
आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। इसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है, क्योंकि महर्षि व्यास को समस्त मानव जाति का गुरु माना गया है। एक मान्यता यह भी है कि उनका जन्म इसी तिथि को हुआ था, किंतु यह धारणा प्रमाणित नहीं है, क्योंकि स्वयं महर्षि व्यास ने कहीं भी अपने जन्मकाल का उल्लेख नहीं किया है।
महर्षि व्यास का जन्म एक द्वीप पर हुआ था और उनका वर्ण श्याम (काला) था। इसी कारण उनका नाम कृष्ण द्वैपायन पड़ा। बाद में उन्होंने वेदों का सुव्यवस्थित संकलन एवं विभाजन किया, इसलिए उन्हें “व्यास” की उपाधि प्राप्त हुई। ऋषि पराशर और मत्स्यगंधा (सत्यवती) के अविवाहित अवस्था में उत्पन्न पुत्र ही व्यास थे। उनकी माता मछुआरा समुदाय से थीं, इसलिए जन्म से उन्हें शूद्र माना गया, किंतु अपने ज्ञान, तप और कर्म के बल पर उन्होंने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया तथा ब्राह्मणों में भी श्रेष्ठ स्थान अर्जित किया। बाल्यकाल से ही उन्होंने कठोर तपस्या आरंभ कर दी और महान सिद्ध पुरुष बने। सिद्धि प्राप्त करने के पश्चात जब वे अपनी माता को छोड़कर तप के लिए चले, तब उन्होंने कहा—”जब भी तुम मेरा स्मरण करोगी, मैं तुरंत तुम्हारे सामने उपस्थित हो जाऊँगा।”
महर्षि व्यास को सबसे अधिक प्रसिद्धि महाभारत जैसे महान काव्यात्मक इतिहास की रचना के कारण मिली। ऐसी मान्यता है कि अठारह पुराणों की रचना भी उन्होंने ही की। जब उन्होंने एक लाख श्लोकों वाले विशाल महाभारत की रचना का संकल्प लिया, तब प्रश्न उठा कि इसे लिखेगा कौन। तब भगवान गणेश ने लेखक बनने का दायित्व स्वीकार किया, किंतु उन्होंने एक शर्त रखी कि व्यास बिना रुके निरंतर श्लोक सुनाते रहेंगे, अन्यथा वे लेखन बंद कर देंगे। इसके उत्तर में व्यास ने भी शर्त रखी कि गणेश प्रत्येक श्लोक का अर्थ समझने के बाद ही उसे लिखेंगे।
इस प्रकार दोनों के बीच यह अद्भुत लेखन प्रारंभ हुआ। जब-जब व्यास को आगे की रचना के लिए समय चाहिए होता, तब वे अत्यंत गूढ़ अर्थ वाले श्लोक बोल देते। गणेश उन श्लोकों का अर्थ समझने में लग जाते और उसी दौरान व्यास आगे के श्लोकों की रचना कर लेते। कहा जाता है कि महाभारत में ऐसे लगभग 8,800 गूढ़ श्लोक हैं।
महाभारत में असंख्य विषयों का समावेश है, जिनका गहन ज्ञान महर्षि व्यास को था। नियोग परंपरा के अनुसार उन्होंने धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर को जन्म दिया। लेखक के अनुसार, वे एक महान वैज्ञानिक भी थे। लेखक का मत है कि उन्होंने गांधारी के गर्भ पर विशेष अनुसंधान कर सौ कौरवों की उत्पत्ति कराई। लेखक आगे यह भी दावा करते हैं कि व्यास को गुणसूत्रों (Chromosomes) का ज्ञान था और उन्होंने “गुणविधि” नाम से उन सिद्धांतों का उल्लेख किया, जिनकी संख्या 23 बताई गई है। आधुनिक विज्ञान में भी मानव के 23 जोड़े गुणसूत्र माने जाते हैं। लेखक का कहना है कि अनुवांशिक रोगों का संबंध भी इन्हीं से होता है, जिसे आधुनिक विज्ञान स्वीकार करता है।
