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गंडमूल नक्षत्र : रहस्य, आध्यात्मिक आधार, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और वास्तविक उपाय

वैदिक ज्योतिष के अनुसार जो सत्ताईस नक्षत्र हैं, इन सत्ताईस नक्षत्रों में छह नक्षत्रों को गंडमूल नक्षत्र की श्रेणी में रखा गया है। अब ये कौन-कौन से हैं? तो आप सभी जानते हैं — अश्विनी, रेवती, आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा और मूल। इसमें तीन नक्षत्र केतु के हैं और तीन नक्षत्र बुध के हैं। इन छह नक्षत्रों के पीछे गहरा वैज्ञानिक और आध्यात्मिक आधार छुपा हुआ है। हमारे बुजुर्ग ऐसे ही इनसे नहीं डरते थे, हालांकि इसमें डरने जैसा नहीं, समझने का विषय है — जैसे मैंने मांगलिक की चर्चा की थी, ठीक वैसे ही।

 

अश्विनी नक्षत्र के जो अधिष्ठाता देवता हैं, वे अश्विनी कुमार हैं। ये दो जुड़वां भाई हैं, जिनके नाम नासत्य और दस्र हैं। ये सूर्यदेव और उनकी पत्नी संज्ञा के पुत्र हैं। अश्विनी कुमार देवताओं के वैद्य कहे गए हैं। ये चिकित्सा, विज्ञान, आयुर्वेद और नवजीवन के प्रदाता माने गए हैं। इनकी कृपा से रोगों का नाश होता है और नई ऊर्जा का संचार होता है। यानी जो लोग अश्विनी नक्षत्र में पैदा होते हैं, उनके भीतर भी कहीं न कहीं ये गुण विद्यमान होते हैं। ये अपनी दिव्य शक्तियों से मृतकों को भी जीवन दे सकते हैं।

वहीं आश्लेषा नक्षत्र — इसके देवता सर्प हैं और यह अत्यंत रहस्यमय और शक्तिशाली नक्षत्र है। क्यों? क्योंकि सर्प केवल जीव नहीं, बल्कि कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक है। ये गुप्त ज्ञान, तंत्र विद्या और आध्यात्मिक शक्तियों के स्वामी हैं। नागों की ऊर्जा में विनाश और सृजन — दोनों की असीम शक्ति छुपी हुई है। और मैं कह सकती हूं कि यह नक्षत्र व्यक्ति को गहरी अंतर्दृष्टि, रहस्यों को समझने की क्षमता और तत्वज्ञान प्रदान करने वाला है। देखा जाए तो वास्तव में यह नक्षत्र उन्हें ही मिलता है जिन्हें जीवन में कोई विशेष आध्यात्मिक मिशन पूरा करना हो।

 

मघा — यह नक्षत्र पितृ सत्ता से जुड़ा हुआ है। मघा नक्षत्र के देवता पितरों को कहा गया है, यानी हमारे पूर्वज। पितरों का अर्थ है वे महान आत्माएं जो भौतिक शरीर छोड़कर सूक्ष्म जगत में निवास कर रही हैं, लेकिन अपने वंशजों की रक्षा और उनका मार्गदर्शन कर रही हैं। यह नक्षत्र पैतृक संस्कारों, कुल परंपरा और वंश की गरिमा से जुड़ा हुआ है। हमारे पूर्वजों का जो आशीर्वाद है, उसी से इसका संबंध माना गया है। मघा नक्षत्र में जन्मे लोग निस्संदेह अपने कुल का नाम रोशन करने की प्रेरणा प्राप्त करते हैं और कहीं न कहीं ये लोग राजसी प्रवृत्ति के तो होते ही हैं, नेतृत्व क्षमता भी इनके अंदर खूब होती है।

 

ज्येष्ठा नक्षत्र के अधिष्ठाता देवता इंद्र हैं। देवराज इंद्र साहस, शक्ति, नेतृत्व और विजय के प्रतीक हैं। “ज्येष्ठा” शब्द का अर्थ ही है — ज्येष्ठ अर्थात सबसे बड़ा, श्रेष्ठ। यह नक्षत्र वीरता, पराक्रम और श्रेष्ठता की भावना जागृत करता है। इंद्र की कृपा से व्यक्ति को मान, सम्मान, धन, वैभव और सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। यह नक्षत्र राज्य, शासन और उच्च अधिकारों से जुड़ा हुआ माना जाता है।

 

