
🔱 अष्ट भैरव और उनके उपभैरव (कुल ६४ भैरव)
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🛕(१). असितांग भैरव मंडल (पूर्व दिशा के अधिपति)
♦️१. असितांग भैरव
♦️२. महाकाल भैरव
♦️३. रक्त भैरव
♦️४. खड्ग भैरव
♦️५. कालभैरव
♦️६. कराल भैरव
♦️७. त्रिशूल भैरव
♦️८. पाश भैरव
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🛕(२). रुरु भैरव मंडल (आग्नेय दिशा)
♦️९. रुरु भैरव
♦️१०. भीषण भैरव
♦️११. शूल भैरव
♦️१२. कपाली भैरव
♦️१३. शंख भैरव
♦️१४. धन्विन भैरव
♦️१५. नील भैरव
♦️१६. क्रूर भैरव
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🛕(३). चण्ड भैरव मंडल (दक्षिण दिशा)
♦️१७. चण्ड भैरव
♦️१८. करालदंष्ट्र भैरव
♦️१९. दंष्ट्र भैरव
♦️२०. संहारक भैरव
♦️२१. दण्ड भैरव
♦️२२. कालाग्नि भैरव
♦️२३. विकट भैरव
♦️२४. उग्रभैरव
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🛕(४). क्रोध भैरव मंडल (नैऋत्य दिशा)
♦️२५. क्रोध भैरव
♦️२६. ज्वालामुख भैरव
♦️२७. दाहक भैरव
♦️२८. भीषणकाय भैरव
♦️२९. महाकाय भैरव
♦️३०. ज्वलन भैरव
♦️३१. भयंकर भैरव
♦️३२. दर्पण भैरव
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🛕(५). उन्मत्त भैरव मंडल (पश्चिम दिशा)
♦️३३. उन्मत्त भैरव
♦️३४. मदन भैरव
♦️३५. हर्ष भैरव
♦️३६. प्रमत्त भैरव
♦️३७. हाहाकार भैरव
♦️३८. जलद भैरव
♦️३९. हर्षण भैरव
♦️४०. उत्तान भैरव
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🛕(६). कपाल भैरव मंडल (वायव्य दिशा)
♦️४१. कपाल भैरव
♦️४२. मूण्ड भैरव
♦️४३. रक्तकपाल भैरव
♦️४४. श्मशान भैरव
♦️४५. चर्म भैरव
♦️४६. स्थूलकपाल भैरव
♦️४७. कृशानु भैरव
♦️४८. भीषणकपाल भैरव
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🛕(७).भीषण भैरव मंडल (उत्तर दिशा)
♦️४९. भीषण भैरव
♦️५०. स्थूल भैरव
♦️५१. क्रूरमुख भैरव
♦️५२. विकराल भैरव
♦️५३. दृढ़ भैरव
♦️५४. घोर भैरव
♦️५५. विकटमुख भैरव
♦️५६. घोरानन भैरव
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🛕(८). संहार भैरव मंडल (ईशान दिशा)
♦️५७. संहार भैरव
♦️५८. कालसंहार भैरव
♦️५९. मृत्युंजय भैरव
♦️६०. कालान्तक भैरव