लेखक के अनुसार महर्षि व्यास को खगोल विज्ञान का भी उत्कृष्ट ज्ञान था। उन्होंने महाभारत युद्ध के समय श्वेत, श्याम और तीव्र नामों से जिन ग्रहों का उल्लेख किया, उन्हें लेखक क्रमशः यूरेनस, नेपच्यून और प्लूटो से जोड़ते हैं। लेखक का दावा है कि व्यास ने ग्रहों की स्थिति सायन और निरयन दोनों पद्धतियों से लिखी है। इन्हीं आधारों पर लेखक ने निष्कर्ष निकाला कि महाभारत का युद्ध रविवार, 16 अक्टूबर, 5561 ईसा पूर्व को हुआ था।
महर्षि व्यास ने महाभारत में लिखा है कि अभिजित नक्षत्र अपने स्थान से हट गया था। लेखक का कहना है कि आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि लगभग 12,000 वर्ष पूर्व इस नक्षत्र की स्थिति में परिवर्तन हुआ था। व्यास यह भी कहते हैं कि यद्यपि नक्षत्रों को स्थिर माना जाता है, फिर भी वे गति करते हैं। लेखक के अनुसार आधुनिक खगोल विज्ञान भी इस तथ्य को स्वीकार करता है।
महाभारत युद्ध के प्रारंभ में अमावस्या थी। व्यास लिखते हैं कि सूर्योदय के समय सूर्य दो भागों में विभाजित प्रतीत हुआ और उसकी किरणों के स्थान पर अग्नि-ज्वालाएँ निकलती दिखाई दीं। लेखक के अनुसार कुछ विद्वान इसे असंभव मानते हैं, किंतु उनका मत है कि पूर्ण सूर्यग्रहण के समय सूर्य वास्तव में दो भागों जैसा दिखाई देता है—बीच में काला भाग और चारों ओर प्रकाशमंडल। आधुनिक विज्ञान के अनुसार भी पूर्ण सूर्यग्रहण के समय सूर्य की सतह से विशाल ज्वालाएँ (Solar Prominences) दिखाई देती हैं।
एक प्रसिद्ध उक्ति है—
“व्यासोच्छिष्टं जगत्सर्वम्।”
अर्थात, “इस संसार में ऐसा कोई ज्ञान नहीं जो व्यास के द्वारा स्पर्शित या वर्णित न हुआ हो।”
लेखक का मत है कि यह कथन सत्य प्रतीत होता है, क्योंकि व्यास का ज्ञान अत्यंत व्यापक था। लेखक इसकी तुलना आधुनिक वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन के सापेक्षता सिद्धांत से करते हैं। आइंस्टीन के अनुसार यदि कोई व्यक्ति अत्यधिक वेग से अंतरिक्ष की यात्रा कर वापस आए, तो उसके लिए समय अपेक्षाकृत धीमी गति से बीतेगा। लेखक का कहना है कि यही सिद्धांत व्यास ने ककुद्मी और रेवती की कथा में बताया है। कथा के अनुसार ककुद्मी अपनी पुत्री रेवती के लिए योग्य वर की खोज में ब्रह्मलोक गए और वहाँ से लौटने तक पृथ्वी पर 27 चतुर्युग अर्थात लगभग 216 वर्ष बीत चुके थे, फिर भी वे जीवित थे और रेवती युवा ही थीं। बाद में उनका विवाह बलराम से हुआ। लेखक के अनुसार इस कथा में यह भी संकेत मिलता है कि विभिन्न लोकों अथवा ग्रहों पर समय की गति अलग-अलग हो सकती है।
लेखक के अनुसार महर्षि व्यास ने परा और अपरा—दोनों प्रकार की विद्याओं में पूर्ण प्रभुत्व प्राप्त किया था। उन्होंने अनेक सिद्धियाँ भी अर्जित की थीं। कहा जाता है कि उन्होंने अपने शिष्य संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की थी, जिसके कारण संजय हस्तिनापुर में बैठे-बैठे कुरुक्षेत्र का युद्ध देख सके। इसी कारण महर्षि व्यास को जगत्गुरु की उपाधि प्राप्त हुई और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है।