यान्नेत्रे हीने च जायते ॥
इसका अर्थ है कि जब अष्टम भाव में चंद्रमा के साथ मंगल शनि और राहु ये तीनों एक साथ बैठ जाएँ तो जातक को जड़ता उन्माद और नेत्रहीनता जैसे रोग होते हैं।
यहाँ सूक्ष्म बात यह है कि केवल चंद्र मंगल शनि राहु के मिलने से यह योग नहीं बनता। चारों ग्रहों का एक साथ अष्टम भाव में होना प्रबल उन्माद योग बनाता है। यदि कोई एक ग्रह कम हो तो फल में न्यूनता आ जाती है।
जब गुलिक पंचम भाव में शनि के साथ स्थित होता है तो यह प्रेत बाधा जन्य उन्माद देता है। यह योग पितृ दोष का स्पष्ट लक्षण है। केवल शनि और गुलिक की युति से यह फल नहीं मिलता। पंचम भाव पूर्व पुण्य बुद्धि संतान और विवेक का स्थान है। गुलिक को शनि का पुत्र माना गया है और इसका स्वभाव विष के समान है। जब यह विष बुद्धि के स्थान में बैठता है तो मनुष्य की विवेक शक्ति में विष घुल जाता है और वह विक्षिप्त हो जाता है।
बृहत्पाराशर होराशास्त्र के अष्टम अध्याय में कहा गया है
जन्मतो मरणं यावद् बाले रोगाः प्रकीर्तिताः । क्षीणेन्दौ लग्नगे पापैः दृष्टे केन्द्रादि वर्जिते ॥
इसका अभिप्राय यह है कि यदि क्षीण चंद्रमा लग्न में स्थित हो और पाप ग्रहों से दृष्ट हो तथा केंद्र भावों में कोई शुभ ग्रह न हो तो बालक जन्म से लेकर मरण पर्यंत रोगी रहता है। विशेष रूप से वह मानसिक रोग से ग्रस्त होता है।
इसका फल यह है कि ऐसा बालक बचपन से ही जड़ बुद्धि होता है। आधुनिक चिकित्सा में जिसे ऑटिज्म या मिर्गी कहा जाता है वह इसी योग का परिणाम है। इसका कारण यह है कि लग्न मस्तिष्क का प्रतिनिधित्व करता है और क्षीण चंद्रमा मन के दीपक के बुझ जाने के समान है। जब मस्तिष्क में ही अंधकार हो तो बुद्धि का प्रकाश कैसे होगा।
प्रश्न मार्ग के चौदहवें अध्याय में वर्णन मिलता है
शनिराहू युतौ चन्द्रे लग्नाद् वा सप्तमस्थिते । पिशाचग्रस्त विज्ञेयो भूतोन्मादं विनिर्दिशेत् ॥
इसका अर्थ यह है कि यदि शनि और राहु चंद्रमा के साथ लग्न में अथवा सप्तम भाव में स्थित हों तो जातक को पिशाच बाधा के कारण उन्माद होता है।
इसका लक्षण यह है कि व्यक्ति अकारण हँसता है अकारण रोता है स्वयं से बातें करता है और कभी कभी हिंसक भी हो जाता है। आधुनिक मनोचिकित्सक इसे स्किजोफ्रेनिया कहते हैं परंतु ज्योतिष इसे प्रेत बाधा कहता है।
इसका परिहार हनुमान बाहुक का पाठ और महामृत्युंजय मंत्र का जप है।
फलदीपिका के अष्टम अध्याय में लिखा है
बुधे रन्ध्रे पापयुते मन्देन यदि वीक्षिते । मतिभ्रंशो भवेत्तस्य वाचि दोषश्च जायते ॥
इसका तात्पर्य यह है कि यदि बुध अष्टम भाव में पाप ग्रहों से युक्त हो और उस पर शनि की दृष्टि पड़ रही हो तो जातक की मति भ्रष्ट हो जाती है और वाणी में भी दोष उत्पन्न हो जाता है।
इसका कारण यह है कि बुध बुद्धि वाणी और नाड़ी तंत्र का कारक है। अष्टम भाव गुप्त रोग और मृत्युतुल्य कष्ट का भाव है। शनि की दृष्टि वायु तत्व को बढ़ाती है जिससे स्नायु विकार उत्पन्न होते हैं। इस योग के कारण पार्किंसन अल्जाइमर और हकलाने जैसे रोग होते हैं।
उत्तरकालामृत में कहा गया है
चन्द्रे शनैश्चरे युक्ते केन्द्रे वा यदि कोणगे । चिंतया पीडितो नित्यं विषादं परमं व्रजेत् ॥
इसका अर्थ यह है कि यदि चंद्रमा और शनि की युति केंद्र या त्रिकोण भाव में हो तो जातक नित्य चिंता से पीड़ित रहता है और परम विषाद को प्राप्त होता है।
यह संसार में विष योग के नाम से प्रसिद्ध है। इसके कारण डिप्रेशन एंग्जायटी और आत्महत्या के विचार आते हैं। चंद्रमा मन का कारक है और शनि दुख और अवसाद का कारक है। जब मन में ही दुख का विष घुल जाए तो जीवन विषमय हो जाता है।
परंतु इसका भंग भी बताया गया है। यदि इस युति पर गुरु की शुभ दृष्टि पड़ जाए तो यही विष योग अमृत योग में परिवर्तित हो जाता है और विष अमृत बन जाता है।
बृहत्जातक में वर्णन है
जीवे राहुयुते केन्द्रे धीस्थानं यदि पीडितम् । गुरुचाण्डाल योगोऽयं मतिभ्रमकरः स्मृतः ॥
