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आपकी और व्यापार में हानि लाभ

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 14, श्लोक 1

धनं वित्तं कुटुम्बं च कोषं धान्यं च भोजनम्। द्वितीयभावतो विद्याद् व्यापारं दशमात् पुनः॥

दूसरे घर से धन, वित्त, परिवार, खजाना, अनाज और भोजन के बारे में जानें। वहीं, दसवें घर से व्यापार के बारे में जानें।

व्यापार को देखने का प्रधान स्थान दसवाँ भाव माना गया है, जबकि धन-संग्रह का विचार दूसरे भाव से और लाभ-आगमन का विचार ग्यारहवें भाव से किया जाता है। जब दसवाँ भाव अपने आप में सशक्त हो, उसका स्वामी केंद्र अथवा त्रिकोण में जाकर बैठे, और उस पर बुध, शुक्र या गुरु की युति या दृष्टि पड़ रही हो, तब व्यापार में स्थिर और सम्मानजनक सफलता प्राप्त होती है। यदि दूसरे भाव के स्वामी और ग्यारहवें भाव के स्वामी दोनों का किसी भी प्रकार से दसवें भाव के स्वामी के साथ संबंध बन जाए, तो यह स्थिति धन की निरंतर वर्षा कराने वाली बन जाती है। साथ ही यदि लग्न का स्वामी भी बलवान अवस्था में हो, तो ऐसा जातक अपने बाहुबल और अथक परिश्रम से स्वयं अपना व्यापारिक साम्राज्य खड़ा कर लेता है।

फलदीपिका, अध्याय 6, श्लोक 14

कर्मेशे लाभगे वापि लाभेशे कर्मसंयुते। धनेशे च तदीशेन दृष्टे तद्भावगेपि वा॥

 

If lord of 10th is in 11th, or lord of 11th conjoins 10th, and lord of 2nd is aspected by its lord or placed in that sign.

 

जब कर्म स्थान का स्वामी लाभ स्थान में जाकर बैठे, अथवा लाभ स्थान का स्वामी कर्म स्थान में आकर युति करे, तो शास्त्र इसे महाधन योग कहता है, और ऐसी स्थिति में व्यापार से करोड़ों तक की आय संभव मानी गई है। यदि धन भाव का स्वामी अपनी स्वराशि, उच्च राशि या मित्र राशि में स्थित हो और वहाँ से दसवें भाव पर दृष्टि डाल रहा हो, तो व्यक्ति की वाणी ही धन बन जाती है, मार्केटिंग, संवाद और प्रस्तुति से विशेष लाभ मिलता है। बुध का दसवें भाव में होना व्यापारिक बुद्धि को तीक्ष्ण करता है, हिसाब-किताब में पक्कापन लाता है, और कमीशन, एजेंसी तथा मध्यस्थता के कार्यों में उन्नति देता है। शुक्र का दसवें में आना वस्त्र, आभूषण, सौंदर्य प्रसाधन, लग्जरी वस्तुएँ और वाहन संबंधी व्यापार को विशेष चमक प्रदान करता है।

 

सारावली, अध्याय 32, श्लोक 25

बुधे कर्मगते वापि कर्मेशे बुधसंयुते। वाणिज्येन भवेद् वृद्धिः सत्यं ज्ञेयं द्विजोत्तम॥

 

If Mercury is in 10th, or lord of 10th conjoins Mercury, increase through commerce is certain, know this truth O best of Brahmins.

 

बुध को शास्त्रों में व्यापार का नैसर्गिक कारक कहा गया है। इसलिए बुध का दसवें भाव में बैठना, दसवें भाव के स्वामी का बुध के साथ युति करना, अथवा बुध का स्वयं लाभ भाव में स्थित होना, इन तीनों में से कोई भी स्थिति व्यक्ति को जन्मजात व्यापारी बनाती है। यदि दसवें भाव में मिथुन या कन्या राशि पड़ रही हो, तो ट्रेडिंग, शेयर बाजार, लेखांकन, कमीशन आधारित कार्य और आयात-निर्यात के क्षेत्र में विशेष सफलता मिलती है। गुरु का दसवें में होना थोक व्यापार, शिक्षण संस्थान, स्वर्ण, पीली वस्तुएँ और परामर्श आधारित कार्यों से धन दिलाता है। शनि का दसवें में होना लोहा, तेल, भारी मशीनरी, फैक्ट्री संचालन और श्रमिक वर्ग के सहयोग से काम करने की प्रवृत्ति देता है, आरंभ में गति धीमी रहती है परंतु अंततः एक स्थायी और विशाल साम्राज्य खड़ा हो जाता है।

