Sshree Astro Vastu

महाँकाल-अर्थात समय, और मृत्यु.. जो इन दोनों को जीत चुके हों |

तनिक सोचिये!! वे समय को कैसे जीतते हैं….? पौराणिक कथाएं कहती हैं, जब सृष्टि नहीं थी, कुछ नहीं था, तब एक सकारात्मक शक्तिपुंज यूँ ही ब्रह्मांड में घूम रहा था। उसी शक्तिपुंज से ब्रह्मा विष्णु और महेश और फिर उनके माध्यम से सृष्टि बनी। वह शक्तिपुंज ही सदाशिव हैं……. सकारात्मक शक्तिपुंज अर्थात ब्रह्मांड की पॉजिटिव एनर्जी… जब धरती, सूर्य, चन्द्र, ब्रह्मांड कुछ भी नहीं था, तब भी यह एनर्जी थी… और जब ये सब समाप्त हो जाएंगे तब भी वह एनर्जी रहेगी। वह काल से परे है..  वे ही सदाशिव हैं, महाँकाल हैं….

 

और वे मृत्यु को कैसे जीतते हैं….? तो वे स्वयं संहार के देवता हैं। जिन्होंने अपने कंठ में ही सृष्टि का समूचा हलाहल धारण किया है, उन्हें मृत्यु कैसे आएगी..? जो काल अर्थात समय से परे हैं,…. वे काल अर्थात मृत्यु से भी परे ही हैं…….

तो भगवान शिव के तीसरे ज्योतिर्लिंग अर्थात महाकालेश्वर के रूप में उज्जयनी में इन्ही सदाशिव को पूजते हैं हम-आप… वैसे मानवीय सृष्टि के बाद का यह पहला ज्योतिर्लिंग हैं। पहले ज्योतिर्लिंग भगवान सोमनाथ की कथा मानवीय सृष्टि प्रारम्भ होने के पूर्व चन्द्रमा और उनकी पत्नियों से जुड़ती है, और दूसरे ज्योतिर्लिंग भगवान मल्लिकार्जुन की कथा भगवान शिव के अपने परिवार से. महाकाल की कथा उज्जयनी के एक प्राचीन राजा से जुड़ती है अर्थात मनुष्य से… जो द्वादश ज्योतिर्लिंगों का क्रम है न, वह बिल्कुल टाइम पीरियड के आधार पर है….. आपको शायद पता हो कि सन 1234 में गुलाम इल्तुतमिश ने महाकाल मंदिर को तोड़ दिया था। तब से सन 1728 ई तक मालवा पर हिंदुओं का शासन ही नहीं रहा, सो पुनर्निर्माण की कोई संभावना ही नहीं थी। पर इन 500 वर्षों में पूजा कभी बन्द नहीं हुई….. अत्याचार होता रहा, कत्लेआम होता रहा, पर भक्तों की आस्था नहीं टूटी। पाँच सौ वर्षों तक लोग ध्वस्त मन्दिर में ही जल चढ़ाते रहे, देव की अर्चना करते रहे…

मैं सदैव कहता हूँ…. सभ्यता का संघर्ष दस-बीस वर्षों का नहीं होता। वह हजारों वर्षों तक चलता है। सभ्य समाज को लंबे समय तक धैर्य धारण कर अपने कर्तव्य में लगे रहना पड़ता है…. तब जा कर दिन लौटते हैं… जैसे देश की आत्मा श्री राम मंदिर निर्माण…..

फिर एक दिन….. मालवा पर मराठों का अधिकार हुआ। बंगाल विजय को निकले राणोजी सिंधिया उज्जयनी में रुके और देखा उस भग्न मन्दिर को। उसी क्षण अपने समस्त अधिकारियों और उज्जयनी के व्यापारियों को बुलाया और पूछा- लज्जा आती है….?

किसी ने कोई उत्तर नहीं दिया। पर कुछ महीनों बाद जब राणोजी सिंधिया बंगाल जीत कर लौटे तो महाकाल का भव्य मंदिर खड़ा था। यह इतिहास है…

    

मर चुकी समस्त परम्पराओं का पुनर्जन्म हुआ…. महाकाल की सवारी निकलने लगी…    उज्जयनी का वैभव लौट आया।

    

बाकी क्या बताना! महाँकाल मंदिर तो भारत का सबसे अधिक भीड़भाड़ वाले तीर्थों में से एक है…. सब तो आप जानते ही हैं। तो जब सम्भव हो, घूम आइये… देख आइये कि दिन 500 वर्षों बाद भी लौटते हैं तो कैसे लौटते हैं……🚩 🚩 🚩

हर हर महादेव – ॐ नमः शिवाय – हर हर महादेव……….

🚩 🚩 🙏 🙏

Share This Article
×