इसका तात्पर्य यह है कि यदि गुरु और राहु की युति केंद्र भाव में हो और पंचम भाव पीड़ित हो तो गुरुचांडाल योग बनता है जो मतिभ्रम उत्पन्न करता है।
इसका कारण यह है कि गुरु सात्विक बुद्धि और धर्म का प्रतीक है जबकि राहु भ्रम और अधर्म का प्रतीक है। जब दोनों एक साथ हों तो जातक के मन में धर्म और अधर्म का भ्रम उत्पन्न हो जाता है। परिणामस्वरूप वह नास्तिक हो जाता है गुरु का द्रोह करता है और विक्षिप्त निर्णय लेता है। आधुनिक भाषा में इसे बायपोलर डिसऑर्डर कहा जा सकता है।
सारावली ग्रंथ कहता है
केमद्रुमे भवेज्जातो निःस्वो मलिन एव च । शनिना वीक्षितश्चेन्द्रे उन्मादी जायते ध्रुवम् ॥
इसका अर्थ यह है कि यदि जन्म कुंडली में केमद्रुम योग हो और शनि चंद्रमा को देखता हो तो जातक निश्चित रूप से उन्मादी होता है।
केमद्रुम योग का अर्थ है अकेला चंद्रमा। जब चंद्रमा के आगे पीछे कोई ग्रह न हो तो मन अकेला पड़ जाता है। उस पर शनि की दृष्टि पड़ने से अकेलेपन में अवसाद बढ़ जाता है। ऐसा जातक समाज से कटा कटा रहता है अंतर्मुखी हो जाता है और अंततः विक्षिप्त हो जाता है।
मानसागरी में कहा गया है
अमायां जननं यस्य रविचन्द्रौ च संगतौ । लग्ने पापैर्युतौ दृष्टौ मूकत्वं जडतां व्रजेत् ॥
इसका तात्पर्य यह है कि यदि किसी का जन्म अमावस्या को हो और सूर्य चंद्रमा की युति लग्न में हो तथा वह पाप ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो जातक मूक और जड़ बुद्धि होता है।
इसका कारण यह है कि सूर्य आत्मा का कारक है और चंद्रमा मन का कारक है। अमावस्या के दिन दोनों का ग्रहण होता है। जब आत्मा और मन दोनों ही अंधकार में हों तो मानसिक विकास अवरुद्ध हो जाता है।
होरा रत्नम् में वर्णन है
कामः क्रोधश्च लोभश्च मोहो मदश्च मत्सरः । एते षड्रिपवः ख्याता लग्नेशे पापसंयुते ॥
इसका अर्थ यह है कि यदि लग्नेश पाप ग्रहों से युक्त हो तो काम क्रोध लोभ मोह मद और मत्सर ये छह शत्रु मन को ग्रस लेते हैं।
लग्नेश स्वयं जातक और उसके मस्तिष्क का प्रतिनिधि है। जब मस्तिष्क में ही पाप का प्रवेश हो जाए तो विकार उत्पन्न होते हैं। यदि लग्नेश मंगल से युत हो तो क्रोधोन्माद होता है। शनि से युत हो तो अवसाद होता है। राहु से युत हो तो कामोन्माद होता है। केतु से युत हो तो वैराग्योन्माद होता है।
परिहार शास्त्रसम्मत उपचार
चंद्र बल वृद्धि के लिए सोमवार का व्रत रखना चाहिए मोती धारण करना चाहिए शिव उपासना करनी चाहिए तथा चावल और दूध का दान करना चाहिए। चंद्र मंत्र ॐ सों सोमाय नमः का 11000 बार जप करना चाहिए।
बुध बल वृद्धि के लिए बुधवार को गाय को हरा चारा खिलाना चाहिए और विद्यार्थियों को पुस्तक दान करनी चाहिए। बुध मंत्र ॐ बुं बुधाय नमः का जप करना चाहिए।
पंचम भाव शुद्धि के लिए सरस्वती मंत्र ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः का जप करना चाहिए और बच्चों को शिक्षा दान देनी चाहिए। क्योंकि पंचम भाव बुद्धि संतान और विद्या का स्थान है।
प्रेत बाधा निवारण के लिए हनुमान चालीसा बजरंग बाण और महामृत्युंजय मंत्र का जप करना चाहिए। घर में गूगल की धूप करनी चाहिए।
आयुर्वेद संगम के अंतर्गत ब्राह्मी शंखपुष्पी और अश्वगंधा का सेवन करना चाहिए। ज्योतिष और आयुर्वेद का सम्मिलित प्रयोग पूर्ण चिकित्सा प्रदान करता है।
सबसे बड़ा सूत्र पराशर ऋषि का वचन
लग्नेशो बली यस्य बुद्धिस्थानाधिपस्तथा । चन्द्रश्च बलसंयुक्तः स नरो नहि दुःखभाक् ॥
इसका अर्थ यह है कि जिसका लग्नेश बली हो पंचमेश बली हो और चंद्रमा बल से युक्त हो वह मनुष्य कभी दुखी नहीं होता।
इसलिए मानसिक रोग से बचने के लिए तीन तत्वों को बली रखना आवश्यक है। लग्न शरीर है चंद्रमा मन है और पंचम भाव बुद्धि है। यदि कुंडली में रोग के योग हों तो उपाय करना चाहिए और यदि योग न भी हों तो भी सात्विक जीवन जीना चाहिए। क्योंकि शास्त्र का वचन है कि मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः। मन ही बंधन का कारण है और मन ही मोक्ष का कारण है।