और मूल — इसी को अभुक्तमूल भी कहा गया है। यही वह विशेष नक्षत्र है जिसकी देवी निरृति हैं। मूल नक्षत्र की अधिष्ठात्री देवी निरृति हैं, जिन्हें विनाश या विघटन की शक्ति कहा गया है। लेकिन यहां ध्यान से समझिए — यहां विनाश का अर्थ नकारात्मकता से नहीं है। यहां उसी तरह का विनाश है जैसे एक किसान खेत से पुरानी फसल को काटता है, फिर धरती को खोदता है और उसमें बची हुई अनुपयोगी चीजों को निकालकर बाहर फेंकता है। यानी खेत की सफाई करता है, फिर नई बुवाई करता है। निरृति वही हैं — जो अनुपयोगी और हानिकारक चीजों का नाश करती हैं और जो नया और श्रेष्ठ है उसकी स्थापना करती हैं। यानी एक पवित्र कार्य, जिसे नवसृजन कहा जाएगा। मूल नक्षत्र के व्यक्ति में भी परिवर्तन लाने की अद्भुत शक्ति होती है।

 

और रेवती — इसके देवता पूषा हैं। ये देवता यात्रा, मार्गदर्शन, पोषण और सुरक्षा के स्वामी हैं। ये पशुओं के रक्षक के रूप में भी माने जाते हैं। रेवती का अर्थ धनवान या समृद्ध होता है। पूषा देवता भटके हुए राहगीरों को रास्ता दिखाने वाले और उन्हें मंजिल तक पहुंचाने वाले कहे गए हैं। यह नक्षत्र यात्रा, व्यापार और कृषि से संबंधित कार्यों में सफलता दिलाता है। रेवती नक्षत्र के व्यक्ति दयालु, उदार और परोपकारी प्रवृत्ति के होते हैं।

 

अब प्रश्न उठता है कि गंडमूल नक्षत्रों को अशुभ क्यों कहा गया?

 

अब यह मुख्य प्रश्न आता है कि इसके पीछे क्या तर्क है? तो इसके पीछे गहरा और वैज्ञानिक ज्योतिषीय कारण छुपा हुआ है — और वह कारण है “संधि” का।

 

संधिकाल की विशेषता पहले समझिए। ये जो छह नक्षत्र हैं, ये उन स्थानों पर आते हैं जहां दो राशियां आपस में मिलती हैं। जैसे रेवती और अश्विनी में मीन राशि की समाप्ति और मेष राशि की शुरुआत होती है। यानी यहां मिलन बिंदु है। वैसे ही आश्लेषा और मघा में कर्क राशि की समाप्ति और सिंह राशि की शुरुआत होती है। वहीं ज्येष्ठा और मूल में वृश्चिक का समापन और धनु की शुरुआत होती है।

 

कुल मिलाकर शास्त्रों में संधिकाल को एक नाजुक समय माना गया है। जैसे सुबह और शाम — यानी गोधूलि काल — जहां दिन और रात का मिलन होता है। ऋतु परिवर्तन के समय भी ऐसा ही होता है। यदि ध्यान से देखें तो ऋतु परिवर्तन के समय आमतौर पर लोगों की तबीयत खराब होने लगती है। डॉक्टर भी कहते हैं — “मौसम बदल रहा है, ध्यान रखिए।” क्योंकि उस समय ऊर्जाओं में परिवर्तन होता है, वातावरण अस्थिर हो जाता है।

 

इसे हम ऐसे भी समझ सकते हैं कि ये सभी नक्षत्र राशिचक्र के उन सीमावर्ती बिंदुओं पर स्थित हैं जहां एक जल राशि का अंत और अग्नि राशि का प्रारंभ होता है। यानी जहां अग्नि का उत्साह जल में डूबने लगता है। इस गंडांत पर प्रकृति स्वयं असमंजस में पड़ जाती है कि पुराना चक्र समापन पर है और नया अभी आकार नहीं ले पाया है। यदि कोई जीवचक्र इस बिंदु पर आकर आरंभ होगा, तो उस आत्मा में अपरिभाषित त्वरा और अनगढ़ वेग जन्मजात होगा।

 

एक और उदाहरण से समझिए — जब किसी ऐसी राह पर हम गाड़ी चला रहे हों जहां दो रास्ते आपस में जुड़ रहे हों, वहां मजबूरन गाड़ी धीमी करनी पड़ती है। यह वही जगह है जहां दो रास्ते मिलते हैं। इसीलिए इसे गंडांत कहा गया है। ब्रह्मांडीय ऊर्जा में बदलाव यहीं पर होता है। कई बार इस समय में नकारात्मक शक्तियां अधिक सक्रिय हो जाती हैं। यह बिल्कुल वैसे ही है जैसे मौसम बदलने के समय रोगकारक जीवाणु अधिक सक्रिय हो जाते हैं और बीमारी का खतरा बढ़ जाता है।

 