 

यदि दसवें भाव में मेष राशि हो और मंगल बलवान स्थिति में हो, तो भूमि, भवन निर्माण, होटल व्यवसाय, अग्नि और लोहे से जुड़े कार्य तथा मिलिट्री सप्लाई जैसे क्षेत्रों में लाभ मिलता है, स्वभाव में तेजी रहती है और व्यक्ति जोखिम उठाने वाला व्यापारी बनता है। वृष राशि दसवें में हो और शुक्र मजबूत हो, तो सौंदर्य, वस्त्र, आभूषण, होटल, वाहन, डेयरी उत्पाद और सुगंधित वस्तुओं का व्यापार फलता है, वातावरण आरामदायक बनता है और ग्राहक बार-बार लौटकर आते हैं। मिथुन राशि दसवें में हो और बुध बलवान हो, तो शेयर बाजार, अकाउंटिंग, कमीशन, मीडिया, ट्रांसपोर्ट और मोबाइल से जुड़े व्यापार में उन्नति होती है, यहाँ वाणी ही धन का माध्यम बनती है। कर्क राशि दसवें में हो और चंद्रमा शक्तिशाली हो, तो दूध, जल, होटल, यात्रा, शिपिंग और नर्सरी जैसे जनता से सीधे जुड़े कार्यों में लाभ होता है। सिंह राशि दसवें में हो और सूर्य बलवान हो, तो सरकारी ठेके, स्वर्ण, औषधालय और राजनीति से जुड़े व्यापार में नाम और प्रतिष्ठा बड़ी होती है। कन्या राशि दसवें में हो और बुध सशक्त हो, तो स्टेशनरी, औषधि, कंप्यूटर, सर्विस इंडस्ट्री और लेखन कार्य से धन आता है, व्यक्ति हिसाब में अत्यंत पक्का होता है। तुला राशि दसवें में हो और शुक्र बलवान हो, तो साझेदारी, फैशन, कानून, उपहार और संतुलन आधारित व्यापार में पार्टनर के माध्यम से लाभ मिलता है। वृश्चिक राशि दसवें में हो और मंगल बलवान हो, तो केमिकल, खनन, बीमा, गुप्त प्रकृति के व्यापार और अनुसंधान से धन मिलता है, यहाँ जोखिम बड़ा होता है तो लाभ भी बड़ा होता है। धनु राशि दसवें में हो और गुरु बलवान हो, तो शिक्षा, धर्म, कानून, बैंकिंग और विदेशी व्यापार में सलाह देने से धन प्राप्त होता है। मकर राशि दसवें में हो और शनि मजबूत हो, तो लोहा, तेल, कोयला, भवन निर्माण सामग्री, श्रमिक आधारित कार्य और कृषि संबंधी व्यापार से धीरे-धीरे व्यक्ति करोड़पति बनता है। कुंभ राशि दसवें में हो और शनि बलवान हो, तो तकनीक, बिजली, सामाजिक कार्य, नेटवर्क मार्केटिंग और पुराने सामान के व्यापार में अनोखे विचारों से धन आता है। मीन राशि दसवें में हो और गुरु बलवान हो, तो अस्पताल, आश्रम, जल, शिपिंग, विदेश संबंधी कार्य और दान-पुण्य से जुड़े क्षेत्रों में भाग्य का साथ मिलता है।

 

