
जामवंत चिरंजीवी हैं इनका वर्णन सतयुग, त्रेतायुग और द्वापरयुग में मिलता है। जामवंत का बल इस प्रकार है-
अपार समुद्र को पार करके सीता का पता लगाना था , समुद्र की विपुलता देखकर सभी सोच में पड़ गए। तब जामवंत बोलते हैं—
जबहिं त्रिबिक्रम भए खरारी , तब मैं तरुन रहेऊ बल भारी।।
जामवंत कहते हैं जब खरारि के शत्रु ( श्रीराम) ने वामन अवतार लिया था तब मैं जवान था और मुझमें बहुत बल था।
बलि को बांधते समय प्रभु इतना बढ़े की उस शरीर का वर्णन नहीं किया जा सकता लेकिन मैंने सिर्फ दो घड़ी में दौड़कर उस शरीर की सात प्रदक्षिणा कर ली।
रावण और जामवंत का युद्ध —
देखि भालुपति निज दल घाता , कोपि माझ उर मारेसि लाता।।
भावार्थ — जाम्बवान ने अपने दल का विध्वंस देखकर क्रोध करके रावण की छाती में लात मारी।
उर लात घात प्रचंड लागत बिकल रथ ते महि परा।
छाती पर जामवंत के लात का प्रचंड आघात लगते ही रावण व्याकुल होकर रथ से पृथ्वी पर गिर पड़ा। रावण को मूर्छित करके जामवंत श्रीराम के पास चले गए।
तो जामवंत इतने शक्तिशाली थे कि महाबली रावण को भी एक प्रहार से मूर्छित कर देते हैं।
जामवंत और श्रीकृष्ण का युद्ध —
श्रीकृष्ण जब स्यांतक मणि लेने वन में जाते हैं तो उनका युद्ध महाबली जामवंत से होता है। यह युद्ध 28 दिनों तक चला था। जब जामवंत युद्ध में हारने लगे तब उन्होंने अपने आराध्य देव श्रीराम को पुकारा। उनकी पुकार सुनकर श्रीकृष्ण को श्रीराम रुप में आना पड़ा। जामवंत इतने बलशाली थे कि भगवान को भी उनसे 28 दिनों तक युद्ध करना पड़ा।
जामवंत का जन्म : चिरंजिवी जामवंत अग्नि के पुत्र हैं, इनका जन्म देवासुर संग्राम में देवताओं की सहायता करने के लिए हुआ था। जामवंत जी बहुत विद्वान हैं, निरंतर स्वाध्यायशीलता के कारण इन्हें लंबा जीवन मिला है। इन्हें ब्रह्म जी का पुत्र भी कहा गया है जिन्हें श्रीराम की सहायता के लिए पृथ्वी पर भेजा गया। द ग्रेट बियर तारामंडल इनका निवास स्थान हो सकता है इस तारा मंडल के बारे में बहुत सी दंत कथाएं यूनान में और प्राचीन भारत में प्रचलित हैं।