संधिकाल में वातावरण की अस्थिरता के कारण व्यक्ति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। गंडमूल नक्षत्र में जन्मे लोगों पर इसका प्रभाव अलग-अलग तरीके से दिखाई पड़ता है। जैसे — स्वास्थ्य समस्या, पारिवारिक कलह, मानसिक अशांति अथवा चरण के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार की परेशानियां। अर्थात हर व्यक्ति पर गंडमूल का प्रभाव अलग-अलग होता है।

 

अब उपाय

 

परंतु यहां ध्यान दीजिएगा —

 

नंबर एक: जो नवजात बच्चे अभी पैदा होंगे, उनके लिए ये उपाय नहीं है, उनके लिए प्रचलित विधि से मूलशांति ही उपाय है।

 

नंबर दो: ज्योतिष में कई तरह की भ्रांतियां हैं, उनमें से एक भ्रांति यह भी है कि पच्चीस, सत्ताईस या पचास वर्ष का कोई व्यक्ति जीवन में कष्ट आने पर किसी आचार्य के पास जाता है और उन्हें कहा जाता है — “तुम्हारा तो मूल नक्षत्र है, उस समय शांति नहीं हुई थी, अब शांति कराओ।”

 

प्रश्न उठता है — क्या यह वैसा नहीं है कि रोग पच्चीस साल पहले था और दवाई आज कराई जा रही है? हालांकि यह रोग नहीं था, परंतु यह बिल्कुल ऐसा है जैसे कोरोना काल में जन्म लिए बच्चे की इम्यूनिटी कमजोर हो और उसे पच्चीस साल बाद टीका लगवाने को कहा जाए। इसका क्या औचित्य बनता है?

 

वैसे ही, अब उम्र के इस पड़ाव पर इसका कोई विशेष अर्थ नहीं रह जाता। यहां ऊर्जा परिवर्तन होता है। यह जो गंडांत दोष माना गया है, यह असल में ऊर्जा का खेल है — संधिकाल और ऊर्जा परिवर्तन का, यानी जल तत्व और अग्नि तत्व का मिलन बिंदु। जल और अग्नि में कोई संबंध नहीं हो सकता, इसलिए यह ऐसा समय है जिसका प्रभाव नवजात शिशु पर अधिक पड़ता है।

 

इसी की शांति के लिए कई प्रकार की विधियां बताई गई हैं। जैसे — पिता को सत्ताइस दिन तक बच्चे को देखने से वर्जित करना। इसका वास्तविक अर्थ बच्चे को अत्यधिक सुरक्षा देना है।

 

कुल मिलाकर ये उपाय उन लोगों के लिए नहीं हैं जो अधिक उम्र के पड़ाव पर पहुंच चुके हैं। जो बच्चे जन्म लेते हैं, उनके लिए सत्ताइस दिन पूर्ण होने पर जब वही नक्षत्र पुनः लौटकर आता है, तब उस नक्षत्र की पूजा, स्नान, हवन आदि कराया जाता है — वही उचित प्रक्रिया है।

 

परंतु यदि आपकी उम्र अधिक हो चुकी है और फिर भी किसी पंडित जी ने कह दिया और आप मन में भ्रम पाल बैठे हैं, तो —

 

यदि आपका जन्म अश्विनी नक्षत्र में हुआ है, तो आपके लिए एक मूल उपाय है कि आपको तांबे के पात्र से जल सेवन करना चाहिए और साथ ही चिकित्सकीय सेवा में जुड़े रहना चाहिए। इससे इस नक्षत्र से संबंधित परेशानियां कम होती हैं।

 

यदि आपका जन्म आश्लेषा नक्षत्र में हुआ है, तो भोलेनाथ के गले में विराजमान नाग को विशेष रूप से दूध से अर्घ्य अर्पित कीजिए और सर्प संरक्षण में कुछ योगदान कर सकते हैं तो अवश्य कीजिए।

 

जो लोग मघा में जन्मे हैं, वे पितृपक्ष में विशेष रूप से पितरों की कृपा हेतु श्राद्ध करें, तर्पण करें और पूर्वजों की स्मृति में दान करें।

 

ज्येष्ठा नक्षत्र वाले अपने जीवनकाल में कृषि कार्य अवश्य करें अथवा कृषि कार्य में योगदान दें।

 

मूल नक्षत्र वाले शक्ति की उपासना करें। मां भगवती, जगज्जननी की आराधना करें।

 

और रेवती नक्षत्र वाले नित्य भुवन भास्कर की आराधना करें। हो सके तो पशु सेवा और पशु संरक्षण में सहायता अवश्य करें।

 

इसके अलावा अधिक उम्र हो जाने पर किसी विशेष शांति की आवश्यकता नहीं है।

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