इनके साथ नक्षत्रों का संबंध भी फल बदलता है। अश्विनी का प्रभाव हो तो व्यक्ति नये काम की शुरुआत करने वाला, बाजार में पहला कदम रखने वाला व्यापारी बनता है। पुष्य नक्षत्र का संबंध पोषण देने वाले कार्य, किराना, अनाज और स्थायी प्रकृति के व्यापार को दर्शाता है। स्वाति नक्षत्र हवा, यात्रा, एजेंसी और स्वतंत्र रूप से किए जाने वाले व्यापार को बल देता है। अनुराधा नक्षत्र मित्रों के सहयोग से साझेदारी और संगठन बनाकर धन अर्जन कराता है। रेवती नक्षत्र विदेश, शिपिंग और अंतिम छोर तक डिलीवरी पहुँचाने वाले व्यापार में सफलता देता है।

 

महाभारत, उद्योग पर्व, अध्याय 37, श्लोक 17

न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः। तस्मात् पुरुषकारेण यतितव्यं न दैवतः॥

Deer do not enter the mouth of a sleeping lion. Therefore one should strive by human effort, not depend on fate.

 

राजा युधिष्ठिर ने द्यूत में अपना राज्य खो दिया था, परंतु वनवास में भी उन्होंने पुरुषार्थ का त्याग नहीं किया। अज्ञातवास के समय विराट नगर में मत्स्य देश के कार्य-व्यापार को उन्होंने ही संभाला था। इससे शिक्षा मिलती है कि दसवाँ भाव कर्म का प्रतिनिधित्व करता है। नवाँ भाव भाग्य है, परंतु दसवाँ भाव कर्म है। यदि भाग्य सोया हुआ भी हो, तो जागा हुआ कर्म उसे उठा देता है। व्यापारी को सोते रहना शोभा नहीं देता, उसे सिंह के समान सजग रहना चाहिए। धर्मराज ने सत्य के आधार पर व्यापार किया, इसीलिए अंत में उन्हें हस्तिनापुर का साम्राज्य पुनः प्राप्त हुआ। यदि व्यापार अधर्म से किया जाएगा, तो दुर्योधन की भांति सब कुछ मिट्टी में मिल जाएगा।

 

दसवाँ भाव कुंडली की छत के समान है। यदि छत मजबूत हो, तो पूरा घर सुरक्षित रहता है। यदि दसवें में पाप ग्रह बैठे हों, परंतु दसवें का स्वामी केंद्र में स्थित हो, तो आरंभ में संघर्ष के बाद भी सफलता निश्चित रूप से मिलती है। बुध यदि अस्त अवस्था में हो, तो हिसाब-किताब में धोखा होने की संभावना रहती है, इसलिए बार-बार पार्टनर बदलने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए। राहु का दसवें में होना विदेश, ऑनलाइन कार्य, राजनीति और छाया प्रकृति के व्यापार से अचानक लाभ दिलाता है, परंतु यदि केतु की दृष्टि भी पड़ रही हो, तो बदनामी का भय रहता है, इसीलिए कार्य को पूरी पारदर्शिता से करना चाहिए। शनि का दसवें में होना प्रायः छत्तीस वर्ष की आयु तक नौकरी कराता है, उसके बाद स्वयं का व्यापार आरंभ होता है, और वही व्यक्ति को करोड़पति बनने की दिशा में ले जाता है। चंद्रमा का दसवें में होना जनता से सीधे जुड़े कार्यों को दर्शाता है, यहाँ रोज उतार-चढ़ाव बना रहता है, परंतु नाम बहुत फैलता है। मंगल का दसवें में होना पुलिस, सेना, भवन निर्माण और शल्य चिकित्सा से जुड़े व्यापार को दर्शाता है, ऐसे में क्रोध पर नियंत्रण आवश्यक है, अन्यथा ग्राहक दूर चले जाते हैं। सूर्य का दसवें में होना सरकारी पहचान दिलाता है, परंतु अहंकार के कारण साझेदारियाँ टूटने का भय रहता है। शुक्र का दसवें में होना यह संकेत देता है कि उधार देने से बचना चाहिए, अन्यथा धन फँसने की स्थिति बनती है।

 

