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माण्डकर्णि मुनि

माण्डकर्णि मुनि का वर्णन वाल्मीकि रामायण के अरण्यकाण्ड के ११ सर्ग में दिया गया है। अरण्यकाण्ड के ८वें सर्ग में श्रीराम सुतीक्ष्ण मुनि से विदा लेकर आगे बढ़ते हैं। मार्ग दिखाने के लिए सुतीक्ष्ण मुनि के एक शिष्य ऋषि धर्मभृत भी उनके साथ होते हैं। उसी मार्ग में ऋषि धर्मभृत श्रीराम, माता सीता और वीरवर लक्ष्मण को माण्डकर्णि मुनि की कथा सुनाते हैं।

 

रामायण के अरण्यकाण्ड के ११वें सर्ग के अनुसार जब वे चारों वन में जा रहे होते हैं तो मार्ग में उन्हें एक विशाल और मनोहर तालाब दिखता है। उस तालाब की लम्बाई और चौड़ाई १-१ योजन थी। उसमें भांति-भांति के पुष्प थे और हाथियों पक्षियों के झुण्ड क्रीड़ा कर रहे थे।

तभी श्रीराम को उसी सरोवर से अद्भुत गीत-संगीत और अनेकों वाद्यों की ध्वनि सुनाई दी। उन सब ने चारो ओर देखा किन्तु उन्हें कोई दिखाई नहीं दिया। ध्यान से सुनने पर उन्होंने पाया कि संगीत की ये ध्वनि उस सरोवर के अंदर से आ रही है। ये देख कर श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी को बड़ा आश्चर्य हुआ कि सरोवर के अंदर से संगीत की ध्वनि कैसे आ सकती है। उन्होंने ये बात ऋषि धर्मभृत से पूछी।

 

तब ऋषि धर्मभृत ने कहा – “हे श्रीराम! आपने ठीक समझा। संगीत की ये ध्वनि इस सरोवर के अंदर से ही आ रही है। इस अद्भुत सरोवर का नाम “पञ्चापप्सर” है। ये सरोवर सदैव जल से भरा रहता है। इसका निर्माण ऋषि माण्डकर्णि ने अपने तप द्वारा की थी और अब वे यहाँ अपनी पांच अप्सरा पत्नियों के साथ रहते हैं। पांच अप्सराओं के इस सरोवर में निवास करने के कारण इसका पञ्चापप्सर नाम पड़ा है।”

 

फिर श्रीराम के अनुरोध पर ऋषि धर्मभृत उन्हें माण्डकर्णि मुनि की कथा सुनाते हैं। एक बार ऋषि माण्डकर्णि ने घोर तपस्या करने का निश्चय किया। उन्होंने इसी सरोवर में केवल वायु पीकर निराहार १०००० वर्षों तक घोर तपस्या की। उनकी तपस्या से देवता चिंतित हो गए। उन्हें लगा कि ऋषि माण्डकर्णि अपनी तपस्या से उनमें से किसी का स्थान लेना चाहते हैं।

ये सोच कर देवताओं ने ऋषि माण्डकर्णि की तपस्या भंग करने के लिए स्वर्ग की पांच सर्वोत्तम अप्सराओं को पृथ्वी पर भेजा। उन अप्सराओं का सौंदर्य अप्रतिम एवं उनकी अंगकान्ति विद्युत् के समान थी। हालाँकि ऋषि माण्डकर्णि १०००० वर्षों से घोर तप कर रहे थे किन्तु फिर भी उन अप्सराओं ने उन्हें अपने मोहपाश में जकड लिया। उनका अद्वितीय सौंदर्य देख कर ऋषि माण्डकर्णि काम के अधीन हो गए और उनसे विवाह कर लिया।

 

उन पांचों अप्सराओं ने माण्डकर्णि के रहने के लिए उस सरोवर के भीतर ही एक ऐसे अद्भुत भवन का निर्माण किया जो अपने ऐश्वर्य से स्वर्गलोग की ही भांति लगता था। उन अप्सराओं के प्रभाव से ऋषि माण्डकर्णि ने भी चिर युवावस्था को प्राप्त कर लिया और अब वे अपनी पांचों पत्नियों के साथ इसी सरोवर के भीतर अपने भवन में काम क्रीड़ा करते रहते हैं। अपने पति को संतुष्ट करते हुए वे पांच अप्सराएं उनके मनोविनोद के लिए सदैव नृत्य संगीत में तत्पर रहती हैं। आप जो ये संगीत की ध्वनि सुन रहे हैं, वो उन्ही पांचों अप्सराओं द्वारा अपने पति की सेवा करने के कारण है।

 

उस कथा को सुन कर श्रीराम को आश्चर्य तो बड़ा हुआ किन्तु फिर भी ऋषि धर्मभृत द्वारा कही गयी उस बात को उन्होंने सत्य माना और फिर अन्य ऋषियों से मिलने के लिए वे आगे चल दिए। रामायण में श्रीराम और माण्डकर्णि ऋषि के मिलने का कोई वर्णन नहीं मिलता। ऐसा माना जाता है कि वर्तमान में महाराष्ट के बुलढाणा जिले के लोनार नामक स्थान पर स्थित जो प्रसिद्ध सरोवर है वही प्राचीन पञ्चापप्सर सरोवर था।

 

सनातन धर्म ज्ञान

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