♦️६१. शत्रु संहारक भैरव
♦️६२. दुष्ट संहारक भैरव
♦️६३. ग्रह संहारक भैरव
♦️६४. पाप संहारक भैरव
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📌 विशेष जानकारी
प्रत्येक मंडल में १ मुख्य भैरव और उनसे उत्पन्न ७ उपभैरव माने जाते हैं।
कुल = ८ × ७ = ६४ भैरव।
इनका अधिष्ठान दिशाओं और शक्तियों के आधार पर है।
अष्ट भैरव मूल रक्षक और दिग्पाल हैं, जबकि उनके उपभैरव विभिन्न कार्यों (संहार, रक्षा, रोगनाश, शत्रु-विनाश, तांत्रिक सिद्धि, वशीकरण आदि) के अधिकारी हैं।
🔱 १. रुद्रयामल तंत्र — ६४ योगिनी के रक्षक ६४ भैरव
📜 रुद्रयामल तंत्र (योगिनी-भैरव पटल)
मूल श्लोक
*🔴चतुःषष्टिर्महायोगिन्यो देव्यः शक्तिस्वरूपिणीः।*
*🔴तासां रक्षणहेतोस्तु चतुःषष्टिर्भैरवाः स्मृताः॥*
भावार्थ
६४ महायोगिनियाँ देवी की शक्तियाँ हैं,
और उनकी रक्षा के लिए ६४ भैरव नियुक्त किए गए हैं।
➡️ यह श्लोक ६४ योगिनी = ६४ भैरव सम्बन्ध का मूल आधार है।
🔱 २. ब्रह्मयामल (पिक्कल तंत्र) — योगिनी-भैरव युग्म सिद्धान्त
📜 ब्रह्मयामल तंत्र
मूल श्लोक
*🔴योगिन्यः शक्तिरूपेण भैरवाः शिवरूपिणः।*
*🔴एकैकस्याः समायुक्तो भैरवो नात्र संशयः॥*
भावार्थ
योगिनियाँ शक्ति-स्वरूप हैं
और भैरव शिव-स्वरूप।
प्रत्येक योगिनी के साथ एक भैरव निश्चित है —
इसमें कोई संशय नहीं।
➡️ यहाँ एक-से-एक (१:१) सम्बन्ध स्पष्ट है।
🔱 ३. योगिनी तंत्र — चक्र व्यवस्था
📜 योगिनी तंत्र
मूल श्लोक
*🔴चक्रे चतुःषष्टियोगिन्यः चतुःषष्टिश्च भैरवाः।*
*🔴परस्परसमायुक्ता रक्षासिद्धिप्रदायिनी॥*
भावार्थ
योगिनी-चक्र में ६४ योगिनियाँ
और उनके साथ ६४ भैरव होते हैं।
वे परस्पर संयुक्त होकर
रक्षा और सिद्धि प्रदान करते हैं।
➡️ यही योगिनी-चक्र है,
जिस पर ६४ भैरव की साधना आधारित है।
🔱 ४. कुलार्णव तंत्र — भैरव बिना योगिनी निष्फल
📜 कुलार्णव तंत्र (उल्लास ९)
मूल श्लोक
*🔴भैरवं वर्जयेद् यस्तु योगिनीं पूजयेत् नरः।*
*🔴न सिद्धिर्न च निर्वाणं तस्य स्यात् कुलमार्गतः॥*
भावार्थ
जो व्यक्ति भैरव को छो़ड़कर केवल योगिनी की पूजा करता है,
उसे न सिद्धि मिलती है,
न मुक्ति।
➡️ यह श्लोक बताता है कि
योगिनी–भैरव अविभाज्य युग्म हैं।