धन-वृद्धि योग तब बनता है जब दूसरे, ग्यारहवें और दसवें भाव के स्वामी तीनों ही केंद्र या त्रिकोण में स्थित हों, ऐसी दशा में व्यापार दिन दूना और रात चौगुना बढ़ता है, इसके लिए किसी विशेष परिहार की आवश्यकता नहीं, केवल धर्म के मार्ग पर चलते रहना पर्याप्त है। व्यापार-नाश योग तब बनता है जब दसवें का स्वामी छठे, आठवें या बारहवें भाव में चला जाए और शनि-राहु से पीड़ित हो, तो कर्ज, दिवालियापन और नौकरों द्वारा धोखा मिलने की स्थिति बनती है, इसका परिहार है दसवें स्वामी का रत्न धारण करना, शनिवार को पीपल को जल अर्पित करना और श्रमिकों को भोजन कराना। वाणी-दोष योग तब बनता है जब दूसरे भाव में केतु और मंगल एक साथ हों, तो ग्राहकों से झगड़ा और कटु वाणी के कारण व्यापार बंद होने तक की नौबत आती है, इसका परिहार है बुधवार को गाय को हरा चारा खिलाना और वाणी में मधुरता अर्थात मिश्री जैसी मिठास रखना। साझेदारी-भंग योग तब बनता है जब सातवें का स्वामी छठे, आठवें या बारहवें में हो अथवा शनि से दृष्ट हो, तो पार्टनर धोखा देता है, इसका परिहार है साझेदारी को सदैव लिखित रूप में करना और शुक्रवार को पत्नी को उपहार देना। अचानक-लाभ योग तब बनता है जब राहु ग्यारहवें में हो और उस पर गुरु की दृष्टि पड़ रही हो, तो लॉटरी, शेयर बाजार और क्रिप्टो जैसे माध्यमों से रातों-रात धन प्राप्त होता है, इसका परिहार है कि लाभ का दस प्रतिशत दान कर दिया जाए, अन्यथा राहु वह धन वापस ले लेता है।

 

ऋग्वेद, मंडल 10, सूक्त 117, मंत्र 5

मोघमन्नं विन्दते अप्रचेताः सत्यं ब्रवीमि वध इत् स तस्य। नार्यमणं पुष्यति नो सखायं केवलाघो भवति केवलादी॥

 

The foolish man obtains food in vain, I tell the truth it is his death. He feeds neither Aryaman nor friend, he who eats alone is sin alone.

 

व्यापार में सफलता का वैदिक सूत्र यही है कि अकेले मत खाओ। ग्राहक को, कर्मचारी को, पार्टनर को, सबको साथ लेकर चलो और सबको खिलाओ। इसकी विधि है कि प्रतिदिन व्यापार आरंभ करने से पहले ‘ॐ गं गणपतये नमः’ का ग्यारह बार जप करें, उसके बाद तुलसी के समक्ष धूप अर्पित करें। इसे जीवन भर प्रतिदिन करने का संकल्प रखें। इससे विघ्न दूर होते हैं और नये ग्राहकों का आगमन होता है।

 

बगलामुखी तंत्र, पटल 2, श्लोक 11

दशमस्थे पापखेटे विवादे शत्रुसंकटे। बगलां पूजयेद् धीमान् वाचं स्तम्भयते रिपोः॥

 

If malefics are in 10th, in dispute and enemy-trouble, the wise should worship Bagala. She paralyzes enemy’s speech.

 

मंत्र है ॐ ह्लीं बगलामुखि सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिव्हां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा। इसकी विधि है मंगलवार की रात दस बजे पीले वस्त्र धारण कर हल्दी की माला से एक सौ आठ बार जप करना। संख्या के रूप में इक्कीस दिनों तक कुल दो हजार दो सौ अड़सठ मंत्रों का अनुष्ठान करें। इससे कोर्ट केस, शत्रु बाधा, कर्जदारों का दबाव और नकारात्मक मार्केटिंग जैसी स्थितियाँ शांत होती हैं। प्रतियोगियों की वाणी स्तंभित हो जाती है।

 

आदित्य हृदय स्तोत्र, वाल्मीकि रामायण, युद्ध कांड, सर्ग 105, श्लोक 3

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान्। त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्॥

 

Seeing Aditya and reciting this, he obtained supreme joy. Sipping water thrice, becoming pure, the valiant took up his bow.

