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महर्षि काकभुशुण्डि

जितना अज्ञानमूलक व्यवहार अपने पूर्वजों, अपने इतिहास के साथ किया है उतना किसी सभ्यता या राष्ट्र ने नहीं किया।

वे अपने कंकड़ को भी पहाड़ बताते हैं और हम अपने ब्रह्मवेत्ता ऋषियों को भी काग, कौवा बताने कहने से नहीं चूकते!!

 

एथेंस की कुल आबादी ही उस समय पांच हज़ार थी जब सुकरात चौराहों पर खड़ा होकर कुछ बोलता था, पांच दस सुनने वाले रहते थे, फिर भी उन्होंने सुकरात को दर्शनशास्त्र का पिता बना दिया।

और यहां, झूठी गप्पों कथाओं के माध्यम से ब्रह्मवेत्ता, महाबलशाली, आदित्य ब्रह्मचारी, संगीत शास्त्र के तीन महान आचार्यों में से एक, श्रीराम भक्त हनुमान को बंदर बना लिया, महर्षि काकभुषुण्डि को कौवा मान लिया।

महर्षि श्रृंगी कहते हैं कि वे अंगिरस गोत्रीय महर्षि रेणुकेतु प्रवाहण के पुत्र थे, बचपन में जब वे महर्षि श्रुति के आश्रम में पढ़ते थे तब उनका नाम था ब्रह्मचारी सोजनी।

 

लेकिन कागा नाम पड़ने के पीछे एक मधुर कथा है, जब वे बालक थे तब अपने भोजन के पात्र के अलावा माता और पिताजी के पात्रों को भी जूठा कर देते थे चखकर।

 

हंसी हंसी में माता ने कहा जैसे कागा पेट भरा होने पर भी कई जगह चोंच मारता है ऐसे ही यह नटखट बालक है, तो वे बालक को कागा बुलाने लगी।

 

जब वे सोजनी ब्रह्मचारी श्रुति ऋषि के आश्रम में वेदाध्ययन कर रहे थे तब किसी भी बात का जवाब एकदम सटीक और तुरन्त देते थे, आजकल जिसको प्रत्युतपन्नमतित्व ,हाज़िर जवाबी  बोलते हैं।

 

सामान्य संस्कृत का परिचय रहने वाला भी जानता है कि संस्कृत में बंदूक को भुशुण्डि बोलते हैं।

 

तो उनके जो सहपाठी ब्रह्मचारी थे महर्षि लोमश वे उन्हें उनकी प्रत्युतपन्न मेधा के कारण गोली की तरह जवाब देने वाला यानी कहते हैं न कि एकदम फायर करता है, भुशुण्डि कहने लगे।

 

महर्षि काकभुशुण्डि आयुर्वेदाचार्य तो थे ही।

 

वर्णन आता है कि जब वे प्रभु श्रीराम से मिले उस समय उनकी उम्र 684 वर्ष थी।

महाराजा राम ने जब कहा कि हे महर्षि आप तो आयुर्वेद के बारे में सबकुछ जानते हैं, इतना आपने कैसे जाना?

 

तब महर्षि काकभुशुण्डि ने कहा कि हे राम, मैंने 400 वर्ष आयुर्वेद के अध्धयन और औषधियों की खोज में लगाए हैं। फिर भी मैं बहुत कम ही जानता हूँ।

आयुर्वेद पर एक महान ग्रन्थ चन्द्रयाणकृत पोथी की रचना की उन ऋषि ने।

 

बाद में विज्ञान में रुचि और शोध बुद्धि के चलते ब्रह्मांडो और गलेक्सीयों की गणना और खोज पर एक सविता नामक महान ग्रन्थ रचा, आजकल हॉलीवुड फिल्मों में देखते हैं कि एक ऐसी मिसाइल छोड़ते हैं जो टारगेट के पीछे लगी रहती है।

 

टारगेट कितना भी मुड़ तुड़ जाए एकदम दिशा बदलकर उल्टा घूम जाए वह पीछे ही लगी रहती है।

 

 महर्षि श्रृंगी कहते हैं कि महर्षि काकभुशुण्डि ने उस समय एक ऐसे ही यंत्र का आविष्कार किया था जिसका नाम कागाम चथवेतु यंत्र था, जिसको बनाने की प्रेरणा उन्हें कौवे को ऐसे उल जलूल उड़ते देखकर मिली।

 

ऋषियों का एक मत यह भी है कि उस कागाम चथवेतु यंत्र के कारण ही इनका नाम काग पड़ा, भुशुण्डि तीव्र मेधा के चलते।

 

भारत में ज्ञानी प्रजा अपने पूर्वजों को कौवे बंदर बनाने पर तुल जाती है, और कुछ मान भी बैठते हैं।

 कूड़े कर्कट से बाहर निकलकर अपने पराक्रमी पूर्वजों, ब्रह्मवेत्ता ऋषियों को जानें, उनका व्यापक अध्धयन करें।

 

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