🔱 ५. रुद्रयामल — अष्टभैरव से ६४ भैरव
📜 रुद्रयामल तंत्र
मूल श्लोक
*🔴असिताङ्गादयः प्रोक्ता अष्टौ भैरवसत्तमाः।*
*🔴प्रत्येकस्याष्टधा भेदाः चतुःषष्टिः प्रकीर्तिताः॥*
भावार्थ
असितांग आदि आठ श्रेष्ठ भैरव हैं।प्रत्येक के आठ-आठ भेद हैं,
इस प्रकार कुल ६४ भैरव माने गए हैं।
➡️ यही संख्या आगे
६४ योगिनी-चक्र से जोड़ी जाती है।
🔱 ६. तंत्रसार (अभिनवगुप्त) — दार्शनिक सिद्धान्त
📜 तंत्रसार
मूल श्लोक
*🔴शक्तयः चतुःषष्टिस्तु भैरवे पर्यवस्थिताः।*
*🔴योगिन्यस्ताः समाख्याताः भैरवोऽपि तथाविधः॥*
भावार्थ
भैरव तत्त्व में ६४ शक्तियाँ स्थित हैं।
वही शक्तियाँ योगिनी कही जाती हैं,
और उनका अधिष्ठाता भैरव है।
🕉️ शास्त्रीय निष्कर्ष (स्पष्ट रूप में)
तत्त्वसंख्या सम्बन्ध योगिनी
६४ शक्ति-स्वरूप भैरव६४ शिव-स्वरूप सम्बन्ध
१ : १ रक्षक–शक्ति अधिपति कालभैरवे सर्वाध्यक्ष
➡️ योगिनी बिना भैरव = निष्फल साधना
➡️ भैरव बिना योगिनी = अधूरी शक्ति
🔚 काशीपुरी से सम्बन्ध
काशी = महायोगिनी क्षेत्र
कालभैरव = ६४ भैरवों के अधिपति इसलिए काशीपुरी में
👉 ६४ योगिनी–६४ भैरव सिद्धान्त पूर्णतः जीवित परम्परा है
1️⃣ काशी खण्ड (स्कन्दपुराण) — भैरव काशी-रक्षक रूप
📜 ग्रन्थ
स्कन्दपुराण – काशी खण्ड
(विशेषतः: अध्याय २९,३३,३४, ५८–६०)
🔱 प्रमाण
श्लोक भावार्थ (काशी खण्ड ३३)
*🔴“काशी क्षेत्रं महापुण्यं भैरवैः परिरक्षितम्”*
➡️ काशी क्षेत्र भैरवों द्वारा सर्वतः सुरक्षित है।
🕉️ कालभैरव अधिपति प्रमाण
काशी खण्ड २९.४५ (भावार्थ)
“कालभैरव को काशी का कोतवाल नियुक्त किया गया,
बिना उनकी आज्ञा के कोई भी काशी में वास नहीं कर सकता।”
➡️ इससे स्पष्ट है कि सभी भैरव कालभैरव के अधीन हैं।
🔢 बहुवचन भैरव संकेत
काशी खण्ड ५८ (भावार्थ)
“भिन्न-भिन्न दिशाओं, मार्गों और शक्तिपीठों में
भैरव अनेक रूपों में स्थित हैं।”
➡️ यहाँ एक नहीं, अनेक भैरवों की स्पष्ट स्वीकृति है
(यही आधार ६४ भैरव परम्परा का काशी-स्रोत है)।
2️⃣ रुद्रयामल तंत्र — अष्टभैरव × अष्टशक्ति = ६४ भैरव
📜 ग्रन्थ
रुद्रयामल तंत्र
(उत्तरभाग, भैरव-योगिनी-पटल)
🔱 अष्टभैरव प्रमाण
रुद्रयामल तंत्र (भावार्थ)….
