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मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र

त्रेता युग की मर्यादापूर्ण इतिहास- मान्यता प्राप्त “रामायण” अति दिव्य ग्रंथ पदवाच्य। रामायण की कथा करुण रस प्रधान; इस में बालकांड के सिवाय सब कांड में करुणा है। रामायण लिखने के बाद वाल्मीकि जी ने विचार किया– यह तो करुणारस- प्रधान ग्रंथ है, तो “आनंद रामायण” की रचना की जाए। आनंद रामायण में करुणा प्रसंगों का वर्णन नहीं किया गया है। श्रीमद् भागवत की रचना गंगा किनारे हुई है और रामायण की रचना तमसा नदी के किनारे हुई है। रामायण आदि काव्य है और महर्षि वाल्मीकि आदिकवि हैं। दिव्यद्रष्टा महर्षी वाल्मीकि जी की कथा अर्थात तारक मंत्र स्वरूपिणी “राम नाम” की दिव्य महिमा अपार है।।

       श्रीराम जी के परम भक्त संत गोस्वामी तुलसीदास जी कृत “राम चरित मानस” के अनुसार रामायण के प्रधान आचार्य है भगवान भोलेनाथ। सर्वप्रथम रघुवंशी “रामायण” को भगवान भोलेनाथ शिव ने हीअपने मन में बनाया है। हमारे धर्म ग्रंथों में ऐसा वर्णन है की शिव जी के मानस- सृष्ट रामायण में 100 करोड मंत्र थे, यथा– “शत करोड़ रामायण बोली”। यह समाचार देव, दानव और मानवों को प्राप्त हुआ कि भगवान शिव ने 100 करोड़ मंत्रों वाली रामायण मन में तैयार की है, तो तीनों ही वर्ग कैलाश पर उपस्थित हुए। उन्होंने एकजुट होकर शिवजी की स्तुति की– “भगवान, आप तो अखंडानंद ब्रह्म स्वरूप स्वयम्भू है, आपकी जो 100 करोड़ मंत्रों की रामायण हैं, वह हम सब में विभाजित कर दिजिए।।”

 

      भगवान शिव जी को दया आ गई और उन्होंने 33 करोड़ मंत्र देवताओं को, 33 करोड़ मांनवो को और 33 करोड़ दानवों को दे दिए। अब शिवजी के पास एक करोड़ मंत्र शेष रह गए, तो देवताओं ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की — “आप तो परमब्रह्न योगेश्वर (ब्राह्मण) है, एक करोड़ मंत्र रखने की क्या जरूरत है?” — तब शिवजी ने 33- 33 लाख मंत्र तीनों में विभाजित कर दिए। अब शिवजी के पास सिर्फ एक लाख मंत्र रह गए। वचे हुए मन्त्रों के लिए मानव ने पुनः प्रार्थना की, तो शिव जी ने उस एक लाख मन्त्र को फिर समान- समान भाग कर तीनों में बांट दिए, तो अब शिवजी के पास सिर्फ “एक मंत्र” ही शेष रह गया। इस स्थिति में तीनों ने कहा — “वचे हुए यह एक मंत्र भी हमें दे दीजिए।।”

 

      शिव जी ने कहा– “सब मंत्र अलग- अलग थे; इसीलिए उनका विभाजन हो गया। अब एक मंत्र को तीनों में कैसे विभाजन करुँ ?” तीन वर्गों ने निवेदन किया — “जैसे भी हो आप इस मंत्र को हम में बांट दीजिए।” वह मंत्र संस्कृत के अनुष्टुप छंद में था। सब जानते हैं की अनुष्टुप छंद में 32 अक्षर होते हैं। अतः शिवजी ने 10 -10 अक्षर सभी को आपस में बांट दिए और वचे हुये सिर्फ “दो अक्षर” अपने पास रख लिए। जो शेष दो अक्षर रहे, उसको शिव जी ने अपने कंठ में धारण कर लिए तथा तीनों वर्गों से निवेदन की — “सारी रामायण आप सभीओं को मुबारक हो, लेकिन वचे हुए यह ‘दो अक्षर’ किसीको नहीं दे सकता।।”

      इस पर तीनों वर्ग बोले– “नहीं देंगे, तो कोई बात नहीं; यह तो बता दीजिये की उस दो अक्षर कौन से हैं।” शिव जी ने खुलासा किया कि यह दो अक्षर है– “रा” और “म”, जिन्हें मिलाने से होंगे– “राम”, जो संपूर्ण रामायण का निचोड़ है। तुलसी दास जी भी कहते हैं कि– “वे दो अक्षर शिव जी ने अपने ह्रदय में धारण कर लिये।” –इस प्रकार सर्वप्रथम शिव जी ने रामायण को तैयार किया और बांट भी दिया। फिर तीनो वर्गों से संग्रह कर, ग्रन्थ के आकार में आदिकवि महर्षी वाल्मीकि जी ने संस्कृत में रामायण को लिखी, जिसे दुनिया ने स्वीकारा है और यह हमारा अधिकार में माना जाता है। इसी से आगे अनेक महात्माओं रामायण पर विभिर्ण ग्रन्थ लिखा है।।

 

  तुलसी रामायण है रामचरित मानस :

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      आज से लगभग 400 वर्ष पूर्व मोगल बादशाह आकबर के शासन काल के अंदर, गोस्वामी तुलसी दास जी ने रामभक्त श्रीहनुमान जी के आदेश के अनुसार, 80 साल की उम्र में लोकभाषा में स्वरचित ‘तुलसी रामायण’ अर्थात प्रसिद्ध रामकथा– “रामचरित मानस” को पोथी में लिख कर आर्य- सनातनी अध्यात्म जगत को समर्पित किया था।गोस्वामी जी संस्कृत के महान विद्वान थे। लेकिन उस समय उन्हें ऐसा अनुभव हुआ था कि– निकट भविष्य में ज्यादा लोग संस्कृत भाषा को समझ नहीं पाएंगे। इस कारण उन्होंने संस्कृत में रचित मूल “वाल्मीकि- रामायण” को लोक- भाषा में रोचक पद्य- रूप देकर “रामचरित मानस” रचना करने की ठान लिया था।।

 

      विद्वानों का कथन के अनुसार सम्बत 1631 की राम नवमी के दिन वैसा ही योग मिला, जैसे त्रेता युग में राम जन्म के दिन था। तुलसी दास जी ने इस पवित्र राम नवमी के दिन ही “राम कथा” लिखने की श्रीगणेश किया और 2 वर्ष 7 माह 26 दिन में, अर्थात सम्बत 1633 के मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी तिथि “राम विवाह” के दिन ही “रामचरित मानस” ग्रन्थ की सातो कांडों लिखन कार्य सम्पूर्ण हुआ था।

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