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गरुड़ पुराण पितृ तर्पण

पितृ शब्द की उत्पत्ति “पा रक्षणे”धातु से है। जो पालन या रक्षण करे वह पितृ है। इसका एकवचन रूप पिता = जन्म या पालन करने वाला पुरुष है। द्विवचन पितरौ का अर्थ माता-पिता है। बहुवचन पितरः का अर्थ सभी पूर्वज हैं। अतः यह कहना उत्तम होगा की हमारे सभी पूर्वज, हमारे वंश के सभी मृत व्यक्ति पितरों कि श्रेणी में आते हैं। ऋग्वेद में भी दिवंगत पूर्वजों के लिए पितर शब्द प्रयोग हुआ है।

 

ऋषिभ्यः_पितरो_जाताः_पितृभ्यो_देवदानवाः।

 

#देवेभ्यश्च_जगत्_सर्वं_चरं_स्थाण्वनुपूर्वशः॥

 

(मनुस्मृति, ३/२०१)

ऋषियों से पितर हुए, पितरों से देव-दानव, देवों से पूरा जगत् हुआ। जगत् में अनुपूर्वशः चर और स्थाणु लिखा है। यह निश्चित रूप से मनुष्य या अचर नहीं है जो आगे पीछे के क्रम से हों (अनुपूर्वशः)। इसमें चर-अचर का कोई निश्चित क्रम नहीं है। जो आज चर है, वह प्राण या शक्ति समाप्त होने पर अचर हो जायेगा।

ऋग्वेद में पितृगण निम्न, मध्यम एवं उच्च तीन श्रेणियों में व्यक्त हुए हैं।

स्मृतियों और पुराणों में पिता को वसु, पितामह को रुद्र तथा प्रपितामह को आदित्य स्वरूप पितर माना है।

हिरण्यगर्भ के पुत्र मनुजी के जो मरीचि आदि पुत्र हैं, उन सब ऋषिओं के पुत्र ही पितर है

 विराट के पुत्र सोमसद साध्यगण के पितर हैं। मरीचि के प्रसिद्ध पुत्र अग्निष्वाता देवताओं के पितर हैं।

अत्रि के पुत्र बर्हिषद दैत्य, दानव, यक्ष, गंदर्भ, नाग, राक्षस, सुपर्ण और किन्नरों के पितर हैं।

ब्राह्मणों के पितर सोमप, क्षत्रियों के हविष्मन्त, वैश्यों के आज्यप और शूद्रों के सुकलिन हैं।

 सोमप भृगु के, हविष्मन्त अङ्गिरा के, आज्यप पुलस्त्य के और सुकालिन वशिष्ठ के पुत्र हैं।

 अग्निदध, अनग्निग्ध, काव्य, बर्हिषद, अग्निष्वात्ता और सौम्य ये ब्राह्मणों के पितर हैं।

पितरों के जो इतने मुख्य गण हैं उनके भी असंख्य पुत्र पौत्रादि हैं।

मघा नक्षत्र के पितर देवता हैं।

विश्व का मूल स्रोत आदित्य था जिससे ३ धामों का निर्माण का आदि हुआ। उत्तम धाम का आदित्य अर्यमा (ब्रह्माण्डों के बीच का स्थान का पदार्थ) है। ब्रह्माण्ड का आदित्य वरुण (ताराओं के बीच का पदार्थ) है, यह मद्य है, अतः वारुणि का अर्थ मद्य है-ऋक् १/१५४/४)। सौर मण्डल का आदित्य मित्र है जो ग्रहों के बीच का पदार्थ है। आर्यमा, वरुण, मित्र-ये ३ धामों के पितर हुए।

अतः सबसे बड़े धाम के पितर अर्यमा को भगवान् ने अपना रूप कहा है ।

मित्रो ये पितरों के महत्व को समझने के लिए है, विस्तार भय से इतना ही।

अस्तु,

पितृ पक्ष में सार्वजनिक रूप से पितृ दोष शांति के लिए गरुड़ पुराण, पितृ तर्पण,  12,13,14  अक्टूबर 2023 को नर्मदा तट पर तर्पण, पंचबली, पिंडदान के साथ अनुष्ठान का भी आयोजन किया जाएगा, इसका मुख्य उद्देश्य ये है की धन की कमी या अन्य कारणो से हम पितृ यज्ञ नही कर पाते जिस कारण हमे अन्य समस्याएं  का सामना करना पड़ता है, इस सब का एक छोटा सा शुल्क रखा गया है, परंतु जो वह भी देने में असमर्थ हो उन सब का भी पूरे मन से स्वागत है,

बस अपनी श्रद्धा विश्वास के साथ उपस्थित रह कर / ऑनलाइन रहकर लाभ उठाए।

आने वाला वर्ष आपको बताएगा की इसका प्रत्यक्ष लाभ क्या है।

ये हमारा धर्म है की हम अपने पितरों को प्रसन्न रखे।

ये आवश्यक नही है की जब दोष लगे तब ही ये किया जाए,

यदि हम नियम पूर्वक इसका पालन करते है तो निश्चित रूप से जीवन स्वयं का ही नही बल्कि पूरे परिवार को खुशहाली और उन्नति की तरफ ले जाने में ये महत्वपूर्ण कदम होगा।

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