*🔴“असिताङ्गश्च रुरुश्च चण्डः क्रोधस्तथैव च।*
*🔴उन्मत्तः कपालश्च भीषणः संहार एव च॥”*
➡️ यह अष्टभैरवों की मूल सूची है।
🔢 ६४ भैरव का तांत्रिक सूत्र
रुद्रयामल (भावार्थ)
“प्रत्येक भैरवस्याष्टधा शक्तिरूपविस्तरः”
➡️ प्रत्येक अष्टभैरव का आठ-आठ रूपों में विस्तार
➡️ ८ × ८ = ६४ भैरव
🔗 योगिनी संबंध
रुद्रयामल
*🔴“योगिनीनां रक्षणार्थं चतुःषष्टिर्भैरवाः स्मृताः”*
➡️ ६४ योगिनियों के रक्षक = ६४ भैरव
➡️ यही संख्या योगिनी चक्र से प्रमाणित होती है।
3️⃣ तंत्रसार (अभिनवगुप्त) — ६४ भैरव सिद्धान्त
📜 ग्रन्थ
तंत्रसार – आचार्य अभिनवगुप्त
(आह्निक ५ एवं ६)
🔱 भैरव-तत्त्व प्रमाण
तंत्रसार (भावार्थ)
*🔴“भैरवो नाम परमेश्वरः शक्तिभिः चतुःषष्ट्या*
विश्वरूपेण प्रकाशते”
➡️ भैरव ६४ शक्तियों के साथ विश्व में प्रकट होते हैं
➡️ यही ६४ भैरव का दार्शनिक आधार है।
🕉️ भैरव = क्षेत्रपाल सिद्धान्त
तंत्रसार
*🔴“क्षेत्रस्य पालकाः भैरवाः”*
➡️ हर क्षेत्र के पालक भैरव
➡️ महाक्षेत्र काशी = ६४ भैरवों द्वारा संरक्षित
4️⃣ कुल निष्कर्ष (शास्त्रीय समन्वय)
ग्रन्थ प्रमाण का प्रकार
काशी खण्ड काशी में अनेक भैरव, कालभैरव अधिपति रुद्रयामल अष्टभैरव + ८-८ विस्तार = ६४ तंत्रसार
६४ शक्ति/रूपों में भैरव तत्त्व
योगिनी तंत्र ६४ योगिनी = ६४ भैरव रक्षक
➡️ इन सभी को मिलाकर
👉 काशी में ६४ भैरव की परम्परा पूर्णतः शास्त्रसम्मत सिद्ध होती है।
5️⃣ काशी परम्परा का अंतिम वचन
काशी खण्ड + तंत्र परम्परा
= श्लोक से कम, जीवित साधना से अधिक प्रमाण इसी कारण काशी में आज भी—
कालभैरव कोतवाल
अनेक भैरव चौक, पीठ, लिंग
६४ भैरव परिक्रमा (गुरु-परम्परा से)चलित है।
*1. असितंग भैरव:* यह पूर्व दिशा की रक्षा करता है, जो पवित्रता का प्रतीक है।
*2. रुरु भैरव:* दक्षिण-पूर्व दिशा को नियंत्रित करते हैं, जो इच्छाओं पर नियंत्रण का प्रतीक है।
*3. चंड भैरव :* दक्षिण पर शासन करते हैं और अज्ञानता का नाश करते हैं।
*4. क्रोध भैरव:* दक्षिण-पश्चिम दिशा की रक्षा करते हैं और अन्याय के विरुद्ध दैवीय क्रोध का प्रतीक हैं।
*5. उन्मत्त भैरव:* पश्चिम में, यह सांसारिक मोह से मुक्ति का प्रतीक है।
*6. कपाल भैरव:* उत्तर-पश्चिम में इनका संबंध मृत्यु और पुनर्जन्म से है।
*7. भीषण भैरव:* उत्तर दिशा की रक्षा करते हैं और नकारात्मकता को दूर करते हैं।
*8. संहार भैरव:* वे उत्तर-पूर्व के स्वामी हैं और समय (काल) का प्रतिनिधित्व करते हैं। ––––––––––––––––––––
भैरव का रमल विद्या से गहरा संबंध है
पौराणिक कथाओं के अनुसार, भैरव ने ही इस भविष्य बताने वाली विद्या *(रमल शास्त्र)* की शुरुआत की थी, जब भगवान शिव के सती वियोग के दौरान, भैरव ने शिव की सहायता के लिए चार बिंदुओं से इस विद्या को सिद्ध कर उन्हें सती का पता लगाने में मदद की थी। *भैरव तंत्र और रमल विद्या,* दोनों ही भारतीय तांत्रिक परंपराओं का अविभाज्य हिस्सा हैं और शक्ति, रक्षा, और आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए उपयोग किए जाते हैं, जिसमें भैरव विभिन्न रूपों में इन विद्याओं के संरक्षक और मार्गदर्शक माने जाते हैं, जैसे कि काल भैरव काशी के रक्षक हैं और भैरव साधना से राहु और नकारात्मक ऊर्जाओं से मुक्ति मिलती है