 

व्यापार को भी एक युद्ध के समान समझना चाहिए। इसकी विधि है प्रतिदिन प्रातः सूर्य को जल अर्पित करके आदित्य हृदय स्तोत्र के तीन श्लोकों का पाठ करना। इसे एक माला अर्थात एक सौ आठ दिनों तक निरंतर करें। इससे सरकारी अड़चनें, कर संबंधी बाधाएँ और लाइसेंस की कठिनाइयाँ समाप्त होती हैं। सूर्य दसवें भाव का नैसर्गिक कारक है, वह तेज, मान और प्रतिष्ठा प्रदान करता है।

 

इन वैदिक उपायों से विघ्नों का नाश होता है, प्रतिदिन नये ग्राहक जुड़ते हैं और मनोबल ऊँचा बना रहता है। दुकान और फैक्ट्री में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है, चोरी और अग्नि जैसी दुर्घटनाओं से रक्षा होती है। बगलामुखी की उपासना से शत्रु, कर्जदार, अपशब्द बोलने वाले और मीडिया ट्रायल जैसी स्थितियाँ स्तंभित हो जाती हैं। कोर्ट केस में विजय मिलती है, रुका हुआ धन वापस लौटता है। पार्टनर द्वारा धोखा देने की संभावना घटती है। आदित्य हृदय के पाठ से सरकारी टेंडर प्राप्त होते हैं, अधिकारी सहयोग करते हैं और बैंक से ऋण स्वीकृत होता है। यश इतना फैलता है कि ग्राहक स्वयं चलकर द्वार तक आ जाता है। इन तीनों उपायों के प्रभाव से दसवाँ भाव मानो सोना उगलने लगता है, ग्यारहवाँ भाव भरपूर हो जाता है और दूसरे भाव में साक्षात लक्ष्मी आकर विराजमान हो जाती हैं।

 

व्यापार केवल कुंडली से नहीं चलता, वह सबसे अधिक नियत से चलता है। दसवाँ भाव कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि ग्राहक को ठगा जाएगा तो शनि सब कुछ छीन लेता है। दसवाँ भाव यदि कमजोर भी हो, परंतु मेहनत और ईमानदारी बनी रहे, तो गुरु स्वयं मार्ग निकाल देता है। प्रतिदिन खाता-बही को स्वच्छ रखें, तिजोरी को आग्नेय कोण में न रखें, ईशान कोण में मंदिर स्थापित करें। नौकर को अपशब्द न कहें, क्योंकि वही शनि का रूप है। ग्राहक को भगवान के समान मानें, क्योंकि वही लक्ष्मी का स्वरूप है। मुनाफे का दस प्रतिशत दान करें, यही ग्यारहवें भाव का सच्चा धर्म है। झूठ बोलने से बचें, क्योंकि वही बुध का सिद्धांत है। समय पर कर चुकाएँ, क्योंकि वही सूर्य का अनुशासन है। सबसे बड़ा योग यह है कि प्रातः चार बजे उठें और एक घंटा अपने कार्य की योजना बनाने में लगाएँ। जो व्यक्ति चार बजे उठता है, लक्ष्मी उसके घर आठ बजे तक स्वयं पहुँच जाती है। अंतिम सूत्र यही है कि व्यापार में यदि डरोगे तो हारोगे, और यदि लड़ोगे तो जीतोगे। जैसे श्रीराम ने समुद्र पर सेतु बाँधा था, वैसे ही तुम बाजार में ग्राहक तक पहुँचने का सेतु बनाओ। जहाँ ग्राहक की सच्ची सेवा है, वहीं वास्तविक मेवा है।

नौकरी छोड़कर बिजनेस कौन कर सकते है।

व्यापार के सोए भाग्य को छठे भाव से जगायें

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